टिहरी के उस गांव में (3)

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….एकदम साफ आसमान के रंगमंच पर तारे उगने लगे। दक्षिण-पूर्व के आसमान में एक और हीरा चमकने लगा। नजरें उससे ऊपर उठीं तो वहां कतार में त्रिकांड के तीन तारे नजर आ गए। ओह, तो यह व्याध यानी ओरायन तारामंडल है! और, यह चमकता छोटा हीरा है- सिरिअस यानी लुब्धक नक्षत्र। फिर तो कई और सितारे भी पहचान में आने लगे-बेतलग्यूज यानी आद्र्रा नक्षत्र, राइगेल, अल्देबरान यानी रोहिणी नक्षत्र, प्लेइडीज यानी कृत्तिका पुंज। दूसरी ओर मिथुन राशि के तारे और उनसे ऊपर कैस्टर और पोलस्क यानी पुनर्वसु नक्षत्र। धीरे-धीरे पूरा आसमान सितारों से भर गया और दुधिया आकाशगंगा आरपार फैल गई।

हम आग तापते रहे। आगे से हाथ-पैरों में आंच की चिसकाटी लगती तो पीठ बर्फ हुई जा रही थी। लगता था, तापमान शून्य से नीचे जा चुका है। मनु सामने जुते हुए खेतों की ओर देख रहा था। अचानक चौंक कर बोला, “अरे वह क्या है?” अभी-अभी बेटी पूछ रही थी कि यहां जंगल में बाघ तो नहीं होते? पता लगा, अंधेरे में चुपचाप कोई बाघ चला आया। देख कर खुश होगा कि आज तो भून कर खाने का भी इंतजाम है!

लेकिन, मनु और अपर्णा ने खेत में क्या देखा? मैंने पूछा, “क्या था?” तो मनु ने बताया, “मोरू के पेड़ की तरफ से तैरती हुई सी कोई चीज आई और खेत में थोड़ी दूर तक पैरों पर चलने के बाद उड़ गई। बात कर ही रहे थे कि उसने कहा- वह देखो, वही तो है।” पलट कर देखने तक वह चीज पेड़ की तरफ तक जा चुकी थी। सवाल था कि आखिर वह था क्या? उस ओर मेरी पीठ थी, इसलिए मैं नहीं देख पाया लेकिन वर्णन सुन कर मैंने कहा, “वह फ्लाइंग फाक्स हो सकता है। पहाड़ों में होते हैं वे, मैंने बचपन में देखा है।” जो आकार मनु ने बताया, उसके अनुसार वह चमगादड़ या उल्लू नहीं हो सकता। बहरहाल, वह जो कुछ भी था, अब अंधेरे में मोरू के पेड़ में समा चुका था।

रसोई की झोपड़ी के बाहर से किसी ने आवाज दी, “आइए, खाना तैयार है।” वहां पहुंचे तो मनीष ने परिचय कराया, “आपके लिए खाना ये बनाते हैं- खुशाल सिंह राणा। ये लोग मेरे साथी हैं। खेती के मेरे काम में भी मदद करते हैं।” राणा जी से पता लगा, इस गांव में राणा लोग रहते हैं। यह भमौरी गांव की चोटी यानी डांडा है-थुनेर, जहां 15-20 परिवार रहते हैं। बाकी परिवार नीचे मुख्य गांव में रहते हैं। भमौरी खाल गांव तिखोन ग्राम सभा में आता है।

“कई परिवार यहां छोड़ कर देहरादून या दिल्ली भी जा बसे हैं,” मनीष ने कहा, “कोई जमीन बेच कर चला गया, तो कोई यों ही छोड़ कर या कोई बच्चों की नौकरी लग जाने के कारण उनके साथ चला गया। यहां कई जगह आपको उजड़ी हुई झोपड़ियां और मकान दिखाई देंगे। छोड़ कर गए हुए लोगों में कई तो कहते हैं- उनके खेतों में भी खेती कर ली जाए ताकि खेत उपयोग में रहें।”

“हमारे पूरे पहाड़ की यही दुखद कहानी है मनीष जी, गांव-गांव में यही हो रहा है,” मैंने कहा।

भरत राणा ने खाना लगा दिया था। मोटे तने के ऊंचे टुकड़ों की मेजें और उससे कम ऊंचे टुकड़ों की कुर्सियां। थाली, कटोरी, गिलास पीतल के, खाना रखने के डोंगे घड़े जैसी मिट्टी के। चम्मच, पलटा लकड़ी के और तांबे का वाटर फिल्टर। ठंड में कंपकंपाते बातें करते हुए खाना खाया। बाहर आए तो झोपड़ी के पीछे उत्तर के आकाश में अंग्रेजी के ‘डब्लू’ आकार का कैसियोपिया यानी शर्मिष्ठा तारामंडल दिखाई दे गया। मैंने कहा, “मनीष जी, आइए आपको ध्रुवतारा दिखाता हूं। ‘डब्लू’ के बीच के तारे से उत्तर की ओर काल्पनिक लकीर खींचिए। और, लीजिए धुर उत्तर में वह रहा ध्रुवतारा।” मनीष के साथ ही श्रीमती जी और बच्चों ने भी ध्रुवतारा देखा। हालांकि, मैं और लक्ष्मी तो अपने विवाह के अवसर पर सेंतालिस वर्ष पहले भी उसे देख चुके थे।

“एक और तरकीब है ध्रुवतारे को पहचानने की,” मैंने कहा, “उसमें सप्तर्षि के आगे के दोनों तारों की सीध में लकीर खींचें तो वह भी ध्रुव तारे के पास पहुंचती है।” अभी सप्तर्षि उग ही रहे थे। फिर भी अगले चार तारे नजर आ रहे थे। मैंने आगे के दोनों तारों की सीध में लकीर खींची और ध्रुवतारा खोज लिया। उसके एक ओर आसमान में कैसियोपिया का ‘डब्लू’ लटका था तो दाहिनी ओर सप्तर्षि की पतंग आसमान में ऊपर उठ रही थी। हम ठंड से ठिठुर रहे थे, इसलिए फिर काटेज के आंगन में कैम्पफायर के पास आकर आग तापने लगे। ऊपर तारों भरा आसमान था और नीचे रात के अंधेरे में सोई धरती पर हम। थके-मांदे थे, जल्दी ही सोने चले गए।

मैं जमीन पर लगे बिस्तरे में लेट गया। पास के जंगल में कहीं काकड़ बोल रहा था- कांक…कांक्..कांक्! इसकी तेज आवाज सुन कर ही अंग्रेजों ने इसका नाम ‘बार्किंग डियर’ रख दिया होगा। बाहर बीच-बीच में सिहराने वाली सर-सर हवा बहने लगती। भरपूर बिस्तर के बाव़जूद मैं ठंड से सिहर रहा था। लक्ष्मी ने कहा भी था, नीचे ज़मीन और दीवारों से ठंड लगेगी, लेकिन मैं नहीं माना। कहा, “जमीन में सोना ज्यादा आरामदेह है।” अब समझ में आ रहा था। वाशरूम में नल का पानी छूते ही बरछी की तरह लग रहा था। सिहराती-ठिठुराती रात थी। निराला जी की ‘शिशिर की शर्वरी’ कविता याद आ गई जो हिंस्त्र पशुओं-सी आक्रामक हो उठी थी। डरने लगा कि कहीं हाइपोथर्मिया न शुरू हो जाए। रजाइयों में प्यूपा बनकर दुबक गया और धीरे-धीरे मुझे भी टुकड़ा-टुकड़ा नींद आने लगी।

पौ फटने से पहले उठना चाहता था, इसीलिए अलार्म लगा लिया। पांच बजे उठा लेकिन बाहर गहरा अंधेरा और सन्नाटा था। झांक कर देखा तो सामने अंधेरे में पहाड़ों पर बिजली की रोशनियां चमक रही थीं और पहाड़ों से ऊपर तारों भरा आसमान जगमगा रहा था। मैं फिर रजाई में दुबक गया। छह बजे से पहले फिर उठा। सामने जैसे किसी चित्रकार ने क्षितिज के आर्ट पेपर पर हिमालय की चोटियों का साफ्ट पेंसिल से रेखाचित्र बना दिया था। पूर्व के आकाश में हंसिए-सा पतला फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी का चांद चमक रहा था।

मैं सूर्योदय का इंतजार करने लगा।

 

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