टिहरी के उस गांव में (8)

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पगडंडी के उतार में उतर ही रहे थे कि अचानक लगा जैसे तेज आंधी आ गई हो। चारों ओर देखा, लेकिन कहीं कुछ नहीं। जैसे अंधेरे में लहरों का शोर आ रहा हो या जैसे किसी पहाड़ी नदी में ऊपर कहीं बाढ़ आ गई हो। वही सुसाट-भुभाट। वही हू…हू…हू…सांय…सांय। कहां से आ रही थी वह धीरे-गंभीर आवाज? तभी लक्ष्मी ने कहा, “वहां ऊपर देखो, आकाश की ओर।”
हमने देखा, वहां ऊंचे रैंसुल और देवदार के पेड़ों के सिरे यहां से वहां झूम रहे थे। वे हवा के साथ ऊंची आवाज में बातें कर रहे थे जबकि नीचे माहौल बिल्कुल शांत था। हम तेजी से आगे बढ़ते रहे और काटेज के पास चले आए। देखा, मनु और अपर्णा भी आ चुके हैं। पता लगा, वे काफी ऊंचाई तक सुरकंडा पहाड़ पर चढ़े। आगे एक बड़ा पेड़ गिरा था जिससे रास्ता पार करना कठिन लगा और वे लौट आए।
DSC_719911खाना खाकर बाहर आए तो देखा खेतों में जुताई और पटेला लगाने की तैयारी चल रही है। खुशाल राणा दोनों बैलों को खेत में लाए और पाटा चलाने लगे। सधे हुए बैल थे। उनके नाक छेद कर उनमें लंबी रस्सी फंसाई हुई थी। राणा एक पैर और कभी-कभी दोनों पैर पटेले पर रख कर खड़े हो जाते। उनके और पटेले के भार से ढेले फूट कर जमीन समतल होती जा रही थी। वे थोड़ा रूके तो मैंने पूछा, “इन बैलों का नाम क्या है?”
वे चौंके, “नाम? हम तो ‘ब’ कहते हैं इन्हें।” वे पटेला चलाते हुए ‘ब’, ‘ब’ कहते थे और दोनों बैल सधे हुए कदमों से सीध में आगे चलते रहते। खेत के अंत में राणा कहते, “ह” और दोनों बैल एक साथ वापस मुड़ जाते। वे फिर रूके तो मैंने पूछा, “जब आप उनसे चलने के लिए ‘ब’ कहते हैं, तो उन्हें भ्रम नहीं होता कि आपने किससे कहा है? हमारे यहां तो दोनों बैलों के नाम होते हैं, जैसे इनमें एक काला-सफेद है और एक भूरा तो, हम नाम रखते कजारा और भूरा। नाम लेने पर उन्हें पता लग जाता कि किससे क्या कहा जा रहा है।”
राणा बोले, “सुना है, हमारे पुरखे भी नाम रखते थे। लेकिन, अब कोई नहीं रखता। ‘ब’ कह कर ही काम चल जाता है। वे समझ जाते हैं।”
“तब तो आप गायों को भी ‘ग’ कहते होंगे?”
वे बोले, “हां। नाम तो उनके भी नहीं रखते।”
मैंने कहा, “आप इनके नाम रख कर देखिए। ये आपकी बात और अच्छी तरह समझने लगेंगे।
मौसम को शायद पता लग गया था कि अगली सुबह हम वापस लौट रहे हैं। वह पहले दिन की ही तरह रंग में आ गया। दोपहर बाद आसमान पर बदली छाने लगी और धीरे-धीरे आसमान बादलों से भर गया। शाम होते-होते सांय-सांय हवा चलने लगी। मोरू के पेड़ आज फिर सरगोशियां करने लगे। हम गर्म कपड़ों में लदे-फंदे बैठे बातें करते रहे। बीच-बीच में ठंडी हवा दरवाजे पर दस्तक दे जाती। बाहर खट-पट सुनी तो देखा भरत कैम्पफायर के लिए लकड़ियां लाया है। हमने दरवाजे से मुंह निकाल कर कहा, “नहीं भरत, नहीं। आज कैम्पफायर नहीं चाहिए। इस हवा में बाहर बैठ ही नहीं सकते।” वह चला गया। बाद में खाना खाने के लिए बुलाने आया। कांपते-ठिठुरते खाना खाया और लौट कर बिस्तरे में दुबक गए। मोरू के पेड़ रात भर जोर-जोर से बोलते रहे और मदमस्त हवा सीटियां बजाती रहीं।
सुबह हवा शांत थी। अपर्णा ने कहा, “रात भर तेज ठंडी हवा चल रही थी, फिर भी कोई बाहर बरामदे की लाइट को कभी आन करता और कभी आफ।” लक्ष्मी ने समझाया, “यह काम भी तेज हवा ही कर रही थी। बल्ब ढीला है, वह उसे हिलाती थी। इसलिए कभी वह जलता और कभी बुझता जाता था।” खैर, धूप खिली। हम चाय पी ही रहे थे कि देखा, तमाम अबाबीलें मस्त होकर हवा में गहरे गोते लगा रही हैं। उनमें से दो-एक खाना खाने के कमरे के भीतर भी आकर छत की लकड़ियों पर बैठतीं और चहक कर उड़ जातीं। मैंने मनीष से कहा, “गांव में मेरे पिताजी अबाबीलों को इस तरह गोते लगाते हुए देखते तो कहते थे- अब वर्षा होगी। वे इन्हें ‘गोंतली’ कहते थे। लगता है, यहां भी वर्षा होगी।”
हमने नाश्ता किया और चलने की तैयारी करने लगे। तभी पास की पहाड़ी से चकोरों की तेज आवाज आने लगी। ऋचा और अपर्णा कैमरा लेकर उनके फोटो खींचने की कोशिश करने लगीं। वे उस ओर देख ही रही थीं कि पत्थरों की दीवार पर एक चकोर आकर बोलने लगा- चाकुर…चाकुर…चाकुर! तभी दूसरा चकोर भी उसके पास आ खड़ा हुआ। लगता था, उन्हें पता लग गया है कि हम वापस लौट रहे हैं। कल तक तो वे छिपे ही रहते थे। आज बाई-बाई करने आ गए! हमने उनकी छवि हमने अपने मन और कैमरे में सहेज ली। फिर हम जंगल से होकर वापसी यात्रा पर निकल पड़े। हमें विदा करने के लिए मनीष के साथ ही खुशाल राणा, उनका बेटा नितिन और भरत साथ चले।
जंगल पार करके बुरांश के तोरण द्वार से आगे बढ़ ही रहे थे कि रोज आसपास चहकने वाली छोटी-सी धानी रंग की चिड़िया बिल्कुल पास में तेज-तेज चहकने लगी- स्वीह्…स्वीह्…स्वीह्! हम पेड़ की शाख पर देखने लगे कि वह कहां बैठी है, कि तभी पीछे से मनीष तेजी से आकर यह बोलते हुए आगे बढ़ गए, “वह कह रही है कि कुछ दिन और रूकिए, अभी क्यों जा रहे हैं!” हम कुछ जवाब देते, तब तक मनीष मुख्य मार्ग पर खड़ी टैक्सी तक पहुंच गए। हमने उन सभी साथियों के साथ दो-एक यादगार तस्वीरें लीं जिनकी पृष्ठभूमि में विशाल हिमालय खड़ा था।
फिर उन सभी साथियों को, उन पेड़ों, पहाड़ों और चिड़ियों को, बुरांश के खिले फूलों, शीतल हवा और हिमालय की धवल चोटियों को अलविदा कहा और वापसी यात्रा शुरू की। हद है, सिर्फ तीन दिन वहां रहे, फिर भी उस जगह को छोड़ने पर निशाश जैसा जाने क्यों लग रहा था। हम भावुक हो रहे थे, इसलिए काफी दूर तक आपस में बिना बोले, चुपचाप चलते रहे।
(समाप्त)

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