विज्ञान के सिद्धांतों को साहित्य की कलम से लिखकर आसान बनाता हूं…

शंकर सिंह

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फिल्म’3 इडियट्स’ का दृश्य। रैंचो से प्रोफेसर मशीन की परिभाषा पूछता है? रैंचो मशीन की परिभाषा अपनी पेंट की जिप ऊपर-नीचे करके बताता है। लेकिन इसके जवाब में चतुर रामलिंगम की दी हुई लंबी चौड़ी परिभाषा शायद ही किसी को याद हो। वजह क्या है? क्योंकि रैंचो की परिभाषा ज्यादा मजेदार थी। अगर ऐसे ही मजेदार तरीके से कोई मिट्टी के गुण, पेड़ों की बनावट और सौरमंडल में मौजूद सभी ग्रहों से लेकर उल्कापिंड के बारे में बताएं, तो भला विज्ञान में किसी की दिलचस्पी क्यों नहीं होगी। कुछ इसी तरह से देवेंद्र मेवाड़ी विज्ञान को समझाते हैं। इनकी परिभाषा में लोक कथाएं, इतिहास में दर्ज घटनाएं, तर्क और हर चीज की शुरुआत से लेकर वर्तमान में उसकी स्थिति का बयान होता है। इनसे मुलाकात हुई तो विज्ञान की एक साहित्यिक दुनिया के बारे में पता चला। जिसमें उन्होंने विज्ञान को कविता और कहानियों के जरिए किसी उपन्यास की तरह दर्शाया है। वे बोले, मेरे अंदर सबसे अच्छी चीज जिज्ञासा है। जिसने मुझे विज्ञान से लेकर साहित्य की परतों तक पहुंचाया है। हमारे बुद्धिजीवी और बड़ों ने विज्ञान को राहु केतु में फंसा दिया है, जो बुरा है। मैं विज्ञान को साहित्य की कलम से लिखना पसंद करता हूं। विज्ञान बड़ा मजेदार और रोचक है। लेकिन इसे समीकरणों, सिद्धांतों और परिकल्पनाओं से कठिन रूप दे दिया है। इसके लिए मैं किस्सागोई की तकनीक अपनाता हूं। आप सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की ‘जूही की कली’ कविता को लीजिए। उसे कोई बॉटनी का विद्यार्थी और साहित्यकार उस तरह से नहीं समझ पाएगा, जैसा मैने समझा। वजह है दोनों विषयों को जानना। दरअसल, विज्ञान में दो चीजें होती हैं, सिद्धांत और साहित्य। इसलिए मैं विज्ञान के सिद्धांतों को साहित्य की कलम से एक नई भाषा में समझाता हूं।
कबूतरों पर लिखी किताब के लिए कविताओं का प्रयोग किया
मैंभारतीय और विदेशी साहित्यकारों को बहुत पढ़ता हूं, वहां से मुझे बहुत कुछ मिलता है। मैं कुछ समय पहले एक किताब लिख रहा था। जिसके लिए मैंने दलित कवयित्री निर्मला पुतुल की कविता, जिसमें वह अपने पिता से कह रही है कि ‘बाबा अगर मेरी शादी करना, तो ऐसे करना, जो कबूतर के जोड़ों की तरह हो, जो जिंदगी भर मेरा साथ निभाए’ का इस्तेमाल किया। मैं कबूतरों के जीवन और उनकी मानसिकता को इस कविता से बहुत अच्छे से बता सकता हूं। साथ ही इसकी मनोधारणा को भी साहित्यिक भाषा के जरिए बता सकता हूं।

राष्ट्रीय बाल साहित्य समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित
उत्तराखंड के देवेंद्र विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों पर 25 किताबें लिख चुके हैं। वनस्पति विज्ञान में एमएससी के अलावा उन्होंने हिंदी में एमए और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। हाल ही में उन्हें हिंदी अकादमी दिल्ली ने सम्मानित किया। साथ ही इन्हें राष्ट्रीय बाल साहित्य, विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान, एनसीएसटीसी राष्ट्रीय अ‌वाॅर्ड समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। आजकल ये उत्तराखंड और विभिन्न राज्यों में हुई अपनी यात्रा पर किताब लिख रहे हैं।

क्या कभी कोई विज्ञान की किताब खरीदी है?
मार्केटमें जाओ तो आपको विज्ञान पर आधारित हजारों किताबें मिलेंगी। वह भी सारी एक ही तरह की और एक ही भाषा में लिखी किताब होगी। जिसमें आंकडंे भी वही हैं। क्योंकि, लिखने वाला कभी उसके भीतर नहीं गया। अगर भीतर जाते, तो यकीनन उन्हें कोई नई खोज या कोई नई दुनिया मिलती। अब मेघनाद साहा पर कितनी ही किताबें लिखी हैं। लेकिन किसी भी किताब में उनके बचपन का जिक्र नहीं है। वह नंगे पैर गांव की नदी पार करके स्कूल जाते थे। लेकिन किसी किताब में उनका यह जीवन क्यों नहीं बताया गया। ऐसी ही कई वजह थी, जिसकी वजह से वे महान बनें। उनके मानवीय मूल्यों पर अगर किसी ने लिखा होता तो उनके द्वारा की गई खोज को लोगों को बताने में और आसान होती।
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कुछ इस तरह देवेंद्र मेवाड़ी विज्ञान को समझाते हैं। इनकी परिभाषाओं में लोक कथाएं, तर्क और हर चीज की शुरुआत से लेकर वर्तमान में उसकी स्थिति का बयान होता है।

 

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