कालयात्रा में भीमबेटका (यात्रा संस्मरण)

 

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यह मन भी कालयात्रा पर कहां-कहां भटकता रहता है! धरती से आसमान तक। आज से लेकर अतीत की दुनिया और भविष्य में बेरोक-टोक जब चाहे आता-जाता रहता है। लेकिन, वह अनुभव अनोखा और अविस्मरणीय बन जाता है जब मन के साथ शरीर भी इस में शरीक हो जाता है।

यही हुआ। भोपाल गया तो मन भीमबेटका की ओर निकल भागा। बमुश्किल उसे रोका और कहा, नहीं, इस बार यों अकेले नहीं जावोगे, मैं भी साथ चलूंगा। वह तो न जाने कब से भीमबेटका के शैलचित्र देखने को मचल रहा था लेकिन अब तक मैं ही वहां जा नहीं सका था। इसलिए, इस बार वहां गया तो मौका मिलते ही वह भागने लगा।

रात में मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् के युवा मित्र विकास शेंदे का फोन आया कि सुबह गाड़ी भेजूंगा। आप लोग चाहें तो आसपास घूम लें। मन खुश हो गया। विकास से कहा, हम भीमबेटका जाना चाहेंगे। सुबह सारथी ब्रजेश गाड़ी लेकर आया तो होटल पलाश से हम भीमबेटका के लिए निकल पड़े। हम यानी हम तीनः मैं, लखनऊ के बीरबल साहनी पुरावनस्पति संस्थान के वैज्ञानिक डा. चंद्रमोहन नौटियाल और विज्ञान पत्रिका ‘आविष्कार’ के संपादक श्री राधाकांत अंथवाल।

भोपाल-होशंगाबाद रोड पर सड़क के दोनों ओर खड़े पलाश के पेड़ों को पीछे छोड़ते हुए हम सड़क के दोनों ओर फैले ओबेदुल्लागंज कस्बे के बाजार को पार कर लगभग 45 किलोमीटर दूर रातापानी अभयारण्य की हरियाली के बीच विंध्य पर्वत माला के उत्तरी छोर पर भीमबेटका की विशाल काली, खड़ी चट्टानों के पास पहुंच गए। आसपास सागौन, साल, बहेड़ा, कारी और तेंदू के पेड़ों तथा लेंटाना की छिटपुट झाड़ियों से भरा जंगल। कहते हैं, कभी पाडंव यहां आए थे। भीम की बैठक के नाम पर इस स्थान का नाम भीमबैठका पड़ा जो आगे चल कर भीमबेटका हो गया। इन शैलाश्रयों की खोज सन् 1957 में डा. विष्णु वाकनकर ने की थी जो सफर के दौरान ट्रेन में से इन पहाड़ियों को देख कर चैंके थे। उन्होंने फ्रांस और स्पेन में ऐसी चट्टानों वाली पहाड़ियां देखी थीं। वे यहां आए और इन पुरा पाषाणकालीन शैलाश्रयों को देख कर हतप्रभ रह गए।

मैं अपने सामने सदियों से खड़ी भव्य चट्टानों को मैं देर तक देखता रहा। फिर देखा, थोड़ा ऊपर एक ओर के विशाल शैलाश्रय में आधुनिक मानवों ने एक मंदिर की स्थापना कर ली है और दूसरी ओर के शैलाश्रय में करीने से दीवाल चिन कर दरवाजे का फ्रेम लगा दिया है।

दो कठोर चट्टानों के बीच दरार में जड़ें जमा कर हवा में हरी पत्तियों की हथेलियां हिलाता नन्हा पीपल कठिन परिस्थितियों में भी जैसे हंसते-हंसते संघर्ष करते हुए जीने का संदेश दे रहा था। एक और ऊंची खड़ी चट्टान पर शान से खड़ा पीपल का ही एक बिरादर पेड़ दूर नीचे जमीन तक अपनी जड़ फैला कर किसी भी हालात में हार न मानने की बात कह रहा था।

चित्रांकित शैलाश्रयों की ओर जाने वाले मार्ग के मुहाने पर भीमबेटका को विश्वविरासत घोषित करने वाला सुनहरा फलक दिखाई दिया। यूनेस्को ने सन् 2003 में पुरा पाषाणकालीन आदि मानवों की इस शरणस्थली को विश्व विरासत घोषित किया। भारत में यह मानव की बसाहट का प्राचीनतम स्थान है। माना जाता है कि इनमें से कुछ शैलाश्रयों में होमो इरेक्टस मानव रहा होगा।

इन शैलाश्रयों के एक गाइड रवींद्र राय और अपने दोनों साथियों, नौटियाल जी और अंथवाल जी के साथ पेड़ों के बीच से विशाल चट्टानों से बने शैलाश्रयों को देखते हुए एक-एक कदम आगे बढ़ रहा था कि ऐन सामने एक बड़ी चट्टान की खोह में खड़े पाषाणकालीन मानव पर नजर पड़ी। उसके पास ही उसकी स्त्री कुछ पीस रही थी। पीछे बच्चा खड़ा था।…….बस, मन छूट कर कालयात्रा पर निकल गया। अब मैं अपने साथियों के साथ ‘हूं’, ‘हां’ कह कर चल रहा था, रवींद्र की बातें सुन रहा था लेकिन मन पुरा पाषाणकाल में आदिमानवों के बीच पहुंच गया…..उन पुरखों को कंद-मूल जमा करते, शिकार पर जाते और चट्टानों के भीतर चित्र बनाते हुए देखने लगा।

शायद वह पूर्व पाषाणकाल था जब मन ने देखा, कुछ आदि मानव टहनी की पतली कूंची से चटख लाल और हरे रंग से जानवरों के चित्र बना रहे थे। मन दम साध कर देखता रहा, उन्होंने एक गेंडे का चित्र बनाया। वर्तमान काल से गया मन क्षण भर चैंका- गैंडा? और, वह भी यहां इस पथरीले इलाके में? कि, तभी वह संभला। याद आया, वर्तमान से 30,000 वर्ष पीछे अतीत में हूं। तब तो भारत भर में गेंडे पाए जाते थे।….उन चित्रकार पुरखों ने याद करते हुए, बड़े ध्यान से जंगली भैंसे, बाघ और रीछ का भी चित्र बनाया। वे लाल पत्थर और पत्तियां घिस कर रंग बना रहे थे। कुछ आदिमानव जंगल से पत्थर के भोंडे नुकीले हथियारों से हिरन का शिकार कर रहे थे।

मैं सोच में डूबा था कि नौटियाल जी की आवाज आई, “क्या सोच रहे हैं? इधर आइए, आपका फोटो तो खींच लूं।” उन्होंने फोटो खींचा, स्क्रीन पर दिखाया। मैं वर्तमान में खड़ा था। वे आगे बढ़े और मेरा यायावर मन पलट कर मध्य पाषाणकाल में पहुंच गया।

आज से 12,000 से 5,000 वर्ष के बीच का समय रहा होगा। यहां आदिमानवों के जीवन में हलचल बढ़ गई है। वे चट्टानों के भीतर सजावट के साथ चित्र बना रहे हैं। वन्य पशुओं के साथ मानव आकृतियां भी बनाने लगे हैं। पहले की तुलना में चित्र आकार में छोटे हैं। हमारे ये पुरखे अब नुकीले, कंटीले भालों, बर्छियों और धनुष-बाणों से पशुओं का शिकार करने लगे हैं। वहां उस चट्टान पर वे दो आदिमानव ऐसी ही एक आखेट की घटना का चित्रांकन कर रहे हैं। आसपास कहीं मादल बज रहा है। मन उधर गया तो देखा एक आदिमानव गले में लटका मादल दोनों हाथों से बजा रहा है। साथी आदिमानव हाथों में हाथ डाले कतार में नाच रहे हैं। चित्रकार आदिमानव सफेद रंग से यह दृश्य चट्टान में चित्रित कर रहे हैं। उन्होंने पास में ही एक मां और बच्चे का चित्र बनाया है।

मन कालयात्रा पर आगे बढ़ गया है। शायद आज से 5,000 से 2,500 वर्ष पहले का समय है। इन विशाल काली-भूरी चट्टानों से भरी पहाड़ियों से दूर नीचे मैदानों में लोग खेती करने लगे हैं। इस पहाड़ी से उतर कर कुछ आदिमानव छिपते-छिपाते नीचे उतर कर एक जगह कंद-मूल रख रहे हैं। खेती करने वाले वहां रस्सियां और भाले-बछियां बनाने का सामान रख कर कंद-मूल उठा रहे हैं। इसका मतलब खेती करने वाले किसानों और आदिमानवों में चीजों का लेन-देन शुरू हो गया है।

मन यह देख कर खुश हुआ ही था कि तभी अंथवाल जी की आवाज आई, “वहां नीचे मैदानों की ओर क्या देख रहे हैं आप? आइए, इस चट्टान पर तीनों फोटो खिंचाते हैं। रवीन्द्र जी खींच देंगे।” मैं जाकर साथ में खड़ा हो गया। रवीन्द्र जी ने हमारा फोटो खींचा और बताया, “पीछे देखिए, वह चट्टान ‘स्टोन टार्टाइज’ कहलाती है। प्रकृति ने चट्टान को कछुए का रूप दे दिया है।”

रवीन्द्र जी बता रहे हैं, “यहां देखिए चित्रों को लाल, सफेद और पीले रंगों से बनाया गया है। वे देखिए घुड़सवार दिखाई दे रहे हैं”……रवीन्द्र जी की बात सुन रहा हूं, लेकिन मन लगभग 2,500 वर्ष पीछे पहुंच गया है। वहां वे चित्रकार चट्टानों पर घुड़सवारों के चित्र बना रहे हैं। मन भटकता हुआ देख रहा है कि कुछ आदिमानवों ने कुरते जैसी पोशाक पहनी है। कुछ चित्रकार इन नए फैशन वाले आदिमानवों के चित्र बना रहे हैं। चित्रों में वृक्ष देवता भी बनाए जा रहे हैं। एक चित्रकार ने तो आकाश में उड़ता रथ बना दिया है।

हम रवीन्द्र जी के पीछे-पीछे मंत्र मुग्ध होकर चल रहे हैं। वे कह रहे हैं, “और, यह है ‘जू राक’। देखिए, इसमें जानवर ही जानवर बने हैं। आदिमानव चित्रकारों ने यहां अपने देखे तमाम वन्य पशु चित्रित कर दिए हैं। उनके दो झुंड़, दो दिशाओं में चल रहे हैं। झुंड में हिरन हैं, सांभर हैं, जंगली भैंसा है और हाथी भी है। उधर देखिए, मोर और सांप का चित्र बनाया गया है। और, वह सूर्य और हिरन देखिए। वे एक और चट्टान पर हमें बड़े दांतों वाले दो हाथी और शिकारी, धनुर्धर, ढाल-तलवारें दिखाते हैं। मुझे लगता है, हमारा आदिमानव पुरखा शायद सभ्य होता जा रहा है।”

वे एक शैल चित्र में हमें एक आदमी पर टूट पड़े जंगली भैंसे का चित्र दिखाते है जिसकी बगल में दो आदमी असहाय खड़े हैं। वे बताते हैं, शायद भैंसे के तेज क्रोध को दर्शाने के लिए उसकी थूथन को खूब मोटा दिखाया गया है।

मन कालयात्रा पर चलते-चलते मध्यकाल में फिर उन्हीं शैलाश्रयों में भटक रहा है। इस काल में चित्र और भी सजावटी बनाए जा रहे हैं। लेकिन, पहले अनगढ़ता में जो सौंदर्य था, वह अब कम हो रहा है। एक आदिमानव चित्रकार ज्यामितीय चित्र बना रहा है। घोड़े डमरू जैसे आकार से बनाए गए हैं। घुड़सवार तेज, नुकीले भाले लेकर आगे बढ़ रहे हैं। चित्रकार मैगनीज, हेमेटाइट, नरम पत्थर और लकड़ी के कोयले को पीस कर रंग बना रहे हैं। ये उनमें जानवरों की चर्बी और पत्तियों का रस भी मिला रहे हैं।

हम पेड़ों के बीच की पगडंडी से वापस लौट रहे हैं। एक विशाल शैलाश्रय में नीली कमीज पहने मूर्ति सा बैठा मानव देख कर मैं ठिठका। यह कैसा आदिमानव? तभी वह मानव हिला। गार्ड था। जहां कभी वस्त्रहीन आदिमानव बैठते होंगे, वहां बैठा इक्कीसवीं सदी का गार्ड समय की लंबी यात्रा याद दिला रहा है। आगे बढ़े। एक और शैलाश्रय की दीवाल पर एक आदिमानव चित्र बना रहा है। गौर से देखा, आदि-मानव का पुतला है। रवीन्द्र कभी फिर आने का आग्रह कर रहा है।

हम उन ऊंची चट्टानों, उनके भीतर के शैलाश्रयों और शैल चित्रों को पीछे छोड़ कर भोपाल वापस लौट रहे हैं। मन शांत है। हजारों वर्ष पीछे पुरा पाषाणकाल तक की यात्रा जो कर आया है। जानता हूं, भीमबेटका के शैलचित्र आजीवन याद आते रहेंगे। याद आते रहेंगे और मन बार-बार पाषाणकाल की कालयात्रा करता रहेगा।

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