डाक्टर कैथ

dscn16021122

 

पांच सितंबर को फेसबुक मित्र आशीष श्रीवास्तव की वाल पर कैथ और कैथ की चटनी का चित्र देखा तो मुझे मंदसौर याद आ गया। दो साल पहले वहां गया था तो इलैक्ट्रानिक मीडिया के युवा पत्रकार मित्र प्रदीप शर्मा मुझे अपनी मोटर साइकिल पर आसपास घुमाने ले गए। रास्ते में उन्होंने एक बस्ती में मुझे दो-चार पेड़ दिखा कर कहा, “मेरी नानी कहा करती थी, इनके फल पेट के रोगों के लिए अचूक दवा होते हैं। बचपन में जब भी नानी के पास आता था, वे मुझे दूध में इसका गूदा घोल कर पिलाया करती थीं और कहा करती थीं- तेरा पेट सदा ठीक रहेगा। वे इन फलों के गूदे को जोड़ों के दर्द की भी दवा बताती थीं।” मित्र प्रदीप ने उस फल का नाम कबीट बताया था।
अब मित्र आशीष श्रीवास्तव के लगाए कैथ के फलों का चित्र देखा तो प्रदीप के दिखाए कबीट के फल याद आ गए। मैंने उन पेड़ों और फलों के फोटो खींच लिए थे। बेल जैसे दिखाई देने वाले कैथ और कबीट के फल एक ही तरह के थे। इन फलों के चित्र देख कर मन कैथ के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो उठा। कई दिन तक कई स्रोतों से इसके बारे में जानकारी एकत्र की तो पता लगा कि हम कैथ कहें या कबीट अथवा कबिट ये तीनों नाम कैथ के ही हैं। यूं भारतीय भाषाओं में भी इसके मिलते-जुलते नाम हैं: मराठी में कोविट, गुजराती में कोथा, बांग्ला में कटबेल, कन्नड में बेलाऊ और तेलगू में वेलगा। संस्कृत में इसे कपित्थ कहा गया है। रही बात इसके वैज्ञानिक नाम की, तो वनस्पति विज्ञानी इसे लिमोनिया एसिडिसिमा कहते हैं। और, यह नाम भी पौधों के प्रख्यात पुरोहित कार्ल लिनियस ने रखा। अंग्रेजों ने शायद बंदरों को कैथ के फल खाते हुए देखा होगा, तभी तो उन्होंने इसका नाम मंकी फ्रुट रख दिया! वैसे अंग्रेजी में इसे वुड ऐपल भी कहते हैं।
कभी हमारे देश के बड़े भूभाग में उत्तर से दक्षिण तक कैथ के पेड़ पाए जाते थे। अब महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कनार्टक, मध्य प्रदेश और पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में ही कैथ के वृक्ष दिखाई देते हैं। हिमालय क्षेत्र में यह 1000 से लेकर 4000 फुट तक की ऊंचाई पर पाया जाता है। उत्तराखंड में इसे कठबेल कहा जाता है।
कैथ के पेड़ प्रायः स्वयं उगते हैं और प्रकृति में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं। लेकिन, अब महाराष्ट्र में कई जगह इसे उगाया भी जाता है। इसके अलावा श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, थाइलैंड, कंबोडिया और जावा तक में यह पाया जाता है। वैज्ञानिक इसके फलों को ‘बेरी’ कहते हैं। इसके पेड़ लगभग 30 फुट तक ऊंचे होते हैं। पेड़ों की छाल खुरदरी और कंटीली होती है। बौद्ध विद्वान हुआनजांग (602-664 ईस्वी) ने लिखा है कि यह भारतीय फल है।
कई बार डाक्टर हमारे सामने खड़ा होता है लेकिन हम उसे पहचान नहीं पाते। कैथ भी ऐसा ही डाक्टर है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसे पेट के रोगों का विशेषज्ञ बताया गया है। इसे पाचन शक्ति बढ़ाने की अचूक औषधि कहा गया है। यह भी बताया गया है कि कैथ के फलों का गूदा, दालचीनी, जीरा और शहद मिला कर खिलाया जाए तो उससे बच्चों को कुपोषण से बचाया जा सकता है। वैद्य तो यहां तक कहते हैं कि यह लीवर सिरोसिस, स्तन तथा गर्भाशय के कैंसर और पाइल्स में भी लाभ पहुंचाता है। कैथ के फल एंटिआक्सीडेंट होते हैं और शरीर के विकार दूर करते हैं। इसकी पत्तियां भी कब्ज, पेचिस, अतिसार और खूनी आंव में लाभकारी बताई गई हैं।
राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद ने कैथ के पोषक गुणों का पता लगाया है। उनके अध्ययन के अनुसार इसके सौ ग्राम गूदे में 7.1 ग्राम प्रोटीन, 3.7 ग्राम वसा, 1.9 ग्राम खनिज, 5 ग्राम रेशा और 18.1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है। इसमें 61 अंतर्राष्ट्रीय इकाई केरोटिन होता है जो हमारे शरीर में विटामिन ‘ए’ की पूर्ति करता है। फलों में विटामिन ‘सी’, थाइमिन, रिबोफ्लेविन और नियासिन भी पाया जाता है। खनिजों में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, मैग्नीशियम, क्रोमियम, मैग्नीज और जिंक पाया जाता है।
कैथ के फल को कड़ी जमीन पर पटक कर पता लगाया जा सकता है कि अया वह पक कर तैयार है कि नहीं। जमीन में पटकने से अगर फल उछलता है तो इसका मतलब है कि अभी वह पक कर तैयार नहीं हुआ है। लेकिन, अगर वह थप्प टकराकर जमीन में ही रह जाता है तो मतलब खाने के लिए पक कर तैयार है। इसके फलों को तोड़ने की भी खास तरकीब है। इसके फलों पर धीरे-धीरे हथौड़ी मार कर या फल को पत्थर अथवा कंक्रीट के फर्श पर धीरे-धीरे मार कर उन्हें तोड़ा जा सकता है। पके हुए फलों के गूदे से भीनी-भीनी, मीठी, कस्तूरी-सी गंध आती है। कच्चे फलों का स्वाद बहुत खट्टा होता है लेकिन पके हुए फलों में हल्की मिठास आ जाती है।
आमतौर पर कैथ के गूदे का शरबत बनाया जाता है। इसके लिए गूदे को पानी में घोल कर छान लिया जाता है। गूदे का मिल्क शेक भी बनाया जा सकता है। चटनी बनाने के लिए इसके गूदे में भुनी दाल, हरी मिर्च आदि काट कर उसे पीस लिया जाता है। गुड़ और जीरा मिला कर स्वादिष्ट मीठी चटनी भी बनाई जा सकती है।
तो, डाक्टर कैथ को पहचानिए और इसके फलों का गूदा अपने भोजन में शामिल कीजिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *