दास्तान-ए-गौरेया

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आज (20 मार्च) दास्तानगोई का दिन भी है और नन्ही गौरेया का दिन भी। हमारे आसपास सदा घुंघरुओं की खनक-सी आवाज में चहकती रहने वाली गौरेयां सहसा गायब होकर खुद दास्तान बनती जा रही हैं। आज फिर अपने गांव की वे तमाम चहकती घिनौड़ियां यानी गौरेयां याद आ रही हैं जो दिन भर घर-आंगन में चहकती रहती थीं।
आइए, दास्तानगोई के आज के दिन, नन्हीं गौरेया की एक नन्ही दास्तान सुनें :
गर्मियों में हमारे गांव में रात खुलने का पता चिड़ियों की चहचहाट से लगता था। घर-आंगन में चिड़िक्-चिड़िक्, चिड़िक्-चिड़िक् करती घिनौड़ियों (गौरेया) का झुंड चहल-पहल मचाए रखता। आंगन में सुबह की धूप में अनाज सुखाने के लिए फैला देते तो गौरेयों को उड़ाने के लिए बीच-बीच में ताली बजा कर जोर से चिल्लाते थे, “स हाऽ!” गौरेयां पलक झपकते भाग जाती थीं। लेकिन, अनाज के दानों का मोह थोड़ी ही देर में उन्हें फिर खींच लाता। हम फिर ताली बजाते और फिर ‘सहाऽ!’ कहते। नटखट गौरेयां उड़ जातीं और फिर लौट आतीं। उनके और हमारे लिए यह सब खेल जैसा हो जाता था।
गौरेयों के बारे में मां एक कथा भी सुनाती थी। कहती थी, “किलै, एक सासु थी बल। घर में नई बहू आई। उससे खूब काम कराने के लिए रोज उसके आगे अनाज का ढेर लगा देती। कहती, ले, छांट इसे। कंकड़, पत्थर, सूखे, सड़े दाने निकाल देना। सांझ तक काम पूरा हो जाना चाहिए।”
नई बहू अनाज का उतना बड़ा ढेर देख कर दाने छांटते-छांटते आंसू टपकाती। उसे बार-बार अपना मायका याद आता।”
“फिर, एक दिन छोटी-छोटी गौरेयों का झुंड आया। उनसे बहू का दुःख नहीं देखा गया। उन्होंने अपनी बोली में चिड़िक्-चिड़िक्, चिड़िक्-चिड़िक् करके आपस में बात की और कहा, हमें इस दुखियारी बहू की मदद करनी चाहिए।”
“बस, फिर क्या था, वे सब चटपट जुट गईं अनाज का एक-एक दाना अलग करने में। धूप ढलने से पहले ही सारा अनाज साफ कर दिया। सास ने देखा तो हैरान हो गई। सोचा, मेरी बहू तो बहुत काम करती है। मैं इसको बेकार ही दुःख दे रही हूं। उसने बहू को प्यार से गले लगा लिया तो बहू ने भी प्यार से गौरेयों की ओर देखा।”
“गौरेयां यह देख कर बहुत खुश हुईं। और, चिड़िक्-चिड़िक् करके चहचहाती हुई उड़ गईं। बेटा, अब वे रोज देखने आती हैं कि कहीं कोई सास अपनी बहू को उस तरह परेशान तो नहीं कर रही है।”
फिर हंसते हुए मां कहने लगी, “अच्छा सुन। जब तेरी दुल्हन आएगी तो मैं उसको इतना सारा अनाज छांटने को नहीं दूंगी!” गौरेयों की कथा सुन कर मैं वहां से भाग जाता।”

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