मंडुवा की रोटी भली

 

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कल मंडुवा की रोटी खाई। एक लेसुवा भी खाया। बहुत आनंद आया। दिनों-महीनों बाद मंडुवा की रोटी मिलने पर पाई हुई जैसी लगती है। घी तो मलाई से घर में ही निकाल लेते हैं। वह ताजा घी मंडुवे की रोटी का स्वाद और भी बढ़ा देता है। बनाने को तो हरा नमक भी बना रखा है। कुछ गास उसके साथ खाने पर अलग ही स्वाद मिलता है। कभी-कभी भांगे की चटनी और पिनालू के साग के साथ भी मंडुवे की काली रोटी खाने का मौका मिल जाता है। इन सब चीजों का जुगाड़ करके रखते हैं हम।
पहाड़ के कठिन जीवन में आड़े वक्त मंडुवा ही तो साथ निभाता था। मंडुवा गरीब-गुरबों का भोजन माना जाता था और उसकी काली रोटी को कमतर मानने वाले कोई कम नहीं थे। लेकिन, तब किसे पता था कि मंडुवा कोई गया-गुजरा अनाज नहीं बल्कि पोषक तत्वों से भरपूर भोजन है। रोटी काली है मगर गुणवाली है। इतनी गुणी कि आज वैज्ञानिक भी कह रहे हैं- मंडुवा खाइए, स्वस्थ रहिए।
मंडुवा, मक्का और चावल से अधिक पौष्टिक माना गया है। पोषक गुणों में यह गेहूं की बराबरी करता है। इसमें प्रोटीन है, खनिज हैं और विटामिन भी हैं। इसकी प्रोटीन बेहतर मानी जाती है क्योंकि उसमें खास तौर पर मेथियोनिन नामक ऐमिनो अम्ल पाया जाता है। रुखा-सूखा और असंतुलित आहार लेने वाले लाखों लोगों के भोजन में इस ऐमिनो अम्ल की कमी रह जाती है। मंडुवा इसकी भरपाई कर देता है। एक बात और। इसमें कैल्सियम, फास्फोरस और आयरन (लौह) तत्व भी काफी होता है। दूसरे अनाजों की तुलना में मंडुवे में कैल्सियम की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। इसलिए यह दांतों और हड्डियों को मजबूत बनाता है। इसमें जिंक और गंधक भी होता है। इसके अलावा विटामिन-ए और बी 1 भी पाए जाते हैं।
आज हालात काफी कुछ बदल गए हैं। पहाड़ में मंडुवे की खेती का रकबा घटता चला गया है। जो कुछ पैदा भी होता है, वह हेल्थ फूड बनाने के लिए जापान तक को भेजा जा रहा है।
मंडुवे की बंद और खुली बालियों की अंगुलियां देख कर ही शायद अंग्रेजी में इसे ‘फिंगर मिलेट’ कहा गया होगा। मुझे याद है, मंडुवे की खेती बड़ी मेहनत-मशक्कत का काम होता था। इसकी संगत में कुछ दूसरी फसलें भी मजे से उगती थीं- चुवा (चैलाई), लोबिया, कौनी और पहाड़ी खीरे। मेहनत तो लगती थी, मगर भरपूर उपज भी मिलती थी। मंडुवा साल भर खाने के काम आ जाता था। इसकी एक अच्छाई यह भी थी कि इसे भंडार में काफी समय तक रखना संभव था। इसलिए अच्छे-बुरे वक्त में मंडुवा ही काम आता था।
मंडुवे के मुरीदों को यह शहर में किसी दक्षिण भारतीय दुकान पर ‘रागी पाउडर’ के नाम से मिल सकता है। कोदो भी इसी को कहते हैं। असल में यह केवल उत्तराखंड के पहाड़ों में ही नहीं बल्कि देश के कई दूसरे इलाकों में भी उगाया जाता है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में इसकी काफी खेती की जाती है। वहां यह ‘रागी’ कहलाता है। बिहार और उड़ीसा में भी मंडुवा उगाया जाता है। बिहार में तो इसे मंडुवा ही कहते हैं मगर उड़िया भाषा में यह ‘मंडिया’ कहलाता है। अन्य राज्यों में भी इसकी थोड़ी-बहुत खेती की जाती है। यों,
मंडुवे की रोटी ही नहीं, इसका हलुवा, दलिया और पुडिंग भी स्वादिष्ट होता है। यही नहीं, कई इलाकों में तो लोग इसकी बीयर जैसी हलकी मदिरा भी बना लेते हैं। कई साल पहले सिक्किम के एक होटल में मेरे चाहने वाले होटल कर्मचारियों ने किसी गांव से लाकर मुझे मंडुवे की वह हलकी मदिरा चखाई थी।
मंडुवा हमारे देश में ही नहीं, अफ्रीका और एशिया के कम से कम 25 देशों में उगाया जाता है। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं मंडुवा अफ्रीका के इथियोपिया देश से लगभग 4000 वर्ष पहले भारत पहुंचा। वहीं इसका जन्म हुआ। लेकिन, दूसरे वैज्ञानिक कहते हैं, मंडुवा कहीं और से नहीं आया बल्कि इसका जन्म यहीं हुआ। और, यह भी कि आज मंडुवा की जो ऐल्युसाइन कोराकाना प्रजाति उगाई जा रही है, वह मंडुवा की ऐल्युसाइन इंडिका नामक जंगली प्रजाति से ही विकसित हुई है।
बहरहाल, मंडुवा चाहे सुदूर इथियोपिया से आया अथवा यहीं हमारी भारत भूमि में जन्मा, हमने तो इसे सदा अपना ही समझा है। और, यह भी यहीं की मिट्टी और जलवायु को गले लगा कर, सदियों से लहलहा कर अपनी काली पौष्टिक रोटी से हमारा पेट भर रहा है।

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