ऐसे थे भीष्म जी

 

hqdefault

नैनीताल से एम.एस.सी. करने के बाद दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में पहली नौकरी लगी तो नौकरी की खुशी के साथ-साथ मन यह सोच-सोच कर खुश होता था कि अब हिंदी के बड़े साहित्यकारों को देखने और सुनने का मौका मिलेगा। मैं कहानियां लिखने लगा था और मेरी कुछ कहानियां ‘कहानी’, ‘माध्यम’ और कुछ अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो चुकी थीं। साहित्यकारों को पत्र भेजा करता था। ‘चीफ की दावत’ पढ़ने के बाद भीष्म साहनी जी मेरे प्रिय कथाकार बन गए। उन्हें पत्र भेजा और उनका स्नेहिल उत्तर पाकर अभिभूत हो उठा। यह जानकर वे बहुत खुश हुए कि मुझे दिल्ली में नौकरी मिल गई है और लिखा कि दिल्ली आने पर उनसे जरूर मिलूं।

दिल्ली आने के बाद उनसे मिलने का साहस जुटाता रहा। वे उतने बड़े लेखक और मैं नवोदित। यों भी मुझसे उम्र में 29 वर्ष बड़े थे। इसलिए कई दिनों तक मिलने से हिचकता रहा। उनके घर का पता मन में रटा हुआ था-8/30, ईस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली। मैं पूसा इंस्टिट्यूट के भीतर ही किसी के क्वार्टर में किराए पर एक कमरा लेकर रहता था। पूसा गेट के सामने ही ईस्ट पटेल नगर था। वहां शाम को पार्क में घूमने जाता तो गलियों के नंबर देखता रहता। पूछते-खोजते भीष्म जी के घर का पता लगा लिया। खैर, हिम्मत जुटा कर एक दिन उनके घर पहुंचा। गेट की कुंडी खटखटाई। बरामदे के एक ओर एक लाल रंग की मोटरसाइकिल खड़ी थी। उसकी बगल में कछुए के आकार की कार थी। भीतर से एक महिला आईं। पूछा, “आप कौन?” मैंने एक सांस में कहा, “देवेन मेवाड़ी” नैनीताल से, भीष्म जी हैं क्या?”

वे मुस्कुराईं। भीतर को मुंह करके कहा, “देवेन मेवाड़ी हैं। मिलने आए हैं।”

भीतर से आवाज आई, “बुला लो उन्हें।”

भीतर गया तो सामने भीष्म जी को देखा। वे बोले, “ये शीला हैं, मेरी पत्नी।” मैंने उन्हें पुनः नमस्कार किया। भीष्म जी ने मेरे मिलने आने पर खुशी जाहिर की। मेरे काम के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि मक्का की फसल पर अनुसंधान कर रहा हूं। लेखन पर बात हुई। मैंने बताया कि ‘कहानी’ में कहानी आने वाली है। उन्होंने लिखते रहने की सलाह दी और कहा कि खूब पढ़ना चाहिए। पत्रिकाओं में कहानियां पढ़ते रहो और देश-विदेश के लेखकों की कहानियां, उपन्यास भी पढ़़ते रहना। उन्होंने मुझे लेव तालस्ताय की कहानियों की एक मोटी किताब दी। उन कहानियों का अनुवाद भीष्म जी ने ही किया था। चाय पीकर थोड़ी देर बाद मैंने चलने के लिए आज्ञा मांगी तो वे गेट तक छोड़ने आए और कहा, “आते रहना। मुझे अच्छा लगेगा।”

वहां से निकला तो लगा जैसे मैं सातवें आसमान पर उड़ रहा होऊं। इतने दिन बेकार ही झिझकता रहा। मन में निश्चय किया कि बीच-बीच में भीष्म जी के पास आता रहूंगा। और फिर उनसे कभी-कभी मिलता रहा। तब उनकी बेटी कल्पना मास्को में थी। बेटा वरुण सनावर स्कूल में पढ़ रहा था। घर में भीष्म जी और शीला जी के साथ-साथ कभी-कभी वरुण से भी भेंट होती थी जिसे डाक टिकट जमा करने का बड़ा शौक था। एक बार शीला जी ने कहा, “देवेन को अपना स्टैम्प कलैक्शन दिखाओ वरुण।” वरुण ने अपने वे तमाम डाक टिकट दिखाए जो विभिन्न देशों और विभिन्न विषयों पर थे। वरुण इतने उत्साह से अपना वह संग्रह दिखा रहा था कि मैंने मन में तय किया, अपने स्टाम्प कलैक्शन की अलबम उसे भेंट कर दूंगा। अगली बार वहंा गया तो वरुण को मैंने अपनी अलबम भेंट कर दी। भीष्म जी और शीला जी ने कहा, “अरे रे, अलबम क्यों दे रहे हैं? अपना संग्रह दिखा दीजिए बस। कोई अतिरिक्त डाक टिकट हों तो वे दे दीजिए।” मैंने कहा, “नहीं, ये डाक टिकट वरुण के संग्रह में रहेंगे तो ठीक रहेगा। उसे इतना शौक है।” मेरे पास उस अलबम में काफी ऐसे पुराने डाक टिकट थे जो मुझे नैनीताल के रोहिला लाॅज की दुछत्ती में मिले। मैं वहां रहता था। आजादी के समय जब अंग्रेज नैनीताल छोड़ कर गए होंगे तो उस घर में रहने वाले अंग्रेज परिवार का बचा-खुचा बेकार सामान दुछत्ती में पड़ा रह गया होगा। उसमें क्लब की पुरानी बिल-बुक और रसीदें वगैरह भी थीं। उसी परिवार के किसी बच्चे ने वे डाक टिकट जमा किए होंगे। वे दुछत्ती के फर्श पर बिखेरे हुए थे।

“देवेन तुम्हें अपना पूरा अलबम दे रहे हैं, इसके लिए उन्हें धन्यवाद दो और तुम उन्हें कुछ नहीं दोगे?” शीला जी ने कहा।

वरुण भीतर गया और एक बड़ी-सी किताब लेकर लौटा- ‘वंडर्स आफ साइंस’। उसे मुझे भेंट करते हुए उसने कहा, “आप साइंस पढ़ते हैं। यह किताब आपको बहुत अच्छी लगेगी।” किताब वाकई अच्छी थी। भीतर वरुण के नाम की पर्ची चिपकी हुई थीः ‘नाम-वरुण साहनी, स्कूल-सनोवर, कक्षा-6 बी।’ वह किताब आज भी मेरे पास है।

भीष्म जी और शीला जी के स्नेह और सरल व्यवहार के कारण मैं प्रायः उनकेे घर जाने लगा। कुछ दिन नहीं जाता तो वे नाराज होते थे। कई बार देखा शीला जी सितार पर अंगुलियां चलाते हुए, आंखें बंद करके संगीत की धुन में खोई हुई हैं। दो-एक बार ऐसा भी हुआ कि वहां गया तो उन्होंने दरवाजा खोल कर भीतर आने को कहा। बैठने का इशारा करके धीरे से बोलीं, “हम लोग धीरे-धीरे बात करेंगे। भीखम (भीष्म जी को वे घर में वे इसी नाम से संबोधित करती थीं) कहानी पूरी करने वाले हैं। हमारी बातचीत से कहीं उनका ध्यान न बंटे।” हम चुपचाप चाय पीते रहे। थोड़ी देर बाद मुस्कराते हुए भीष्म जी आए और कहा, “मुझे बताया नहीं देवेन के बारे में?” शीला जी बोलीं, “जानबूझ कर नहीं बताया। हम दोनों आपकी कहानी पूरी होने का इंतजार कर रहे थे।” फिर बातचीत में भीष्म जी भी शामिल हो गए।

वे कहते थे, शीला जी उनकी कहानियों की पहली पाठक हैं। भीष्म जी का पढ़ने का कमरा और किताबों का संग्रह ऊपर के कमरे में था। एक दिन उन्होंने मुझे उस कमरे में बुलाया। वहां वे शरत नाम के एक युवा कथाकार के साथ बैठे बातें कर रहे थे। उन्होंने उनसे मेरा परिचय कराया। ‘नई कहानियां’ में शरत की एक कहानी छपी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी। कहानी का नायक कंधे पर गिटार लटका कर एक मोटरसाइकिल में दूर एकांत की ओर निकल जाता है। पूरी कहानी में वही अकेला पात्र था और बाकी एकांत था। मेरा मन भी मोटरसाइकिल खरीदने को होता था लेकिन आमदनी उतनी नहीं थी। सोलह वर्ष बाद मैं मोटरसाइकिल खरीद पाया।

एक बार मैंने भीष्म जी से पूछा, “आपकी कितनी किताबें छप चुकी हैं?”

वे बोले, “दो। किताब छपाना भी आसान नहीं है।” तब तक उनके दो संग्रह ‘भाग्य रेखा’ और ‘पहला पता’ छप चुके थे।

मैंने पूछा, “किताब पर रायल्टी या पैसे मिलते हैं?”

उन्होंने कहा, “बस किताब छप गईं, इसी में संतोष है। अब तीसरे कहानी संग्रह में क्या होता है, देखना है। ज्यादा जरूरी यह है किताब छपे।”

कई बार शीला जी बंबई (अब मुंबई) गई होती थीं जेठ बलराज साहनी के परिवार से मिलने। तब भीष्म जी अकेले होते। वही चाय बनाते। एक बार देर शाम ऐसे ही मौके पर मैं वहां पहुंचा तो वे खुश होकर बोले, “अच्छा हुआ तुम आ गए। अब खाना साथ खाएंगे।” मैं अचकचाया तो पूछा, “अभी खाना खाया तो नहीं?” मैंने कहा, “नहीं, लेकिन मैं अभी होटल में खावूंगा।” वे बोले, “बस ठीक है। ऐसा करते हैं, मैं रोटी लगवा के आता हूं। आओ, तुम तब तक चूल्हे पर दाल-सब्जी देखो।” मैं उनके साथ किचन में गया। आटा वे गूंध चुके थे। मुझे वहां छोड़ कर वे रोटी लगवाने जाने लगे तो मैंने पूछा, “कहां बनवाएंगे रोटी?” बोले, “पास में ही सांझा चूल्हा है। वहीं पर लगवा लाता हूं।”

नेकर और टीशर्ट पहने दुबले-पतले भीष्म जी आटा लेकर तेजी से बाहर निकल गए। मैं भारी उलझन में था। दाल-सब्जी गैस के चूल्हे पर पक रही थी। मैं पूसा गेट पर देबी होटल में खाना खाता था। गैस के चूल्हे के बारे में कतई कुछ नहीं जानता था। दाल-सब्जी उबलती जा रही थीं। मेरे हाथ-पैर फूल गए। अब क्या करूं? दाल-सब्जी जल गई तो क्या होगा? चूल्हे को छूने से भी डर रहा था। परेशानी में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि तभी भीष्म जी आ गए। बोले, “सब्जी शायद तले लग रही है। चलाई नहीं?” मैंने कहा, “चलाई थी।” उन्होंने कोई बटन घुमा कर गैस बंद कर दी और बोले, “चलो, अब गरमा-गर्म खाना खाते हैं।” प्लेटें लेकर हम डाइनिंग टेबल पर आ गए और बातें करते हुए खाना खाने लगे। बातचीत में वे अक्सर नए लेखकों की कहानियों के बारे में पूछते थे कि इधर कौन-सी कहानियां पढ़ीं, किस पत्रिका में पढ़ीं, कहानी का थीम क्या था, वगैरह। कहते थे, तुमसे बातें करके मुझे नए लेखकों और उनकी कहानियों की जानकारी मिलती है। पढ़ता मैं भी हूं लेकिन इतना सब कुछ कहां पढ़ा जा सकता है।

खाना खाकर भीष्म जी बोले, “चलो थोड़ी दूर तक सैर करके आते हैं।” मैं उनके साथ चल पड़ा। वे पूसा गेट की ओर चले। चौराहा पार करके पूसा गेट के भीतर हिल साइट रोड में पहुंच कर बोले, “इस रोड पर पेड़ों की छांव में घूमना मुझे बहुत अच्छा लगता है। यहां न भीड़ है, न शोरगुल।” तभी उन्होंने जेब से एक उम्दा सिगरेट की डिब्बी निकाली और एक सिगरेट मेरी ओर बढ़ाई। मैं सकते में! मन उद्वेलित हो उठा। भीष्म जी के सामने सिगरेट पिऊंगा? नहीं, ऐसा नहीं कर सकता।…..उन्होंने मुझे झिझकते हुए देख कर कहा, “क्यों क्या हुआ? सिगरेट नहीं पीते?” मैंने कहा, “मैं झूठ नहीं बोलता, सिगरेट पीता हूं, लेकिन अपने से उम्र में बड़े लोगों के सामने नहीं पीता। उनका आदर करता हूं।”

भीष्म जी का हाथ वहीं रूक गया। शांति से बोले, “मैं तो सोच रहा था, तुम्हारे साथ मेरी अच्छी दोस्ती जमेगी। उम्र के बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं। सोचा तुम जैसे युवा लेखक के साथ मैं भी अपने-आप को युवा समझूंगा। चलो, कोई बात नहीं। मैं भी दोस्ती के लिए कोई उम्रदराज आदमी ढूंढ लूंगा।”

यह सुन कर मुझे बहुत दुःख हुआ। फौरन उनकी ओर हाथ बढ़ा कर सिगरेट ली और मुंह में लगा ली। उन्होंने लाइटर निकाला, दोनों ने सिगरेट सुलगाई और मैं अपने 51 वर्षीय दोस्त के साथ हिल साइड रोड पर दूर तक घूमने निकल पड़ा। लौटते समय उसी रोड पर पूसा पालीटैक्निक के गेट के पास पहुंच कर मैंने उन्हें बताया कि मैं पालीटैक्निक के पीछे चिड़िया कालोनी में रहता हूं। उन्होंने बताया वहीं गेट के पास में ग्रैफिक कलाकार जगमोहन चोपड़ा रहते हैं। भीष्म जी को पूसा गेट तक छोड़ कर मैं वापस अपने कमरे में लौट आया।

एक दिन भीष्म जी ने कहा, “कल कनाट प्लेस चलेंगे। गैलरी में एम.एफ. हुसेन की पेंटिग्स की प्रदर्शनी शुरू हो रही है। सुबह आना, साथ चलेंगे।”

मैं चकित होता था कि दिल्ली महानगर में कहां से आया हुआ मैं, एक अनजान नवोदित लेखक, नाते न रिश्ते, फिर भी भीष्म जी के परिवार से इतना स्नेह मिल रहा है। मेरा सौभाग्य ही तो है यह। अगले दिन उनकी उस विंटेज कार में बैठ कर कनाट प्लेस गया। वहां एम.एफ. हुसेन धूमीमल गैलरी के सामने दो-एक साथियों के साथ रेलिंग पर बैठे हुए थे। उनकी प्रदर्शनी का थीम था- ‘वुमन इन ब्लू।’ पास गए तो भीष्म जी ने मेरा परिचय कराया, “देवेन मेवाड़ी हैं। कहानियां लिखते हैं।” मैंने हुसेन से हाथ मिलाया। उन दिनों उनकी कार के चर्चे थे जिस पर उन्होंने अपने प्रिय घोड़े और हाथों की मुद्राएं पेन्ट की हुई थीं। कुछ लोग विरोध कर रहे थे कि उनकी कार से ध्यान बंटेगा और एक्सीडेंट हो सकते हैं। फिर भी हुसेन की कार यहां-वहां नजर आ जाती।

इसी तरह एक बार भीष्म जी मुझे रामकुमार की पेटिंग्स की प्रदर्शनी दिखाने धूमीमल गैलरी ले गए। और उनसे परिचय कराया। उनकी कहानियां भी मुझे बहुत पसंद थीं। भीष्म जी रीगल सिनेमा के पास टी-हाउस जाया करते थे। एक बार उनके साथ वहां जा रहा था तो रीगल के पास एक सजी-धजी महिला से मेरा परिचय कराया, “देवेन ये कृष्णा जी हैं, कृष्णा सोबती।” मैंने आदर से उनको नमस्कार किया। नई कहानियां के मार्च 1967 अंक में प्रकाशित उनकी ‘यारों के यार’ कहानी ने उन दिनों श्लील-अश्लील का तूफान मचाया हुआ था। वह ‘नई कहानियां’ में भीष्म जी ने प्रकाशित की थी। कहीं मनोहरश्याम जोशी जी ने अपने स्तंभ में लिखा भी था कि ‘यह कहानी छापी भी तो भीष्म साहनी जैसे गऊ संपादक ने!’ गऊ संपादक को ‘नई कहानियां’ में पत्रों के तारीफ के साथ ही तीखी और तल्ख चिट्ठियां भी मिल रही थीं। लोग हैरान थे कि एक महिला कथाकार ऐसे शब्द अपनी कहानी में लिख सकती है जिन्हें लिखने से पुरुष भी परहेज करते हैं। एक दिन भीष्म जी ने बताया कि दिल्ली में और अन्यत्र इस विषय पर चर्चा के लिए गोष्ठियां आयोजित की जा रही हैं।

‘नई कहानियां’ के मार्च 1967 अंक के अपने संपादकीय में उन्होंने कुछ यों लिखा, “‘यारों के यार’ शीर्षक रचना पर हम इस अंक में भी पाठकों की प्रतिक्रियाएं छाप रहे हैं। कहानी की भाषा के सवाल पर अनेक दृष्टिकोण सामने आए हैं। स्थानाभाव से सभी पत्रों को प्रकाशित नहीं कर पाए। पर इस बहस के दौरान अनेक बातें उठी हैं जिनका संबंध कला, लेखक के दायित्व, कला के मूलगत तत्वों आदि से है। इस विचार की उपयोगिता को समझते हुए ‘नई कहानियां’ ने एक गोष्ठी का आयोजन किया है जिसमें अनेक प्रतिष्ठित लेखक तथा विचारक भाग लेंगे। ‘यारों के यार’ पर खूब बहस-मुबाहिस हुआ, उसे किसी ने भी अश्लील नहीं माना और धीरे-धीरे तूफान शांत हो गया।

भीष्म जी कभी-कभी ‘नई कहानियां’ के लिए प्राप्त किसी कहानी को पढ़ने के लिए शीला जी और मुझे भी देते थे और कहते कि इसे पढ़ कर तुम लोग अपनी राय दो। देखें, मेरी और तुम लोगों की राय में यह कहानी कैसी है? मुझे याद है, एक बार उन्होंने जो कहानी पढ़ने को दी, उसमें ट्रेन में खून-खराबे की बात थी। मुझे और शीला जी को वह कहानी वीभत्स लगी। लेकिन, भीष्म जी ने उस कहानी की अपने ढंग से व्याख्या की और उसे ‘नई कहानियां’ में छापा। धुंधली याद है कि शायद वह हरयाणा के किसी दीपक या हो सकता है, स्वदेश दीपक की कहानी थी जो आगे चल कर बड़े कथाकार बने।

भीष्म जी आम लोगों के जीवन के संघर्ष की कहानियां लिखते थे। उन्होंने ‘नई कहानियां’ में एक नया स्तंभ शुरू किया था- ‘मेरी ज़िदगी का पहला मोड़’। उन्होंने लिखा कि इस स्तंभ के अंतर्गत जीवन के उन निर्णायक क्षणों का व्यौरा मिलेगा जब व्यक्ति जीवन में जाने-अनजाने ऐसा मोड़ काट देता है जिससे उसकी ज़िदगी का रुख ही बदल जाता है।

‘ज्ञानोदय’ नवंबर 1967 के ‘शेष शताब्दी विशेषांक’ में पत्रकार प्रेम कपूर ने सात प्रतिष्ठित लोगों से शेष शताब्दी से संबंधित पांच सवाल पूछे थे जिनके उत्तर बिना सोचने का समय दिए तत्काल टेप कर लिए थे। उनमें भीष्म साहनी भी थे। सवाल थे: (1) मृत्यु संकट और संत्रास-हमारी सहज अवस्था में ये कितना भाग अदा करते हैं? (2) क्या वास्तव में हम आने वाले जमाने से भयाक्रांत हैं? (3) आने वाला समय क्या होगा? (4) उसमें हम क्या चाहते हैं? और, (5) यदि एकबारगी हमें सूचना मिले कि बस यह घड़ी प्रलय की है, तब?

आज उस शेष शताब्दी के बीत जाने के बाद इक्कीसवीं सदी में भीष्म जी के वे उत्तर पढ़ना एक अनोखा अनुभव है। भीष्म जी ने सिलसिलेवार तत्काल इस तरह उत्तर दिए: ‘आने वाले जमाने में क्या होगा यह स्पष्ट कह पाना कठिन है। मैं तो चाहूंगा, शांति बनी रहे, महायुद्ध न हो जो तबाही लाए और देश प्रगति के रास्ते पर स्थिरता से बढ़े। यह बदलाव का जमाना है, इस परिवर्तन के लिए कौन आएगा- यह कह पाना कठिन है। नेता लोगों में से ही उठते हैं- हो सकता है आने वाले जमाने में विज्ञान और तकनीक हमें बहुत दूर ले जाए और मनुष्य किसी नक्षत्र तक भी जा पहुंचे, पर नए हथियारों के बारे में भी आशंका है। यदि बहुत से देशों ने आणविक अस्त्र तैयार कर लिए तो शांति के लिए खतरा बन जाएगा। पर साथ ही हो सकता है, हमारे लिए विज्ञान नए द्वार भी खोल दे या कि खाद्य संकट बहुत तीव्र हो उठे- मैंने कहीं पढ़ा था, यदि आबादी ऐसी ही बढ़ती गई तो आने वाले जमाने में स्थिति बड़ी भयंकर हो सकती है। और, अगर आज प्रलय की बात सुनूंगा तो कुछ क्षणों के लिए स्तंभित रह जावूंगा लेकिन उसके बाद मेरा व्यवहार वैसा ही होगा जैसा हर दिन होता है। मेरा मस्तिष्क कुछ कर पाने या कुछ समेटने के लिए इतना क्रियाशील होगा – मैं नहीं समझ पाता। आने वाले समय में आज की स्थिति नहीं रह जाएगी- यह निश्चित है।’

उन्हीं दिनों, भीष्म जी के साथ दो-चार बार टी-हाउस गया। वहां वे साथी लेखकों के साथ बातचीत में व्यस्त हो जाते और मैं उनका चुप्पा, संकोची दोस्त, किसी टेबल पर चुपचाप आंख-कान और दिमाग के दरवाजे खोल कर बैठा रहता। देखता कि आसपास क्या हो रहा है। एक ओर विष्णु प्रभाकर होते, किसी एक टेबल पर 20-सिगरेटों की महंगी डिब्बी से सिगरेट निकाल कर कमलेश्वर उसे पीते हुए दिखते, अचानक अट्टहास सुनाई देता तो पाइप पीते, ठहाके लगाते मोहन राकेश दिखते। एक बार भीष्म जी के साथ गया था तो लौटते हुए उन्होंने कार में मुझे आगे अपने साथ बिठाया। पीछे की सीट पर मोहन राकेश और एक गोरा सुंदर युवक बैठा। पता लगा, वह अजय साहनी हैं, फिल्म कलाकार बलराज साहनी के सुपुत्र जो बाद में परीक्षित साहनी के रूप में प्रसिद्ध हुए। जहां तक मुझे याद है, रास्ते में मोहन राकेश और भीष्म जी मोहन राकेश के नाटक ‘लहरों के राजहंस’ पर बातें कर रहे थे और कहते थे कि उस पर बेहतरीन फिल्म बन सकती है। वे चर्चा कर रहे थे कि हिंदी के अच्छे नाटकों पर अच्छी फिल्में बननीं चाहिए। भीष्म जी ने घर जाते हुए पहले मोहन राकेश को राजेंद्र नगर में उनके घर पर छोड़ा, फिर पूसा गेट पर मैं उतरा और भीष्म जी अजय के साथ ईस्ट पटेल नगर में अपने घर की ओर गए।

भीष्म जी के संपादन के दौरान ‘नई कहानियां’ के मार्च 1967 अंक में मेरी भी एक कहानी ‘सांड’ छपी थी लेकिन वह मैंने उन्हें ही सीधे नहीं दी थी और न उसके बारे में उनसे कोई जिक्र किया था। मैं पहचान का सहारा नहीं लेना चाहता था। इसलिए कहानी डाक से संपादकीय पते पर भेजी। कुछ दिनों बाद डाक से ही स्वीकृति का कार्ड मिल गया जिसमें किसी महिला के हस्ताक्षर थे। उसी बीच एक शाम टी-हाउस में एक टेबल पर चुपचाप बैठा था। तभी सामने हिमांशु जोशी दिखाई दिए। उन्होंने इशारे से बुलाया और पूछा, क्या लिख रहे हो इन दिनों। मैंने उन्हें ‘नई कहानियां’ के स्वीकृति पत्र और ‘कहानी’ तथा ‘माध्यम’ में छपी अपनी कहानियों के बारे में बताया। उन्होंने स्नेह के साथ कहा- तुम्हें अपना कोई अच्छा-सा नाम रखना चाहिए जैसे ‘अमोघ वर्ष’। बात मन में घर कर गई। अपने कमरे में लौट कर मैंने संपादक ‘नई कहानियां’ को पत्र लिखा कि मैंने अपना नाम बदल कर ‘अमोघ वर्ष’ रख लिया है। मेरी स्वीकृत कहानी ‘सांड’ में मेरा यही नया नाम दिया जाए। सुबह पत्र भेज दिया।

मुझे क्या पता था, वह कहानी ताजा अंक (मार्च 1967) में ही छप रही थी। अंक छप कर बाजार में आ गया। पता लगा, भीष्म जी बंबई गए हुए थे। मेरे अनुरोध पर छपते-छपते मेरा नाम बदल दिया गया था। लौट कर भीष्म जी ने देखा तो घर पर मुझसे पूछा, “यह अमोघ वर्ष कौन है?” मैंने सकपकाते हुए जवाब दिया, “मैं ही हूं। मैंने नाम बदलने के लिए पत्र भेजा था।”

उन्होंने नाराजगी के साथ कहा, “तुमने गलत किया। तुम्हारे अपने नाम में क्या कमी है। इतना अच्छा नाम है- देवेन मेवाड़ी। इस बात को सदा याद रखना कि अपने काम से नाम बनता है। तुम्हें जीवन में देवेन मेवाड़ी बनना है, अमोघ वर्ष नहीं। तुम्हारे लेखन से लोग कल तुम्हारा नाम जानेंगे,” उन्होंने समझाया। मैं सिर झुकाए बैठा रहा और उसी दिन उस नाम से तौबा कर ली।

कभी-कभी भीष्म जी अपने मास्को प्रवास के किस्से भी सुनाया करते थे। कहते थे, “वैसी तो यहां कल्पना करना भी कठिन लगता है। जानते हो, जो काम वाली मेरे अपार्टमेंट में काम करने आती थी, उसके पास उसी कालोनी में हमसे बड़ा अपार्टमेंट था। कारण यह कि उसका परिवार हमसे बड़ा था। उसे अधिक जगह की जरूरत थी।”

वर्ष 1969 में मैंने उन्हें बताया कि मेरा विवाह होने वाला है। भीष्म जी और शीला जी दोनों बहुत खुश हुए। उन्होंने लड़की के बारे में पूछा और कहा, “विवाह के बाद जब दिल्ली आवोगे तो दोनों मिलने आना।” हम नौकरी और नई गृहस्थी के कामों में उलझने के कारण कुछ दिनों तक मिलने नहीं जा सके। मैं तब इंद्रपुरी में रहता था। एक दिन उनका पोस्टकार्ड मिला, “देवेन, विवाह के बाद तुम मिलने नहीं आए। लगता है, किसी दिन हमें ही घूमते-घामते तुम लोगों से मिलने आना पड़ेगा।” हमें अपनी गलती का अहसास हुआ और एक दिन लक्ष्मी और मैं दोनों उनसे मिलने गए। हमें देख कर वे दोनों बहुत खुश हुए।

उनका स्नेह और उनकी आत्मीयता भीतर तक भिगो देती थी। मन करता था, उनके आसपास ही रहूं। लेकिन, उसी बीच पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय से नियुक्ति पत्र आने पर मैंने वहां जाने का मन बना लिया। झिझकते हुए भीष्म जी को बताया तो उन्होंने पूछा, “वहां किस तरह का काम करना होगा?”

मैंने कहा, “अनुवाद एवं प्रकाशन निदेशालय में कृषि की पाठ्य पुस्तकों का अुनवाद तथा संपादन, मौलिक पुस्तक लेखन और किसानों की पत्रिका का संपादन।” उन्होंने गंभीर होकर कहा, “देखो देवेन, मैंने वर्षों अनुवाद का काम किया है। यह बोझिल काम है। इससे मौलिक लेखन पर असर पड़ता है। मौलिक लेखन के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता। फिर, नौकरी में तो अनुवाद का काम उबाऊ भी होता है। क्यों, यहां क्या दिक्कत है? रिसर्च के काम में हो, दिल्ली के साहित्यकारों की संगत में हो। मुझे तो लगता है, तुम्हारा यहां रहना ज्यादा अच्छा रहेगा। लेकिन, क्या करना है, यह तो तुम्हीं तय करोगे।”

मैंने पंतनगर जाने का निर्णय ले लिया। उनसे दूर जाने में बहुत बुरा लग रहा था, लेकिन चला ही गया। पंतनगर से उन्हें पत्र लिखता रहा। एक पत्र में लिखा, “काश, हमें अपने रिश्ते चुनने की स्वतंत्रता होती तो आप मेरे सबसे करीबी रिश्तेदार होते। आपको सदा याद करता रहता हूं।”

भीष्म जी चाहते थे, मैं एक सफल लेखक-कहानीकार बनूं। परिस्थितियों ने कुछ इस तरह मोड़ लिया कि मेरी पहचान एक विज्ञान लेखक और विज्ञान कथाकर के रूप में बनती चली गई। मन में एक संकल्प लिया था कि मैं खूब लिखूंगा और एक दिन अपनी कुछ पुस्तकें लेकर उनके सामने जावूंगा और कहूंगा, “भीष्म जी मैं आपका देवेन हूं। देखिए, मैंने इतनी पुस्तकें लिखी हैं।…लेकिन, बहुत देर हो गई। जब तब में यह सब करता, भीष्म जी विदा हो गए। अब केवल उनकी स्मृति को ही यह बता सकता हूं।”

कभी-कभी सोचता हूं, काश मैं दिल्ली छोड़ कर न जाता और उनकी संगत में रहता तो शायद मेरा भविष्य कुछ और होता। फिर सोचता हूं, लेकिन तब मैं वह न होता जो आज हूं। भविष्य तो समय स्वयं गढ़ता है।

देवेंद्र मेवाड़ी

 

×××

 

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *