टिहरी के उस गांव में (6)

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हम धीरे-धीरे बातें करते, पगडंडी पर आगे बढ़ते जा रहे थे कि मेरे दाहिनी ओर बहुत पास में अचानक ‘भद-भद-भद’ की आवाज हुई और एक झाड़ में छिपा चकोर पंख फड़फड़ा कर नीचे जंगल की ओर उड़ गया। इस आवाज को बचपन से पहचानता हूं इसलिए अचानक आई आवाज से अचकचाया नहीं। चकोर छिपने में माहिर होते हैं। बिल्कुल पास पहुंच जाने तक भी उनका पता नहीं लगता और बहुत पास पहुंचने पर वे अचानक पंख फटफटा कर उड़ जाते हैं।

पगडंडी पार कर हम खेतों में पहुंचे तो देखा ठीक ऊपर के खेत में आलू बोया जा रहा है। लक्ष्मी बोली, “चलो, हम भी आलू लगाते हैं।” हम उनके पास गए। लक्ष्मी ने उनसे बातचीत शुरू की। वहां अम्मा यमला देवी थीं, उसकी बहू यशोदा और दो पोतियां थीं।

“क्या मैं भी आपके साथ आलू बो सकती हूं? हम अपने गांव में भी बोते हैं,” लक्ष्मी ने कहा।

WP_20170224_01511“हां, हां क्यों नहीं। आओ लगाओ,” अम्मा बोली। लक्ष्मी ने आलू के बीज काटने में मदद की। फिर दो कतारों में आलू के टुकड़े बो कर कहा, “अम्मा, जब आलू की फसल तैयार हो जाए तो इन दो लाइनों के आलू रख देना। हम आएंगे और उनकी सब्जी खाएंगे।”

अम्मा खुश हो गईं। बोली, “हम जरूर रख देंगे। तुम लोग आना।” फिर प्यार से पूछा, “बच्चे कितने हैं?”

“तीन बेटियां, एक बेटा,” लक्ष्मी ने कहा।

“अच्छा। बेटियां बहुत अच्छी होती हैं। दिन भर काम में लगी रहती हैं,” अम्मा ने कहा। इस बीच मैं आकर नीचे काटेज के आंगन में बैठ गया था। लक्ष्मी ने बाद में हंसते हुए बताया, “तुम आ गए तो अम्मा ने तुम्हारी ओर इशारा करके पूछा, “अच्छा, वो तुम्हारा बुड्डा है?”

“तो तुमने क्या कहा?” मैंने पूछा।

“मैंने कहा ‘हां’।”

“ठीक है, ठीक है, कल मैं जाकर उनको बताऊंगा तुम मेरी बुड्डी हो!” और, हम दोनों ठठा कर हंसे।

DSC_670511हम फर्सत से आंगन में और बगल के बिना जुते हुए खेतों में बैठ कर, बातें करते धूप तापते रहे। भोजन कक्ष की बगल में सौर कुकर हमारे लिए कुकर में भात-दाल बना चुका था। राणा जी की आवाज सुनाई दी, “खाना तैयार है। आइए, रोटियां बना रहा हूं।” हम गए और तने के गोल टुकड़ों की मेज-कुसियों पर बैठ कर खाना खाया। बातें करते-करते थोड़ा विश्राम किया। मनीष ठीक ही कहते थे, यहां आपस में बातें करने के लिए हमारे पास सचमुच कितना समय था! दिल्ली की ज़िदगी में तो लगता है किसी के पास कोई समय ही नहीं है। थोड़ा समय था भी तो वह अब मोबाइल फोन ने छीन लिया है। यहां अच्छा था कि नेटवर्क कभी-कभी ही मिलता था।

देर दोपहर चाय पीकर हम फिर पास की छोटी पहाड़ी की ओर निकल गए। सूरज सुरकंडा की पर्वतमाला की ओर उतरने की तैयारी कर रहा था। ढलते सूरज के साथ खेलने के लिए दो-चार छोटे बादल भी चले आ रहे थे। दिन भर चटख धूप थी। अब वह पश्चिम की ओर से पेड़ों-पहाड़ों पर तिरछी पड़ने लगी। बाईं ओर घने जंगल के पेड़ों की फुनगियों पर सुनहरी धूप खेलने लगी। हरिऔध के ‘प्रिय प्रवास’ की शुरूआती पंक्तियां साकार होने लगीं: ‘दिवस का अवसान समीप था/गगन था कुछ लोहित हो चला/तरु शिखा पर थी अब राजती/कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा!’

पहाड़ों के पार सूरज विदा हुआ। उसे गया हुआ जानकर हवा भी ठंडक लेकर लौट आई। मोरू के पेड़ धीरे-धीरे हवा से बातें करने लगे। चिड़ियां भी लौट आईं। वनवासी गौरेयां आसपास की झाड़ियों पर बैठ कर चहकने लगीं मानों रात का अंधेरा घिरने से पहले-पहले दिन भर की बातें पूरी कर लेना चाह रही हों।

लेकिन, मुझे तो आज शिद्दत से रात का इंतजार था। अंधेरी, तारों भरी रात का इंतजार। आज मैं सितारों की उस दुनिया को अपने शब्दों में उतार लाने वाले गुलजार की नज़्म को पढ़ते-पढ़ते आसमान को देखना चाहता था। तो, धीरे-धीरे अंधेरा गहराने लगा। पश्चिम के आकाश में आज फिर वीनस यानी शुक्र ग्रह जगमगा उठा और चमकीले लुब्धक तारे के आते ही एक-एक कर फिर से तारों की बारात सज गई। हमारे चारों ओर नीम अंधेरे में डूबे पहाड़ थे। कहीं-कहीं रोशनियां जगमगा रही थीं। खाना बन गया था। हम खाना खाकर काटेज में चले आए।

ठंडक बढ़ने लगी तो भरत आकर आंगन में कैंपफायर जला गया। आग तापते हुए मैंने जेब से अपनी छोटी डायरी निकाली, आंगन के कोने में जाकर भर-नज़र तारों भरे आसमान को देखा और डायरी के पन्नों से गुलज़ार की नज़्म उभरने लगीः

रात हमेशा स्याह नहीं होती है

वो ज़र्द भी होती है, खाकिस्तरी भी, सुरमई भी।

रात के रंग देखने हों तो

कभी पहाड़ों पे चलो

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है।……

हम पांचों सुन रहे थे नज़्म का शब्द-शब्द। रात घिरने के बाद से ही रात के रंग भी देख रहे थे और आसमान को भी। यह भी देख रहे थे कि कविता किस तरह आसमान के अद्भुत मंजर को शब्दों में उतार रही थी और वे शब्द कानों की राह भीतर जाकर कैसे हमारे मन के कैनवस पर आकाश की हू-ब-हू उसी तस्वीर में तब्दील हो रहे थेः

आसमान बुझता ही नहीं

और, दरिया रौशन रहता है

इतना जरी का काम नज़र आता है

फलक पर तारों का

जैसे रात में प्लेन से रौशन शहर दिखाई देते हैं।…..

हम कभी उस पहाड़ी गांव के आसमान में आर-पार फैले रौशन दरिया ‘आकाशगंगा’ को देखते और कभी आसमान के आंचल में ज़रदोजी से जड़े सलमे-सितारों के काम को देख कर हवाई जहाज से दिखती किसी शहर की जगमगाती रोशनियों की कल्पना करने लगते।

देर रात तक नज़्म में तारों भरा आसमान उतरता रहा और जब गुलज़ार के शब्दों में नज़्म भी आधी आंखें खोल कर सोने लगी तो हम भी अधमुंदी आंखों से अपने कमरे में सोने चले गए।

ठंड तो थी लेकिन रात कल की तरह सिहराने-कंपाने वाली शिशिर की रात नहीं थी। आग तापते बातों-बातों में हम लोगों ने पहले ही तय कर लिया कि कल मनु-अपर्णा तो मनीष के साथ जंगल के रास्ते ऊंचे सुरकंडा पहाड़ पर चढ़ेंगे और मैं, लक्ष्मी और ऋचा जंगल की सैर पर जाएंगे। मुझे शरीर की ऊर्जा बचा कर रखनी थी। यह ध्यान रखना था कि मांसपेशियां हद से अधिक न थक जाएं क्योंकि एक दिन के बाद दिल्ली लौट कर मुझे राजस्थान के अजमेर जिले की ओर कूच करना था।

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