टिहरी के उस गांव में (7)

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दिल्ली से लगभग 300 किलोमीटर दूर, टिहरी गढ़वाल के ऊंचे पहाड़ पर बसे इस गांव में सुबह के दृश्य भी बड़े मनमोहक लगते थे। इसलिए रोज सुबह का इंतजार रहता था। मुंह अंधेरे उठने का लाभ यह था कि आकाश के रंगमंच पर रोमांचक परिवर्तनों को देख सकते थे। धीरे-धीरे रात की काली यवनिका हटती और उसके साथ ही रंगमंच के जगमगाते सितारे विदा हो जाते। चांद के घटने के दिन थे, इसलिए इन दिनों वह सुबह की वेला में ही पूर्व के आसमान में बारीक-सा नजर आता था। आज तीसरे दिन भी फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी का बारीक चांद बमुश्किल ही पूर्व में नजर आया लेकिन बेटी ने कैमरे में उसकी छवि उतार ही ली। अच्छा हुआ, अगले दिन तो चांद को छुट्टी पर रहना था और हमें वापस लौटना था।

तारे विदा हुए और आसमान के रंगमंच पर चमकता सूर्य निकल आया। कल की तरह आज भी पहाड़ों पर गुनगुनी धूप खिल उठी  हालांकि हवा में ठंडक थी। चाय पीते-पीते सुबह की धूप का आंनद लेने के लिए हम रसोईघर के पास जाकर लकड़ी के टुकड़ों पर बैठ गए। मैं मनीष को देख रहा था जो केवल एक पतली टी-शर्ट, नेकर और चप्पल में यहां-वहां आते-जाते नहाने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें देख कर ध्यान आया, अरे हमें तो यहां नहाने का ख्याल ही नहीं आया! मैंने मनीष से कहा, “नहा रहे हैं क्या?”

वे बोले, “हां, सुरकंडा जा रहे हैं, सोचा नहा कर चलें।” मैं सोच रहा था, प्रकृति अपनी गोद में पलने वाले प्राणियों को सहने की कितनी क्षमता दे देती है? इस ठंड में भी मनीष इतने कम कपड़ों में आराम से चल-फिर रहे हैं, नहा रहे हैं?

उनसे पूछा, “आपको ठंड नहीं लगती?”

वे बोले, “पहले लगती थी। धीरे-धीरे ठंड सहने की आदत पड़ गई। यहां तो रोज नहाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। हफ्ता-दस दिन में नहा लें, तब भी चलता है।”

DSCN0883बेटी झाड़ियों पर बैठी चिड़ियों के फोटो खींच रही थी। उसने आकर एक फोटो दिखाया। झाड़ी पर छोटी-सी खूबसूरत काली-सफेद टिट् बैठी हुई थी। दूसरे फोटो में एक शाख पर यलो वेंटेड बुलबुल बैठी धूप का आनंद ले रही थी। लक्ष्मी ने हमें बताया, “अभी रसोई के पीछे, एक ही झाड़ी पर दस-पंद्रह बुलबुलें खेल रही थीं।”

रसोई में पराठे बनाने की तैयारी चल रही थी। लक्ष्मी ने कहा, “चलो, आलू के पराठे मैं बनाती हूं।” राणा जी मूली के पराठे बनाने की तैयारी में जुट गए। पराठे बने, खाए और और हम अपने-अपने गंतव्य की ओर चल पड़े यानी सुरकंडा पहाड़ और जंगल की सैर पर। मैंने चलते-चलते लक्ष्मी और ऋचा से कहा, “हम जंगल से मिलने जा रहे हैं, इसलिए वहां हर चीज को गौर से देखेंगे और महसूस करेंगे। खेतों को पार करते हुए सामने भव्य हिमालय के के दर्शन हुए। जंगल शुरू होते ही दो-एक लाफिंग थ्रस झाड़ी में फुदकती दिखीं। तिरछी पगडंडी के दोनों ओर इस जंगल के बहुत पुराने और आसमान को छूते एबीज पिंड्रो यानी रेंसुल के मोटे पेड़ थे। हम उन्हें छूते, उनसे मिलते आगे बढ़ते रहे। मुझे रिटायर्ड वन अधिकारी जीवन मेहता जी के शब्द याद आ गए कि कभी वे यहां कानाताल के जंगलों में आया करते थे। मैं तो तय करके ही आया था कि बुजुर्ग पेड़ों को उनकी याद दिलाऊंगा। इसलिए मैंने कुछ उम्रदराज पेड़ों से उनके बारे में बात की- रैंसुल से, देवदार और बुरांश से भी। मैंने कहा, “याद है आपको, पचास-साठ वर्ष पहले आपसे मिलने एक वन अधिकारी आया करते थे-जीवन सिंह मेहता? वे अब भी आपको याद करते हैं।” मैं तने पर हाथ लपेटे उनकी बात सुनने की कोशिश करता। वे अपने ऊंचे सिर से सांय-सांय की भाषा में कुछ कहते थे। शायद कहते हों कि हां, उन्हें भी याद है। एक बुजुर्ग बुरांश की तो गोद में बैठ कर मैंने ये बातें कीं।

पगडंडी अब ऊपर चढ़ने लगी। हमने धीरे-धीरे उसे पार किया और ऊपर समतल में पहुंचे। यह वही जगह थी जहां परसों आते समय हमने बर्फ की सफेद कालीन देखी थी। आज हम वहां देवदारूओं की छांव में गए और बर्फ के पास बैठे। इस जगह से आगे मिश्रित जंगल था। उसमें कई प्रजातियों के छोटे-बड़े पेड़ प्रेम से रहे थे। वहां देवदार के वृक्ष तो थे ही, थुनेर, बुरांश, अंयार, कांचुला (एसर) या किरमोली, बांज (ओक), मोरू या तिलौंज, खर्सू आदि के भी पेड़ थे। बीच-बीच में खिले बुरांश हरियाली में लालिमा बिखेर देते थे। हमने वहां कई पेड़ों से  मुलाकात की। पेड़ों के साथ खड़े होकर कई बार हिमालय के मनोरम दृश्य देखे।

मुझे बार-बार तोरण द्वार-सा वह बुरांश का वृक्ष याद आ रहा था जो परसों देखा था। बांटुली (हिचकी) लग रही थी। मुझे लगा, जरूर वही बुरांश याद कर रहा होगा। इसलिए हम कानाताल की पहाड़ी के ऐन सामने, गांव के सिरहाने उस जगह आज फिर पहुंचे। सुर्ख फूलों की भाषा में खिलखिलाता बुरांश वहीं विशाल हिमालय को देखता हुआ खड़ा था। उसकी संगत में फिर फोटो खींचे। लौटे तो उस कच्ची पगडंडी से ऊपर खड़ी चढ़ाई में एक बुरांश पर आई बहार दिखाई दी। थके तो थे लेकिन मन नहीं माना और उससे मिलने चले गए।

उससे नीचे एक मकान था जिसके आंगन से सटे दो पर्णविहीन पेड़ अब भी शीत समाधि में ही खड़े थे। उन्हें पता ही नहीं था कि वसंत आ गया है और बुरांश खिल चुके हैं।

17389227_10208322645895305_4515389182059112679_oऊपर जाकर देखा, वहां चौरस खेत था जिसके किनारे मेंड़ पर वह बुरांश खिला था। बुरांश के उस वृक्ष ने जैसे सुर्ख फूलों का मुकुट पहना हुआ था। केवल दो फुनगियों पर ही फूल खिले हुए थे। उसी की कतार में हिमालय को ताकते कुछ और पेड़ खड़े थे जिन्होंने उस चोटी पर मौसम की मुश्किलें झेली थीं। उनकी कद-काठी कठिन समय को साहस के साथ झेलने की कहानी बयां कर रही थी।

हम उनसे मिल कर वापस लौटे। कितना सुकून था वहां की शीतल हवा और पेड़ों की छांव में। कई जगह धानी रंग की नन्हीं चिड़ियां शाखों पर भागती-खेलती चहक रही थीं। काश, हम उनकी भाषा समझते। हो सकता है, वे उन पेड़ों और उस जंगल के बारे में ही गीत गा रही हों। कौन जाने?

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