उपग्रह प्रक्षेपण के बाजार में भारत

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 15 फरवरी 2017 को एक ही मिशन में 104 उपग्रह अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेज कर, एक साथ अधिकतम उपग्रह छोड़ने का विश्व कीर्तिमान तो बनाया ही, इस मिशन से अंतरिक्ष में उपग्रह प्रक्षेपण के बढ़ते बाजार में एक बार फिर अपनी अहम मौजूदगी भी जता दी है। इसरो ने इस बाजार में अपने इंजीनियरों और अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के बेहतरीन कौशल के बूते पर इस बाजार में बहुत कम समय में, बड़ी तेजी से कदम बढ़ाए हैं। इस अपूर्व कौशल की धमक अब विश्व के तमाम देशों ने सुन ली है। यही कारण है कि इस बार इसरो ने अपने एक 714 किलोग्राम भारी कार्टोंसेट-2 उपग्रह तथा दो नैनो उपग्रहों के साथ 101 विदेशी उपग्रहों का अचूक और करिश्माई प्रक्षेपण ही नहीं किया बल्कि इन सभी उपग्रहों को अंतरिक्ष की कक्षा में बड़ी कुशलता से बारह मिनट के भीतर स्थापित भी कर दिया। यह कोई मामूली काम नहीं। इसके लिए अचूक तकनीकी कौशल जरूरी है। हमारे तकनीशियनों और वैज्ञानिकों ने यह कर दिखाया। इससे इसरो की उपग्रह प्रक्षेपण के बाजार में एक बार फिर एक कुशल खिलाड़ी के रूप में जबरदस्त साख बन गई है।
इस बार छोड़े गए 104 उपग्रहों में से 96 अमेरिका के और एक-एक उपग्रह इस्राइल, अरब अमीरात, नीदरलैंड, कज़ाखिस्तान और स्विट्जरलैंड का था। इससे पहले केवल रूस ने सन् 2014 में एक साथ अंतरिक्ष में उपग्रहों का प्रक्षेपण किया था। उससे एक वर्ष पहले सन् 2013 में अमेरिका ने 29 उपग्रहों को एक साथ छोड़ा था और जब भारत ने जून 2016 में एक साथ 20 उपग्रहों के प्रक्षेपण का कौशलपूर्ण कारनामा कर दिखाया तो उपग्रह प्रक्षेपण बाज़ार के कई खिलाड़ियों का हैरान होना लाजिमी था। असल में भारत 28 अप्रैल 2008 को अपने शक्तिशाली पीएसएलवी-सी 9 प्रक्षेपण यान से 10 उपग्रहों का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण कर चुका था। इसमें हमारे अपने कार्टोसेट-2 ए के साथ इसरो ने जापान, कनाडा, जर्मनी, डेनमार्क तथा नीदरलैंड के 8 नैनो उपग्रहों को भी अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया था।
उपग्रह प्रक्षेपण बाजार के विदेशी खिलाड़ियों ने हालांकि इससे पहले भी इस बाजार में इसरो के कदमों की आहट सुनी थी क्योंकि इसरो इससे पूर्व चार बार व्यापारिक दर पर विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण कर चुका था। लेकिन, सन् 2008 में आठ उपग्रहों के प्रक्षेपण से साबित हो गया कि भारत इस बाजार में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। तब उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में तब अंतर्राष्ट्रीय दर 20,000 से 30,000 डाॅलर प्रति किलोग्राम थी लेकिन भारत ने उदारता दिखा कर विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित इन उपग्रहों का प्रक्षेपण मात्र 12,000 डाॅलर प्रति किलोग्राम की रियायती दर पर किया। इससे यह भी साबित हुआ कि भारत के पास इस हुनर का अचूक तकनीकी कौशल तो है ही, यह वैश्विक अंतरिक्ष बाजार की दरों की तुलना में सस्ती दरों पर भी उपग्रह प्रक्षेपण कर सकता है। अमेरिकी विमानन विभाग ने तो जून 2016 में भारत द्वारा 20 उपग्रहों के एक साथ प्रक्षेपण के बाद कह ही दिया था कि कम दाम पर उपग्रहों का प्रक्षेपण करके भारत उनके बाजार को तबाह कर सकता है।

firstrocketभला आज कौन विश्वास करेगा कि 104 उपग्रहों का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण करने वाले भारतीय प्रक्षेपण कार्यक्रम की शुरूआत केरल के थुंबा नामक मछुवारों के एक गांव से 21 नवंबर 1963 को नासा से प्राप्त साउंडिंग राकेट नाइके-अपाचे के प्रक्षेपण से हुई थी जिसे प्रक्षेपण स्थल तक एक साइकिल में लाया गया था। वर्षों बाद सन् 1981 में एप्पल उपग्रह को भी एक बैलगाड़ी में लाया गया था!

जल्दी ही भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने देश में ही राकेट बनाने की तकनीक का विकास कर लिया। उन्होंने देश का पहला राकेट रोहिणी-75 बना कर, थुंबा से ही 20 नवंबर 1967 को उसका भी सफलतापूर्वक प्रक्षेपण कर दिया। असल में भारतीय तकनीशियनों ने देश में स्वयं अपना राकेट यानी प्रक्षेपण यान और उपग्रह बनाने के लिए अपनी कमर कस ली। उनके निश्चय और समर्पित कार्य ने इन तमाम वर्षों में देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता कथा स्वर्णाक्षरों में लिखी है। यह उन्हीं की साधना का फल है कि आज हमारे पास अपने शक्तिशाली प्रक्षेपण यान और नायाब उपग्रह हैं।

मतलब यह कि हमारे इंजीनियरों और अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम ने अपनी सफलताओं से दुनिया के बड़े देशों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। कम अवधि में भारत की उल्लेखनीय उपलब्धियों के कारण विश्व के कई विकसित देश चकित हैं। उपग्रह प्रक्षेपण के कारोबार में रूस और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की धाक जमी हुई थी क्योंकि उनके प्रक्षेपण यान हमारे यानों की तुलना में काफी शक्तिशाली है। वे भारी संचार उपग्रहों का भी प्रक्षेपण करने में समर्थ हैं। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का शक्तिशाली एरिएन-5 प्रक्षेपण यान ऐसे भारी संचार उपग्रह अंतरिक्ष में पहंुचाता रहा है। अब आगे भारत को अंतरिक्ष बाजार की इस होड़ में आगे बढ़ने के लिए ‘पीएसएलवी’ तथा ‘जीएसएलवी’ के बाद की पीढ़ी यानी ‘जीएसएलवी मार्क-3’ का सहारा लेना होगा। शायद निकट भविष्य में ही भारत अपने इस शक्तिशाली प्रक्षेपण यान का भी उपयोग शुरू कर देगा।

अब तक भारत 21 देशों के 180 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर चुका है जो उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में उल्लेखनीय कारोबार कहा जा सकता है। भारतीय उपग्रह प्रक्षेपण कार्यक्रम की खूबी यह है कि यह अमीर देशों के साथ ही सस्ती दरों के कारण गरीब देशों के उपग्रहों का भी प्रक्षेपण कर सकता है। इससे इस बाजार में भारत का हिस्सा बढ़ेगा। हाल के 101 उपग्रहों के प्रक्षेपण के बाद दुनिया के कई देश भारत से अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण कराने के लिए अपनी उत्सुकता जता रहे हैं।
इसरो के व्यापारिक हितों का ध्यान एंटिक्स कार्पोंरेशन लिमिटेड रखती है। यह कार्पोरेशन भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है जो अंतरिक्ष विभाग के तहत काम करती है। यह इसरो की व्यापारिक शाखा है और इसरो के व्यापारिक उत्पादों और सेवाओं का व्यापारिक प्रबंधन करती है।
कल तक भारत को गरीब और पिछड़े देश के रूप में देखने वाले कई विकसित देश आज इसे अंतरिक्ष कार्यक्रम में अग्रिम पंक्ति में खड़ा देख कर कम हैरान नहीं हैं। भारत अपने प्रथम प्रयास में ही ‘चंद्रयान-1’ और ‘मंगलयान’ को चंद्रमा और और मंगल ग्रह की निर्धारित कक्षा में स्थापित कर चुका है।

देवेंद्र मेवाड़ी

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