टिहरी के उस गांव में (4)

 

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मैं सूर्योदय के बदलते रंग देखना चाहता था, इसलिए टकटकी लगाए हिमालय को देखता रहा। कनखियों से पूर्व में पहाड़ों के ऊपर बढ़ती उजास को भी देख लेता था। अचानक हिमालय की चोटियों पर शेडिंग होने लगी। प्रकाश और छाया का प्रभाव दिखाई देने लगा। सहसा चोटियों पर सफेदी पुतने लगी। और, पूर्व दिशा में पहाड़ों के बीच से आती स्वर्णिम उजास ने चोटियों पर भी सुनहरा रंग फेर दिया। फिर जल्दी ही उन पर सफेदी पुतने लगी और हिमालय की धवल चोटियां चमक उठीं। साथ ही उस रंगरेज सूरज ने पूर्व की पर्वतमाला से धीरे से अपना मुंह निकाल कर झांका।

सूरज क्या निकला कि चारों ओर धूप की चादर फैल गई। चराचर जगत जाग उठा। मोरू के पेड़ों और आसपास की झाड़ियों पर नन्हीं चिड़ियां प्रभाती गाने लगीं। गौरेयों की टोली खनकते घुंघरूओं की आवाज में चहचहा रही थीं तो धानी रंग की नन्हीं चिड़िया अपनी साथिन के साथ गाने लगी- स्वीट….स्वीट…स्वीट! खेतों की मेंड पर झाड़ पर फुदकती स्ट्रीक्ड लाफिंग थ्रस यानी मुसिया चड़ी भी मधुर तान छेड़ने लगी। एक और चिड़िया गाती थी- स्वीहू…स्वीहू…स्वीहू! सूरज और उसकी धूप देख कर कितनी खुश थीं वे। तभी सामने की पहाड़ी पर दो-एक चकोर बोले- चाकुर….चाकुर…चाकुर!

अब तक हम सभी जाग चुके थे। अपर्णा कैमरा लेकर सामने की पहाड़ी की ओर निकल गई। वहां से आरपार पूरा हिमालय दिखता होगा। राणा जी के हाथ की बनाई चाय पीकर हम भी उस ओर निकले। आगे-आगे मैं था। सुबह की गुनगुनी धूप से शरीर में नई जान आ गई। खुद को विश्वास नहीं हो रहा था कि रात को कितनी ठंड थी। मैं चलता रहा। सामने स्लेटों की ढालू छत वाला, सफेदी पुता एक छोटा-सा घर दिखा। थोड़ा और ऊपर धार यानी चोटी थी। वहां पहुंचा ही था कि देखा मनीष भी आ गए हैं। चोटी पर उस घर के बारे में पूछा तो बोले, “एक बुजुर्ग महिला का है। आजकल वे नीचे गांव में रह रही हैं।”

“यहां अकेली रहती हैं?”

“हां। घर के आसपास खेती भी करती हैं,” उन्होंने कहा तो मैं बोला, “मनीष जी, यह शांति और सुरक्षा यहीं हमारे पहाड़ों में संभव है, प्रकृति की संगत में। शहरों में तो उम्रदराज लोगों की कोई सुरक्षा ही नहीं है और न वे ‘बैठे ठाले’ की ज़िदगी में कोई शारीरिक मेहनत ही कर सकते हैं। पार्कों में नकली हंसी हंसते और ताली बजाते कितने दिन कट सकते हैं?”

हम दोनों उस समय अकेले थे। मैंने पूछ लिया, “आप कह रहे हैं कि गाजियाबाद के रहने वाले हैं। फिर, आपने यह कठिन जीवन क्यों चुना?”

“सच पूछिए तो मुझे लगा मुझे अपना पूरा मानसिक और शारीरिक रूपांतरण करना होगा। इसके लिए मुझे प्रकृति की गोद में लौटना होगा। मैंने यही किया। यहां आया, लोगों से मिला। शुरू में मैं ‘बाहरी’ और ‘देसी’ आदमी माना गया। यह स्वाभाविक भी था। लेकिन, जब मैं यहां थोड़ा जमीन खरीद कर यहीं के लोगों की तरह, उनके साथ जीने लगा तो लोगों ने मुझे अपना लिया, अपना मान लिया,” मनीष ने बताया।

“आप यहां क्या करना चाहते थे?”

“खेती और ग्रामीण पर्यटन’। उद्देश्य एक ही रहा और रहेगा कि जो लोग प्रकृति से दूर हो गए हैं, शहरों में फ्लैटों के बंद कमरों में रह रहे हैं, उन्हें फिर प्रकृति में लाने की कोशिश करूं। भले ही, कुछ ही दिन सही, लेकिन उन्हें लगे कि प्रकृति की गोद में रहने का अर्थ क्या है। यहां जीए हुए उनके दिन, उन्हें सदा प्रकृति की याद दिलाते रहेंगे। वे प्रकृति से प्रेम करते रहेंगे,” मनीष ने कहा।

“इसीलिए जीरो-स्टे नाम दिमाग में आया कि शहरों की आपाधापी से जीरो डाउन करके कुछ दिन प्रकृति की गोद में आइए। यहां आकर शहरों की भौतिक सुविधाओं से दूर न्यूनतम प्राकृतिक सुविधाओं में रहिए। प्रकृति का स्नेह, उसकी याद लेकर लौटिए।”

ऊपर चोटी में पथरीली मिट्टी और पत्थरों का एक अनगढ़ सा, आधा खोदा गया गड्ढा दिखाई दिया। पता लगा, किसी सरकारी योजना का रेन हार्वेस्टिंग पिट है। कागजों पर हो सकता है पक्का और भरपूर गड्ढा हो। चारों और पहाड़ों पर दूर-दूर माचिस की डिबिया जैसे मकान दिखाई दे रहे थे। चोटी से ठीक नीचे भमौरीखाल गांव के सीढ़ीदार मगर अधिक चौड़े और चपटे मकान भी दिखाई दे रहे थे। हम चीड़, अंयार, बांज, बुरांश के छोटे-छोटे पेड़ों और किलमोड़े की झाड़ियां पार कर थोड़ा नीचे उतरे और सामने का दृश्य देख कर, देखते ही रह गए। बाएं से दाएं जहां तक नजर जाती थी, वहां तक भव्य हिमालय खड़ा था। दिनकर की पंक्तियां गूंज गई दिलो-दिमाग में: ‘मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट!’

“चोटियों को पहचान रहे हैं?” मनीष ने पूछा।

मैंने कहा, “सामने दाहिनी ओर चैखंबा की चोटी तो साफ पहचान में आ रही है।”

“वह देखिए, उसके एक ओर नीलकंठ और कामेट हैं। बाईं और केदारनाथ और कीर्तिस्तंभ। उधर गंगोत्री ग्रुप की चाटियां हैं। इधर आगे बाईं और बंदरपूंछ। और, बंदरपूंछ के पास ही कालानाग और फिर सीढ़ियों जैसी स्वर्गारोहण चोटी। यहां से चार ही सीढ़ियां दिखाई दे रही है। कहते हैं, सात हैं। महाभारत की वह कथा आपने सुनी होगी कि अंत में धर्मराज युधिष्ठिर ने हिमालय में जाकर स्वर्गारोहण किया था,” मनीष ने बताया।

भव्य हिमालय के ऐन सामने की ठंडी हवा, पानी और चलते-फिरते रहने के कारण हमें खासी भूख लग जाती थी। नाश्ते का समय हो गया था। हम चोटी से उतर कर रसोई की ओर आए। सामने दक्षिण में सुरकंडा का ऊंचा पहाड़ सिर उठाए खड़ा था। पैताने से ही लगता था, जैसे विशाल चट्टानों से बना हो वह। कहीं-कहीं तो सिर्फ चट्टानें दिख रही थीं, जिन पर न घास उगी थी, न पे़ड़-पौधे। आधे पहाड़ पर सुबह की धूप की चादर फैल चुकी थी।

नाश्ता लग चुका था। मैं लकड़ी के गोल टुकड़े पर बैठ कर नाश्ता करने लगा। मनीष ने मेरे सामने अपने मोबाइल से जोड़ कर उड़नतश्तरीनुमा एक छोटा-सा सुर्ख स्पीकर रख दिया। पहला ही कौर मुंह में लिया था कि धीरे-धीरे एक भारी गहरी आवाज हवा में गूंज उठी।

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