टिहरी के उस गांव में (2)

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….मनीष ने चलते-चलते मुझे थुनेर और देवदार के पेड़ों को दिखा कर उनका अंतर बताया। वहां जंगल के बीच धूप का एक टुकड़ा दिखा। थोड़ी खुली जगह थी। हम वहां खड़े होकर देवदार और थुनेर के पेड़ों की भीनी खुशबू से भीगी भरपूर हवा अपने फेफड़ों में भरने लगे। तभी मनीष ने कहा, “यहां जंगल में इतना ठंडा रहता है कि कई जगह बर्फ अभी भी बची हुई है। जहां हम खड़े थे, उसके ऊपर देवदारुओं की छांव में उन्होंने हमें इशारे से बर्फ की सफेद कालीन का टुकड़ा दिखाया। बेटा-बहू जाकर उसका फोटो खींच लाए। थोड़ा दम लेने के बाद हम फिर आगे ब़ढ़े। अब पगडंडी नीचे उतार में जा रही थी। वहां भी कुछ पेड़ों का तना छीलकर नंबर डाले हुए थे। जंगल के इस भाग में बहुत ऊंचे और मोटे रैंसुल के पेड़ थे जिन्हें वनस्पति विज्ञानी एबीज पिंड्रो कहते हैं। उतार में संभल कर चलते हुए हमें खूब अनुभव हो रहा था कि शहरी जीवन ने हमारा क्या हाल बना दिया है। गनीमत है कि जल्दी ही पगडंडी सीधी और समतल हो गई।

चलते रहे हम और अचानक सामने सीढ़ीदार खेतों से सजी पहाड़ी आ गई। नीचे जुते हुए खेतों के ऊपर सलेटी रंग का साधारण काटेज दिखाई दिया, जिसके बरामदे के ऊपर सूखी घास की छत पड़ी हुई थी। आंगन में बैठने के लिए सूखे पेड़ों के कटे हुए तने के डेढ़-दो फुट ऊंचे गोल टुकड़े रखे हुए थे। सामने आर-पार विशाल हिमालय, जिससे बादलों के टुकड़े अठखेलियां कर रहे थे। खेतों में कुछ महिलाएं काम कर रही थीं। काटेज के पीछे दो, हरे-भरे और ऊंचे मोरू के पेड़ों की जोड़ी। उससे ऊपर खेतों के किनारे मोरू के तीन और हरे-भरे पेड़। दो-चार सीढ़ियां उतर कर हम काटेज के आंगन में पहुंचे।

कमरे में सामान रखा। भीतर मिट्टी से लिपी दीवारें और चार जगह बिस्तरे। दो नीचे और दो सीढ़ियों से चढ़ कर ऊपर। मनीष ने पूछा तो पता चला, चार बिस्तरे एक सैट में इसलिए कि पूरा परिवार साथ रह सके और शहर में जिनके पास आपस में बातचीत करने का वक्त नहीं है, वे यहां आकर आपस में बातचीत कर सकें। हम बाहर आकर तने के टुकड़ों पर बैठ गए। बादलों के बीच भव्य हिमालय की झलकी मिलती रही। वहीं गर्मागर्म चाय पी।

शाम ढलने को थी। काटेज में बिजली की रोशनी थी। इसके अलावा कमरे और वाशरूम में बैटरी की छोटी-सी लालटेन भी रखी थी। पानी छत पर टंकी से आता था जिसे रेन हार्वेस्टिंग करके जमा किया गया था। यानी, वह वर्षा का जमा पानी था। उसी से काम चलाना था। पीने-खाने के लिए पानी पास के जंगल में बहते सोते की पतली-सी धार से भर कर लाया जाता था। रात के खाने में हमने मंडुवा (कोदा) की रोटी मिली जुली सब्जी और गहत की दाल चुनी। बच्चों ने मांसाहार भी किया। मनीष ने बताया कि सब्जी, मांस वगैरह चंबा के बाजार से मंगानीं पड़ती हैं। पत्नी और बिटिया रास्ते भर उल्टियां करने के कारण थके-हारे सो गए।

उत्तर-पूर्व के पहाड़ ढलते सूरज की धूप से सुनहरे हो उठे। देवदार, रेंसुल, थुनेर के घने जंगल पर भी किरणों की स्वर्णिम आभा बिखरने लगी। ढलते सूर्य की छवि देखने के लिए काटेज के पीछे कच्चे रास्ते पर गया। ओह, अद्भुत दृश्य था। पश्चिम के पहाड़ों पर बादलों के साथ सूर्य लुका-छिपी खेल रहा था। कभी-कभी अपनी किरणों की बांहें बढ़ा कर पहाड़ों और नीचे घाटियों को छू लेता। जहां मैं खड़ा था, उसके नीचे सीढ़ीदार खेतों के बीच यहां-वहां मकान थे। नीचे मोटर रोड बन रही थी। मोटर रोड के बारे में जान कर कुछ बाहरी उद्यमी लोगों ने उसके आसपास रिजार्ट और हट्स बनाना शुरू कर दिया था। ढलते सूरज की तिरछी किरणें उनकी लाल, हरी छतों पर पड़ रही थीं। मैं कल्पना में भविष्य में जाकर वहां उग आए सीमेंट-कंक्रीट के जंगल को देख आया। वहां मोटर रोड के आसपास उभर आई दुकानों और वहां पनप रही फास्ट फूड संस्कृति को भी देखा और यहां-बिखरे पालिथीन के अंबार भी देखे। मोरू के पेड़ों की सरगोशियों से तंद्रा टूटी तो अपने आप को उस कच्ची सड़क पर खड़ा पाया।

तभी हाथ में लैपटाप लिए मनीष आ गए। बोले, “यहां नेट कनेक्शन कुछ ही जगहों पर आता है, जैसे यहां इस कच्ची सड़क पर, रसोई के आगे और वहां सामने देखते हुए बोले, “वहां उस सबसे ऊंचे पहाड़ पर जहां टावर दिखाई दिखाई दे रहा है, सुरकंडा देवी का मंदिर है। वह देखिए भी देरहा है। वहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। सती की पौराणिक कहानी सुनी होगी आपने। शिव जब सती का शव लेकर रौद्र रूप में ब्रह्मांड में फिरने लगे तो विष्णु ने अपने चक्र से शव के टुकड़े कर दिए। मान्यता है कि सती का सिर इसी पहाड़ पर गिरा था।” मैंने उस ओर नमन किया। फिर ढलते सूरज की कुछ तस्वीरें लीं और आंगन में लौट आया।

ज्यों-ज्यों शाम ढल रही थी, सरसराती ठंडी हवा चलने लगी। मोरू के दोनों पेड़ फिर से सरगोशियां करने लगे। मैंने किनारे से झांक कर देखा। वाह! वहां पश्चिम के आकाश में हीरा दमक रहा था। खूब चमकीला। उसे पहचानना कठिन नहीं था। वह था- वीनस यानी शुक्र ग्रह। सूर्य और चंद्रमा के बाद आकाश में सबसे तेज चमकने वाला पिंड। हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे। टोपी, मफलर और गर्म कपड़े पहन कर आंगन में आया। बेटा-बहू आ चुके थे। मनु ठंड से बचने के लिए कैंप फायर के लिए कह आया था। भरत ने आकर आंगन में आग धुधका दी। हम पेड़ के तने के टुकड़ों पर घेरा बना कर आग के चारों ओर बैठ गए।

 

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