हरियाली में किताबें

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बाल साहित्य में विज्ञान की बात करके जून के आखिरी दिन देहरादून से दिल्ली लौटा ही था कि अलसुबह रेलवे स्टेशन जाकर नई दिल्ली-काठगोदाम शताब्दी ट्रेन पकड़ी और रुद्रपुर के लिए रवाना हो गया। हेम ने कई बार फोन पर कह दिया था कि आना जरूरी है। दिल्ली में अभी मानसून की झड़ी नहीं लगी थी, इसलिए उमस जारी थी। ट्रेन में बैठा तो खिड़की के कांच के पार धुंध के धवल कैनवस पर प्रकृति की कूंची ने अभी केवल सूरज की नारंगी चकती ही पेंट की थी जिसकी चमक धीरे-धीरे बढ़ने लगी। 

काली-मैली यमुना, मकान बिजली के खम्भे, गंधाती हिंडन, भागती बसें और कारें पीछे छूटती गईं तो खिड़की के पार हरियाली दिखने लगी। कहीं-कहीं कव्वे सुबह की हवा में पंख तौल रहे थे तो कहीं बगुलों के झुंड नम भूमि में नाश्ता खोज रहे थे। शायद रात भर बारिश हुई थी। हरे-भरे पेड़ उसमें नहा-धो कर और भी हरे हो गए थे।

ट्रेन उत्तर दिशा में भागती जा रही थी। बीच-बीच में अमराइयों के आसपास गांवों की झलक मिलती। कई जगह लोग खेतों में धान रोपते दिखाई देते तो कहीं धान के बालिश्त भर ऊंचे पौधे खेत में डबाडब भरे पानी में अपना अक्श देख रहे होते। खेतों की मेंड पर उगे ऊंचे पापलर और यूकेलिप्टस केे पेड़ भी पानी में अपनी परछाइयों के साथ-साथ आसमान में छाए बादलों की छवि ताक रहे थे।

मुरादाबाद, रामपुर पार कर ट्रेन ऊधमसिंह नगर की हरियाली में प्रवेश कर गई। पानी भरे धान के खेतों के अलावा दूर-दूर तक लहलहाते गन्ने के फार्म दिखाई देते रहे। और, दस बजते-बजते ट्रेन रुद्रपुर शहर के रेलवे स्टेशन पर आ खड़ी हो गई।

बाहर हवा में चौमास की बारिश की खुशबू थी। सड़कों के गड्ड़ों और खेतों के आसपास रात में बरसा पानी भरा हुआ था। प्लेटफार्म पर अपरिचितों की भीड़ में अचानक, टी-शर्ट पहने एक युवक ने आगे आकर पूछा, ”आप मेवाड़ी जी हैं?” मैंने कहा, “जी हां और आप हेम?” हेम ने हामी भर कर बैग की ओर हाथ बढ़ाया तो मैंने कहा, “नहीं मित्र, अपना बोझ मैं स्वयं उठाता हूं। इसीलिए रक-शैक और बैक-पैक लेकर चलता हूं। जब तक यह बोझ उठा सकता हूं, तब तक मेरी यात्राएं चलती रहेंगीं।” अपनी कार में वे मुझे शहर से बाहर किच्छा रोड पर ‘ले-कैसल’ होटल की ओर ले चले।

रास्ते भर तराई की उपजाऊ, भीगी मिट्टी की सौंधी गंध तीस-बत्तीस वर्ष पहले देखे रुद्रपुर कस्बे की यादों को ताज़ा करने लगी। तब पंतनगर विश्वविद्यालय से कभी-कभार किसी बस में बैठ कर हम रुद्रपुर कस्बे के बाजार में आया करते थे। दिल्ली-नैनीताल हाइवे के किनारे बस अड्डा हुआ करता था और उसके सामने चंद झोपड़ी और ढाबेनुमा कच्ची दुकानें। लेकिन, हमारा जाना-पहचाना कस्बा अब शहर बन गया है। हाइवे के दोनों किनारों पर चमचमाते आफिस और दूकानें हैं। उनके पीछे, जहां कभी सैकड़ों एकड़ फार्मों में हरी-भरी फसलें लहलहाती थीं और गेहूं की फसल की कटाई के मौसम में कंबाइन हार्वेस्टर मशीनें कटाई कर रही होती थीं, वहां अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की हाई-टैक इमारतें और वर्कशापें हैं। लगा जैसे टाइम ट्रेवल कर रहा होऊं।

हेम रुद्रपुर औद्योगिक शहर के बारे में बताते जा रहे हैं। कहते हैं, यहां विकास की दौड़ में सब कुछ मशीनी होता जा रहा है। यही खतरा भांप कर हम कुछ साथियों ने अपनी संस्कृति और संवेदनाओं को बचाने की एक छोटी-सी कोशिश शुरू की है- ‘क्रिएटिव उत्तराखंड’ के रूप में। हम नई पीढ़ी पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। अगर वे अपनी जड़ों से थोड़ा भी जुड़ सके तो हम इसे अपनी सफलता मानेंगे।

इसीलिए हम यहां बच्चों के लिए नाटक करा रहे हैं, फिल्में दिखा रहे हैं, कविता पाठ करा रहे हैं। हमने यहां के सबसे पुराने राजकीय प्राथमिक विद्यालय पर ध्यान दिया। उसके दो जीर्ण-शीर्ण कमरों को देखा तो प्रबंध कमेटी से मांग कर उन्हें ‘सृजन पुस्तकालय’ का रूप दे दिया है। स्कूल के विद्यार्थी और अन्य लोग वहां आकर किताबें पढ़ सकेंगे।

ले-कैसल आ गया था।………. वे कमरा दिला कर वापस लौट गए, यह कहते हुए कि कई काम करने हैं। सभी साथी काम में लगे हैं। बारिश का मौसम है। टेंट लगा रहे हैं, फिर भी अगर बारिश हो गई तो बगल में ही एक छोटा-सा हाल है, कार्यक्रम उसमें कर लेंगे। मैं दिन का भोजन करके, चींटियों की तरह समर्पित रूप से काम में जुटे उन साथियों के बारे में सोचते हुए निपट एकांत में अपने आप से बातें करता रहा। बच्चों को जो कहानियां सुनानी थीं, उन्हें गुनगुनाता रहा। एक नन्ही बच्ची की कहानी सुनाने के लिए कुछ देर हनुमान, स्पाइडर मैन और हल्क के मुखौटे पहन कर खुद को ड्रैसिंग टेबल के शीशे में देखा। डोरा डाल को गोद में पकड़ कर उसे प्यार किया।

13579931_f10153858969697525_885062600_111111oचार बजे के आसपास हेम फिर आए और मुझे ‘सृजन पुस्तकालय’ तक ले गए। वहां उनके साथी काम में जुटे थे। उषा जी सफाई और चीजों को सही जगह पर सहेजने में व्यस्त थीं। अलमारियों में पुस्तकें सजाई जा चुकी थीं। उन पर चिप्पियां चिपका कर पुस्तक संख्या डाली जा चुकी थीं। जीर्ण-शीर्ण कमरों का कायापलट हो चुका था। बाहर टेंट हाउस ने चांदनी कस दी गई। हेम ने वह हाल दिखाया, बारिश होने पर जहां कार्यक्रम किया जाएगा। पता लगा, उसी शाम शहर में ही कहीं बच्चे ‘चरनदास चोर’ नाटक भी प्रस्तुत कर रहे हैं।

दिन में बारिश दो-एक बार दस्तक दे चुकी थी। क्रिएटिव उत्तराखंड के साथियों की तैयारियां और व्यस्तता देख कर मैं साथी हरीश के स्कूटर में होटल तक लौट आया। शाम के धुंधलके में हाइवे के किनारे-किनारे दूर तक पैदल जाकर कीचड़ से बचता-बचाता वापस होटल में चला आया। भीतरी कमरा होने के कारण रात में बारिश का कोई अनुमान नहीं लगा था।

सुबह पांच बजे उठ कर, स्वयं नींबू-पानी और ग्रीन-टी बना कर पी और कुछ देर पढ़ने के बाद होटल की बालकनी की ओर आया तो देखा रात को जम कर बारिश हो चुकी थी। बालकनी में पानी भरा हुआ था और मुंडेर पर गमलों में लगे नौबजिया के फूल अभी सोए हुए थे। कल दिन में उन खिले हुए चटख गुलाबी सुंदर फूलों को देखा और छुआ था। शाम घिरते-घिरते वे सो गए थे। बादलों से घिरे आसमान के कारण आज रोशनी कम थी, शायद इसलिए नौबजिया के फूल अभी तक नहीं जगे थे।

तभी फिर रिमझिम शुरू हो गई। मैं सीढ़ियों से उतर कर लाबी में आया और कांच का दरवाजा खोल कर बाहर निकला। बाहर वर्षा मंगल का माहौल था। ले-कैसल के ऐन सामने खड़ा विशाल पेड़ अपनी हजारों पत्तियों की हथेलियों से बारिश की बूंदों से खेल रहा था। नीचे उसकी कोटर में से एक गिलहरी बाहर निकल कर यहां-वहां फुदकते हुए वर्षा का आनंद ले रही थीं। तभी देखा, अरे वाह, यह तो एक नहीं, दो पेड़ों की जोड़ी है! पीपल और बरगद ने गलबहियां भरी हैं। पीपल और वटपूजन करके उनके मोटे घेरदार तने पर चारों ओर से धागे की रक्षा लपेट कर बांध दी गई है। सामने से मोटरगाड़ियां तेजी से निकलती जा रही थीं। एक तांगा सामने से निकला। घोड़ा बारिश में नहा रहा था। प्लास्टिक की चादर से अपने-आप को सिर से पैरों तक लपेटे उसका मालिक रास थामे हुए था। एक रिक्शा चालक सब्जियों की ढेर सारी गठरियां लाद कर चला जा रहा था।

बाद में साथी हरीश अपनी कार में आए और तैयार रहने को कह कर कुछ स्कूली बच्चों को लेने पास के स्कूल में चले गए। उत्तराखंड में भारी वर्षा के कारण प्रशासन ने तीन दिन के लिए स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दी थी। क्रिएटिव उत्तराखंड के साथी अपने स्तर पर बच्चों को ला रहे थे। साथी हरीश भी बच्चों को लेकर आए और मैं उनके साथ चल पड़ा। जगह-जगह पानी भरा हुआ था। यहां-वहां मेंढक उछल रहे थे। राजकीय प्राथमिक विद्यालय के सामने सागौन के चौड़ी पत्तियों वाले पेड बारिश में नहा कर चमक रहे थे। गुलाबी चांदनी अब भी तनी हुई थी लेकिन कार्यक्रम सृजन पुस्तकालय के कमरों और पास के हाल में करने का निश्चय किया जा चुका था।

सृजन पुस्तकालय का शुभारंभ ऊधम सिंह नगर के पुस्तक प्रेमी एसएसपी श्री अनंत शंकर ताकवाले ने किया। उन्होंने बच्चों से कहा कि पुस्तकें हमें ज्ञान का प्रकाश देती हैं और जीवन में आगे बढ़ने के लिए सही राह दिखाती हैं। उन्होंने इस पुस्तकालय के लिए 10,000 रूपए मूल्य की पुस्तकें अपनी ओर से मंगाने की घोषणा की। क्रिएटिव उत्तराखंड के साथी हेम पंत ने इसे एक छोटी-सी शुरूआत कह कर हार्दिक आभार व्यक्त किया। मैंने इस अवसर पर बच्चों को सफदर हाशमी की किताबों पर लिखी खूबसूरत कविता ‘किताबें करती हैं बातें’ सुनाईं।

13600169_f10153855215332525_5566093495674164133_nफिर हाल में बच्चों के साथ कथा-कथन का सिलसिला शुरू हुआ। बच्चे कहानी सुनने को उत्सुक थे। मैंने उनसे बातें करते हुए बातों-बातों में बताया कि दोस्तो, अपने आसपास की दुनिया को जानने की कोशिश करो। मन में जिज्ञासाओं के जुगनुओं को जगमगाने दो। सवालों को उठने दो। जरा सोचो तो, अभी कुछ दिन पहले तक कितनी भीषण गर्मी पड़ रही थी, अचानक से उमड़ते-घुमड़ते बादल कहां से आ गए? ये बरसने क्यों लगे? जानते हो दोस्तो वर्षा क्यों होती है? बिटिया वीरेश ने तुरंत जवाब दिया “पृथ्वी के झील-तालाबों और महासागरों से सूरज की गर्मी के कारण पानी भाप बन कर आसमान में चला जाता है। वहां उससे बादल बन जाते हैं। उनसे वर्षा हो जाती है।” “शाबास!” मैंने कहा। हम सब ने बिटिया के लिए तालियां बजाईं। फिर कहा, “दोस्तो, हम ज्यों-ज्यों वायुमंडल में ऊपर जाते हैं तो ठंडक बढ़ती जाती है। आसमान की उस ऊंचाई पर पृथ्वी से उड़ कर वहां पहुंची भाप जम जाती है। उसकी नन्हीं-नन्हीं बूंदें बन जाती हैं। जब वे घनी हो जाती हैं तो उनसे बादल बन जाता है। बूंदें जब आपस में मिल कर बड़ी बूंदें बन जाती हैं तो नीचे टपक पड़ती हैं। दोस्तो, यही वर्षा है।

फिर हमने संज्ञा उपाध्याय का बालगीत ‘बादल का वह नटखट बच्चा’ गाया। मैंने उनसे कहा, देखो तुम्हारे लिए उन्होंने कितनी सुंदर कविता लिखी है! तुम भी बादलों को इस तरह कुछ अलग ढंग से देखने की कोशिश करना। तब तुम्हें बादलों में कई मजेदार चीजें दिखाई देंगी। और दोस्तो, सुनो। एक बार मैं भी बादलों के देश में गया था। बच्चे चौंक गए-बादलों के देश में! बड़े होकर तुम भी जाना वहां और नजदीक से बादलों को देखना। मैंने उन्हें बताया, उस बार मैं हवाई जहाज में बैठ कर मुंबई जा रहा था। हवाई जहाज ऊपर उड़ते-उड़ते बादलों के देश में पहुंच गया। वहां कहीं बड़े-बड़े रूई के पहाड़ों जैसे बादल थे तो कहीं भेड़ों के झुंड की तरह बादल भाग रहे थे।

13579931_f10153858969697525_885062600_111111oमैंने उन्हें बताया कि दोस्तो, एक बादल तो धरती पर भी चलता है। उसे तुम छू सकते हो! जानते हो, कौन-सा है वह बादल? वह बादल है- कोहरा। इसके बाद हमने मेंढकों की बातें कीं। वे भीषण गर्मी में गर्मी की नींद में सो गए थे। अब वर्षा ऋतु में जाग गए हैं। कड़ाके की सर्दी पड़ने से पहले वे सर्दी की नींद में सो जाएंगे। दोस्तो, तुम्हें जानना चाहिए पेड़-पौधों के बारे में, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों के बारे में, आसमान में टिमटिमाते तारों और चांद-सूरज के बारे में। और, अपने शरीर के बारे में भी।

फिर आई कहानी की बारी। उनकी उत्सुकता को देखते हुए पहले मैंने उन्हें एक छोटी-सी कहानी सुनाई कि ट्रेन के एक डिब्बे में दो आदमी सफर कर रहे थे। एक ने दूसरे से पूछा- क्या तुम भूतों पर विश्वास करते हो? उसने कहा ‘नहीं तो’ और गायब हो गया! बच्चे चौंके लेकिन उन्हें पता था, ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि वे आज के विज्ञान युग के बच्चे हैं। मैंने उन्हें बताया कि विज्ञान सदा सच का पता लगाता है। हमें हर चीज के बारे में सवाल पूछने चाहिए कि यह क्या है, ऐसा क्यों होता है, कैसे होता है? इन सवालों के जवाब खोजोगे तो तुम्हें सच का पता लगता जाएगा।

इसलिए दोस्तो, सवाल पूछो। पूछो कि तारे क्यों टिमटिमाते हैं, जुगनू क्यों जगमगाते हैं, तितलियां कहां से आती हैं, फूल क्यों खिलते हैं, क्यों बीज उग कर पेड़ बन जाते हैं? ये और ऐसे ही तमाम सवाल। कुछ अलग ढंग से, कुछ नया सोचो, जैसे चैन्नई की पांच वर्ष की नन्हीं सरिता ने सोचा। वह मां के साथ एक बड़े स्कूल में अपर के.जी. में एडमिशन के लिए इंटरव्यू देने आई थी। वहां हमारे मित्र, वरिष्ठ विज्ञान लेखक बिमान बसु भी मौजूद थे। यह कहानी फेसबुक पर उन्हीं ने बताई। बच्ची की अद्भुत कल्पना शक्ति से वहां सभी चौंक गए।

13570144f_10153858969517525_175290855711111_oउस बच्ची ने सीता की कहानी सुनाई। कि, रावण सीता का अपहरण करके श्रीलंका ले गया। राम ने हनुमान से उसे छुड़ा लाने को कहा। हनुमान ने अपने दोस्त स्पाइडर मैन को बुला लिया। हनुमान स्पाइडरमैन की रस्सी थाम कर श्रीलंका गया। वहां सीता को छुड़ा लिया। फिर सुरक्षा के लिए सीता के कहने पर ‘हल्क’ को बुला लिया। वे चैन्नई में वेलेचरी बस स्टाप पर उतरे। सीता के घर का रास्ता भूल गए। तब हल्क ने डोरा डौल को बुलाया और डोरा डौल ने सीता को उसके घर पहुंचा दिया।…अंत में बच्ची ने कहा, मैं ही तो सीता हूं!

मैंने हनुमान, स्पाइडरमैन, हल्क के मास्क पहन कर तथा डोरा डौल दिखा कर नाटकीय ढंग से बच्चों को यह कहानी सुनाई। फिर मैं उन्हें कल्पना यान में सौरमंडल की सैर पर ले गया। सूरज के निकट जाकर उसे देखा, फिर आठों ग्रहों और छह बौने ग्रहों के साथ-साथ सौरमंडल के करीब 183 चंद्रमाओं, उल्का पिंडों और धूमकेतुओं को देखा। पृथ्वी पर लौट कर हम सभी ने जीवन का गीत गा कर अपनी प्यारी और निराली धरती पर जीवन की धड़कन को बचाए रखने का संकल्प लिया।

दाल-भात का स्वादिष्ट लंच करने के बाद सृजन पुस्तकालय के एक कमरे में बैठ कर ‘मोबाइल तथा इंटरनेट युग में पुस्तकों की प्रासंगिकता’ विषय पर विचार गोष्ठी शुरू हुई। मुझे बताया गया कि मुझे उसकी अध्यक्षता करनी है। मैंने विनम्रता से कहा कि अध्यक्ष के लिए जो धीर-गंभीर ज्ञानी चेहरा और वेश-भूषा चाहिए, वह मेरे पास नहीं है, न आगे होगा। इसलिए गुजारिश है कि मुझे साथी ही रहने दें। समूह के एक साथी के रूप में मैंने पुस्तकों के बारे में डा. जाकिर हुसैन के विचार सुनाए कि ‘पुस्तकें हमें जीवन के नए रूप दिखाती हैं, जीने का सही ढंग सिखाती हैं। वे एकांत में हमें सहारा देती और संसार तथा मनुष्य-जीवन की क्षण-भंगुरता को भुला पाने में हमारी मदद करती हैं। हमारी निराशाओं को थपकियां देकर सुलाती हैं।’

मैंने उन्हें महान यहूदी विद्वान जुडा इलेम तिब्बन का यह कथन भी सुनाया कि, “पुस्तकों से भरी अलमारियां तुम्हारे बागीचे हैं, सैरगाहें हैं। वहां लगे फल चखो, वहां लगे गुलाब चुनो, वहां से पराग और लोबान बटोरो।”  फिर मैंने साथियों से कहा कि चाहे मोबाइल युग आए अथवा इंटरनेट युग, पुस्तकों की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी। पुस्तकें अपने जादुई शब्दों और कागज की खुशबू के साथ सदा हमारा साथ निभाती रहेंगी। इंटरनेट और मोबाइल उनकी दुनिया का विस्तार ही करेंगे।

चार बज चुका था। मुझे पौने पांच बजे की शताब्दी ट्रेन से दिल्ली वापस लौटना था। इसलिए सभी साथियों से विदा लेकर मैंने साथी हरीश के साथ रेलवे स्टेशन की राह पकड़ी। वहां पहुंच कर हम काफी देर तक बातें करते रहे। शाम घिरती देख कर पक्षी अपने नीड़ों की ओर लौटने लगे थे। शताब्दी ट्रेन आई तो मैं भी साथी हरीश से विदा लेकर दिल्ली को रवाना हो गया।

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