चौरास में प्रेरणा

बचपन में ही किस तरह बच्चों को विज्ञान की राह पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी जा सकती है, यह प्रयोग ‘इंस्पायर’ एक शिविर में अलकनंदा के तट पर चौरास में देख कर लौटा हूं। वहां हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के कैंपस में इस प्रयोग में 317 मेधावी बच्चे शामिल थे।

इस शिविर में आकर बच्चों से विज्ञान की बातें करके उन्हें प्रेरित करने का जब आमंत्रण मिला, तब मैं गुवाहाटी, असम के ब्रह्मपुत्र लिटरेरी फेस्टिवल में भाग ले रहा था। पहले डा. एस.पी. सती का फोन आया और फिर भूगर्भ विज्ञान के प्रोफेसर तथा इस शिविर के संचालक डा. यशपाल सुंद्रियाल का। उन्होंने बताया कि यह ‘इंस्पायर’ कार्यक्रम का शिविर है जिसमें मेधावी छात्र-छात्राएं भाग ले रही हैं। ‘इंस्पायर’ युवा पीढ़ी को विज्ञान की शिक्षा की ओर आकर्षित करने के लिए विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग की एक महा परियोजना है। इसका मूल उद्देश्य देश भर के विद्यार्थियों को यह संदेश देना है कि विज्ञान का क्षेत्र बेहद रोचक और रोमांचक है। इन बच्चों में से भविष्य के लिए वैज्ञानिक और शोधकर्ता तैयार होंगे।

मैंने डा. सुंद्रियाल से कहा, मैं बच्चों को किस्सागोई के जरिए विज्ञान की बातें बताता हूं। बताता हूं कि दोस्तो, देखो विज्ञान कितना रोचक है। यानी, अगर अंग्रेजी में कहें तो मेरे इस तरीके को आप ‘लर्निंग साइंस थ्रू स्टोरी टेलिंग’ भी कह सकते हैं। आप चाहेंगे तो मैं जरूर आवूंगा।

दिल्ली लौटा तो देहरादून तक और वहां से वापसी के हवाई उड़ान के टिकिट आ चुके थे। डा. सुंद्रियाल ने बताया, देहरादून से आपने टैक्सी से गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास कैम्पस में आना है। लिहाजा, यात्रा का मन बनाया, रक-सैक तैयार किया और 9 फरवरी की अल-सुबह बरास्ता एयरपोर्ट-मैट्रो से इंदिरागांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के टी-3 टर्मिनल पर पहुंचा। एयर इंडिया की प्रातःकालीन उड़ान थी। एयर इंडिया के मशीनी उड़ान पंछी ने 8.45 बजे उड़नपट्टी से उड़ान भरी और जल्दी ही मकानों, कालोनियों, सड़कों, पेड़-पौधों, खेतों, जंगलों और अरावली की पहाड़ियों को नीचे छोड़ता हुआ, बादलों की झीनी चिलमन को पार कर नीले आकाश में ऊपर और ऊपर उठता गया जहां सुबह का सूरज मुस्कुरा रहा था। चारों ओर धूप छिटकी हुई थी जिसका बादलों से नीचे धरती पर पता नहीं था। कभी बादल हटता तो नीचे धरती के किसी टुकड़े में धूप की चादर फैल जाती।

उड़नपंछी बादलों के देश में आगे बढ़ता गया। कई बार हलके बादल चलते-चलते खिड़की से भीतर झांक लेते। मैं खिड़की पर था। मन ही मन कहता- हैलो, बादल! वह प्यार से मुझे घूरता आगे बढ़ जाता। वह आगे बढ़ता तो नीचे दूर धरती पर सांप जैसी नदियां, सड़कें, खेत और पहाड़ दिखाई देते। घंटे भर बाद शाल के घने जंगल दिखाई देने लगे तो मैं समझ गया, देहरादून शायद आ गया है। तभी कैप्टन कार्लोस की आवाज गूंजी ‘हम चंद मिनटों में जौली ग्रांट हवाई अड्डे पर उतरने वाले हैं। कृपया अपनी सीट बेल्ट बांध लें।’ 9.30 बजे हम वहां पहुंच गए।

मैं बैगेज की चल-पट्टी से अपना रक-सैक लेकर बाहर निकला ही था कि किसी ने पास आकर मेरा नाम पूछा। मैं मुस्कराया कहा, ‘हां’। वे कीर्ति नेगी थे, जिनकी टैक्सी मेरा इंतजार कर रही थी। मैंने उन्हें बताया था कि बाहर निकलने वालों में जो आदमी अजीब-सा लगे, वही मैं हूं। वे बोले, “आपको ये ब्रजेन्द्र रावत चौरास, श्रीनगर पहुंचाएंगे।”

टैक्सी में बैठा। सारथी ब्रजेन्द्र रावत ने जौली ग्रांट हवाई अड्डे से चौरास की राह पकड़ी। आसपास समाधि में खड़े पर्णविहीन पेड़ों को देख कर मैंने पूछा, ”रावत जी, आप जानते हैं, ये पेड़ कौन-से हैं?” वे बोले, ”हम तो इन्हें अपनी भाषा में पापड़ी कहते हैं। जानवर इनकी पत्तियों का चारा खाते हैं। आगे शाल वन आ गए, जिनमें पता लगा शाम ढले हाथी भी निकल आते हैं।

IMG-20170209-WA0004हम रानीपोखरी, शिवपुरी, ब्यासी होते हुए आगे बढ़ते रहे। हमारे दाहिनी ओर नीले रंग की धीर गंभीर गंगा बह रही थी। कालीगाड़ की पुलिया पार कर सारथी ब्रजेन्द्र रावत ने गाड़ी रोकी। सड़क किनारे के एक रेस्त्रां में उन्होंने खाना खाया। मैंने चाय पी। दोनों ओर के तीखे पहाड़ों के पैताने पतली-सी नीली गंगा बह रही थी। एक गौरेया कुर्सियों के नीचे भोजन के नन्हे बचे-खुचे टुकड़े उठा रही थी।

पहाड़ों की सर्पिल सड़क के मोड़ों को पार करते हुए हम आगे बढ़ते रहे। अगला पड़ाव था- देव प्रयाग जो हर बार मुझे सम्मोहित करता है। भागीरथी और अलकनंदा का मिलन यहीं होता है और यहीं से गंगा गंगा बनती है। दोनों नदियों का अपना-अपना रंग है। अलकनंदा अधिक सांवली दिखाई दे रही थी तो अल्हड़ भागीरथी उछलती-कूदती अलकनंदा से गलबहियां मिल रही थी। ब्रजेन्द्र जी ने फोटो खींचे। गंगा को मन में बसा कर हम आगे बढ़े। देवप्रयाग से अब श्रीनगर केवल 32 किलोमीटर दूर था। वही श्रीनगर जो कभी गढ़वाल राज्य की राजधानी हुआ करता था। राजा अजय पाल ने उस राज्य की स्थापना की थी और सन् 1506 से 1512 तक वहां राज्य किया था। बाद में सन् 1806 से 1815 तक वहां गोरखा राज रहा जिन्हें हरा कर अंग्रेजों की हुकूमत शुरू हुई। लेकिन, हमें सीधे श्रीनगर के बजाय मलेथा से कीर्तिनगर और वहां से नैथाना आदि गांवों से होकर श्रीनगर के सामने, अलकनंदा के उस पार चौरास जाना था जिसके लिए अब लगभग 12 किलोमीटर का चक्कर लगा कर जाना पड़ता है। श्रीनगर से चौरास को जोड़ने वाला पुल सन् 2013 की भयंकर बाढ़ में बह गया था और नए पुल का निर्माण मंथर गति से चल रहा है।

WP_20170209_013बहरहाल, हम पहाड़ की गोद में बसे गढ़वाल विश्वविद्यालय के कैम्पस में पहुंच गए। मेरे रहने की व्यवस्था अलकनंदा के तट के ऊपर नए अतिथि गृह में की गई थी। खुला-खुला खुशनुमा माहौल। विस्तृत आंगन में शाखों की बांहें उठाए एकांत में एक शाल्मलि (सेमल) वृक्ष खड़ा था। शायद उसे बढ़ते तापमान से वसंत के आगमन का संदेश मिल चुका था। शाखों पर कलियां जागने लगी थीं। मैं काफी देर तक आंगन में खड़े उस एकाकी शाल्मलि वृक्ष को देखता रहा। बशीर बद्र की पंक्तियां याद हो आईं:

सर पे साया सा दस्ते दुआ याद है

अपने आंगन में एक पेड़ था याद है

उन्होंने ठीक ही तो कहा है, पेड़ का साया सचमुच हमारे लिए प्रार्थना का, दुआ का हाथ ही तो है।

किनारे जाकर मैं बहुत देर तक बहती हुई अलकनंदा को देखता रहा जो सतोपंथ ग्लेशियर और भागीरथी खरक ग्लेशियर के संगम से जन्म लेकर, धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिंडर और मंदाकिनी की जलराशि को स्वयं में समेट कर पहाड़ों के बीच से कल-कल छल-छल बहती यहां तक चली आई है। क्या उसे पता है, दूर देवप्रयाग में भागीरथी से मिल कर गंगा बन जाना है? उसे पता होगा, क्योंकि कहते हैं नदी की स्मृति बहुत तेज होती है। वह अपना रास्ता कभी नहीं भूलती। तभी तो भूगर्भ विज्ञानी आगाह करते हैं कि जहां कभी नदी बहती थी, वहां इमारतें खड़ी न करें, बस्तियां न बसाएं। नदी वहां लौट सकती है। सन् 2013 में केदारनाथ में मंदाकिनी इसी तरह लौटी थी और तबाही मच गई थी। कुछ देर पहले सारथी ब्रजेंद्र ने तब अलकनंदा में आई भयानक बाढ़ में बह गए पुल की जगह दिखाई थी और तट पर सीमेंट के ऊंचे पुश्ते को दिखाते हुए कहा था- न जाने उस समय के कितने शव उस दीवार और तट की रेत में नीचे दबे होंगे।

DSCN0425चारों ओर पहाड़। पश्चिम के पहाड़ों पर सूरज ढलने लगा। ढलते-ढलते उसने अपनी स्वर्णिम किरणों से चारों ओर पहाड़ों पर सुनहरी आभा फेर दी। और लो, तभी पश्चिम के आकाश में हीरे की तरह शुक्र ग्रह चमक उठा। मैं खड़े-खड़े चारों ओर घूमा। विशाल पहाड़ मौन खड़े थे। उन पर यहां-वहां बसे गांवों और घाटी के किनारे बसे श्रीनगर, सिरकोट और चौरास घिरते अंधेरे में बिजली की रोशनी से जगमगा उठे। पूर्व के आसमान में माघ पूर्णिमा की पहली रात का चांदी के थाल-सा चांद चमक रहा था। श्वेत बादल का एक टुकड़ा धीरे-धीरे चांद की ओर बढ़ने लगा। पूर्व दिशा के पहाड़ की चोटी के ठीक ऊपर चमकते तारे को गौर से देखा तो पता लगा, वह सिरिअस यानी व्याध तारा है। सूर्य, चंद्रमा और शुक्र ग्रह के बाद आसमान में वही सबसे तेज चमकता है।

धीरे-धीरे अंधेरा बढ़ने के साथ-साथ ओरायन यानी व्याध तारामंडल के तारे साफ दिखाई देने लगे। मैंने छत में जाकर आसमान को देखा। और, देखता रहा- वहां….वह तीन तारों का त्रिकांड, वहां नीचे वह राइगेल तारा, ऊपर बाईं ओर लाल-लाल रंग का बीटलग्यूज यानी हमारा आद्र्रा नक्षत्र और उधर दाहिनी ओर ऊपर लाल अल्डेबरान यानी रोहिणी नक्षत्र, उससे ऊपर कृत्तिका के तारों का पुंज। अद्भुत दृश्य था। काश, दिल्ली के आकाश में भी तारे इतने ही साफ दिखाई देते। त्रिकांड के बीच के तारे की सीध में ऊपर दूर कैपिला यानी ब्रह्महृदय तारा चमक रहा था। तभी बादलों के फाहों ने छितरा कर दूधिया चांद को अपने झीने आवरण से ढक लिया। सुबह मुंह अंधेरे ही फिर छत पर जाकर देखा तो पहाड़ों के ऊपर उत्तर के आकाश में सप्तर्षि के तारे चमक रहे थे।

अगला दिन यानी 10 फरवरी मेरे लिए इंस्पायर शिविर के मेधावी बच्चों से मुलाकात का और विज्ञान की बातें करने का दिन था। कैम्पस की सैर करते हुए मैं आडिटोरियम तक पहुंचा। दोपहर के भोजन के बाद गढ़वाल विश्वविद्यालय के भव्य आडिटोरियम में बच्चों से भेंट हुई। उत्तराखंड के विभिन्न जिलों से आए उन 317 मेधावी विद्यार्थियों में लगभग डेढ़ सौ बालिकाएं थीं। शिविर के संचालक डा. सुंद्रियाल ने परिचय कराया और बच्चों से मुखातिब हुआ। सभी बच्चे पहाड़ से थे- इसलिए मैंने उनसे कहा कि अपने बचपन में मैंने प्रकृति की प्रयोगशाला में पढ़ा। आप लोग सौभाग्यशाली हैं कि आपके पास भी वह प्रयोगशाला है। मैंने अपने चारों ओर की दुनिया को गौर से देखा। देखा कि बीज कैसे उगते हैं, फूल कैसे खिलते हैं। कैसे कोहरा बनता है और कैसे बादल झमाझम बरसते हैं। मैं तारों भरे आकाश को देखता रहता था। तरह-तरह की चिड़ियों को देखता था, उनका कलरव सुनता था। वन्य जीवों की आवाजें सुनता था। इस तरह मैं पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और अपने चारों ओर के चराचर जगत से जुड़ गया।

फिर मैंने उनके साथ विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण  के बारे में बातें कीं। उन्हें बताया कि केवल कोई परखनली, या प्रयोगशाला या मेंढक की चीर-फाड़ विज्ञान नहीं है। विज्ञान तो ‘क्यों, कैसे, कहां, किसलिए’ जैसे सवालों का उत्तर खोजने की साधना है। विज्ञान एक सोच है, एक नजरिया है। मैंने कहा, दोस्तो, यूनान के महान दार्शनिक अरस्तू का कहना था कि हमें जो कुछ दिखता है, वह वैसा ही है। जैसे, अगर हम किसी भारी और हलकी चीज को जमीन पर गिराएं तो जाहिर है-भारी चीज जमीन पर पहले गिरेगी। उसकी इस बात पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। अठारह सौ वर्ष से भी अधिक समय तक लोग यही मानते रहे। लेकिन, इटली के गैलीलियो गैलिली को इस पर संदेह हुआ। वह पीसा की मीनार पर चढ़ गया। उसने वहां से लोहे की छोटी, बड़ी हल्की और भारी गेंदें जमीन पर गिरा कर पता लगा लिया कि भारी हो या हल्की हर चीज जमीन पर एक साथ ही गिरती है। उनके गिरने के समय में अगर अंतर आता है तो वह हवा के अवरोध के कारण आता है।

गैलीलियो ने अपनी एक दूरबीन बनाई और उससे आकाश को देखा। उसने चंद्रमा, शुक्र ग्रह, बृहस्पति ग्रह के चार चंद्रमाओं और आकाशगंगा को देखा। तब उसने कहा कि आकाश में कोई स्वर्गलोक नहीं है। वहां भी हमारी पृथ्वी की तरह के पिंड हैं। चंद्रमा पर हमारी धरती की तरह ही पहाड़ और मैदान है। दोस्तो, इससे विज्ञान की राह खुल गई। गैलीलियो ने प्रयोग किया, उसका प्रेक्षण यानी अवलोकन किया, जो देखा उसका विश्लेषण किया और तब निष्कर्ष पर पहुंचा। यह विज्ञान विधि कहलाती है। विज्ञान की सभी खोजें इसी विज्ञान विधि से होती हैं। मैंने उन्हें यह भी बताया कि हमारा देश वैज्ञानिक दृष्टिकोण को संविधान में शामिल करने वाला विश्व का पहला देश है। विज्ञान का प्रसार करना हमारा मौलिक अधिकार है।

DSC_0283जलपान के बाद हमने की सौरमंडल की सैर। आडिटोरियम की बत्तियां बुझा दी गईं। धुंधली रोशनी में मैंने यानी ‘कल्पना’ अंतरिक्षयान के कमांडर ने सभी बाल अंतरिक्ष यात्रियों का स्वागत करते हुए कहा, ‘मैं ‘कल्पना’ यान का कमांडर देवेंद्र आप सभी बाल अंतरिक्ष यात्रियों का सौरमंडल की सैर पर हार्दिक स्वागत करता हूं। हमारा अंतरिक्षयान प्रक्षेपण के लिए तैयार है। मुझे काउंट डाउन की आवाज साफ सुनाई दे रही है- दस, नौ, आठ, सात, छह, पांच, चार, तीन, दो, एक और शून्य! और, लो हमारा यान अंतरिक्ष की ओर कूच कर गया है…दोस्तो, अब अपने मन की आंखें खोल लो…।’

हम तारों की छांव में आगे बढ़ते गए। राह में मैंने उन्हें अमीर खुसरो की पहेली ‘एक थाल मोती भरा, सबके सर पर औंधा धरा…’सुनाई। फिर हम सभी ने तारों का गीत गाया- आसमान में लाखों तारे/टिमटिमाते तारे/तारे कितने सारे!’ अंधेरे में पीछे पर्दे पर तारों भरा आसमान दिख रहा था। गाते-गाते हम सूरज के पास पहुंच गए। पर्दे पर सूरज का धधकता लाल गोला उभर आया। सूरज को करीब से देखने-समझने के बाद हम आगे बढ़े और हमने एक-एक कर आठों ग्रहों यानी बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून को देखा। हमने क्षुद्र ग्रहों की विशाल पट्टी भी देखी। पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून के चंद्रमा देखे। सैर करते-करते बौने ग्रह प्लूटो, सेरेस, मेकमेक, होमिया, ईरिस और सेडेना को भी देखा।

हमने सौरमंडल के सीमांत पर, उसके चारों ओर गोलाई में फैले बर्फ की विशाल मैली बर्फीली गेंदों का ऊर्ट बादल भी देखा। वहां से निकली एक ऐसी ही बर्फीली गेंद हमारे सौरमंडल में चली आई थी। सूरज की गर्मी से उसकी गैसों और धूल से लाखों किलोमीटर लंबी पूंछ बन गई। वह बर्फीली गेंद धूमकेतु बन गई थी। हमने उस धूमकेतु का सिर और जटा भी देखी। फिर हम उल्का पिंडों से बचते-बचाते अपने प्यारे ग्रह पृथ्वी की ओर लौट आए। और, धीरे-धीरे ऊंचे पहाड़ से घिरे चौरास में गढ़वाल विश्वविद्यालय के विशाल आडिटोरियम में सुरक्षित उतरे। हमें आसमान से चौरास के नीचे बहती नीले रंग की अलकनंदा भी दिखाई दी। धरती पर आकर हम सबने मिल कर जीवन का गीत गाया। फिर कुछ विद्यार्थियों के सवालों के जवाब दिए।

सौरमंडल की लंबी यात्रा से लौटने के बाद चाय पीते-पीते बच्चों और शिक्षक-शिक्षकाओं से बातचीत हुई। शाम को अतिथि गृह में डा. सुंद्रियाल से इंस्पायर शिविर पर काफी चर्चा की, उनसे विदा ली और उन्हें बताया कि सुबह-सुबह ही वापस लौटना चाहूंगा। सारथी राणा जी के साथ सुबह सात बजे देहरादून को कूच किया। अभी कीर्तिनगर बाजार पार कर ही रहे थे कि एक पुलिस वाले ने हाथ से रूकने का इशारा किया। राणा जी बाहर निकले और पुलिस वाले से बात करके तेजी से गाड़ी में बैठे। मैंने कहा, “चुनाव के दिन होने के कारण पुलिस भी बहुत पूछताछ कर रही है। क्या पूछा पुलिस वाले ने?”

वे कुछ जवाब देते, तब तक खिड़की के करीब आकर पुलिस वाला गौर से मुझे देखने लगा। मैंने भी चश्मा उतार कर उसे देखा। वह संतुष्ट होकर चला गया।

मैंने फिर पूछा, “पुलिसवाला क्या पूछ रहा था?”

“कुछ नहीं। जबरदस्ती बैठना चाह रहा था।”

“तो आपने क्या कहा?”

“मैंने कहा फारेनर (विदेशी) बैठा हुआ है। बैठने नहीं देगा या उतर जाएगा।”

मैं अब समझा कि पुलिसवाला मुझे क्यों घूर रहा था! राणा जी सधे हाथों से गाड़ी चलाते रहे। हमने गंगा के चैड़े पाट के निकट कौड़ियाला में रूक कर चाय-नाश्ता लिया और फिर आगे बढ़ चले। पांच घंटे की यात्रा के बाद हम देहरादून पहुंच गए। मैंने मित्र एम.एस. बिष्ट जी के घर पर रात्रि विश्राम किया।

सुबह 10.30 बजे की उड़ान थी लेकिन एयर इंडिया का अल-सुबह ही संदेश आ गया कि उड़ान अब सुबह 10.10 बजे छूटेगी। टैक्सी लेकर युवा सारथी उमेश के साथ 7 बजे जौलीग्रांट हवाई अड्डे की ओर कूच किया। वहां पता लगा कि वी आई पी मूवमेंट के कारण उड़ान पहले भेजी जा रही है। प्रस्थान लाउंज के पार चार हैलीकाप्टर खड़े थे और सुरक्षाकर्मियों की काफी हलचल थी। पता लगा प्रधानमंत्री उत्तराखंड के दौरे पर आ रहे थे। सुबह की धूप में हमारे छोटे-से विमान ने ऊंची उड़ान भरी और आकाश मार्ग से बादलों के देश से होता हुआ, घंटे भर में दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतर गया। मैंने घर की राह पकड़ी। जानता था- वे चहकते बच्चे, वे पहाड़ धीरे-धीरे बहती वह अलकनंदा, वह उजला चांद और वह तारों भरा आकाश बहुत दिनों तक मेरे सपनों में आएंगे।

– देवेंद्र मेवाड़ी

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