पिता

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आप हंस रहे हैं ? मुझे देखकर आप क्यों हंस रहे हैं- यह मैं अच्छी तरह जानता हूं। आप मन में क्या सोच रहे हैं- मैं यह भी जानता हूं। यही न कि मेरा मुवक्किल अभी-अभी केस जीत गया है , फिर भी मैं खुश नहीं हूं?

अच्छा, सच कहिए, यही बात है न?

ठीक सोच रहे हैं आप भी। सभी यही सोचते हैं। सोचते हैं- वकीलों का भी कहीं कोई ईमान-धर्म होता है? जो पैसा देगा, उसके लिए वे झूठ बोलेंगे। हमारा व्यवसाय ही झूठ बोलना मान लिया गया है। इसके लिए लोगों ने मन में किस्से गढ़ लिए हैं। अपनी बात पर विश्वास दिलाने के लिए वे बड़े-बड़े नामी-गिरामी वकीलों के किस्से सुनाते हैं कि, कैसे अमुक वकील ने पैसा लेकर मुलजिम को बचा लिया। बल्कि एक नामी वकील का किस्सा तो दावे के साथ मिसाल के रूप में बताया जाता है। कहते हैं जो भी अपने केस के बारे में उनके पास जाता है, वे उससे पूछते हैं- जुर्म किया है? ‘हां’ सुनते ही वे उसका स्वागत करते हैं और कहते हैं- तब तो मैं बचा लूंगा! हां, पैसा काफी खर्च होगा।

आप लोग सोचते हैं वकीलों का दिल नहीं होता। उनमें भावनाएं नहीं होतीं। उनकी आत्मा नहीं होती। उनका रिश्ता, उनका मतलब सिर्फ पैसे से है। लेकिन, यह सच नहीं है। वकील भी आखिर इंसान है। उसमें भी वह सब कुछ है, जो आप में है। सभी वकीलों की निगाह पैसे पर ही नहीं होती। वे भी सच का साथ देना चाहते हैं ताकि लोगों को न्याय मिल सके।

आप फिर मुसकरा रहे हैं। लेकिन मैं जो कुछ कह रहा हूं, ठीक कह रहा हूं, मेरी बात पर विश्वास कीजिए। यह बात तो मैं आपसे पैसे के लिए नहीं कह रहा हूं ना? कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि फीस लेने और एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद मुवक्किल केस हार जाता है। तब हमें भी तकलीफ होती है। अगर यह पता हो कि हमारे मुवक्किल ने जुर्म नहीं किया है, वह निर्दोष है- तब अगर वह केस हार जाता है तो सच मानिए कई-कई दिन तक बैचेनी रहती है।

आप सोच रहे होंगे- मैं कह तो कुछ रहा हूं और कर कुछ और रहा हूं। अगर वकीलों का भी दिल होता है तो फिर मैं रत्ती के केस जीत जाने से दुःखी क्यों हूं?

इसलिए, क्योंकि मैं भी इंसान हूं और सही-गलत के बारे में सोचता हूं।

आप चकरा गए न? जब तक पूरी बात मालूम न हो, कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। सुनी-सुनाई बात गलत भी हो सकती है। और, कानून में तो सुनी-सुनाई बातों का कोई मतलब ही नहीं है। न उसे बयान माना जा सकता है और न प्रमाण। पहले पूरी बात का पता लगाना चाहिए। उसके बाद ही अपनी राय बनानी चाहिए। इसलिए आप भी पहले मेरी पूरी बात सुन लें। उसके बाद मेरे बारे में अपनी राय बनाएं।…इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रत्ती के केस के बारे में सब कुछ जान लेने के बाद आप इस तरह व्यंग्य से नहीं हंस सकेंगे। अभी आपको सारी बातों का पता नहीं है। पहले मुझे भी नहीं था।

रत्ती जब पहली बार मुझसे मिली और उसने केस लेने की मुझसे प्रार्थना की तो मैंने उसे साफ-साफ कहा था कि वह मुझे सब कुछ सच-सच बता दे। छिपाए कुछ भी नहीं। इससे केस को पूरी तरह समझने और लड़ने में मुझे मदद मिलेगी। वह फफक-फफक कर रो पड़ी और सिसकते हुए कहने लगी- आपके पास इसीलिए तो आई हूं सरकार। मैं गरीब औरत हूं। मेरे साथ धोखा हुआ है। अन्याय हो रहा है। मुझे मेरा बच्चा दिला दीजिए हुजूर। मेरा बच्चा…मेरा बच्चा…

वह छाती पीटकर रोने लगी। मैंने उसे ढाढ़स बंधाया- तुम्हारा बच्चा तुम्हें मिल जाएगा। धीरज रखो। रोने-धोने से कुछ नहीं होगा। पहले पूरी बात बताओ। हुआ क्या है… ?

रत्ती ने अपने आंसू पोंछे और भरी हुई आवाज़ में बोली- मैं सोनपुर से आई हूं सरकार। आई क्या, लाई गई हुजूर। वहां मजूरी और चौका-बर्तन करके पेट पाल रही थी। वहीं एक घर में एक दिन एक बीबी जी मिलीं। कहने लगी, दिल्ली से आई हूं। बड़े अच्छे स्वभाव की और मिलनसार थीं वे। बड़ी-बड़ी बातें सुनातीं। दिल्ली में तो वह है, दिल्ली में तो वह है। उनसे अच्छी पहचान हो गई। एक दिन बोलीं- रत्ती दिल्ली चलेगी? मैं आश्चर्य से उनका मुंह देखती रह गई। दिल्ली? मैंने कहा- वहां मेरा कौन है बीबी जी? धीरे से बोलीं-अरे है नहीं तो हो जाएगा। क्या जिंदगी भर यही चौका-बर्तन या मज़दूरी करने का ठेका ले रखा है…? सोच लो। तुम्हारे फायदे के लिए कह रही हूं।

मैं सोच में पड़ गई। दिल्ली शहर के बारे में उन्होंने जो कुछ बताया था- वह सब याद आने लगा। उन्होंने अगले दिन फिर पूछा तो मैंने भी साफ-साफ पूछ लिया- क्या अपने पास रखेंगी आप…? आपके घर का काम कर दिया करूंगी। वे हंसने लगीं। मेरे घर का नहीं- अपने घर का काम करेगी तू। …मैंने कहा- मेरा घर? बोली- हां, तेरा घर।  तू चाहे तो मैं तेरा घर बसा सकती हूं। तब तो वहां तेरा घर होगा, क्यों…?

मैं अविश्वास से उनकी ओर देखती रही। तब उन्होंने समझाया- मेरी पहचान के एक बहुत अच्छे आदमी हैं। उमर थोड़ी ज्यादा है- चालीस के आसपास, लेकिन स्वभाव बहुत अच्छा है। भगवान का दिया सब कुछ है उनके पास। अच्छे खाते-पीते आदमी हैं। तुझसे उमर में बड़े जरूर हैं लेकिन आदमी की भी भला कहीं उमर पूछी जाती है। मुझसे कहते रहते हैं- भाभी जी, कभी कहीं कोई सीधी-सादी अपने जैसी लड़की दिखाई दे तो हमारा ध्यान रखना। इस घर की लक्ष्मी बस आपने ही लानी है।…मैंने कई लड़कियां देखीं, लेकिन जमीं नहीं। वे बेचारे है सीधे-सादे आदमी। अगर कोई तेज़-तर्रार लड़की मिल गई तो उन्हें नाच नचा देगी। फिर इतने बड़े घर की चाबियां हर किसी को तो सौंपी नहीं जा सकती। और, तुझसे ज्यादा सीधी-सादी, गरीब लड़की ही उनके घर की लक्ष्मी बन सकती है। और, तुझसे ज़्यादा सीधी-सादी भला कौन होगी? मैंने तो तुझे देखते ही पसंद कर लिया था। बाकी तुझ पर निर्भर करता है। तू इस नरक से निकलकर कुछ बनना चाहती है तो यह मौका है। और, रत्ती यह बता दूं, मौका बार-बार नहीं आता। अगर चलना चाहे तो मुझे कल तक बता देना। चार-छहः दिन मे मुझे लौटना है। चलना है तो मेरे साथ ही चलने को तैयार भी रहना होगा।

मैंने बहुत सोचा और फिर उसके साथ जाने का निश्चय कर लिया।

उसके साथ मैं दिल्ली आ गई। तीन दिन उसके घर पर रही। फिर एक दिन एक अधेड़ उम्र का आदमी उसके साथ आया। उसने उससे मेरा परिचय कराया- यह हैं बिंद्रा बाबू। हैं कि नहीं ठीक वैसे जैसे मैंने बताए थे तुझे? बहुत भले आदमी हैं। रानी की तरह रखेंगे तुझे। और यह है- रत्ती। सीधी-सादी गऊ लड़की है। जैसी लड़की आप चाहते थे, बिलकुल वैसी। दुनिया-जहान का कुछ पता नहीं है। यह गऊ पहली बार आपके खूंटे पर बंध रही है। कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए इसे।

…बिंद्रा बाबू ने हाथ जोड़ दिए। बोले- आप भी कैसी बात कर रही हैं भाभी ली…? आप मेरे घर की लक्ष्मी लायी हैं। उसे तकलीफ क्यों होने दूंगा? रत्ती मेरा घर बसाने आई है। हम लोग आज ही मंदिर में भगवान को साक्षी मानकर विवाह कर लेते हैं। बस, आज ही मेरा घर आबाद हो जाएगा।

बीबीजी बोली- और क्या। नेक काम में देरी कैसी।…फिर वे दोनों मुझे मंदिर ले गए। वहां भगवान की मूर्ति के सामने बिंद्रा बाबू ने मुझे अपनी पत्नी स्वीकार किया। हम लोगो ने एक-दूसरे को फूलों की माला पहनाई। उन्होंने मेरी मांग में सिंदूर भरा और मुझे गले लगा लिया। बीबीजी घबराकर बोलीं- बस, बस देवर जी। मंदिर मकें और लोग भी आते हैं। बिंद्रा बाबू ने मुझे यह अंगूठी पहनाई और गले में सुहाग का यह हार डाला। मैंने उनके चरण तो छुए ही, बीबीजी के भी पैर पकड़ लिए जिन्होंने मेरे लिए इतना कुछ किया। मैं सुहागन हो गई।

…बिंद्रा बाबू मुझे घर ले गए। एक साफ-सुथरी कालोनी में था उनका घर। तीन कमरे, बैठक, रसोई, बाथरूम। थोड़ा-सा बरामदा भी था। भीतर ले जाकर उन्होंने मुझे घर की चाबियां सौंप दीं। बोले- आज से यह घर तुम्हारा है। संभालो इसे। तुम अब रत्ती नहीं मेरी रीता हो। रत्ती देहाती नाम लगता है।

अपनी किस्मत पर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था। लगता, जैसे यह सब एक सपना है। उसी नए-नए घर में, नए फर्नीचर और नए बर्तनों के साथ हमने अपनी नई गृहस्थी शुरू की। बिंद्रा बाबू, मुझे बहुत चाहते। बीच-बीच में वे कई दिनों के लिए अपने काम से बाहर जाते। तब मैं बिल्कुल अकेली रह जाती। मुझे काफी बुरा लगता। शिकायत करने पर वे कहते- बाहर नहीं जाऊंगा तो खाएंगे क्या? पैसा तो कमाना ही होगा। उन्होनें मुझे बताया कि वे जायदाद  की खरीद-फरोख्त का काम करते हैं।

…यह तो  मुझे बहुत बाद में पता लगा कि मैं बिंद्रा बाबू की दूसरी पत्नी हूं। मुझे तब बिंद्रा बाबू जैसे देवता पर बहुत गुस्सा आया। लेकिन, मैं कर भी क्या सकती थी। मैं मां बनने वाली थी। मेरे गर्भ में चार माह का शिशु पल रहा था। उन दिनों मैं बेहद खुश थी और उसी खुशी के माहौल में एक दिन बिंद्रा बाबू ने कहा कि बहुत दिनों से एक बात बताना चाहता हूं लेकिन डरता हूं कि कहीं तुम नाराज न हो जाओ। मैंने कहा-  नाराज़ और आपसे…? जिसने मुझे सब कुछ दिया है, उससे मैं कैसे नाराज हो सकती हूं। तब बिंद्रा बाबू ने कहा-  मैं तुम्हारी खुशियां नहीं छीनना चाहता। लेकिन, मैं यह भी नहीं चाहता कि तुम्हारे मेरे बीच कोई बात छिपी रहे। तब उन्होंने मुझे यह बात बताई।

…उन्होंने कहा- वे शादीशुदा हैं। पच्चीस वर्ष की उम्र में उनका विवाह हो गया था। उनकी पहली पत्नी इसी शहर में है। वह दूसरे घर में रहती है उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शहर से बाहर जाने के बहाने प्रायः वे पहली पत्नी के पास चले जाते हैं। उन्होंने बहुत दुःख से कहा कि सब कुछ होते हुए भी उनका घर सूना है। वे निःसंतान हैं। संतान की आशा में ही उन्होंने यह दूसरा विवाह किया है। मेरी गोद भर जाने से अब उनकी आशा पूरी हो रही है।

…वे कहने लगे- वे गुनहगार हैं। लेकिन, संतान का मुंह देखने के लिए वे इस बात को अब तक कह नहीं पाए। उन्हें डर था कि पहली पत्नी के बारे में जानने के बाद पता नहीं कोई महिला उनसे शादी करे या न करे। इसलिए वे चुप ही रहे। फिर उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा कि मैं बिल्कुल निश्ंिचत रहूं। मुझे वे पत्नी का पूरा हक़ देंगे। पहली पत्नी के होने से मेरे लिए उनके प्यार और व्यवहार में कोई अंतर नहीं आएगा।

…उनके व्यवहार में कोई अंतर आया भी नहीं। वे मुझे किसी प्राइवेट अस्पताल में ले जाकर मेरी जांच कराते रहे। अस्पताल में उन्होंने मेरा नाम श्रीमती रीता और अपना अमरजीत बिंद्रा लिखाया। उनका यही नाम है।

…नौ माह बाद मेरा बच्चा पैदा हुआ। उसी प्राइवेट अस्पताल में। गोल-मटोल प्यारा-सा लड़का। तीन दिन बाद वे मुझे घर ले आए। घर आते ही बोले- तुम्हारी दीदी को बच्चे के जन्म से बड़ी खुशी हुई है। कहती है, हमारे वंश का चिराग जल उठा है। वह तुम्हें बधाई देने आ रही है।

…दीदी, मेरा मतलब है उनकी पहली पत्नी को मैंने उस दिन पहली बार देखा। आते ही मुझे उन्होंने बधाई दी और बच्चे को उठाकर छाती से लगा लिया। काफी देर तक उसे पुचकारती रहीं। बिंद्रा बाबू से उम्र में वह छः-सात साल छोटी लग रही थी। उन्होंने बिंद्रा बाबू से पूछा- इनकी देखभाल के लिए क्या इंतज़ाम किया है?

बिंद्रा बाबू बोले- एक नर्स आया करेगी। जच्चा-बच्चा को देखने के लिए। घर के काम के लिए आया का प्रबंध कर रहा हूं। थोड़ा मैं भी देख लूंगा।

वे बोलीं- नर्स, आया कुछ नहीं। मैं देखूंगी। दीदी हूं इसकी। इन्हें देखना मेरी ज़िम्मेदारी है।

…इस तरह बच्चे के जन्म के बाद वह हमारे पास ही आ गईं। घर का सारा काम उन्होंने संभाल लिया। मुझे लगा, मेरे लिए उनके मन में कोई नफ़रत नहीं थी। बच्चे से वह बहुत प्यार करती थी। हर समय गोद में पकड़े रहती। मैं कहती थी कि गोद की आदत पड़ जाएगी, तो वह हंस कर टाल देती। मुझे लगता, संतान नहीं है इसलिए बच्चे पर पूरा प्यार उड़ेल रही है। मुझे क्या पता था हुजूर कि यह सब वह समझ-बूझकर कर रही है। और, बिंद्रा बाबू भी सब जानता था। वह मिली भगत थी उनकी । यह भी मुझे बाद में मालूम हुआ कि उसकी पहली पत्नी का नाम रीता है।

कुछ देर रोने के बाद रत्ती फिर बोली- एक दिन खाना खाने के बाद मेरी आंख लग गई। बच्चा मेरी बगल में सो रहा था। जब आंख खुली तो न वहां बच्चा था, न बिंद्रा, न उसकी बीबी। मैंने काफी देर इंतज़ार किया। लेकिन, वे नहीं लौटे। मैं रोई-चिल्लाई लेकिन उससे क्या होता? पास-पड़ोस में पूछा। लेकिन यहां कोई किसी को भला जानता है? कोई जानता भी है तो बताता नहीं। जब कुछ पता नहीं लगा तो मुझे कुछ लोगों ने थाने में रिपोर्ट लिखाने की सलाह दी। मैंने रो-धोकर रिपोर्ट लिखाई। बिंद्रा बाबू के दूसरे घर का पता मुझे मालूम नहीं था। पुलिस ने हुलिया पूछा तो मुझे जितना मालूम था वह बता दिया।

…भला हो उन पुलिस वालों का। उन्होंने बिंद्रा बाबू और उसकी बीबी का पता लगा लिया है। उसकी कोठी में ले जाकर उनकी पहचान भी करा ली है। मैं रोती-कलपती रही। अपना बच्चा मांगती रही। लेकिन, वे निर्दयी नहीं पसीजे। उन्होंने पुलिस को बयान दिया है कि बच्चा उनका है और वे मुझे नहीं जानते। मैं बच्चे का बहाना बनाकर उनसे पैसा ऐंठना चाहती हूं।…यह झूठ है हुजूर। उन्होंने मेरा बच्चा ले लिया है। मुझे लगता है बिंद्रा ने मुझसे बच्चे के लिए झूठ-मूठ शादी की थी।…मुझे मेरा बच्चा वापस दिला दीजिए…मेरा बच्चा…

वह बुरी तरह रोने लगी। मैंने उसे समझाया और अगले दिन मिलने की सलाह दी। मैंने उसक रहने के ठिकाने के बारे में पूछा तो बोली- अभी तो उसी घर में रह रही हूं हुजूर। लेकिन, अब पता लगा है कि वह किराए पर लिया हुआ था। इस महीने के अंत में उसे छोड़ देना है। फिर कहां रहूंगी, कुछ पता नहीं…

मैंने रत्ती का केस लेने का निश्चय कर लिया। हद है, किस तरह एक भोली-भाली लडकी को बहला-फुसलाकर उसे धोखा दिया गया है। उससे उसका बच्चा छीन लिया गया है। इंसानियत रह ही नहीं गई है।

मैंने केस पर काफी विचार किया और दूसरे दिन रत्ती की याचिका उच्चतम न्यायालय में दाखिल करा दी। डिवीजन बेंच के माननीय न्यायमूर्तियों ने पुलिस को केस की पूरी तफ़शीश करने का आदेश दिया। लेकिन, यह तो आपको पता ही होगा कि अगले दिन इस केस में एक अजीब मोड़ आ गया। श्रीमती रीता बिंद्रा और अमरजीत बिंद्रा ने रत्ती के केस के खिलाफ़ अपनी अपील दायर कर दी कि बच्चे के मां-बाप वे हैं। रत्ती नामक महिला उनके बच्चे पर झूठा हक जता रही है ताकि वह उनकी जायदाद की हिस्सेदार बन सके। अपील में बिंद्रा ने कहा कि रत्ती से उसका किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं रहा है। इसलिए उसका और रत्ती का बच्चा होने की कहानी मनगढ़ंत है। वह उनके घर में सिर्फ एक महरी के रूप में रह रही है।

मैंने रत्ती को इस बारे में बताया तो वह चीख पड़ी- नहीं, नहीं। यह सब झूठ है। वह मेरा बच्चा है।…मेरा और बिंद्रा का बच्चा…मेरा बच्चा दिला दीजिए…

—–बिंद्रा दंपति की अपील के खिलाफ मैंने रत्ती की ओर से न्यायालय में पुनः प्रार्थनापत्र दिया। उसमें रत्ती ने न्यायालय से प्रार्थना की कि बच्चे की असली मां वही है और डाॅक्टरी जांच के प्रमाणपत्रों से यह बात सिद्ध हो सकती है कि बच्चे को उसी ने जन्म दिया है।

लेकिन प्रमाणपत्रों से यह समस्या नहीं सुलझी क्योंकि उनमें मां का नाम श्रीमती रीता बिंद्रा लिखा था- रत्ती बिंद्रा नहीं। रत्ती ने मुझे पहले ही बता दिया था। कि बिंद्रा बाबू ने कहा था, रत्ती देहाती नाम लगता है इसलिए वे शादी के दिन से ही उसे रीता कहने लगे। यही नाम उन्होंने डाॅक्टरी जांच के लिए लिखाया था।

मैं समझ गया कि गहरा षड्यंत्र है। बहुत सोच-समझकर सारा काम किया गया है। डाॅक्टरी प्रमाणपत्रों से तो बच्चे की मां श्रीमती रीता बिंद्रा ही साबित हो सकती थी। इसलिए रत्ती की ओर से मैंने न्यायालय से प्रार्थना की कि पैतृकता का पता लगाने के लिए ‘डी. एन. ए. छाप’ अर्थात् ‘डी.एन.ए. फिंगर-प्रिंटिंग’ से जांच की जाए ताकि असली माता-पिता का पता लग सके। न्यायालय को यह भी बताया गया कि ‘सेंटर फाॅर सेल्युलर एंड मालिक्यूलर बायोलाॅजी’ अर्थात् सी. सी. एम. बी’, हैदराबाद में मद्रास के इसी तरह के एक मामले में वर्षों पहले 1989 में ‘डी. एन.ए.’ छाप की जांच से पांच वर्षीय ‘मेरी’ को कलिअम्मा और पेरूमल की बेटी साबित किया था। उस मामले में आदिवीररामा और उसकी पत्नी कणिअम्मा का उसे अपनी बेटी बताने का दावा झूठा सिद्ध हुआ था। न्यायालय के सम्मुख यह तथ्य भी रखा गया कि पैतृकता का पता लगाने क लिए अब तक खून के नमूनों और वंशागत गुणों की जांच की विधि अपनाई जाती रही है और ‘मेरी’  के केस में भी मद्रास उच्च न्यायालय ने इसी प्रकार की जांच के नतीजों के आधार पर अपना निर्णय लिया। लेकिन, इस विधि की सत्यता केवल 96-97 प्रतिशत है जबकि ‘डी. एन. ए. छाप’  अर्थात् ‘डी. एन.ए  फिंगर-प्रिंटिंग’  की विधि से शत-प्रतिशत सच्चाई का पता लग सकता है। प्रार्थनापत्र में बंगलौर के उस केस का भी उल्लेख किया गया, जिसमें सत्र न्यायालय ने कथित हत्या के एक मामले में हड्डियों के टुकड़ों से निकाली गई मज्जा की ‘डी.एन.ए. छाप’ को कानूनी सुबूत माना।

उच्चतम न्यायालय ने रत्ती की अपील को स्वीकार करते हुए पुलिस को आदेश दे दिया कि विवादास्पद व्यक्तियों के खून के नमूने ‘डी.एन.ए.छाप’ की जांच के लिए ‘डी. एन. ए. फिंगर-प्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स लेबोरेट्री’ मे भेजे जाएं और जांच की रिपोर्ट अगले माह निर्धारित तिथि को न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत की जाए।

पुलिस अधिकारियों ने रत्ती, श्रीमती रीता बिंद्रा, बिंद्रा और बच्चे के खून के नमूने लेकर एक अधिकारी के माध्यम से जांच के लिए प्रयोगशाला को भेज दिए।

मेरा खयाल है, आप मेरी इस बात को समझ रहे होंगे कि इस तरह के मामले में कितनी पेचीदगियां होती हैं। क्यों…? फिर भी शुक्र है कि विज्ञान हम वकीलों की भी मदद कर रहा है। आप ही साचिए, अगर कल की बात होती तो क्या होता?—-

आपको बाइबिल की वह कहानी याद है जिसमें राजा सोलोमन ने बच्चे की असली मां का पता लगाने के लिए तलवार से उसके दो टुकड़े करके आधा-आधा हिस्सा दोनों औरतों को देने का आदेश दिया…? असली मां चीख उठी कि नहीं-नहीं, बच्चे को काटो मत, दूसरी औरत को दे दो। बस इसी बात से असली मां का पता लग गया।

लेकिन, अब ऐसी बात नहीं है। लोग बहुत चालाक हो गए हैं। शर्त लगा लीजिए, अगर आज रत्ती बिंद्रा के सामने बच्चे को काटने को कहा जाता तो दोनों ही चीख पड़तीं कि बच्चे को मत काटो- उसे दे दो! तब…? तब क्या करता न्यायालय…? इसीलिए कह रहा हूं कि विज्ञान हम लोगों की भी मदद कर रहा है। ज्यों-ज्यों विज्ञान की प्रगति हो रही है- सच और झूठ का पता लगाना भी आसान होता जा रहा है। अब तक माता-पिता का पता लगाने के लिए जानते हैं खून के नमूनों और वंशागत गुणों के कितने टैस्ट करने पड़ते थे? करीब 19 टैस्ट। अब हमारे देश की अपनी ‘डी.एन.ए. छाप’ विधि से शत-प्रतिशत सच्चाई का पता लग सकता और जांच की इस विधि को मान्यता मिल चुकी है।

आप सोच रहे होंगे मैं बात को उलझा रहा हूं। नहीं, मैं उसी बात पर आ रहा हूं। रत्ती, रीता बिंद्रा, बिंद्रा और बच्चे की ‘डी.एन.ए. छाप’ के नतीजे न्यायालय में पेश किए गए। जांच की रिपोर्ट से पता लगा कि बच्चे की असली मां रत्ती है। इसीलिए न्यायालय ने आज रत्ती के पक्ष में अपना निर्णय दे दिया है।

लेकिन, जांच की रिपोर्ट से एक नई उलझन पैदा हो गई है। निर्णय में जांच के आधार पर न्यायमूर्तियों ने स्पष्ट किया है कि बच्चे की ‘डी.एन.ए. छाप’ रत्ती की ‘डी.एन.ए. छाप’ से मिलती है जिससे साबित होता है कि वह रत्ती की ही संतान है। लेकिन बच्चे की ‘डी.एन.ए. छाप’ श्रीमती रीता बिंद्रा और श्री बिंद्रा से नहीं मिलती। इसलिए उनका बच्चे से कोई संबंध नहीं है। बच्चे को तुरंत रत्ती के संरक्षण में सौंपने के आदेश दिए गए हैं।

बच्चा तो रत्ती को मिल गया है लेकिन आप समझ रहे हैं क्या हो गया है? इस बच्चे का पिता कौन है…? अगर बिंद्रा बाबू की ‘डी.एन.ए. छाप’ बच्चे से नहीं मिलती तो इसका मतलब है वे इस बच्चे के पिता नहीं हैं। वे इसके पिता नहीं है तो फिर पिता कौन है…?

इसका मतलब समझते हैं आप…? इसका मतलब है रत्ती स्वयं झूठ बोल रही है। उसके बच्चे का पिता कोई और है। फिर वह बिंद्रा के यहां क्यों आई? क्या बिंद्रा ने सचमुच उससे शादी की है या यह सिर्फ रत्ती की गढ़ी हुई कहानी है? क्या वह बच्चे को बिंद्रा का बेटा साबित करके उसकी संपत्ति का वारिस बनाना चाहती थी? या वही सच है जो उसने मुझे बताया…?

अगर वही सच है जो उसने मुझे बताया तो बच्चे का पिता कौन है?

उसने मुझे सब कुछ बताया लेकिन यह बात वह छिपा गई। उसने सोचा होगा इस बात का पता न तो लग सकेगा और न कोई लगाना चाहेगा। उसके मां साबित होते ही बच्चा पैतृक संपत्ति का हकदार हो जाएगा। उसकी परेशानियां सदा के लिए दूर हो जाएंगी। उसे क्या पता था, विज्ञान उसके रहस्य का भंडाफोड़ कर देगा?

लेकिन, क्या बिंद्रा इतना सीधा-सादा आदमी है कि रत्ती के बिछाए हुए जाल में इतनी सरलता से फंस जाए? मुझे तो नहीं लगता। हो सकता है संतान की चाह में उसने बिल्कुल वही किया हो जो रत्ती ने बताया है। यह भी संभव है कि उसने अपनी पत्नी से पहले सब कुछ छिपाया हो और बच्चे के जन्म के बाद उसे सब कुछ बता दिया हो! जायदाद के लिए आखिर कोई वारिस तो चाहिए ही। संभव है, वे दोनों किसी अज्ञात पैतृकता के बच्चे को गोद लेने के लिए राजी न रहे हों और इस बात के लिए सहमत हो गए हों कि बिंद्रा किसी सीधी-सादी औरत से अपनी संतान प्राप्त कर ले और औरत को भगा दे। तब कम-से-कम यह तो पता रहेगा कि बच्चा बिंद्रा का है। वही उसका उत्तराधिकारी होगा। हो सकता है तभी रत्ती जैसी अनजान लड़की से उसने शादी का ढोंग रचाया हो। संतान पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते।

हां, तो अब आप बताइए। न्याय तो हो गया है। मेरा मुवक्किल केस जीत गया है। आपकी सोच के मुताबिक मुझे खुश होना चाहिए। हूं- मैं खुश हूं कि बच्चे की असली मां का पता लग गया है। लेकिन, उसने मुझसे झूठ क्यों बोला कि बच्चे का पिता बिंद्रा है? इसीलिए कि मैं मानवीयता के आघार पर उसका केस लडूंगा? अब बताइए, मैं क्या करूं इस मानवीयता का? ठगा तो मैं गया हूं इस केस में। और, आप मुझे खुश न देखकर हंस रहे थे। आप ही बताइए, क्या मुझे खुश होना चाहिए…? बोलिए, क्या करूं मैं?

रत्ती से मिलूं? एक बार पूछ लूं कि उसने ऐसा क्यों किया? हां, यह ठीक है। वह आखिर मेरी मुवक्किल है। उसके लिए, इतना किया तो उससे यह पूछने का हक़ भी बनता है कि उसने बच्चे के पिता का नाम गलत क्यों बताया?

तो आप भी थोड़ी तकलीफ कीजिए। मेरे साथ रत्ती के घर तक चलिए। यों तो अब क्या घर, भगवान भरोसे हो गई है वह। लेकिन, अभी वहीं गई होगी। और जाएगी भी कहां?

लीजिए, मेरा अनुमान ठीक था। घर पर ही है वह। लेकिन रो क्यों रही है? इसीलिए कि बिंद्रा की संपत्ति का हक नहीं मिल पाया?

– रत्ती! तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला कि बच्चे का पिता बिंद्रा है?

– मैं तो बर्बाद हो गई सरकार। लुट गई। कहीं की नहीं रही मैं।

– यही होना था। झूठ का फल ऐसा ही होता है। मैंने तुम्हें गरीब और सीधी-सादी औरत समझ कर तुम्हारा केस लिया। और, तुमने बिंद्रा की जायदाद पर हक़ जमाने के लिए अपने और किसी गैर आदमी के बच्चे को उसका बेटा साबित करना चाहा?

– नहीं…नहीं सरकार- यह झूठ है। मैंने ऐसा कुछ नहीं सोचा। कुछ नहीं किया। मैंने आपसे जो कुछ कहा, सच कहा। मैंने किसी के लिए कुछ गलत नहीं कहा।…मैं अभागी हूं सरकार। मेरा क्या होगा…? मैं क्या करूं…कहां जाऊं मैं…? किस पाप की सज़ा मिल रही है मुझे…

– पाप तो तुमने किया ही है। किसका बच्चा है यह?

– बिंद्रा बाबू का हुजूर।

– तुम झूठ बोल रही हो। बिंद्रा बाबू का बच्चा नहीं है यह। बोलो किसका है? तुमने मुझे सब कुछ बताया रत्ती, इस बात को क्यों छिपा रही हो? बोलो?

– साब, बच्चा बिंद्रा बाबू का ही होना चाहिए।…अगर नहीं है तो मैं दूसरे के पाप की सज़ा भुगत रही हूं।

– दूसरा कौन? …बोलो रत्ती?

– सरकार, सोनपुर से यहां आने पर मैं तीन दिन बीबी जी के घर में रही थी। उनका आदमी बहुत खराब है…बीबी जी को कुछ पता नहीं हे हुजूर। और, पता भी हो तो उन्हें कोई मतलब नहीं है। इसमें मेरी कोई गलती नहीं है सरकार। पाप कोई और करे और सज़ा मैं भुगतूं? यह कहां का न्याय है?

– ठीक है रत्ती, तुमने मुझे यह बता कर अच्छा किया। मैं अब इस बारे में सोचता हूं।  तुम्हें नारी-निकेतन में रखने की कोशिश करूंगा। और, अपराधी को उसके अपराध की सज़ा जरूर मिलनी चाहिए। मैं नए सिरे से तुम्हारा केस लडूंगा। न्यायालय से उसकी, तुम्हारी और बच्चे की ‘डी.एन.ए. छाप’ से असली पिता का पता लगाने की प्रार्थना करूंगा। इस बच्चे का पिता है और उसका पता लगेगा। तुम धैर्य से काम लो। खुद को और बच्चे को संभालो। तुम्हें न्याय मिलेगा। जरूर मिलेगा…

हां, अब बताइए। अरे, आप तो मायूस हो गए। मैंने तभी आपसे कहा था कि जब तक पूरी बात मालूम न हो, कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। क्यों ठीक कहा था न? अरे साहब, हम भी इंसान हैं। हम भी जानते हैं कि दुनिया में पैसा ही सब कुछ नहीं है। इंसानियत उससे बड़ी है। क्यों…?

_ देवेंद्र मेवाड़ी

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