विज्ञान परिक्रमा 2015

विज्ञान परिक्रमा 2015
विज्ञान परिक्रमा 2015

विज्ञान की अनेक नई विस्मयकारी खोजों से मानव जीवन तथा समाज पर विज्ञान की गहरी छाप छोड़ कर वर्ष 2015 विदा हो गया है। विदा होने से पहले वैज्ञानिक खोजों की खुशियां मनाती मानव जाति को आगाह भी कर गया कि विज्ञान के बूते पर सच की खोज का सतत प्रयास तो ठीक, लेकिन भावी पीढ़ियों के लिए इस प्यारी और निराली पृथ्वी को बचा कर रखें जो ब्रह्मांड का अब तक ज्ञात ऐसा एकमात्र ग्रह है जिसमें जीवन की धड़कन चल रही है।

 विज्ञान यह संदेश भी दे गया कि पृथ्वी पर जल, थल और नभ में जीवों की लाखों प्रजातियां मौजूद हैं जो हमारे इस प्राकृतिक रूप से बेहद सुंदर ग्रह की अनोखी संपदा और भावी पीढ़ियों की अनमोल विरासत हैं। इसमें जीवन के जितने रूपों को हम अपने लंबे इतिहास में अब तक पहचान पाए हैं, उनके अलावा भी प्रकृति की गोद में न जाने जीवन के कितने रूप आज भी अज्ञात हैं। बीते वर्ष के दौरान मिली तमाम नई जीव-जातियों ने इसे फिर साबित कर दिया।

आइए धरती, आसमान और स्वयं हमसे जुड़ी हुई बीते वर्ष की कुछ वैज्ञानिक घटनाओं की चर्चा करें। शुरूआत असीम अंतरिक्ष के अन्वेषण से…

अंतरिक्ष

आदमी का सपना पहले पंछियों की तरह आसमान में उड़ना था। वह उड़ा और उड़ने के बाद चांद तक पहुंच गया। आज उसके बनाए अंतरिक्षयान सौरमंडल के असीम अंतरिक्ष में ग्रहों उपग्रहों तक ही नहीं बल्कि सौरमंडल की सीमा के भी पार जा चुके हैं। उसके रोबोट ग्रहों, उपग्रहों, धूमकेतुओं और क्षुद्रग्रहों की सतह टटोल रहे हैं। उड़ने और चंद्रमा को छू लेने के बाद आदमी यह सपना संजो रहा है कि अब बस जाएंगे जाकर कहीं और! वह चांद और मंगल पर अपनी बस्तियां बसाने की योजनाएं बना रहा है। उसका मन चांद और मंगल पर ही बसने के मंसूबे नहीं बांध रहा है बल्कि सौरमंडल के पार जाकर कभी अनजान एक्ज़ोप्लेनेटों यानी बहिग्र्रहों पर भी बसने की संभावना टटोल रहा है।

न्यू होराइजंस अंतरिक्ष यान
न्यू होराइजंस अंतरिक्ष यान

अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में बीते वर्ष की सबसे बड़ी घटना यह रही कि ‘न्यू होराइजंस’ अंतरिक्षयान 14 जुलाई 2015 को बौने ग्रह प्लूटो के पास पहुंच गया। सुदूर प्लूटो के पास तक पहुंचने वाला यह पहला अंतरिक्षयान है। वहां तक पहुंचने में ‘न्यू होराइजंस’ को लगभग साढ़े नौ बर्ष का समय लगा। इस यान ने प्लूटो के धरातल और उसके चंद्रमाओं की साफ तस्वीरें भेजीं जिनसे पता लगा कि वहा चौरस बर्फीले मैदान और क्रेटर यानी गहरे गड्ढे हैं। इसके अलावा 2353 मीटर ऊंचे बर्फीले पहाड़ भी हैं। ‘न्यू होराइजंस’ अभियान से यह पक्के तौर पर तय हो गया है कि बौने ग्रह प्लूटो का व्यास 2,370 किलोमीटर है।

बीते वर्ष में ही अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ का अंतरिक्षयान ‘डान’ बौने ग्रह सेरेस के पास पहुंचा। सेरेस को वर्ष 2006 तक एस्ट्रायड यानी क्षुद्र ग्रह माना जाता था। वैज्ञानिक इस बौने ग्रह पर जल की मौजूदगी का पता लगा रहे हैं। डान किसी बौने ग्रह की परिक्रमा करने वाला पहला अंतरिक्षयान है।

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ई एस ए) ने वर्ष 2014 में धूमकेतु ‘67 पी/चुर्युमोव गेरासिमेंको’ रोजेट अंतरिक्ष यान से जो प्रोब ‘फाइली’ उतारा था, वह लगभग सात माह से हाइबरनेशन में सोकर निष्क्रिय पड़ा था। इस वर्ष के मध्य में वह पुनः सक्रिय हो गया। वैज्ञानिकों ने रोजेटा-फाइली का कार्यकाल सितंबर 2016 तक बढ़ाने की घोषणा भी की।

बुध ग्रह
बुध ग्रह

बुध ग्रह की सतह का काला रंग अब तक खगोल वैज्ञानिकों के लिए रहस्य ही बना हुआ था। लेकिन, इस वर्ष उन्होंने इस रहस्य का अनावरण करने में सफलता हासिल कर ली। उन्होंने पता लगा लिया कि सदियों से धूमकेतुओं की धूल परत-दर-परत जमा होने के कारण बुध की सतह काले रंग की दिखाई देती है। उस धूल में कार्बन का अंश काफी होता है।

लगभग दस वर्षों से बुध ग्रह की परिक्रमा कर रहा मैसेंजर अंतरिक्षयान इस वर्ष वैज्ञानिकों के निर्देश पर बुध ग्रह की सतह से जा टकराया। उसका ईंधन समाप्त हो चुका था। मैसेंजर यान ने बुध की गहन जांच-पड़ताल करके उसके अनेक रहस्यों का पता लगाया।

इस वर्ष खगोल वैज्ञानिकों को सौरमंडल के पार अनेक नए एक्ज़ोप्लेनेटों यानी बहिग्र्रहों का पता लगाने में बड़ी सफलता हासिल की। इस कार्य में अंतरिक्ष में घूमती ‘केप्लर’ दूरबीन ने भारी मदद की। इनमें से कई बहिग्र्रह हेबिटेबल जोन में पाए गए। हेबिटेबल जोन अंतरिक्ष का वह क्षेत्र है जहां पानी की और जीवन पनपने की संभावना हो सकती है।

केप्लर दूरबीन ने लगभग डेढ़ लाख तारों की पड़ताल के बाद एक हजारवां बहिग्र्रह खोजने का भी रिकार्ड बनाया। इस वर्ष केप्लर दूरबीन की मदद से जो आठ बहिग्र्रह खोजे गए, उनमें से छह बहिग्र्रह हमारे सूर्य के आकार और तापमान के तारों की परिक्रमा कर रहे हैं। जो बहिग्र्रह इस वर्ष खोजे गए, उनमें से मुख्य बहिग्र्रह हैं: केप्लर 438 बी, केप्लर 442 बी, केप्लर 452 बी।

चित्रकार की कल्पना में वीणा (लायरा) तारामंडल में केप्लर-444 तारा और उसकी परिक्रमा करते ग्रह 2
चित्रकार की कल्पना में वीणा (लायरा) तारामंडल में केप्लर-444 तारा और उसकी परिक्रमा करते ग्रह

केप्लर दूरबीन ने एक ऐसे तारे केप्लर-444 का भी पता लगाया जिसके चारों ओर हमारे सौरमंडल के बुध, शुक्र और पृथ्वी के आकार के पांच ग्रह चक्कर लगा रहे हैं।

इसके अलावा स्पिट्जर अंतरिक्ष दूरबीन से भी हमारी पृथ्वी से 21 प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक पथरीले बहिग्र्रह ‘एच डी 219134 बी’ का भी पता लगा।

भारत में

हमारे देश में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ‘इसरो’ के वैज्ञानिकों ने मंगलयान से प्राप्त हो रही सूचनाओं और तस्वीरों का विश्लेषण किया। उन सूचनाओं से मंगल के धरातल और वायुमंडल के बारे में नए रहस्यों का पता लगेगा।

इसरो के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इस वर्ष अंतरिक्ष में कई महत्वपूर्ण उपग्रह छोड़े। वर्ष की शुरूआत में 28 मार्च 2015 को इसरो ने श्रीहरिकोटा से 1425 किग्रा. भारी ‘आइ आर एन एस एस 1-डी’ उपग्रह का प्रमोचन किया। इस श्रंखला में सात उपग्रह छोड़े जाने हैं जिनमें से यह  चौथा उपग्रह था।

11 जुलाई 2015 को श्रीहरिकोटा से ही 5 ब्रिटिश उपग्रह छोड़े गए। इन वाणिजिक विदेशी उपग्रहों का कुल भार 1440 किग्रा. था। इन्हें शक्तिशाली पीएसएलवी-एक्स एल राकेट से छोड़ा गया। इससे पूर्व भारत अमेरिका सहित 19 देशों के 45 उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ चुका था। इस तरह भारत ने वाणिज्यिक उपग्रहों के प्रमोचन में विश्व में अपना विशेष स्थान बना लिया है।

इसरो के वैज्ञानिकों ने सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र, श्रीहरिकोटा से 27 अगस्त 2015 को शक्तिशाली जीएसएलवी-मार्क 2 डी-6 राकेट से जीसैट-6 संचार उपग्रह का सफल प्रमोचन किया। यह भारत का 25 वां भू-स्थिर संचार उपग्रह है। जी-सैट श्रंखला के उपग्रहों ने हमारे देश को प्रसारण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया है।

एस्ट्रोसैट
एस्ट्रोसैट

28 सितंबर 2015 को भारत ने अपनी 1513 किग्रा. भारी प्रथम अंतरिक्ष वेधशाला ‘एस्ट्रोसैट’ को अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया। इसे पीएसएलवी-सी-30 राकेट से छोड़ा गया। एस्ट्रोसैट के साथ ही छह (6) विदेशी उपग्रह भी अंतरिक्ष में स्थापित किए गए। इनमें कनाडा का नैनो उपग्रह एन एल एस-14, इंडोनेशिया का उपग्रह लापान-ए2 और अमेरिका के चार नैनो उपग्रह शामिल थे।

इसरो निकट भविष्य में ही चंद्रयान-2 मिशन भेजने की तैयारी कर रहा है। इसके तहत एक आर्बिटर यान और लैंडर रोवर माड्यूल भेजने की योजना है। इसके अलावा सूर्य के अध्ययन के लिए 400 किग्रा भारी ‘आदित्य-1’ उपग्रह भी अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। सार्क देशों में संचार की सहूलियतें बढ़ाने के लिए ‘सार्क संचार उपग्रह’ भेजने की भी योजना बनाई गई।

धरती पर

इधर, धरती पर वैज्ञानिक न केवल मानव के जीवनकाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि शरीर की सूक्ष्म संरचना और जीनों के रहस्यों का पता लगा कर उसे बुढ़ापे से मुक्ति दिला कर दीर्घजीवी बनाने के हर संभव प्रयास भी कर रहे हैं। बीते वर्ष के दौरान फसलों की नई किस्में भी विकसित की गईं। विज्ञान की मदद से खतरनाक बीमारियों के साथ लड़ाई जारी रही और कुछ असाध्य बीमारियों के कारगर टीके बनाने की आस जगी।

अपना साथ निभाने और हाथ बंटाने के लिए तरह-तरह के रोबोटों का निर्माण जारी रहा। कल-कारखानों में तो वे काम कर ही रहे है, दैनिक जीवन में हाथ बंटाने वाले कई रोबोट भी सामने आए।

नई जीव जातियां
नई जीव जातियां

नई जीव जातियां

पहले नई जीव जातियों और प्रजातियों की बात। वर्ष 2015 के दौरान वैज्ञानिकों के हाथ पूर्वी हिमालय क्षेत्र में अब तक अनजानी 200 से भी अधिक प्रजातियों का खजाना हाथ लगा। वहां पेड़-पौधों की 133, मछलियों की 26, उभयचरों की 10 और स्तनधारी प्राणी, रेंगने वाले प्राणी और चिड़ियों की एक-एक नई जाति मिली। इनमें से मुख्य प्रजातियां हैं: छींकने वाले बंदर, चित्तीदार बैबलर चिड़िया, सीगों वाला मेंढक, नई तितली, जहरीला पिट वाइपर सांप और खूबसूरत नया आर्किड। इनके अलावा बालदार ततैयों और मकड़ी की भी नई प्रजाति मिली है।

फसलों की नई किस्में

2015 के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने भी फसलों की अनेक नई उन्नत किस्में विकसित कीं। विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों ने अलग-अलग इलाकों की जलवायु को ध्यान में रखते हुए प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने वाली नई किस्मों का विकास किया। केरल कृषि विश्वविद्यालय ने धान, कोकोवा, कटहल, मिर्च, मशरूम, लोबिया, बैंगन तथा टमाटर की कुल 25 नई किस्मों का विकास किया।

भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान ने नींबू, अनार, शरीफा, अमरूद, पपीता, अंगूर और आम की नई किस्में तैयार कीं। गेंदा और प्लूरोटस मशरूम की भी उन्नत किस्में तैयार की गईं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने 14 फसलों की उन्नत किस्मों के विकास पर गहन शोध कार्य किया। इनमें मौटे अनाज, दलहन, तिलहन और चारे तथा बागवानी की फसलें शामिल हैं।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने धान, ज्वार, तिल, कपास, गन्ना और वसंतकालीन मक्का की नई उन्नत किस्में विकसित कीं।

जलवायु परिवर्तन

मौसम विज्ञानियों और जलवायु विशेषज्ञों ने ग्लोबल वार्मिंग और विश्व के विभिन्न भागों में बदलते मौसमों पर गहरी चिंता व्यक्त की। इस आसन्न संकट से बचने के उपाय खोजने हेतु गहन शोध कार्य किया गया। जलवायु परिवर्तन पर विश्व भर के वैज्ञानिकों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए पेरिस में 12 दिन का जलवायु संकट शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। इस शिखर सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा कि घड़ी की सुई जलवायु संकट से संभावित तबाही की ओर घूम रही है। उन्होंने सम्मेलन में भाग ले रहे सभी 195 देशों के नीति निर्माताओं से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन रोकने के लिए ठोस समझौता करने की अपील की।

रोबोट

रोबोट गायिका यांग यांग
रोबोट गायिका यांग यांग

मानव की दुनिया में उसके बनाए मशीनी मानव का आगमन जारी रहा। रोबोट वैज्ञानिकों ने भावनाएं प्रकट करने वाले रोबोट बनाने में सफलता हासिल की। उन्होंने  ऐसे रोबोट भी तैयार किए जिनका नियंत्रण विचारों से किया जा सकता है। जापान के एक होटल में रोबोट स्टाफ भर्ती किया गया जो ग्राहकों की मुस्तैदी से सेवा कर रहे हैं। चीन में एक ऐसा रोबोट बनाया गया जो दो दिन में मकान बना देता है। इस वर्ष ज्वालामुखियों के भीतर जाकर बखूबी काम करने वाले रोबोट भी बनाए गए। इस सब के बावजूद कई वैज्ञानिकों ने आगाह किया कि आगामी 200 वर्षों में हम मानव भी रोबोट और साइबोर्ग ही बन जाएंगे।

चेतावनी तो वैज्ञानिकों ने यह भी दी है कि परमाणु हथियारों के बढ़ते हुए जखीरे और ग्लोबल वार्मिंग से हमारी पृथ्वी लगातार विनाश की ओर आगे बढ़ रही है।

चिकित्सा विज्ञान

इस वर्ष वैज्ञानिकों ने अनेक नई औषधियों और टीकों का विकास किया। एक ऐसा स्प्रे तैयार किया गया है जिसका नाक में प्रयोग करके अल्जीमियर रोग का इलाज किया जा सकता है। चिकित्सकों ने चेतावनी दी कि गुस्से का दिल के दौरे से सीधा संबंध है। इसलिए हमें अपने गुस्से पर काबू करना सीखना चाहिए। इस वर्ष कृत्रिम शुक्राणु भी बना लिया गया और वैज्ञानिकों ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की जैव घड़ी से उसकी जीवन अवधि का पता लगाया जा सकता है। इबोला, मलेरिया और डेंगू के इलाज के लिए नई कारगर दवाइयों की तलाश जारी रही। और हां, वैज्ञानिकों ने यह भी कहा कि संगीत हमें आपस में जोड़ता है।

इस तरह वर्ष 2015 विज्ञान की नई उपलब्धियों की सौगात सौंप कर विदा हो गया है और वैज्ञानिक नव वर्ष में अनुसंधान के लिए नए स्वप्न संजो रहे हैं।

  ( देवेंद्र मेवाड़ी)

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