टिहरी के उस गांव में (5)

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लगता था नीचे कहीं घाटियों से ऊपर उठ कर आ रही है वह गूंजती हुई आवाज और पहाड़ों की इन वादियों में गूंज रही है।….मैंने आंखें बंद कर लीं और उस आवाज को सुनने लगा…

रात के रंग देखने हों तो

कभी पहाड़ों पर चलो

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है….

मैं ‘वाह’ कहता सुनता रहा, और सोचने लगा, मनीष ने आखिर ठीक इस समय यह शानदार नज़्म क्यों लगा दी होगी? नज़्म भी उसी शायर की आवाज़ में। और गा भी कौन सकता था इन्हें इतनी शिद्दत के साथ?

समझा, मनीष ने मुझे रात को पूरी शिद्दत और मोहब्बत के साथ आकाश को निहारते हुए देखा था, तभी इसे लगाया होगा। वे गुलजार थे और सुरमई रात पर उन्हीं की नज़्म थी यह। हवा में नज़्म गूंज रही थी और मुझे अपनी बंद आंखों के आकाश में कल रात का पूरा मंजर दिखाई दे रहा था। मैं सुबह के उजाले में आंखें बंद करके रात को जीने लगा। फिर उठा और बाहर धूप में आकर मनीष से कहा, “मुझे ये चंद लाइनें नोट करनी हैं। मैं आज रात गीतकार गुलज़ार के शब्दों के साथ आसमान देखना चाहता हूं।” वहीं बैठ कर मैंने नज़्म की वे लाइनें अपनी डायरी में नोट कर लीं।

DSCN099611हमने तय किया कि आज दोपहर को खाना खाकर जंगल में पानी के उस स्रोत को देखने चलेंगे, जहां से पीने का पानी लाते हैं। तब तक हम आसपास चिड़ियों और तितलियों को देखेंगे। रसोई के पीछे झाड़ी पर बुलबुलें चहक रही थीं और धूप में काटेज के पास पेड़ पर गौरेयों की टोली एक-दूसरे का पीछा कर रही थीं। एक टहनी पर बैठी गौरेया को देख कर बेटी ने पूछा, “यह गौरेया लगती है लेकिन सिर और पीठ गेरूवा रंग से रंगे हैं?”

शायद उसने भी गाया होगा- ‘रंग दे तू मोहे गेरूवा!” मैंने हंसते हुए कहा। फिर बताया, “ये गौरेया की ही वनवासी बिरादर हैं। घरों के आसपास पाई जाने वाली गौरेया को जीव विज्ञानी पासेर डोमेस्टिकस कहते हैं यानी मनुष्यों से हिली-मिली, घरेलू गौरेयां। लेकिन, वनवासी गौरेया का नाम है- पासेर रुटिलेंस। लैटिन भाषा में रुटिलेंस का अर्थ होता है ललछोंह यानी गेरुवा। प्रकृति ने इन वनवासी गौरेयों को गेरुवा रंग दिया है। ये यहां हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती हैं और घरेलू गौरेयों के साथ भी हिल-जुल कर रह लेती है। मैंने तो नैनीताल में जोशी विला के आंगन में दस-पंद्रह घरेलू गौरेयों के झुंड में एक अकेली गेरुवा गौरेया को कई बार देखा है।”

हम काटेज के आंगन में आकर धूप में बैठे और चारों ओर का नजारा देखने लगे। ऋचा कैमरा खेतों की ओर साध कर फोटो लेने लगी तो मैंने पूछा, “वहां क्या है?”

“वह नीली चिड़िया,” उसने खेत की ओर इशारा करते हुए कहा। वहां नीली चिड़िया यहां-वहां देखती-रुकती आगे बढ़ रही थी। “वाह कलचुड़िया!” मैंने कहा, “हमारे गांव में इसे कलचुड़िया कहते हैं और अंग्रेजी में ब्लू ह्विसलिंग थ्रस। क्री ई ई ई की मधुर सीटी-सी आवाज में चहकती है।” पास जाने पर उड़ जाती, इसलिए बेटी ने दूर से ही उसका फोटो खींचा। वह गई तो वहीं आसपास घास में फुदकती मुसिया चड़ी दिखाई दे गई। चूहे की तरह भूरे रंग की और चूहे की ही तरह चूं-चूं करती, चट-पट फुदकती इस चिड़िया को इसीलिए मुसिया चड़ी कहते हैं। पहाड़ में चूहे को मुस कहते हैं।

“लेकिन सूर्योदय के बाद सुबह तो यह बड़ी मधुर आवाज में गा रही थी?”

“हां, गा रही थी। गा क्या रही थी, जैसे मीठी आवाज़ में खिलखिला रही थी। तभी तो अंग्रेजी में यह लाफिंग थ्रस कहलाती है। यह भी यहां हिमालय क्षेत्र में पाई जाती है। ”

तभी मनीष आ गए। साथ में राणा जी का छोटा-सा बेटा नितिन और उसका दोस्त। हम लोग जंगल में पानी का स्रोत देखने निकल गए। देवदार, रैंसुल, थुनेर, अंयार और बुरांश के पेड़ों के बीच एक संकरी पगडंडी पर चलते हुए हम घने पेड़ों के बीच कभी धूप, कभी छांव में चलते स्रोत तक पहुंच गए। वहां पानी की अंगूठे बराबर मोटी धार गिर रही थी, जिस के नीचे कनस्तर या जरीकेन लगा कर उसे भरते हैं। पानी के इसी स्रोत पर सरकार ने किसी योजना के तहत सीमेंट-कंक्रीट की छोटी-सी डिग्गी बना कर पाइप लाइन से भमौरीखाल गांव में पीने का पानी पहुंचाया है। बेहद ठंडा मगर मीठा पानी था। देवदार वन के सभी पेड़ों ने अपनी गहरी जड़ों और उस वन की माटी ने जैसे अपनी पूरी मिठास और खनिज उस पानी में घोल दिए थे। मैंने मन ही मन उन पेड़ों और पहाड़ को नमन किया जिन्होंने उस सूखे पहाड़ को अपनी छांव से शीतल बना कर पानी की अमृत धार भी दी है। वहां भमौरीखाल गांव के एक राणा जी बैठे है। उनसे बातें हुई तो मैंने कहा, “जब तक यह जंगल है, यह हरियाली है, तभी तक यहां यह अमृत धार भी बहेगी।”

बोले, “ यह तो सच बात है।”

DSCN07221वहां से हम लौटे। मनु, अपर्णा और गांव के दोनों बच्चे मनीष के साथ नीचे भमौरीखाल गांव देखने निकल गए। मैं, बेटी और लक्ष्मी पगडंडी से वापस लौटे। रास्ते में कुछ खूबसूरत जंगली फूल देखे, खिले हुए, सुर्ख बुरांश भी देखे और पेड़ों पर यहां-वहां चहकती नन्हीं चिड़ियों को देखा। पेड़ों पर मौस और लाइकन भी काफी थे। राह में किसी सूखी, टूटी हुई टहनी के टुकड़े पर एक मनमोहक लाइकन मिला। मौस देख कर इसलिए खुशी होती है कि यह स्पंज की तरह नमी बनाए रखता है और नन्हे कीटों को आश्रय देता है। लाइकन एल्गी यानी शैवाल और फंगस की अटूट दोस्ती का प्रतीक है। इन दोनों की दोस्ती है, इसलिए लाइकन है अन्यथा तो ये दो अलग वनस्पतियां हैं। दूसरी खासियत इनकी यह है कि ये वहीं पनपते हैं, जहां प्रदूषण न हो। यानी, इस इलाके में हवा में कोई प्रदूषण नहीं है।

 

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