झीलों की नगरी में किताबें, कहानियां और बच्चे

फतेहसागर
फतेहसागर

मुंबई से लौटा ही था कि झीलों की नगरी उदयपुर जाने की तैयारी में जुट गया। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के संपादक द्विजेन्द्र कुमार ईमेल और फोन से सूचना दे चुके थे कि उदयपुर, राजस्थान में पुस्तक मेला लग रहा है और आपको वहां चलना है।

“मुझे क्या करना होगा वहां” के उत्तर में उन्होंने कहा था, “आपने वहां बच्चों को विज्ञान की कहानी लिखना सिखाना है, लेखक से मिलिए कार्यक्रम में भाग लेना है, ‘बच्चों के लिए रोचक लेखन कैसे किया जाए’ विषय पर परिचर्चा में शामिल होना है, और जुगलबंदी करनी है।”

“जुगलबंदी? किसके साथ?”

“लेखक-चित्रकार आबिद सुरती के साथ।”

सहसा कानों पर विश्वास नहीं हुआ। दुबारा पूछा, “किसके साथ?” वे बोले, “आबिद सुरती के साथ।”

अब शको-शुबहे की कोई गुंजाइश नहीं थी। सुन कर मन बाग-बाग हो गया। इसलिए कि आबिद सुरती मेरे प्रिय लेखक और कार्टूनिस्ट रहे हैं। सन् सत्तर के दशक से मन में ख्वाहिश रही है कि कभी अपने इस प्रिय लेखक से जरूर मिलूंगा। अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में दो-एक बार उन्हें देखा भी, लेकिन अपने संकोची स्वभाव और परिचय न होने के कारण दूर से ही उन्हें देखता रहा। और, अब अचानक यह उनसे मिलने का सुखद संयोग!

मुझे कुछ माह पूर्व कौसानी, उत्तराखंड के बाल साहित्य सम्मेलन में बाल साहित्यकार मित्र रजनीकांत शुक्ल से हुई बातचीत याद हो आईः

“बड़ी इच्छा थी कि कभी कौसानी देखूं।”

“हर आदमी की अपनी-अपनी इच्छाएं, अपनी ख्वाहिशें होती हैं,” उन्होंने कहा।

“हां मित्र, मेरी ख्वाहिशों के बारे में सुनेंगे तो चौंक जाएंगे। वे लगती आसान हैं लेकिन उन्हें पूरा करना कठिन है,” मैंने कहा।

“बताइए, जैसे?”

“जैसे, मैं एक बार लेखक कार्टूनिस्ट आबिद सुरती के साथ बैठ कर चाय पीना चाहता हूं। जैसे, मैं पेरू में प्राचीन इंका साम्राज्य के शहर माचू-पिक्चू को देखना चाहता हूं…”

“आपकी पहली ख्वाहिश तो आसानी से पूरी हो सकती है। आबिद जी दिल्ली आते रहते हैं। इस बार आए तो मैं आपकी मुलाकात कराऊंगा। यह अब मेरी जिम्मेदारी रही,” उन्होंने कहा और मैं निश्चिंत हो गया।

और, अब अचानक द्विजेन्द्र जी का यह फोन! उदयपुर जाने का उत्साह दुगुना हो गया। अगले दिन दोपहर की उड़ान पकड़नी थी। काफी पहले हवाई अड्डे पर पहुंच गया। सुरक्षा जांच के बाद निर्धारित गेट के पास वेटिंग लाउंज में बैठ कर कांच की दीवारों के पार मैदान में आते-जाते लोहे के विशाल उड़न-पंछियों को देखता रहा। मैदान में खड़े एयर इंडिया के एक ऐसे ही उड़न पंछी में हमने भी उदयपुर की उड़ान भरनी थी। हमने यानी द्विजेन्द्र कुमार और लेखक डा. शेखर सरकार ने जिनकी विवेकानंद पर लिखी पुस्तक पिछले दिनों चर्चा में रही थी। कुछ देर बाद वे भी आ गए। उड़ान विलंबित थी, इसलिए कुछ देर तक एक रेस्तरां में काफी पीते हुए किताबों पर चर्चा करते रहे। बाद में एयर इंडिया की उड़ान संख्या ए आई- 0471 से उदयपुर के महाराणा प्रताप हवाई अड्डे पर पहुंचे। बाहर सारथी प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी गाड़ी में लगभग 20 किलोमीटर दूर शहर के लिए रवाना हुए। एक जगह दो पहाड़ों के संकरे दर्रे से निकले तो सारथी ने कहा, ”पहले यहां एक बड़ा गेट था। सड़क चौड़ी करने के लिए उसे तोड़ दिया गया। रास्ते में दोनों ओर ऊंचे पहाड़ों के बीच की चौरस घाटी में आगे बढ़ते गए। शहर की भीड़-भाड़ को पार करते हुए सारथी ने हमें राजस्थान पर्यटन विभाग के होटल ‘कजरी’ तक पहुंचा दिया। वहां हमारे रहने की व्यवस्था की गई थी। फटाफट सामान रखा, खाना खाया, और उसी सड़क पर करीब छह किलोमीटर वापस लौट कर नागर राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर में आयोजित पुस्तक मेले में पहुंचे। मेले के स्टाल के बाहर मैंने माथे पर मेवाड़ की वीर भूमि की माटी का तिलक लगाया और मन ही मन उसे नमन किया। मन में सदा ही यह भाव रहा है कि शायद मेरे पुरखे भी कभी मेवाड़ से उत्तराखंड के पहाड़ में गए होंगे। मेले में दर्शकों के साथ पुस्तकों का जायजा लेकर पास के ही एक हाल में ‘कथालोक’ कार्यक्रम में शामिल होने चले गए। वह कहानियों की शाम थी जिसमें स्थानीय साहित्यकारों के साथ ही सलूंबर के बाल साहित्य सम्मेलन से लौटे लेखक मित्र रजनीकांत शुक्ल और मनोहर चमोली मनु को भी कथा पाठ करना था। स्थानीय साहित्कारों में राकेश मोहन भटनागर, ज्योत्सना इंद्रेश, डा. नीता कोठारी और अरविंद आश्या आमंत्रित थे। कहानियां सुनते-सुनते पूरी शाम गुजर गई।

2सुबह मेले में पहुंचे तो बसों से उतर कर बच्चे लंबी कतारों में भीतर पुस्तकों के पास पहुंच रहे थे। ग्यारह बजे से बच्चों को हमने विज्ञान पर आधारित कहानी लिखना सिखाया था। भीड़ के बीच बच्चों को कहानी लिखने के लिए उत्साहित किया गया। देख कर खुशी हुई कि तमाम बच्चे कहानी लिखने के लिए सामने आकर बैठ गए। मेरे साथ मोहनलाल सुखाड़िया, विश्वविद्यालय, उदयपुर में पत्रकारिता विभाग के प्रभारी डा. कुंजन आचार्य भी थे।

बच्चों से कहानी की बातचीत की तो उन्होंने रोबोट और एलियनों में बहुत रूचि दिखाई। उनकी कल्पना को पंख देने के लिए मैंने उन्हें विज्ञान की कहानी के लिए यही दो कथा बीज दिए। मैंने कहा, दोस्तो, सोचो आपके पापा को नौकरी में जापान जाने और वहां कई साल तक रहने का मौका मिला। अब वे वहां से लौट आए हैं और, अपने साथ एक रोबोट ले आए हैं। वह रोबोट अब तुम्हारे साथ रहता है और तुम्हारे परिवार का सदस्य है। बताओ, उसका नाम क्या है और तुम्हारे परिवार में उसे कैसा लग रहा है? वह क्या करता है? परिवार के लोग उसके आने से खुश हैं या नहीं? क्या उसे जापान की याद आती है?

दूसरा कथा बीज एलियनों के बारे में था। मैंने कहा एक दिन तुम्हें एक अजीब-सा प्राणी मिला। तुम उससे डर गए लेकिन उसने कहा, “डरो मत, मेरी बात सुनो। मैं इस पृथ्वी का निवासी नहीं हूं, दूर ब्रह्मांड के किसी दूसरे लोक से आया हूं। क्या तुम मेरी मदद करोगे? मैंने तुम्हारी पृथ्वी के निवासियों के बारे में बहुत-कुछ पता लगा लिया है। मैं तुम्हें अपने ग्रह, अपने लोक के बारे में बताऊंगा। आओ, मेरे पास आओ।” उसकी बात सुन कर तुमने क्या किया? क्या तुम उसके पास गए? उसने हमारी पृथ्वी, अपने ग्रह और वहां के निवासियों के बारे में क्या बताया? जो कुछ बताया, लिखो दोस्तो।

3और, वे उसी शोरो-गुल में लिखने में जुट गए। पूरे ध्यान से लिखते रहे और जाते-जाते 40 कहानियां सौंप गए! उनकी कुछ शिक्षिकाएं भी साथ थीं। बाद में कहानियां पढ़ीं तो उनमें बच्चों की कल्पनाओं के कई रंग दिखे। बच्चों ने विदेशों से लाए रोबोटों के नाम रखे- रोबो, चिंटी, चिकी, सुनील, ब्लू चेरी, जिमी, जनासू और जादू! रोबोट उनका दोस्त बन गया। घर के तमाम कामों में मम्मी की मदद करने लगा। उनका रोबोट उनके साथ खेलता-कूदता तो था ही उनकी रक्षा भी करता था। उन्हें स्कूल तक छोड़ने और लाने की जिम्मेदारी भी उसने संभाल ली। वह थकता भी नहीं था। नंदिनी तो रोबोट के साथ इतना अधिक खेलने लगी कि पापा ने रोबोट को बंद कर दिया और चाबी अपने पास रख ली। जब वह फिर से पढ़ाई में मन लगाने लगी तो पापा ने रोबोट उसे दे दिया। आशी जैन की मम्मी ने पापा से कहा, “अब मैं दो-दो को कैसे संभालूंगी- आशी और रोबोट को?” लेकिन, रोबोट तो एकदम सुबह उठ कर काम में जुट गया। ध्रुव माहेश्वरी का रोबोट ‘जादू’ एक दिन भटक गया। उसने उसकी स्मृति ठीक कर दी। लेकिन, एक दिन जादू पूछने लगा, “मेरा घर कहां है?“ ध्रुव ने एक कमरा बना कर उसे बता दिया,“ यह है तुम्हारा घर।” रोबोट ने केतन मेहता को बदमाश लड़कों से, हिमांशी कोठारी के परिवार को डाकुओं से और हुजेफा फलासिया को सांप से बचाया। सभी बच्चों की कहानियों में रोबोट दोस्ती निभाते हैं।

एलियनों की कल्पनाएं भी मजेदार थीं। उनकी कहानियों में एलियन एकांत में अंतरिक्ष यान और उड़नतश्तरी से उतरे या फिर सुनसान जगह पर मिल गए। महेशपुरी गोस्वामी और उसके पापा को जैसलमेर के रेगिस्तान में एलियन मिला। उसने कहा, “चिम, चिम, चम!” और दोस्ती का हाथ बढ़ाया। उसे वे घर ले आए। उसका नाम बराइन रखा। सी बी आई वाले उसे पकड़ने आए लेकिन महेश ने उन्हें देने से मना कर दिया। स्नेहिल कोठारी को स्कूल से आते समय ‘होडो’ एलियन मिला। वह इंसानों से नहीं मिलना चाहता था क्योंकि कुछ लोग उसे पुलिस को सौंपना चाह रहे थे। स्नेहिल उसे घर ले गई। मम्मी-पापा को उसने बताया कि वह ‘जुबा-जुबा’ ग्रह से अपने साथियों के साथ आया है लेकिन उनसे बिछड़ गया है। स्नेहिल के परिवार ने साथियों को खोजने में उसकी मदद की। सूरज लुहार को पिकनिक के समय पानी खोजते-खोजते एलियन मिल गया जो उसका अच्छा दोस्त बन गया। जमीन पर उसके पैरों के निशान नहीं पड़ते थे। लेकिन, एक बात थी। वह केवल धूप में अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सकता था। सूरज की गलती से एक बार वह पानी में गिर गया और अदृश्य हो गया। वह कहां गया, कैसे गया, किस ग्रह से आया था- यह रहस्य ही रह गया। इसके बारे में सूरज आज भी सोचती रहती है।

प्रभाव खंडेलवाल एलियन को घर ले गया तो वह उसे होमवर्क भी कराने लगा। वह प्रभाव को पढ़ाता भी है। उसे हर विषय का ज्ञान है। वह जीनियस है। अपने ग्रह और वहां की टैक्नोलाजी के बारे में अनेक मजेदार बातें बताता है। प्रभाव को वह यू.एफ.ओ. यानी उड़नतश्तरी बनाना सिखाता है। बताता है कि उसके ग्रह में जीने के लिए पानी की नहीं बल्कि बिजली की जरूरत पड़ती है। फिर एक दिन वह चला जाता है। हरीश सोनी को परिवार के साथ पिकनिक पर जाते समय एलियन मिला। तेज आंधी से उनकी बस रूकी तो देखा, सामने एक अंतरिक्षयान उतरा। शायद उसमें खराबी आ गई थी। उसमें से एक एलियन निकला जिसने अपना नाम 024568 बताया। हरीश ने उसका नाम ‘मोहित’ रख दिया। उससे खूब दोस्तो हो गई। कई दिन बाद वह अपने ग्रह को लौटा तो पलट कर नहीं देख रहा था। शायद अपने आंसू छिपा रहा था। हरीश ने कहा, “अलविदा मेरे प्यारे दोस्त!“

शिवानी श्रीवास्तव ने देखा, आसमान से जैसे कोई उल्का पिंड धरती पर गिरा। पास जाकर देखा तो वहां एक बौना लेकिन मजबूत कद-काठी का एलियन खड़ा था। उसके हाथ में एक यान का नमूना था। वह धरती को चकित होकर देख रहा था। शिवानी एक पेड़ की ओट से उसे देख रही थी। उसने देखा कि एलियन आसपास का कूड़ा-करकट उठा कर कूड़े के डिब्बे में डाल रहा है। तब उसने पास जाकर इस बारे में पूछा तो एलियन ने कहा, “मैं एक साफ-सुथरे ग्रह में रहता हूं। गंदगी नहीं देख सकता। शिवानी ने सफाई का सबक सिखाने के लिए उससे धन्यवाद कहा। उसने अपना खिलौने जैसा यान निकाला और बताया कि उसके ग्रह के निवासी टैक्नोलाजी में बहुत विकसित हो चुके हैं। फिर उसने अपने यान को अचानक एक बड़े यू.एफ.ओ. अंतरिक्षयान में बदल दिया और आंखों में आंसू भर कर कहा, “बाई!” शिवानी जब भी आसमान की ओर देखती है तो उसे उस एलियन की याद आती है।

कशिश मेनारिया को जब मम्मी ने डांटा, “नहीं, तुम आगरा घूमने नहीं जावोगी,” तो वह घर से निकल कर पास के घने जंगल में चली गई। अचानक उसने देखा कि आसमान में बादलों के बीच से एक हरी-चांदी जैसी कोई चीज नीचे आ रही है। वह चीज उसके पास तक आ गई तो उसने पूछा, “तुम कौन हो, कहां से आए हो? क्या चाहिए तुम्हें? तभी मोटी, भारी आवाज में कोई बोला, “मैं क्रोजेन हूं, बृहस्पति ग्रह से आया हूं। सौरमंडल की सैर कर रहा था कि मेरा अंतरिक्ष यान भटक कर यहां आ गया।” अचानक उसके कुछ और साथी आ गए और वे अपने ग्रह को लौट गए।

आनंदवर्धन सिंह चौहान की कहानी में रोहित मेला देखने जा रहा होता है कि उसे जंगल में एक एलियन मिलता है जो अपना नाम जी.टी. बताता है। यह पूछने पर कि वह यहां क्यों आया है, जी.टी. बताता है कि पृथ्वी पर मौजूद गैसों का पता लगाने के लिए। वह जानना चाहता है कि पेड़-पौधे और प्राणी उनमें कैसे जीवित रहते हैं। उस पर किसी जानवर ने हमला किया था और हाथ में घाव बना था। रोहित उसे घर ले गया और उसे दवाइयां दीं। घाव ठीक हो जाने के बाद एलियन अपने ग्रह को लौटने लगा। उसने रोहित को एक बटन दिया और कहा जब भी इसे दबाओगे तो हमारे यू.एफ.ओ यानी अंतरिक्षयान में सिगनल आ जाएगा। तब मैं तुमसे मिलने आ जावूंगा। वे बाहर थे। एलियन ने बटन दबाया और अचानक उसका उड़नतश्तरीनुमा अंतरिक्षयान आ गया। और फिर, एलियन अपने ग्रह को चला गया।

शाम को लेखक से मिलिए कार्यक्रम था जिसमें मुझे और आबिद सुरती को मौजूद रहना था। लेकिन आबिद जी? पूछा तो पता लगा, वे दोपहर बाद मुंबई की उड़ान से उदयपुर पहुंचने वाले हैं। समय था, इसलिए भोजन करके हमने सोचा, फतेहसागर तक हो आएं। वहां गए। पहाड़ों के बीच उस विशाल झील का शानदार मंजर नजर आया। धर्मवीर सिंह गाड़ी चलाते हुए बता रहे थे कि इसका नाम उदयपुर, मेवाड़ के राणा फतेह सिंह के नाम पर रखा गया है। कहते हैं, उन्होंने करीब तीन-साढ़े तीन सौ साल पहले इसे इसका यह रूप दिया। फतेहसागर में तीन द्वीप हैं जिनमें से दो में सुंदर पार्क और एक में उदयपुर वेधशाला है।

हमारे सामने दूर तक फतेहसागर का जल फैला हुआ था और पीछे हरे-नीले पहाड़ दिखाई दे रहे थे। एक पहाड़ पर श्वेत सज्जनगढ़ पैलेस चमक रहा था, जहां से कभी मानसूनी बादलों की आवाजाही का पता लगाया जाता था। उदयपुर वेधशाला को बिग बियर लेक, दक्षिण कैलिफोर्निया के माडल पर बनाया गया है। इसमें सौर लपटों और सूर्य के सक्रिय हिस्सों का अध्ययन किया जाता है।

मोतीमागरी
मोतीमागरी

थोड़ी देर फतेहसागर से आती शीतल हवा में सांस लेने के बाद हम लौटने लगे तो धर्मवीर ने कहा, “मोतीमागरी यहीं पहाड़ी पर है, उसे देख लीजिए।” हमने भी सोचा चलते-चलाते देख ही लेते हैं। ऊपर पहाड़ी पर पहुंचे तो वहां महाराणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक की विशाल मूर्ति देख कर कानों में कवि श्याम नारायण पांडेय की बचपन से पढ़ी कविता की पंक्तियां गूंजने लगीं: ‘रणबीर चैकड़ी भर-भर कर/चेतक बन गया निराला था/राणा प्रताप के घोड़े से/ पड़ गया हवा का पाला था!’ हवा का एक झौंका आया, लेकिन राणाप्रताप और चेतक उस ऊंची पहाड़ी के स्मारक पर इतिहास में अटल खड़े रहे। कहते हैं, वीर महाराणा प्रताप का कद 7.5 फुट और वजन करीब 110 किलोग्राम था। उनका भाला 80 किलोग्राम, कवच 72 किलोग्राम और 2 तलवारें 25-25 किलोग्राम भारी थीं। वे चेतक पर बैठते तो इन हथियारों के साथ उनका कुल वजन लगभग 206 किलोग्राम होता था। यह चेतक की ही हिम्मत थी कि वह इस वीर योद्धा को लेकर हवा की चाल से दौड़ सकता था।

हम मन की आंखों में उनकी वही तस्वीर संजो कर आसपास घूमे। याद आते रहे राणा प्रताप जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। और, वह स्वामिभक्त श्वेत काठियावाड़ी घोड़ा चेतक जिसने अपने जीवन के आखिरी क्षण तक राणा प्रताप के प्राण बचाए। हमने वहां मोती महल के अवशेष देखे। स्मारक के ‘हाल आफ हीरोज’ में गए जहां मेवाड़ के ऐतिहासिक चरित्रों की बीस आदमकद पेंटिंगें देखीं। चित्तौड़गढ़ और हल्दीघाटी के माडल देख कर मेवाड़ की वीर भूमि को मन ही मन नमन किया।

5 (1)आबिद सुरती जी के आने का समय हो रहा था। हम पहले पुस्तक मेले में पहुंचे और फिर डा. शेखर सरकार और मैं आबिद जी को लेने हवाई अड्डे पर पहुंचे। आबिद जी बाहर ही मिल गए। उन्हें साथ लेकर होटल कजरी गए और कमरे में सामान रख कर तेजी से पुस्तक मेले में पहुंचे। राह में मैंने उन्हें बताया कि मेरी तमाम ख्वाहिशों में से एक ख्वाहिश आपसे मिलने की भी थी जो आज पूरी हो गई है। मैंने सन् साठ के दशक से ही पढ़ी उनकी कहानियों, किताबों और कार्टून पट्टी ढब्बू जी के बारे में उन्हें बताया और ढब्बू जी के कुछ चुटकुले भी सुनाए। उन्हें बताया कि मैंने ‘धर्मयुग’ में छपे 40-45 साल पुराने उनके कार्टून ढब्बू जी की कतरनें आज भी संभाल कर रखी है। शाम छह बजे पुस्तक मेले के हाल में ही आबिद जी और मैंने ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में श्रोताओं से बातचीत की।

अगले दिन सुबह ‘जुगलबंदी’ का कार्यक्रम था। हाल में विद्यार्थी बैठे थे। वे कहानी सुनने के लिए बहुत उत्सुक थे। पहले उन्हें शेखर सरकार ने विवेकानंद के जीवन-दर्शन पर कहानियां सुनाईं। फिर बच्चों से बातें करते-करते अचानक पूछा, “अच्छा बच्चो, यह बताओ, बकरी कैसे बोलती है? बोल कर बताओ?” बच्चे मुस्कुरा कर एक-दूसरे की ओर देखने लगे। मैंने इसे ही कहानी का सूत्र बनाया और कहा, “दोस्तो, बताओ, बकरी कैसे बोलती है? बताओगे तो मैं तुम्हें एक बकरे और बकरी की कहानी सुनाऊंगा। पहले एक बच्चे ने, फिर दूसरे और तीसरे बच्चे ने बकरी की आवाज में कहा- “में ऽऽऽ में”

7“हां तो दोस्तो, घने जंगलों के बीच दूर एक गांव में लोग बकरियां पालते थे। उन्हें खूब हरा-भरा चारा खिलाते थे। लेकिन, वे वहां अपने मंदिर में बकरियों की बलि भी देते थे। यह देख कर एक बकरा बहुत दुखी हुआ और उसने अपनी साथी बकरी से कहा, “मेंऽऽऽ….में, चलो यहां से भाग जाते हैं दूर जंगल में। वहीं रहेंगे। यहां हमारा जीवन संकट में है।”

बकरी ने कहा, “वहां भी तो खतरा है?” तब बकरे ने कहा, “नहीं, वे सभी चैपाए तो हमारे बिरादर हैं। हमारी तरह उनके भी चार पैर हैं। उनसे कहेंगे कि हमें शरण दो, हमारी रक्षा करो।“

इस तरह कहानी आगे बढ़ी। वे दोनों जंगल में एक गुफा में रहने लगे। लेकिन, एक धूर्त सियार उनके बच्चों को उठा ले जाता है। तब बकरा एक तरकीब सोचता है। बकरी से कहता है कि वह हर रोज सुबह सामने पहाड़ी पर चला जाएगा। वहां से पूछेगा, “अरी, ये बच्चे क्यों रो रहे हैं?” उसने बकरी को बताया कि तुम कहना- वे भूखे हैं। खाने के लिए सियार का कलेजा मांग रहे हैं।

उन्होंने यही किया। सियार ने सुना तो डर कर भागा। तब लंगूर भाई ने कहा कि तुम बेकार ही डर रहे हो। बकरा तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मेरे साथ चलो।” सियार ने कहा, “लंगूर भाई, अपनी पूंछ से मेरी पूंछ बांध लो और अपनी पीठ में बिठा लो, तो चलूंगा। लंगूर ने यही किया। वे बकरी की गुफा के पास पहुंचे तो बकरे ने जोर से कहा, “अरी ये बच्चे क्यों रो रहे हैं?” बकरी ने कहा, “भूखे हैं, सियार का कलेजा मांग रहे हैं।” बकरा बोला, “मैंने अपने दोस्त लंगूर से सियार पकड़ लाने को कहा है। उसे शायद एक मिल गया है। अपनी पूंछ से बांध कर ला रहा है।” यह सुन कर सियार के होश उड़ गए। वह जोर से उछल कर भागा। उसकी पूंछ टूट गई  लंगूर भी भाग गया और उसके बाद बकरा-बकरी अपने बच्चों के साथ जंगल में बड़े चैन से रहने लगे। बलि की कुप्रथा से भी उनके प्राण बच गए।

कहानी पूरी हुई तो आबिद सुरती बच्चों को चित्र कला समझाने में जुट गए। स्कैच पेन लेकर उन्होंने एक चैतरफा बोर्ड पर आदमियों के तरह-तरह के चेहरे और कद-काठी बनाने के गुर बच्चों को समझाए।

8शाम को बच्चों के लिए ऐसे लेखन पर परिचर्चा हुई जिसे बच्चे खुशी-खुशी मन लगा कर पढ़ सकें। साथ में थे आबिद सुरती, शेखर सरकार, विमला भंडारी और पंचशील जैन। श्रोताओं में ‘बच्चों का देश पत्रिका’ के संपादक संचय जैन और कई स्थानीय साहित्यकार भी थे। सभी इस बात पर एकमत थे कि बच्चों के लिए ऐसी सीधी सरल भाषा और रोचक शैली में लिखा जाना चाहिए जिसे वे आसानी से समझ सकें और उसे पढ़ कर उसका आनंद उठा सकें। पंचतंत्र और ईसप की कहानियां हों चाहे परीकथाएं, वे इसीलिए बच्चों में लोकप्रिय हुईं क्योंकि वे सीधी-सरल भाषा में लिखी गईं। उनमें जिज्ञासा का भाव आखिर तक बना रहता था।

उदयपुर के पहाड़ों से शाम नीचे उतर आई थी और शहर बिजली की रोशनी में जगमगाने लगा था। हमने पिचैला झील के किनारे जाकर अंधेरे में उसके पानी में झिलमिलाते सिटी पैलेस को देखने का मन बनाया। एक छोटी झील के पास से निकले तो धर्मवीर बोले, “सर, यह दूध तलाई है।”

मैंने पूछा, “दूध तलाई? इसका दूध से क्या संबंध है?”

“पता नहीं, लेकिन कहते हैं, कभी इसमें दूध भरा जाता था जिसमें रानियां नहाती थीं,” धर्मवीर ने कहा। फिर कुछ सोचते हुए कहा, “इतना दूध कहां से आता होगा? खाली कहावत ही होगी। इसके पास ही वह वहां महाराजा फतेहसिंह का शिव निवास है।”

सिटी पैलेस
सिटी पैलेस

पिचैला झील के पास पहुंचे तो शीतल हवा चल रही थी। किनारे नीचे नावें विश्राम कर रही थीं और ऊपर पेड़ों के नीचे झुटपुट अंधेरे में बैंचों और किनारे की दीवार पर बैठे युवक-युवतियां ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे। सामने झील में लेक पैलेस जगमगा रहा था। मैं अंधेरे में उसकी तस्वीरें लेने की कोशिश करता रहा। साथी कुछ दूर चर्चा में मशगूल थे।

वहां से लौटते हुए हरी दास जी की मागरी, मुल्ला तलाई में केसर विलास की छत पर उसके युवा रसोइयों के हाथ का बना ताजा भोजन किया। वहां से रात के अंधेरे में दूर जगमगाती रोशनियां दिखाई दे रही थीं। एक ओर पिचैला झील के पीछे का दृश्य दिखाई दे रहा था।

अगली सुबह हाल में दो-तीन सौ बच्चों को मैंने किस्सागोई के अंदाज में सौरमंडल की सैर कराई और उनके साथ जीवन का गीत गाया। आज ही लौटना भी था। इसलिए होटल जाकर खाना खाया और गाड़ी में सामान रखा। आबिद जी की उड़ान पहले थी। इसलिए डा. शेखर सरकार और द्विजेन्द्र कुमार मेले में चले गए। मैं आबिद जी के साथ हवाई अड्डे की ओर चला। उदयपुर की झीलें और पहाड़ पीछे छूट रहे थे। मैंने मन ही मन उन्हें विदा कहा। दो दिन भी कहीं रहे तो न जाने क्यों उस जगह से एक लगाव हो जाता है। मुझे भी उदयपुर छूटने का अहसास हो रहा था। हवाएं जैसे कानों में गुनगुना रही थीं- फेर आणा जी म्हारे देस!

तभी आबिद जी ने अपने बैग में से ‘ब्लैक बुक’ पुस्तक निकाली और मुझे भेंट की। वह उनकी पुस्तक ‘काली किताब’ का अंग्रेजी अनुवाद था। मैंने कहा इस पर सप्रेम भेंट लिख दीजिए। वे बोले, “हवाई अड्डे में आराम से लिखेंगे।” वहां पहुंचे, धर्मवीर को धन्यवाद दिया और भीतर जाकर उड़ान का पता किया। मुंबई की उड़ान का चैक-इन हो रहा था। आबिद जी को उन्होंने जाने दिया, मैं हाथ में ‘ब्लैक बुक’ पकड़े इंतजार ही करता रह गया। आबिद जी की उड़ान निकलने के बाद हमारा चैक-इन शुरू हुआ। जब तक ऊपर वेटिंग लाउंज में पहुंचा, आबिद जी की उड़ान जा चुकी थी। मायूस होकर मैं अपनी उड़ान का इंतजार करने लगा। साथी शेखर सरकार और द्विजेन्द्र भी आ गए। काफी इंतजार के बाद हमारे उड़ान पंछी ए आई-472 ने शाम 5.20 बजे उड़ान भरी। शाम 7 बजे दिल्ली पहुंचे तो आसमान से नीचे दूर-दूर तक हजारों-हजार रोशनियां देख कर लग रहा था, जैसे सितारों के संसार में उतर रहे हों। 7 बजते-बजते हम दिल्ली पहुंच गए।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *