काक कथा -3

(आप सोच रहे होंगे – काक कथा के काक दम्पति का क्या हुआ? उनकी कथा मैंने आपको लगभग माह भर पहले सुनाई थी। अब आगे ….)

अपने घर-घोंसले के ऐन सामने सिल्वर ओक के ऊंचे पेड़ पर नीड़ का निर्माण कर रहे काक दम्पति पर मैं पिछले डेढ़ माह से नजर रख रहा हूं। उन्हें तिनका-तिनका चुन कर दिन-दिन भर घोंसला बनाते देखा। एक जाता, दूसरा आता। कभी-कभार दोनों एक साथ भी घोंसले में आ बैठते। क्या पता, निर्माण कार्य पर मशविरा करते हों। बाद में बारी-बारी से उन्हें घोंसले में बैठते हुए देख कर मुझे लग रहा था, शायद वे यह देख रहे हों कि घोंसला भीतर से आरामदेह बना है या नहीं, या फिर विश्राम करते हों। या, कहीं ऐसा तो नहीं कि अंडे दे चुके हों, उन्हें से रहे हों और मुझे पता ही न हो?

मैं दिन भर काक दम्पति की गतिविधियों को देखता रहा। अचानक 20 अगस्त को दिन में पीछे की बालकनी में सदा चहचहाती गौरेयों की मधुर, घुघरुओं-सी आवाज न सुन कर चौंका। गौरेया परिवार का क्या हुआ? उठ कर देखा। गौरेया दम्पति बच्चों को लेकर उड़ चुका था। यह जोड़ा 13 जुलाई को हमारे घर में आया था। इस बीच उन्होंने दफ्ती के डिब्बों के ऊपर घोंसला बनाया, प्यार किया, अंड़े दिए, उनसे बच्चे निकले, उन्हें चुग्गा चुगाते रहे और उड़ान का पाठ पढ़ा कर आज उन्हें लेकर उड़ गए। कहा होगा, कि चलो बच्चो, अब उन्मुक्त आकाश में उड़ो और आत्मनिर्भर बनो।…हमें अब फिर गौरेया के किसी नए जोड़े का इंतजार है।

बहरहाल, अपनी दूरबीन फिर काक दम्पति के घोंसले की ओर घुमाई। इन दिनों जब भी बारिश हुई कौवे आकर घोंसले में बैठते रहे। कभी अकेले, कभी दोनों। झमाझम बारिश में तो दोनों घोंसले में समा जाते। शायद अंडों या फिर बच्चों को पंखों की छांव और शरीर की गर्मी दे रहे हों। 21 से 23 अगस्त के बीच वे कई बार घोंसले में लेटते रहे। 22 अगस्त को शाम सात-सवा सात बजे से लगातार वर्षा होती रही। ठंडक बहुत बढ़ गई। न जाने काक दम्पति ने कैसे रात बिताई होगी। उनके घोंसले के ऐन सामने हम पक्की इमारत के घर-घोंसले में चादर ओढ़ कर आराम से सो रहे थे।  हम दोपाए प्राणियों की जीवन शैली को वे अपनी काक दृष्टि से देखते तो जरूर होंगे। हो सकता है, सोचते भी हों कि ठाठ तो इन्हीं दोपायों के हैं। कितने आराम से कमरे में सो रहे हैं!

23 अगस्त की सुबह सुहानी थी। वर्षा थम चुकी थी और ठीक 5.25 बजे नीम की डाल पर बुलबुल चहकी ‘पीईई…क्विह्…क्विह्!’ 5.30 बजे बाद कई पक्षी जागे। मैनाएं ‘चुच्यांवुं…चुच्यांवुं…चुच्यांवुं…’ की खास आवाज में चहकीं। रात बारिश में काक दम्पति घोंसले में आ गए होंगे। सुबह के धुंधलके में वे घोंसले में हिल-डुल रहे थे।

और आश्चर्य, घोंसले में तो बच्चे हैं!

……24 अगस्त को सुबह 10.30 बजते-बजते झमाझम वर्षा शुरु हो गई। थमी तो एक काक घोंसले से ऊपर उठा और उड़ गया। भोजन लेकर लौटा तो घोंसले के भीतर से दो-चार लंबी, पतली गर्दनें और चौंचें उठीं। काक ने एक-एक कर भोजन दिया और फिर भोजन की तलाश में उड़ गया। तभी दूसरा कौवा भोजन लेकर लौटा और बच्चों को चुगाया। एकदम सामने का बच्चा मां-बाप के आते ही चौंच खोल कर सबसे पहले भोजन की ओर झपटा। लेकिन, मां-बाप घोंसले में उसके पीछे और नीचे चौंच डाल कर दूसरे बच्चों को भी भोजन चुगा रहे हैं। सवा तीन बजे फिर रिमझिम वर्षा शुरू हो गई। एक काक पंख पसार कर घोंसले में बैठ गया।

देर रात तक वर्षा हुई और अगले दिन भर रह-रह कर बरसती रही। दोनों काक घोंसले में लेटे और वर्षा थमने पर भोजन लाते रहे। 26 अगस्त की भीगी-भीगी सुबह एक चील गोता मार कर घोंसले वाले पेड़ के पास से निकली तो एक काक जी-जान से उसके पीछे पड़ गया। बल्कि जी-जान से भिड़ गया। असल में बस्ती के कूड़ाघर के पास इन चील-कौवों की समरभूमि है जो इन पेड़ों से ज्यादा दूर नहीं है। यह काक दम्पति यहां इस हरियाली के बीच लगभग एकांत में रहते हैं हालांकि कव्वे सामूहिक रूप से रहना पसंद करते हैं। इसीलिए तो लगता है कि कौवों का यह जोड़ा शायद कुछ खास है। तभी शायद इन्हें यह भी पता लग गया है कि हम इन पर नजर रख रहे हैं। शायद इसी पहचान को लेकर 26 अगस्त को वे दोनों हमारी बालकनी की मुंडेर पर चले आए। क्षण भर बैठ कर चले गए जैसे बस यह बताने आए हों कि हम जानते हैं, आप लोग हम पर नजर रख रहे हैं।

चार दिन फिर वर्षा हुई। 28 अगस्त की शाम तो तेज बौछारें आने लगी। सिल्वर ओक के दोनों पेड़ यहां-वहां झूलने लगे। रात को भी बारिश की झड़ी लगी। पर दोनों कौवे घोंसले में डटे रहे। अपने पंख ओढ़ा कर शरीर की गर्माहट से बच्चों को ठंड और पानी से बचाया होगा।

बच्चे नजर आने के बाद से दोनों कौवों की आवाजाही में एक सावधानी साफ दिखाई दे रही है। वे अब सीधे घोंसले के पास नहीं आते। पहले बाईं ओर के पेड़ के पैताने पर आते हैं। फिर एक-एक डाली पर कूद कर ऊपर की ओर चढ़ते हैं जैसे सीढ़ी चढ़ रहे हों। फिर गौर से यहां-वहां देखते हैं। संतुष्ट हो जाने के बाद दाहिनी ओर के पेड़ की शाखा पर जाते हैं। उसके बाद पत्तियों से घिरे घोंसले में जाकर बच्चों को भोजन देते हैं। यह सब शायद शिकारी पक्षियों को यह जताने के लिए कि हम तो बस यों ही उछल-कूद रहे हैं, यहां है कुछ नहीं!

इस बीच बच्चे भी बड़े हो गए हैं। घोंसले में से उठते काले रंग के पंख दिखाई दे जाते हैं। दो-एक बच्चे पैरों पर खड़े होकर तेजी से पंख फड़फड़ाते हैं। उन्होंने पास ही बैठे माता-पिता को इसी तरह पंख फड़फड़ाते हुए देखा है। शायद माता-पिता ने उन्हें उड़ान का पहला पाठ पढ़ा दिया है। 2 सितंबर रविवार धूपीला दिन था। उस दिन उन दो बड़े बच्चों ने खूब पंख फड़फड़ाए। अगले दिन विज्ञान प्रसार में बैठक थी। देर शाम लौटा तो बेटी ने बताया दो बड़े बच्चे उड़ गए हैं।

सुबह खाली घोंसले को गौर से देख ही रहा था कि एक कौवा घोंसले में आया और दो गर्दनें ऊपर उठीं। वाह! यानी दो बच्चे और हैं वहां! फिर वही झमाझम बारिश, तेज हवा के झौंके और माता-पिता के पंखों की छांव। बारिश थमने पर बच्चों का तेजी से पंख फड़फड़ाना। उड़ान का पूर्वाभ्यास जारी है। दोनों बच्चे घोंसले की मुंडेर पर खड़े होकर बीच-बीच में पंख फड़फड़ा लेते हैं। माता-पिता काक आसपास की डालियों पर पंजों के बल कूदने, फुदकने का पाठ पढ़ा रहे हैं। खुद फुदकते हैं और फिर बच्चों की ओर देखते हैं, जैसे कह रहे हों- अब तुम कूदो! 12 सितंबर को एक काक हमारी बालकनी में आकर बेटी का दिया भात चोंच में भर कर घोंसले में ले गया और बच्चों को खिलाया। अगले दिन फिर आया और भोजन ले गया। दोनों काक-शिशु डालियों पर कूदने, फुदकने का अभ्यास कर रहे हैं। थकने पर घोंसले में आकर विश्राम करते हैं।

16 सितंबर को दिन में इन दोनों काक-शिशुओं ने भी अपने ढंग से नई जिंदगी जीने के लिए पहली उड़ान भर ली। उन्होंने घोंसला छोड़ दिया। काक परिवार के सदस्य कभी-कभी आसपास शीशम के पेड़ों की कोमल हरी फुनगियों पर आकर बैठते, झूलते और बतियाते हैं।

सिल्वर ओक के पेड़ पर अब केवल खाली-खाली घोंसला है। ज़िदगी पेट भरने के लिए आसपास भोजन तलाशने, कांव-कांव की भाषा में अपने कुनबे के सदस्यों से बतियाने, कूड़ाघर की समर भूमि में संघर्ष करने और समय आने पर इन हरे-भरे पेड़ों की छांव में फिर नई जिंदगी को जन्म देने के लिए घोंसले से बाहर उड़ान भर चुकी है।…..नीतिशतकम् का श्लोक याद आ रहा है…..

काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयो।

वसंत समये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः।।

हां, काक भी काला है, कोयल भी काली है। इनमें क्या अंतर है, यह वसंत ऋतु आने पर पता लग जाएगा। लेकिन, केवल शरीर का रंग देख कर या बोली सुन कर यह कहां पता लगेगा कि घर-परिवार के लिए कितने समर्पित हैं ये सहृदय काले काक दम्पति और किस तरह मिल-जुल कर ये बच्चों की परवरिश करते हैं। कैसे पता लगेगा कि काले रंग के इन कौवों का हृदय कितना उजला है।

 

 

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