टिहरी के उस गांव में

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बेटे मनु ने पूछा, “चार दिन की छुट्टियां हैं। कहीं बाहर चलें?”

मैंने कहा, “जरूर चलें।”

“आपको कैसी जगह पसंद है?”

“ऐसी जगह जहां पहाड़ हों, शीतल हवा हो, जंगल की हरियाली हो, पक्षी चहचहाते हों, वन्य जीव-जंतु हों…”

अभी मैं बोल ही रहा था कि मनु ने कहा, “मैंने खोज ली है एक ऐसी जगह। बहुत दूर भी नहीं है। हम तीन दिन वहां रह कर आ सकते हैं।”

“वहां कहां?” मैंने पूछा।

“कानाताल के पास गांव में, ऊंचाई 8500 फुट”

“कानाताल?”

“हां, बहुत लोग नहीं जानते उसके बारे में, इसीलिए अभी उसका व्यावसायीकरण नहीं हुआ है। प्रकृति बची हुई है वहां,” मनु ने कहा।

“तो ठीक, वहीं चलते हैं, प्रकृति की गोद में।”

जगह तय हुई ही थी कि दूर बेरीनाग, पिथौरागढ़ से प्रथम फाउंडेशन में विज्ञान कार्यक्रमों के प्रभारी आशुतोष उपाध्याय जी का फोन आ गया। उन्होंने कहा, “इस बार 28 फरवरी को विज्ञान दिवस के अवसर पर आप हमारी बाल विज्ञान खोजशाला, मसूदा, राजस्थान में जा सकेंगे तो बहुत अच्छा लगेगा। वहां बाल विज्ञान मेला लग रहा है। विज्ञान खोजशाला के प्रभारी कानाराम जी हैं।

“कानाराम? यह नाम तो सुना हुआ लग रहा है,” मैंने कहा।

“हां, रामनगर में आपसे भेंट हुई थी उनकी,” आशुतोष बोले।

उनका आग्रह स्वीकार करना ही था लेकिन इस शब्द साम्य पर चकित रह गया कि यहां कानाताल जाना है और वहां कानाराम जी के पास! अद्भुत। कानाताल से एक बात और याद हो आई। मेरी चौरास, श्रीनगर, गढ़वाल की पिछली यात्रा के बारे में पढ़ कर वन विभाग के वरिष्ठ रिटायर्ड अधिकारी जे.एस. मेहता जी ने लिखा था, “मुझे अपने वे तीन वर्ष 1961 से 1963 तक याद आ गए…..लंबगांव, कानाताल, सुरकंडा देवी, कद्दूखाल, मालदेवता…वनों का पैदल भ्रमण करता था।….” मैंने तय किया कि कानाताल जाने पर बड़े-बुजुर्ग पेड़ों को मेहता जी की याद जरूर दिलाऊंगा।

खैर, वहां जीरो-स्टे में बुकिंग हो गई। रेलवे की तत्काल योजना में पांच टिकट भी मिल गए और हम रात की ट्रेन नंदादेवी एक्सप्रेस से देहरादून के लिए चल पड़े। अलसुबह वहां पहुंच कर मित्र एम.एस.बिष्ट जी के घर पर नहाया-धोया और नाश्ता करके टैक्सी से 9.30 बजे 78 किलोमीटर दूर कानाताल के लिए चल पड़े।

देहरादून से सारथी अजय सीधे राजपुर रोड से निकलने के बजाय किसी पुरानी रोड से आंय-बांय निकलते हुए, उतार-चढ़ाव और तीव्र मोड़ों के हिचकोले खिलाता, पता पूछता चुपचाप आगे बढ़ता रहा। हम स्वयं रास्ते से अनजान। चालीस-पैंतालीस मिनट बाद मसूरी के मुख्य मार्ग पर पहुंचा। तब तक हिचकोलों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। मां-बेटी उबका कर उल्टियां करने लगीं। अब सड़क ठीक थी। बुरांशखंडा, धनोल्टी और कद्दूखाल होते हुए दोपहर बाद 2 बजे कानाताल पहुंच गए।

कानाताल मील के पत्थर के पास उतरे तो काले ट्रैक सूट में एक युवक ने मुझसे पूछा, “मनु?” मैंने मनु की ओर इशारा करके कहा, “मनु वह है, मैं उसका दोस्त हूं।” वह मुस्कुराया और कहा, “मैं मनीष जैन, जीरो-स्टे से।”

हमने टैक्सी की डिकी से अपने बैग निकाले। मैं अपने बारह-तेरह किलोग्राम भारी रक-सैक को पीठ पर चढ़ाने लगा तो मनीष ने कहा, “इसे हमें दे दीजिए।”

“अपना सामान मैं स्वयं ढोता हूं,” मैंने कहा तो वे बोले, “वह तो ठीक है, लेकिन आगे कुछ चढ़ाई आएगी और रास्ता भी संकरा है। आपको दिक्कत हो सकती है।”

मैंने पूछा, “हमें जाना कहां है?”

“उस ओर,” मनीष ने दाहिनी तरफ इशारा करते हुए कहा, “आगे घना जंगल है, हमें उसे पार करके जाना है।” उन्होंने मेरा रक-सैक अपने साथ आए भरत को देते हुए कहा, “तुम चलो आगे-आगे, मैं इन्हें लेकर आता हूं। मैंने छोटा बैक-पैक पीठ पर कसा और उनके पीछे चल पड़ा। बेटी के साथ ही पत्नी भी उल्टियां करते-करते निढाल हो चुकी थी। सारथी पैसे लेकर जा चुका था और हम मार्गदर्शक बने मनीष के पीछे-पीछे चल पड़े। गांव के सिरहाने से जाती पतली पगडंडी पर आगे बढ़ते जा रहे थे कि तोरण द्वार की तरह फूलों से लदा बुरांश का पेड़ सामने आ गया। बेटे ने उसके साथ मेरा फोटो खींचा। आगे बढ़े। मोड़ से आगे सचमुच घना जंगल था। मेरे बचपन की यादों के जंगल की तरह घना, हरा-भरा जंगल।

सामने दोनों ओर पेड़ों से जैसे ग्रीन-टनल बनी हुई थी। कच्ची पगडंडी पर ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए, पेड़ों की छांव और जंगल की खुशबू मिलती चली गई। पीछे कानाताल की खौणी (नंगी) धार देख कर लग नहीं रहा था कि यहां इस ओट में देवदार, थुनेर, सुरई, बांज, बुरांश, मोरु और अंयार जैसे पेड़ों का जंगल भी होगा। पगडंडी के किनारे कई पेड़ों के छिले घावों पर नंबर लिखा देख कर मैंने मनीष से कहा, “ये नंबर कैसे?”

“जंगलात विभाग ने डाले हैं। कानाताल से इस जंगल के बीचों-बीच से मोटर रोड निकालने के लिए सर्वे करके पेड़ों को छापना शुरू कर दिया था। ये पेड़ कटते और रोड बनती,” उन्होंने कहा।

“तो फिर क्या हुआ?”

“हमने, गांव वालों ने मिल कर विरोध किया। अब भी विरोध कर रहे हैं। देखिए, कब तक बच पाता है यह जंगल। एक बार मोटर रोड बन गई तो जंगल गायब होना शुरू हो जाएगा। कामर्शियल गतिविधियां शुरू हो जाएंगीं। सीमेंट, कंक्रीट का जंगल खड़ा हो जाएगा। कानाताल की पहाड़ी को देखा आपने? वहां रिजार्ट ही रिजार्ट बन गए हैं, हट्स बन गई हैं, सारा शहरी कल्चर पनप गया है और जंगल गायब हो गया है।”

मुझे वर्षों पहले के एक विदेशी टीवी सीरियल की कड़ी के शब्द याद आ गए, जो कुछ इस तरह थे- ‘मनुष्य ‘उपभोक्ता’ बन गया और प्रकृति का दोहन करने लगा। तात्कालिक खुशी बटोरने लगा- तुरंत सुख, तुरंत संतोष। कंज्यूम एंड डिस्कार्ड! जमीन हड़पो! उपभोग करो और फेंको! उपभोग करो और फेंको!’ मैंने कहा, “आप लोगों ने विरोध किया, बहुत अच्छा किया।”

हम चलते जा रहे थे। जंगल में, बीच-बीच में बुरांश खिले हुए दिखाई देते रहे। पेड़ों के पार दूर उत्तर में कभी-कभी भव्य हिमालय की झलक दिखाई दे जाती।

(शेष कल)

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