चंद्रमा के चारों ओर एक प्रभामंडल यानी घेरा

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आसमान में इन दिनों चंद्रमा के चारों ओर एक प्रभामंडल यानी घेरा दिखाई दे रहा है जिसे देख कर कई लोग चकित हैं। कुछ लोग इसका उत्तर लोक विश्वास में खोज रहे हैं तो कुछ लोगों को चांद के चारों ओर प्रभामंडल कोई खगोलीय रहस्य लग रहा है।
पहली रोचक बात तो यह है कि हम सभी आसमान में देखते समय चांद के चारों ओर घेरे पर ध्यान तो दे रहे हैं लेकिन इस बात की ओर ध्यान नहीं जा रहा है कि चांद हमसे करीब 3,84,000 किलोमीटर दूर है जबकि बादल केवल धरती से ऊपर वायुमंडल में 12 किलोमीटर तक ही बनते हैं। यानी हमें चांद बादलों की परत के पार दिखाई दे रहा है। लेकिन, बादल कई तरह के होते हैं, कम से कम दस तरह के। 9 से 12 किलोमीटर की ऊंचाई पर सिर्रोस्ट्रेटस यानी पक्षाभ-स्तरीय मेघ होते हैं जो पूरे आसमान में छा जाते हैं। जब उनकी परत बहुत पतली होती है तो हमें उसके पार चंद्रमा या सूर्य साफ दिखाई देता है और उनके चारों ओर प्रभामंडल यानी घेरा दिखाई देता है। ऐसा उनके प्रकाश के कारण होता है। और फिर, चांद की तो बात ही क्या है! वह तो खुद सूरज की रोशनी से चमकता है और उसे हमारी ओर चांदनी के रूप में भेजता है। चांदनी की किरणें बादल की जल बुंदकियों से टकराती हैं और बादल की उस पतली परत में लगता है जैसे कोई घेरा बन गया है। एक लोक विश्वास यह भी है कि टिटहरी के काफी देर तक बोलते रहने से बारिश होने का अंदेशा होता है। मेरे पिताजी हवा में तेजी से गोते लगा रही गोंतली (अबाबील) चिड़ियों को देख कर अपने अनुभव से कहा करते थे कि बारिश होने वाली है और बारिश होती थी। ये सचमुच लोक विश्वास की बातें हैं। जैसे, घाघ कह गए हैं, ‘शुक्रवार की बादरी, रहे शनिश्चर छाय /घाघ कहे सुन घाघनी, बिन बरसे नहीं जाय।’ लोक कवि घाघ ने कई बार देखा होगा कि शुक्रवार को छाए बादल अगर शनिवार को भी छाए रहते हैं तो वर्षा जरूर होती है। उन्होंने इसे अपने दोहे में कह दिया। यह लोक विश्वास बन गया लेकिन प्रयोगों से यह प्रमाणित नहीं किया गया है। इसलिए इसे वैज्ञानिक सच नहीं कहा जा सकता। ऐसा संयोग से कभी हो भी सकता है और कभी नहीं भी।
(मेघों के बारे में विस्तृत जानकारी मेरी नई पुस्तक ‘विज्ञान और हम’ में। प्रकाशक- लेखक मंच प्रकाशन, गाजियाबाद-201014, मोबाइलः 09871344533)

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