अंतिम प्रवचन

बाबा सेवक दास धीरे-धीरे जीवानंद के चरण दबाते रहे। बीच-बीच में वे स्वामी जी के कृशकाय शरीर पर नजर डाल लेते। उनका चेहरा मलिन पड़ गया था। आंखें बंद थीं। लगता था जैसे स्वामी जी गंभीरतापूर्वक कुछ सोच रहे हों।

काफी देर बाद उन्होंने बिना आंखें खोले क्षीण आवाज में पूछा- ‘जमना आया? समय कम है सेवक।’

‘आते होंगे स्वामी जी। आप चिंता न करें। बाबा गोकुल दास स्वयं उन्हें लेने गये हैं न?’ बाबा सेवक दास ने चरण दबाते हुए ही उन्हें दिलासा दी।

पिछले तीन दिन से वे न जाने कितनी बार यही प्रश्न पूछ चुके हैं । बाबा सेवक दास सुनते हैं और उन्हें  धीरज बंधाते हैं। मन ही मन अब उन्हें भी चिंता होने लगी है स्वामी जी के बारे में। उनकी ओर देखते हैं तो सारा अतीत याद आने लगता है। इतने वर्षों तक सुख-दुःख में सदा साथ रहने के बाद क्या अब स्वामी जी सचमुच साथ छोड़ जाएंगे? स्वामी जी किसी असाध्य रोग के शिकार हैं- यह तो पिछली बार की विदेश-यात्रा में डाक्टरी जांच से पता लग ही गया था लेकिन इतनी जल्दी रोग यों उभर आएगा इसका अंदेशा नहीं था। तीन दिन पहले अचानक उन्हें बैचेनी अनुभव हुई और उन्होंने तुरंत सेवक दास को अपने नितांत निजी कक्ष में बुलाकर कहा- ‘सेवक, मुझे लगता है समय आ गया है। बहुत बैचेनी है मेरे भीतर। जमना को फौरन बुला लो। किसी को कानो-कान खबर न हो। यह तुम अच्छी तरह जानते हो। गोकुल और माया के अलावा किसी दूसरे को विश्वास में लेने की जरूरत नहीं है। ठीक है? बहुत सावधानी से करना है सबकुछ। समझे सेवक?’

सेवक दास की आंखे भर आईं। तब मुसकराने की कोशिश करते हुए स्वामी जीवानंद ने उसे ढांढ़स बंधाया- ‘तू क्यों उदास होता है रे? तेरा-मेरा साथ थोडे़ ही छूटेगा? हमारा साथ तो बना ही रहेगा?

भरे गले से सेवक दास ने कहा, ‘समझ गया स्वामी जी। आप चिंता न करें।

सब कुछ वैसे ही होगा जैसे आपने तब किया था। जमना को भी बुला ही लिया है। अमेरिका से आने में दो-चार दिन तो लगेंगे ही। तब तक मैं यहां जरूरी काम करवाता हूं।’ फिर थोड़ा हिचकते हुए सेवक दास ने कहा, ‘लेकिन, स्वामी जी आप इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं। संभव है आप ठीक हो जाएं। डाॅक्टर को…’

‘सेवक दास! तुम बौरा तो नहीं गए?’ अचानक कड़े स्वर में जीवानंद चीखे- ‘डाॅक्टर, वैद्य कोई मेरे आश्रम में नहीं आएगा। जो औषधि तुम दे रहे हो, हम वही लेते रहेंगे।’

फिर थके हुए स्वर में बोले, ‘सेवक, मैं जानता हूं। अब बचूंगा नहीं। क्या कुछ नहीं किया है इस काया ने? तुझसे क्या छिपा है रे? अब थक चुकी है मेरी यह काया। इसीलिए कहा- जमना को बुला लो। काम शुरू कर दो। तीन दिन से मैंने भक्तों को भी दर्शन नहीं दिए हैं। कल प्रातः तुम घोषणा करोगे। मैं दर्शन दूंगा और प्रवचन भी। कौन जाने सेवक दास, वही मेरा अंतिम…’ कहकर वे चुप हो गए।

‘चित्त को शांत रखें स्वामी जी। मैं प्रातः घोषणा कर दूंगा।’ सेवक दास ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा।

जीवानंद आश्रम के विशाल कीर्तन कक्ष में हजार से भी अधिक देशी-विदेशी भक्तों की भीड़ ढोलकी, मंजीरे और खड़ताल की ताल पर स्वामी जीवानंद की स्तुति गा रही थी।…जय जीवा स्वामी, जय जीवा स्वामी…बीच-बीच में कोई भक्तिन या भक्त उठकर, अचानक सुधबुध खोकर ‘ट्रांस’ में नाचने लगता। स्वामी जी का जयकार होता और ढोलकी, मंजीरे और खड़ताल की ताल उसमें डूब जाती। तीन दिन से अखंड कीर्तन चल रहा था क्योंकि जब तक दर्शन न होते भक्त जा ही नहीं सकते थे। उनकी आंखें कीर्तन कक्ष के दूसरे छोर पर ऊंचे आसन के पीछे के बंद द्वार पर टिकी थीं। पिछले तमाम वर्षों से प्रतिदिन प्रातः और सायं उसी द्वार से स्वामी जीवानंद आते, भक्तों को हाथ उठाकर अभयदान देते और अपनी ओजस्वी वाणी में संक्षिप्त प्रवचन देकर उसी द्वार से भीतर चले जाते। लेकिन तीन दिन से द्वार बंद था। भक्तों को बता दिया था कि स्वामी जी ध्यान में बैठे हुए हैं और उससे जागने पर दर्शन देंगे। बस, तभी से अखंड कीर्तन चल रहा था।

अगले दिन प्रातः स्वामी जी के सबसे विश्वसनीय सहयोगी बाबा सेवक दास सामने आए और उन्होंने घोषणा की- ‘भक्तजन! जय जीवा स्वामी! सर्वज्ञानी, सदाचारी स्वामी जीवानंद महाराज ध्यान से जाग गए हैं। कुछ क्षणों के बाद वे आप लोगों को दर्शन देंगे। अपनी वाणी से आपको ज्ञान का रसपान भी कराऐंगे। स्वामी जी तीन दिन से ध्यान-मुद्रा में लीन होकर आत्म- विश्लेषण कर रहे थे।       उसके आधार पर उन्होंने अब एक महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया है। “ चोला बदलने का निर्णय। वे अब अपना चोला बदलना चाहते हैं। मैंने उनसे कहा, आप सभी और देश-विदेश में फैले उनके आपकी ही तरह प्रिय हज़ारों देशी-विदेशी भक्तों की ओर से कहा कि स्वामी जी हमें आपकी इस काया से प्रेम है। इससे मोह है हमें क्योंकि हमने तो इसे ही देखा है और इसे ही पूज्य माना है। तो जानते हैं भक्तजन, क्या बोले वे? बोले- मोह से मन को मुक्त कर दो। मेरी काया से मोह कैसा? किसी भी काया से मोह क्यों हो? सत्य तो सिर्फ आनंद है…चरम आनंद। इसलिए उसे खोजो। उसमें डूबो। अपने अस्तित्व को उसमें विलीन कर दो।…फिर कहने लगे- काया में कुछ नहीं रखा है सेवक दास। यह तो आनंद भोगने का एक निमित्त है। काया जितनी युवा रहेगी, उतना ही आनंद रस पा सकेगी। अब मैं इस पुरानी, बूढ़ी काया के बोझ से थक गया हूं। इसलिए चाहता हूं, अपनी आत्मा को नई और युवा काया में रखूं। फिर हंसकर बोले, वह कोई दूसरी काया नहीं होगी सेवक दास। इसी बूढ़ी काया को पुनर्यौवन दूंगा मैं। इसलिए घबराने की बात नहीं है। मैं तो मैं ही रहूंगा। हां, युवा हो जाऊंगा और पहले की तरह अपने देश-विदेश में फैले आश्रमों में जाकर भक्तों को दर्शन और प्रवचन दे सकूंगा। क्या इसमें तुम्हें कोई एतराज है?…मैंने स्वामी जी के चरण पकड़ लिए और कहा- यह तो हम जैसे सेवकों और भक्तों के लिए आप जैसे दिव्य पुरूष का एक और चमत्कार होगा। हमारा अहोभाग्य है कि हम यह चमत्कार स्वयं देख सकेंगे। फिर, नई काया में आप आगामी पीढ़ियों को भी तो ज्ञान का रसपान कराते रहेंगे प्रभु! कोई नहीं जानता भक्तजन कि स्वामी जी की असली उम्र कितनी है। एक बार एक बुजुर्ग भक्त ने मुझे बताया था कि उसे बचपन में किसी वृद्ध भक्त ने बताया था कि स्वामी जी को उसने तब भी वैसा ही देखा था जैसे वे अब हैं। इसलिए कुछ पता नहीं कि वे कितने सौ साल से अपनी इसी काया में हैं। अब अगर वे चोला बदलना चाहते हैं तो हम भक्तों और सेवकों के लिए यह सौभाग्य की ही बात है। काया को जरावस्था से यौवनावस्था या कौमार्यावस्था में पुनः लौटा ले जाना असंभव लग सकता है लेकिन स्वामी जी के लिए भला क्या असंभव है? उनके चमत्कार आप देखते ही रहे हैं…जय जीवा स्वामी!“

उसी जयघोषणा के बीच अचानक स्वामी जीवानंद द्वार पर प्रकट हुए। बाबा सेवक दास ने झपट कर उनके चरण छुए और उनके कंधे पर हाथ रखे स्वामी जी धीरे-धीरे आसन तक आकर उस पर बैठ गए। उन्होंने मुसकराते हुए भक्तों की ओर देखा। भक्त भावातिरेक में ‘जीवा स्वामी जीवा’ की धुन पर नाचने लगे। कुछ देर बाद स्वामी जी की वाणी गूंजी- ‘बैठो मेरे बच्चो! तुम्हें आनंदित देखकर कितनी प्रसन्नता होती है मुझे। लगता है तुमने आनंद का रहस्य पा लिया है। और, आनंद ही सत्य है। तो तुमने सत्य भी पा लिया है। उसे अनुभव करो मेरे बच्चो। यह काया तुम्हें निमित्त के रूप में मिली है। आनंद के सत्य को अनुभव करने के लिए एक निमित्त, एक साधन के रूप में। जो लोग इस रहस्य को नहीं जानते, वे काया से कष्ट ही बटोरते हैं। अगर यह काया प्रसन्न रहती है, आनंदित होती है, आनंद के सागर में गोते लगाती है तो समझो तुम आनंद या सुख के सत्य को पा चुके हो। तुम्हारे जीवन का लक्ष्य सिर्फ सुख होना चाहिए। आनंद और चरम आनंद होना चाहिए। इसे पाने के लिए तुम जो भी मार्ग अपनाओगे, वह उचित ही होगा। इसालिए, आनंद दो, आनंद लो। मेरे जीवन का यही अनुभव है। मेरे अनुभवों का यही सार है। जब इस सत्य से मैं परिचित नहीं था तो मेरी काया ने भी बड़े कष्ट उठाए।…हां, आनंद और सुख पाने के लिए काया का युवा होना आवश्यक है। चरम आनंद का भोग करते हुए इस काया को युवा बना लेना कठिन नहीं है। आनंद के सत्य को पा लेने के बाद काया को युवा बना लेना संभव हो जाता है। मैंने इसलिए यह निश्चय कर लिया है मेरे बच्चो कि मैं इस बूढ़ी काया को युवा बना लूं। जरावस्था की कड़ी और झुर्रीदार केंचुल उतार कर फिर युवा रूप में तुम्हारे सम्मुख आऊं। मै। कुछ दिनों की निर्विकल्प समाधि लगा रहा हूं जिसमें मेरा चोला बदलेगा। पुराना चोला नया बन जाएगा। तब मैं नई स्फूर्ति और नई शक्ति के साथ तुम्हारे पास फिर आऊंगा।…फिर आऊंगा….सुखी रहो।’

स्वामी जी की आवाज थरथराने ही लगी थी कि बाबा सेवक दास ने ज़ोर से कहा- ‘जय जीवा स्वामी!’ और फिर स्वामी जीवानंद के चरणों पर झुक गए ताकि वे धीरे से उनकी पीठ और कंधे का सहारा लेकर उठ सकें। फिर वे उन्हें लेकर द्वार से भीतर चले गए।

कीर्तन के स्वर कीर्तन-कक्ष की दीवारों को कंपाने लगे।

 

डा. सूरजभान उन दिनों भारत के ही एक विश्वविद्यालय के भ्रूण विज्ञान विभाग में अपनी पी-एच.डी उपाधि के लिए अनुसंधान कर रहे थे जब स्विट्ज़रलैंड में कार्ल इल्मेंसी और पीटर होप की जोड़ी ने एक चुहिया की हू-ब-हू वैसी ही ‘कापी’ तैयार की थी। सूरजभान उससे पहले आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के डा. जे.बी. गर्डन के प्रयोग के बारे में पढ़ चुके थे जिन्होंने एक मेंढक की प्रतिलिपि या वैज्ञानिकों की भाषा में कहें तो ‘क्लोन’ तैयार कर लिया था। पढ़ने में कितना आसान लगा था वह। गर्डन ने मेंढ़क का एक अंडा या डिंब लेकर उसके भीतर से न्यूक्लियस निकाल दिया था। फिर मेंढ़क की आंत की एक कोशिका का न्यूक्लियस निकाला और खाली डिंब के भीतर रख दिया। उसे पोड्ढक घोल में रख दिया। न जाने किस अदृश्य शक्ति से वह डिंब बढ़ने लगा। बढ़ते-बढ़ते टेडपोल बन गया!

सूरजभान भी भ्रूण विज्ञान के क्षेत्र में कुछ ऐसा कर दिखाना चाहते थे लोग देखते रह जाएं। उन्होंने इसी दिशा में अपने प्रयोग शुरू कर दिए। पी-एच.डी की उपाधि मिल जाने के बाद वे यह सोच कर बहुत खु्श हुए कि अब कहीं किसी प्रयोगशाला में जमकर काम करेंगे। इल्मेंसी और होप ने गर्डन की ही तकनीक से चुहिया का क्लोन बनाया था। एक भूरी चुहिया के गर्भ से भ्रूण की कोशिकाएं निकालीं। उनका न्यूक्लियस निकाला। फिर काली चुहिया का गर्भाधान के तुरंत बाद का डिंब निकाला। उसका भी न्यूक्लियस निकाल दिया। भूरी चुहिया की भ्रूण कोशिका का न्यूक्लियस इस काली चुहिया के खाली डिंब में रोप दिया और उसे पोषक घोल में बढ़ने दिया। फिर उसे एक सफेद चुहिया के गर्भ में रख दिया। भ्रूण बढ़ता गया और भूरी चुहिया की हू-ब-हू प्रतिलिपि तैयार हो गई।

डा. सूरजभान ने तब ‘नेचर’ पत्रिका में छपी इस प्रयोग की रिपोर्ट को न जाने कितनी बार पढ़ डाला। उन दोनों स्विस वैज्ञानिकों की हिम्मत की वे मन ही मन दाद देते। इसलिए क्योंकि अपने इस प्रयोग के लिए उन्होंने 363 प्रयास किए जबकि सफलता केवल तीन बार मिली। रिपोर्ट पढ़कर कई बार वे बुदबुदा उठते- इसे कहते हैं धैर्य! उन वैज्ञानिकों के इस कथन से भी उनका मार्गदर्शन  ही हुआ कि चुहिया का क्लोन बनाना कठिन नहीं है- कठिन है इतनी सूक्ष्म शल्य क्रिया करना। इसलिए वे निरंतर इस समस्या के हल के बारे में सोचते रहते। सबसे अधिक उत्साहित वे इस बात से थे कि एक स्तनपोषी प्राणी का क्लोन बना लिया गया था, हो सकता है कल मनुष्य का भी क्लोन बना लिया जाए। वे म नही मन सोचते- क्या पता कल ऐसा कुछ वे ही कर दिखाएं। सुविधा मिलने की ही तो बात है। कल तक कौन जानता था कि परखनली शिशु भी तैयार हो सकते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने यह कर दिखाया। इसलिए प्रयोगशाला की सुविधा मिल जाए तो वे जरूर कुछ कर दिखाएंगे। भ्रूण विज्ञान की भावी खोजों और मानव क्लोन तैयार करने के सपने देखते हुए डा. सूरजभान नौकरी के लिए आवेदन पत्र भेजते रहे। समाचारपत्रों के ‘आवश्यकता है’ कालमों को टटोलते रहते। उन्हें लगता समय व्यर्थ ही बर्बाद हो रहा है। इस अमूल्य समय का उपयोग वे अनुसंधान के लिए कर सकते थे।

लाख कोशिशें कीं लेकिन निराशा ही हाथ लगी। पूरा साल बेकार निकल गया। उन्हें अपने आप पर ग्लानि होने लगी। वे अक्सर बेहद परेशान हो जाते। उन्हें लगता नियति उनके साथ क्रूर मजाक कर रही है।

इसी बीच एक अच्छी बात हुई जिससे फिर उनमें उत्साह भर दिया। पी-एच.डी. की डिग्री के लिए उन्होंने जो अनुसंधान किया था उससे संबंधित शोध लेख भ्रूण विज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित  हो गया। डा. सूरजभान उसे लेकर कई संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं  में गए। नामी वैज्ञानिकों से मिले। सभी ने शोध लेख की प्रशंसा की लेकिन नौकरी की व्यवस्था न हो सकी। उसके बाद डा. सूरजभान गुमसुम से हो गए। दाढ़ी बढ़ा ली और अपने आप में ही खोए हुए रहने लगे। परिचित लोगों से बचने लगे।

तभी एक दिन डाक से उन्हें एक नियुक्तिपत्र मिला। एक विश्वविद्यालय के भ्रूण विज्ञान विभाग की एक-वर्षीय अनुसंधान परियोजना में रिसर्च एसोसिएट का पद था। इसके लिए महीनों पहले उन्होंने इंटरव्यू दिया था। लेकिन, जितने इंटरव्यू वे दे चुके थे उनका परिणाम देखते हुए उन्हें इस पद पर भी चुने जाने की कोई आशा नहीं थी। फिर, जितना कुछ करने की उनकी आकांक्षा थी उसके लिए तो यह पद कुछ भी नहीं था। लेकिन, वे क्या कर सकते थे। भारी निराशा, अवसाद, हार के अहसास और अपराध बोध ने उन्हें भीतर ही भीतर तोड़ कर रख दिया था। इसलिए उन्होंने इस अवसर को हाथ से न जाने देने का निश्चय किया।

रिसर्च एसोसिएट के पद पर कुछ माह काम करने के बाद एक दिन अचानक उन्हें अपने पुराने विश्वविद्यालय की ओर से एक पत्र मिला। पत्र के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका के वांशिगटन विश्वविद्यालय की ओर से डाॅ. सूरजभान को भेजा गया आमंत्रण पत्र था। आमंत्रण वांशिगटन  विश्वविद्यालय में आयोजित हो रहे अंतर्राष्ट्रीय भ्रूण विज्ञान सम्मेलन में उनके शोध पत्र को प्रस्तुत करने के लिए भेजा गया था।

इस घटना से डा. सूरजभान के भीतर एक नया उत्साह भर दिया। उन्हें लगा अब भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं। सम्मेलन में भाग लेने के लिए आने-जाने की व्यवस्था पहले उन्हें ही करनी थी। सम्मेलन के आयोजकों ने लिखा था कि वह व्यय उन्हें सम्मेलन के दौरान दे दिया जाएगा। अन्य सभी व्यवस्थाएं सम्मेलन की ओर से की गई थीं। डा. सूरजभान ने बहुत मुश्किल से धन जटा कर आने-जाने के लिए हवाई यात्रा के व्यय की व्यवस्था की।

सम्मेलन में उन्होंने बड़े आत्मविश्वास के साथ अपना शोध लेख प्रस्तुत किया। उससे संबंधित सवालों के सटीक जवाब दिए और कई मुद्दों पर जमकर बहस की। अंत में, अपने अनुसंधान की भावी संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला। फिर अचानक भावुक होकर यह भी कह बैठे कि इस दिशा में वे कितना कुछ करना चाहते हैं लेकिन काम करने के लिए सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

सम्मेलन में अनेक ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों ने व्याख्यान दिए और अपने अनुसंधान परिणामों को प्रस्तुत किया। चुहिया का क्लोन बनाने वाले वैज्ञानिक कार्ल इल्मेंसी और पीटर होप भी सम्मेलन में उपस्थित थे। उन्होंने क्लोन बनाने की दिशा में अपने नए प्रयोगों की जानकारी दी। एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने प्युओं के भ्रूणों से क्लोन बनाने की तकनीक पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया। जार्ज वांशिगटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक जैरी हाल और राबर्ट स्टिलमैन ने मानव भ्रूण से क्लोन बनाने की दिशा में किए जा रहे अपने प्रयोगों के बारे में व्याख्यान दिया।

डा. सूरजभान सम्मेलन के दौरान अनेक वैज्ञानिकों से व्यक्तिगत रूप में मिले। उनसे उनके और अपने अनुसंधान के बारे में खूब चर्चा की। उस युवा भारतीय भ्रूण विज्ञानी में अद्भुत उत्साह और अपने विषय के प्रति इतना समर्पण देखकर उनमें से कई वैज्ञानिक बहुत प्रभावित हुए। डा. हाल और स्टिलमैन से डा. सूरजभान की अच्छी पहचान हो गई। उन्होंने अपनी प्रयोग्याला भी डा. सूरजभान को दिखाई। उसे देखकर डा. सूरजभान चकित रह गए। इतनी सुविधाएं! सोचते रहे- काश ऐसी सुविधाएं, इतने सारे उपकरण उनके पास भी होते!

सप्ताह भर का सम्मेलन समाप्त हुआ। सभी विदेशी वैज्ञानिक अपने-अपने देश को लौट गए। डाॅ. सूरजभान भी भारत लौट आए और परियोजना के काम में जुट गए। सहकर्मी और साथी ‘फाॅरेन रिटर्न’ होने की बधाई देते तो उन्हें नश्तर-सा चुभता। धीरे-धीरे आत्मकेंद्रित होकर वे पहले की तरह लोगों से कट कर रहने लगे।

उनकी अब तक की जिंदगी का वह शायद सर्वोत्तम क्षण था जब उन्हें जार्ज वांशिगटन विश्वविद्यालय की भ्रूण विज्ञान प्रयोगशाला में काम करने का तीन वर्ष का अनुबंध मिला। अनुबंध पत्र में यह भी लिखा था कि अनुसंधान कार्य को देखते हुए अनुबंध को आगे भी बढ़ाया जा सकता है। परियोजना में रिसर्च एसोसिएट के पद पर काम करते हुए उन्हें लगभग एक साल होने ही जा रहा था कि तत्काल त्यागपत्र देकर उन्होंने अमेरिका जाने की तैयारियां शुरू कर दीं।

डा. सूरजभान ने अगले कई वर्षों तक जार्ज वांशिगटन विश्वविद्यालय की सुसज्जित भ्रूण प्रयोगशाला में काम किया। वहां मुख्य रूप से ऐसे दंपतियों की समस्या सुलझाने के प्रयोग किए जा रहे थे जिनमें स्त्रियां एक ही बार गर्भ-धारण कर सकती हैं। प्रयोग सफल होने पर उनके भ्रूण से क्लोन बनाकर उन्हें एक से अधिक संतान प्राप्त करने की सुविधा देना संभव हो सकता था। डा. जैरी हाल और राबर्ट स्टिलमैन दिन-रात इन्हीं प्रयोगों में डूबे रहते। डाॅ. सूरजभान ने भी अपना पूरा ध्यान मानव डिंब पर केंद्रित कर दिया। हाल और स्टिलमैन इस संभावना पर काम कर रहे थे कि जैसे निषेचन के बाद कभी-कभी भ्रूण कोशिका के दो कोशिकाओं में बंट जाने पर अलग-अलग भ्रूणों का विकास होता है और जुड़वां या ‘क्लोन’ बच्चे जन्म लेते हैं, वैसे ही अगर दो कोशिका वाली अवस्था में उन्हें किसी तरह अलग-अलग कर दिया जाए तो उनसे भी दो भ्रूण बन सकते हैं। वे दोनों क्लोन होंगे। दोनों कोशिकाओं को अलग करने के लिए वे किसी कारगर रसायन की खोज कर रहे थे। डा. सूरजभान ने माइक्रो सर्जरी की मदद से चुहिया वाले प्रयोग की तरह मानव की निषेचित डिंब कोशिका में न्यूक्लियस के हेरफेर पर अपने प्रयोग जारी रखे। निषेचित डिंब कोशिका का न्यूक्लियस निकाल कर वे उसी महिला की चमड़ी की सामान्य कोशिका का न्यूक्लियस उसमें रखते। फिर उसे पोषक घोल में रख देते।

सात वर्षों में डा. सूरजभान ने ऐसे न जाने कितने प्रयास कर डाले।

और एक दिन उन्हें सफलता मिल ही गई। वे जिन डिंब कोशिकाओं पर प्रयोग कर रहे थे, उनमें से उन डिंब कोशिकाओं में अचानक विभाजन होने लगा जो एक विशेष पोषक घोल में उन्होंने रखी थीं। विभाजन अर्थात् विकास! भ्रूण का विकास होने लगा। चार और आठ कोशिकाएं बन जाने पर उन्होंने प्रयोग रोक दिया। आठ कोशिकाओं की अवस्था में भ्रूण को किसी भी महिला के गर्भ में बढ़ने के लिए प्रतिरोपित किया जा सकता था।

तभी हाल और स्टिलमैन को साडियम एलिग्नेट की मदद से दो कोशिका वाले भ्रूण की दोनों कोशिकाओं को अलग करने में सफलता मिल गई। उनके प्रयोग के नतीजे प्रकाशित होते ही दुनिया भर में हल्ला मच गया। समाजशास्त्री, नीतिशास्त्री और धार्मिक नेताओं ने ऐसे प्रयोगों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने मानव भ्रूण पर किए जा रहे प्रयोगों को तुरंत बंद करने की मांग की। वैज्ञानिकों के एक वर्ग ने भी इनके खिलाफ आवाज़ उठाई। ऐसे विरोध के कारण ही इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, हालैंड आदि कई दे्य मानव भ्रूण के क्लोन तैयार करने और उनके साथ छेड़छाड़ के अन्य प्रयोगों पर कानूनी रोक लगा चुके थे। ऐसे माहौल में डा. सूरजभान ने अपने प्रयोगों में मिल रही सफलता की फिलहाल घोषणा न करना ही उचित समझा। इससे उन्हें भीतर-भीतर बैचेनी तो बहुत हुई लेकिन उन्होंने मन को किसी तरह समझा लिया और कुछ समय पश्चात लौट कर भारत में रहने का निश्चय किया।

भारत लौटते समय हवाई अड्डे के डिपार्चर लाउंज़ में उनकी मुलाकात एक भारतीय स्वामी से हुई जिन्होंने अपना नाम स्वामी जीवानंद बताया। साथ में बाबा सेवक दास और संन्यासिन मां माया भी थीं। डाॅ. सूरजभान स्वामी जी के नाम से परिचित थे। अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के एक लोकप्रिय अखबार में प्रायः सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक आयोजनों की सूचना और रिपोर्ट प्रकाशित होती रहती थीं। उनमें स्वामी जीवानंद के प्रवचनों और उनके आश्रम के बारे में भी काफी कुछ छपता रहता था। भारतीय होने के नाते वे प्रायः इन आयोजनों के बारे में लिया करते थे। उन्हें पता था, टैक्सास में उनका विशाल आश्रम था जिसमें दुनिया की सर्वोत्तम कारों का काफिला भी था। वे ‘हाईफाई’ स्वामी जी थे। बातचीत में वे काफी प्रभावित करते थे।

स्वामी जी के साथ उनकी काफी बातें हुईं जिनसे उन्हें पता चला के उनके अमेरिका के अलावा यूरोप के कई देशों में भी आश्रम चल रहे हैं, भक्तों की संख्या हज़ारों में है और वे भारत भी आते रहते हैं। भारत में विभिन्न पार्टियों के प्रमुख नेता और बड़े व्यवसायी उनका आशीर्वाद लेते ही रहते हैं। अपनी सफलता के लिए वे उनसे तांत्रिक अनुष्ठान भी कराते हैं। कई अन्य देशों के शासक और राजनयिक भी उनके भक्तों में हैं। बातों ही बातों में स्वामी जी ने उनके बारे में भी तमाम बातें पूछी। उनके संघर्ष और प्रयोगों की दाद दी। डा. सूरजभान को यह देखकर आश्चर्य भी हुआ और अच्छा भी लगा कि धार्मिक व्यक्ति होते हुए भी स्वामी जी ने भ्रूण पर किए जा रहे प्रयोगों की निंदा नहीं की। इस बारे में पूछने पर बोले- ‘हमारे यहां यह सब कुछ होता ही रहा है। इसमें बुराई क्या है? कौरव कैसे पैदा हुए थे? घी के घड़ों में शरीर के एक-एक टुकड़े से ही न? इसलिए भ्रूणों पर प्रयोग करने में कोई बुराई नहीं है।’

फिर वे मुस्कुराकर डा. सूरजभान से बोले- ‘सदियों बाद तुम भी वैसा प्रयोग कर रहे हो। यह प्रसन्नता की बात है। कभी आश्रम में आना। माह भर अब भारत में ही रहूंगा।’

 

स्वामी जीवानंद बेचैनी से बरामदे में टहल रहे थे।

सेवक दास काफी देर तक चुपचाप उन्हें देखता रहा। फिर धीरे से बोला- ‘जय जीवा स्वामी!’

स्वामी जी अपने विचारों में उलझे थे। उन्होंने सुना नहीं। तब सेवक दास ने स्वर थोड़ा ऊंचा करके कहा- ‘जय जीवा स्वामी!’

जीवा स्वामी सहसा ठिठके। हंसकर बोले- ‘अच्छा, तू है सेवक? कब से खड़ा है रे?’

‘हां, स्वामी जी मैं हूं। अभी आया। एक प्रश्न पूछूं स्वामी जी?…

‘पूछो…पूछो सेवक!’

‘चित्त बहुत उदास लगता है….आप किसी उलझन में हैं क्या?’

‘तू मन के भीतर झांक लेता है सेवक। इसी कारण तू मेरा दायां हाथ है। मेरा विश्वस्ततम साथी है।’?

 

‘सेवक दास तो सेवक है, स्वामी जी। मुझ पर आप विश्वास करते हैं और दायां हाथ मानते हैं- यह तो आपकी अनुकंपा है।’

‘अनुकंपा? क्या तेरी कम अनुकंपा रही है मुझ पर? सेवक, तू क्या समझता है मैं सब कुछ भूल गया हूं? तेरे बिना आज मैं यहां होता?’

सेवक दास ने चौंक कर चारों ओर देखा। कोई नहीं था। जीवानंद समझ गए। बोले- ‘चलो। मेरे निजी कक्ष में चलते हैं। उलझन में था, तूने ठीक कहा। फिर तूने भी ऐसी बात छेड़ दी है…चल, भीतर चल…’

स्वामी जीवानंद की अनुमति के बिना उनके निजी कक्ष में जाना वर्जित था। वहां एकांत में सेवक दास ने फिर कहा- ‘आनंद और सुख भोगने का गुरु-मंत्र देने वाले चेहरे पर उलझन और मलिनता तो आनी ही नहीं चाहिए…इसलिए चौंक उठा था कि इतने वर्षों बाद आज फिर वही चिंता, जिसे चेहरे पर से हमने उसी दिन पोंछ दिया था जमना, जिस दिन तुम जमना लाल से जीवानंद और मैं सोबरन प्रसाद से सेवक दास बना था। तुम्हें देखकर मैं थोड़ा डर गया था कि कहीं हमारा मुखौटा आज 20 साल बाद ढीला तो नहीं पड़ रहा है।…सच मानो तो जमना पिछले कुछ हफ्तों से ही मैं तुम्हारे भीतर हल्की बैचेनी देख रहा हूं। क्या हुआ है तुम्हें?’

‘ठीक कह रहे हो सोबरन। मैं सचमुच परेशान हूं। पिछले 25 वर्षों में ऐसी बेचैनी मुझे कभी नहीं हुई। लेकिन अब…अब मन अचानक भविष्य के बारे में सोच-सोचकर परेशान होने लगा है। तुझे मालूम है, जिस दिन जीवन में कुछ कर दिखाने की कसम खाकर तू और मैं घर छोड़कर भाग आए थे उस दिन लक्ष्य केवल कुछ बन जाना था।….और, कुछ बन जाने की होड़ में हमने क्या-क्या नहीं किया था सोबरन…कभी भूल सकोगे वह सब? भूख क्या होती है यह तभी हमने जाना था। याद है, कई बार तीन-तीन दिन तक खाने को कुछ नहीं मिला था? तब जीवन का लक्ष्य केवल भोजन बन गया था। पेट भरने के लिए क्या-क्या तिकड़में नहीं कीं हमने? हर समय सिर पर खतरा मंडराता रहता था। कई बार लोगों की और पुलिस की मार का भी स्वाद चखा था न? भूले नहीं होगे यह सब सोबरन।…आज जब भी एकांत में आंखें बंद करके बैठता हूं- अतीत फिल्म के दृश्यों की तरह दिखाई देने लगता है। सब कुछ याद आने लगता है…तुझे याद है, एक बार तीन साधू आए थे। हम दो दिन से भूखे थे। हमारी आंखों के सामने लोग उन साधुओं को बिना मांगे दक्षिणा दे रहे थे। भोजन के लिए अनुरोध कर रहे थे…उसी दिन तो हमने स्वामी बन जाने का निश्चय किया था, क्यों? दूसरे कामों में हर समय खतरा बना रहता था जबकि इस काम में श्रद्धा भी थी, आदर और सम्मान भी। कितना सही निर्णय लिया था हमने उस दिन। जहां कोई कुछ देने को तैयार नहीं था, यह सफेद चोला पहनते ही सब कुछ स्वयं मिलने लगा। उस दिन से चेहरे पर उलझन और चिंता को न उभरने देने का निश्चय किया था हमने।…तुम ठीक कहते हो…फिर सब कुछ कितनी तेजी से बदलता गया- यह याद आने पर आश्चर्य होता है। सच पूछो तो सोबरन, अगर वह एम.एल.ए. प्रत्याशी न मिला होता तो हम आज भी भटक रहे होते। हमारी भविष्यवाणी, हमारे आशीर्वाद और अनुष्ठानों को ही उसने अपनी सफलता का मूल कारण मान लिया था न? मंत्री बनते ही उसने हमें अपना गुरु घोषित कर दिया था। हमारी अदृश्य शक्तियों और क्षमताओं का प्रचार तो उसी ने किया क्यों? फिर तो भक्तों और भक्तिनों की कतार लगती ही चली गई…जिले से राज्य की राजधानी और फिर केंद्र तक हमारे सूत्र जोड़ने का श्रेय भी उसी को जाता है…सत्ता के गलियारों में हमारी ख्याति उसी ने फैलाई…भला हो उसका। इसका लाभ क्या उसे भी कम मिला? उसके साथ हम और हमारे साथ वह आगे बढ़ा।…अब देखो आज क्या नहीं है हमारे पास? भारत, अमेरिका और यूरोप में हमारे आश्रम की शाखाएं फैली हुई हैं। हजारों देशी-विदेशी भक्त हैं जो हमारे लिए जान भी दे सकते हैं। करोड़ों की संपत्ति है। स्विस बैकों में अथाह धन भरा पड़ा हुआ है। और, क्या चाहिए सेवक? नहीं, सोबरन?’

‘तभी तो कह रहा हूं जमना कि फिर चिंता क्यों? क्या परेशानी है तुम्हें?’

‘भविष्य के बारे में सोचा है कभी तुमने? बड़ा भय लगता है सोबरन…हमें वैराग्य तो हुआ नहीं है और न हमने संन्यास की कोई विधिवत दीक्षा ही ली है। हमारे भीतर तो आज भी वही जमनालाल जिंदा है। भूखा, प्यासा, परेशान जमनालाल, जिसके पास कुछ नहीं था और जिसके भीतर सब कुछ पाने की भयानक भूख थी। उसी भूख ने इतनी अकूत संपदा जुटा दी सोबरन। लेकिन, आगे इसका क्या होगा?’

‘आगे?’

‘हां सोबरन। मेरे बाद इस साम्राज्य, धन और संपत्ति का क्या होगा?’

‘इससे मोह…’

‘मैंने कहा न कि जमनालाल अभी जिंदा है और जिंदा रहेगा। इसे मैंने जुटाया है, इसलिए यह मेरा रहेगा। इससे मेरा मोह टूट नहीं सकता सोबरन।’

‘लेकिन मोह तो तोड़ना ही होगा।’

‘मैंने कहा ना, संन्यासी नहीं हूं मैं और न तुम हो। इस छद्म को बनाए रखकर हम आगे भी सुख भोगते रहेंगे। लेकिन, उसके बाद? इस क्षेत्र में सब कुछ अच्छा है लेकिन कोई वारिस न होना बहुत दुखद है। विवाह और संतान की बात सोच भी नहीं सकते। फिर क्या होगा?’

‘शिष्यों में से किसी को उत्तराधिकारी बना सकते हैं।’

‘सब लड़ मरेंगे सोबरन। तुमसे क्या छिपा है? स्वयं मेरी जान को खतरा नहीं बना हुआ है क्या? पिछली बार उन तीन युवकों को चाकू-पिस्तौल के साथ तुम्हीं ने गिरफ्तार करवाया था ना? और हां, तुम क्या समझते हो अगर तुम्हें उत्तराधिकारी घोषित कर दूंगा तो कुछ नहीं होगा? हमारे आश्रमों की व्यवस्था कर रहे कई संन्यासी और भक्त संपत्ति पर आंख गड़ाए हुए हैं सोबरन। इतनी संपत्ति किसी का भी मन पलट सकती है। तू तो मन को इतनी जल्दी पढ़ लेता है। जानता ही होगा, क्यों?’

‘जानता हूं जमनालाल। लेकिन कोई और रास्ता भी तो नहीं है।’

‘है। या शायद हो सकता है। तुझे याद है, वांशिगटन से लौटते समय हवाई अड्डे पर एक वैज्ञानिक मिला था हमें?….क्या नाम था….हां, सूरजभान।’

‘डाॅ. सूरजभान।’

‘हां वही। कहता था वह जो प्रयोग कर रहा है उससे किसी भी मनुष्य की प्रतिलिपि बनाई जा सकती है। प्रतिलिपि को कुछ कहा था उसने…’

‘क्लोन जैसा कुछ कहा था।’

‘हां, क्लोन ही कहा था। बातों-बातों में उससे मैंने कई चीजें पूछ ली थीं। उसका कहना था कि उसे अपने प्रयोग में सफलता मिल चुकी है लेकिन मानव भ्रूण पर किए जा रहे प्रयोगों का इस समय अमेरिका में भारी विरोध हो रहा है। इसलिए अपने अनुसंधान के परिणाम वह फिलहाल छपा नहीं रहा है। विरोध के वातावरण में उसकी सफलता दब जाएगी। मैंने उसका उत्साह बढ़ाने के लिए कह भी दिया था कि हमारे देश में तो यह सब कुछ प्राचीन काल में होता ही रहा है। कौरव ऐसे ही पैदा हुए थे। उसे मैंने आश्रम में आने के लिए भी कहा था। लेकिन अब तक तो आया नहीं। सोबरन, उसके भीतर बड़ा उत्साह है। वह कुछ कर दिखाना चाहता है। कर तो चुका है लेकिन उसके दुर्भाग्य से इस समय विरोध की लहर चल रही है।…हो सकता है यह हमारे भाग्य से हुआ हो। उसे अगर अवसर दिया जाए तो वह अपने प्रयोग को पूरा करना चाहेगा। मतलब, अपने अनुसंधान की जो कुछ चाहेगा, हम उसे देंगे। धन, सुविधा-सभी कुछ। अगर वह क्लोन बना देता है तो फिर मेरी समस्या हल हो जाती है- उत्तराधिकारी की समस्या।’

‘लेकिन, क्या आपकी गद्दी उसे संभालने दी जाएगी? उसका विरोध नहीं होगा? उसकी जान के लिए खतरा नहीं होगा?’

‘किसकी जान का खतरा सोबरन? किसका विरोध? वह तो मैं ही हूंगा ना? मैं ही अपना उत्तराधिकारी!’

‘लेकिन उम्र में तो वह छोटा होगा ना आपसे?’

‘हां होगा। लेकिन, कौन? मैं ही ना?’

‘यह पहेली नहीं समझा मैं।’

‘समझने की कोशिश कर सोबरन। मैं ही युवा हो जाऊंगा। और, तू बताएगा सभी सेवकों और भक्तों को कि मैंने अपनी काया को युवा बना लिया है। तू ही बताएगा उन्हें कि मैंने समाधि ले ली है- निर्विकल्प समाधि और उसमें अपनी काया को युवा बनाकर मैं अपने सेवकों और भक्तों के पास लौट आवूंगा….मुझे तब तू चुपचाप गायब करेगा और मेरी प्रतिलिपि को आसन पर बिठाएगा। भक्तों के सम्मुख लाएगा।’

सोबरन की आंखें फटी रह गईं। इतनी दूरदृष्टि! उसने अभिभूत होकर जमनालाल के चरण पकड़ लिए और बोला- ‘मैं मान गया आपको। कितनी दूर की सोचते हैं आप स्वामी जी। हम सब तो केवल आपके सोच का खा रहे हैं। आज जो कुछ हमारे पास है वह आपके सोच की उपज है। धन्य हैं आप।’

‘लेकिन, यह काम बिल्कुल गोपनीय ढंग से होगा। इसके बारे में किसी को कुछ भी मालूम नहीं होना चाहिए अन्यथा तुम अच्छी तरह जानते हो कि क्या हो सकता है। अभी किसी और को विश्वास में लेने की जरूरत नहीं है। यह आगे देखेंगे कि क्या किसी और को इस काम के लिए विश्वास में लेने की आवश्यकता है या नहीं। तुम डाॅ. सूरजभान से मिलने अकेले जाओगे। उससे बिल्कुल अकेले ही बात करोगे और मेरी ओर से यहां आश्रम में आने का निमंत्रण दोगे। बाकी बातें यहां मैं स्वयं करूंगा। हां, अगर वह आने में रुचि न दिखाए तो उसे प्रलोभन देना कि स्वामी जी आपके अनुसंधान के बारे में बातें करना चाहते हैं। इसके लिए आपकी हर तरह से मदद करना चाहते हैं। मैं जानता हूं, उसके भीतर प्रयोग पूरा करने की बेचैनी है। वह जरूर आएगा।’

अगली सुबह सेवक दास डाॅ. सूरजभान से मिलने चला गया।

 

डा. सूरजभान को स्वामी जीवानंद से मिलने में कोई रुचि नहीं थी। सेवक दास ने उन्हें वांशिगटन  से लौटते हुए हवाई अड्डे पर स्वामी जी से मुलाकात की बात याद दिलाई। उन्हें यह सब याद भी आया लेकिन स्वामी जी से मिलने का प्रयोजन उनकी समझ में नहीं आ रहा था। तब बाबा सेवक दास ने कहा- ‘आपसे मिलने के बाद से ही स्वामी जी अक्सर कहते हैं कि जीवन में सफल होने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। इसके लिए आपका उदाहरण देते हैं। वे कहते रहते हैं कि अगर सुविधा मिले तो आप शरीर के सूक्ष्म अंश से संपूर्ण व्यक्ति तैयार कर सकते हैं। क्या ऐसा चमत्कार आप सचमुच कर सकते हैं?’

‘इसमें चमत्कार क्या है? चमत्कार तो आप लोगों का क्षेत्र है,’ हलके व्यंग्य के साथ डाॅ. सूरजभान ने कहा। फिर बोले- ‘वैज्ञानिक प्रयोगों का पुख्ता आधार होता है। वे वैज्ञानिक नियमों के अुनसार किए जाते हैं। इसलिए हम लोग कोई चमत्कार-वमत्कार नहीं करते, सिर्फ़ खोज करते हैं।’

‘उसी के बारे में स्वामी जी से बात करना चाहते हैं। जानना चाहते हैं जिस तरह की खोज आपने जार्ज वांशिगटन  विश्वविद्यालय में की है, क्या यहां भी कर सकते हैं? इसके लिए वे हर तरह की सहायता करने को तैयार हैं।’ बाबा सेवक दास ने बात आगे बढ़ाई।

डाॅ. सूरजभान पर इस बात का असर पड़ा। वे कुछ सोचने लगे। फिर बोले- ‘अच्छा, उनसे कहिए, मैं परसों उनके पास पहुंच जाऊंगा।’

डाॅ. सूरजभान से स्वामी जी ने उनकी खोज के बारे में विस्तृत बातचीत की और अपने वाक्चातुर्य से उन्हें खूब उत्साहित किया। उन्हीं के काम की याद दिला-दिलाकर उन्हें उसे वास्तविकता में बदलने की राय दी। डाॅ. सूरजभान ने कहा कि फिलहाल अमेरिका में वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते। तब स्वामी जी ने समझाया- ‘तो भारत मे कीजिए। चुपचाप कीजिए ताकि किसी को पता भी न लगे। और आपके अनुसंधान की सच्चाई की भी परख हो जाए।’

डाॅ. सूरजभान ने कहा- ‘ऐसा यहां कैसे संभव होगा?’

‘क्यों नहीं होगा? आप चाहें तो उपकरण विदेश से मंगा लीजिए। अपनी प्रयोगशाला बना लीजिए। या किसी निजी ‘जनन केंद्र’ में हो सकता है तो वहां कीजिए। आर्थिक सहायता के लिए मैं आपके साथ हूं।’

डाॅ. सूरजभान की आंखे चमक उठीं। बोले- ‘उपकरण और रसायन आदि मंगाने में तो काफी समय लग जाएगा। लेकिन दूसरा रास्ता भी हो सकता है। मैं भ्रूण तो वहीं जाकर तैयार कर सकता हूं। फिर उसे लेकर लौट आऊं और यहां किसी महिला के गर्भ में उसका प्रतिरोपण कर दिया जाए तो क्लोन यहीं नौ माह बाद पैदा हो जाएगा। इसमें समय की काफी बचत हो जाएगी। लेकिन, आपकी इसमें क्या रुचि है? आप मेरी आर्थिक मदद क्यों करना चाहते हैं? आपको क्या मिलेगा इससे?’

‘इतने महत्त्वपूर्ण प्रयोग में आपकी मदद करने का सुख और…अपना क्लोन।’

‘अपना क्लोन?’

‘हां मेरा क्लोन। आपको तो किसी-न-किसी का क्लोन बनाना ही है। तो, मैंने सोचा क्यों न मैं स्वयं इसके लिए आपसे अनुरोध करूं।…हम सन्यासी पल-पल बढ़ता जीवन और देख भी कहां सकते हैं? आपके लिए भी अच्छा रहेगा- प्रयोग की व्यावहारिक सफलता का पता भी लग जाएगा और ‘क्लोन का क्या होगा’ की समस्या भी नहीं रहेगी। हमारे विशाल परिवार का एक सदस्य वह क्लोन भी बन जाएगा। क्यों ठीक है ना?’

डाॅ. सूरजभान ने थोड़ी देर सोचा। प्रस्ताव बहुत अच्छा था। कहीं किसी तरह का कोई झंझट नहीं। प्रयोग भी पूरा हो जाना था और क्लोन की कोई जिम्मेदारी भी नहीं लेनी थी। ऐसा अवसर तो मुश्किल से ही मिल सकता है। उन्हें तो सिर्फ प्रयोग कर देना है, बस।…यही सोचते हुए उन्होंने प्रयोग करने का निर्णय ले लिया। बोले- ‘ठीक है स्वामी जी, मैं तैयार हूं। यह काम चुपचाप होगा, इसलिए इसकी जानकारी किसी और को नहीं होनी चाहिए। मैं नहीं चाहता कि किसी तरह का कोई बखेड़ा खड़ा हो।’

‘आप ठीक कहते हैं। हमारी ओर से यह बिल्कुल गोपनीय काम है। इसकी जानकारी सिर्फ उसे होगी, जिसे आप इस प्रयोग में शामिल करेंगे। मेरे अलावा मेरे विश्वस्त साथी सेवक दास को इसकी जानकारी रहेगी। क्या और किसी की जरूरत पड़ेगी?’

‘हां, एक महिला की आवश्यकता होगी जो अपनी कोख में क्लोन को पनपने दे और समय आने पर उसे जन्म दे सके।’

‘तो फिर उस महिला की देखभाल और उस पर नज़र रखने के लिए मेरा एक और विश्वस्त साथी रहेगा। इस काम की खबर इसके अलावा हवा को भी नहीं होगी।’

‘गर्भ में क्लोन के भ्रूण का प्रतिरोपण करने के लिए किसी ‘फर्टिलिटी सेंटर’ में उस महिला की माह भर जांच होगी और मासिक चक्र देखकर सही समय पर भ्रूण का प्रतिरोपण कराना होगा। यहां हो पाएगा यह काम?’

स्वामी जीवानंद ने इसमें पहचाने जाने का खतरा देखा। इसलिए कहा- ‘लगता है वह सारा काम वहीं अमेरिका में कराना ठीक रहेगा।  किसी को पता भी नहीं लगेगा।’

‘हां, वहां मैं अपने प्रयोग के ही भाग के रूप में सब कुछ करा सकता हूं। भ्रूण के प्रतिरोपण के बाद जीवित रहने और सामान्य रूप से बढ़ने का अध्ययन भी इस तरह हो जाएगा।’

‘तो ठीक है। हम लोग इसी सप्ताह अमेरिका पहुंच जाएंगे। टैक्सास के अपने आश्रम में। आप कब पहुंचेंगे?’

‘उसी फ्लाइट से मैं भी चलूंगा।’

‘तो ठीक है। हम जाने की व्यवस्था करते हैं। आपको सूचना मिल जाएगी।’ स्वामी जीवानंद ने भारी संतोष से कहा।

डा. सूरजभान के जाने के बाद स्वामी जीवानंद सोच में पड़ गए। सोचने लगे- महिला कौन? अपनी तमाम सेविकाओं के बारे में सोचा। घूम-फिर कर एक ही नाम पर विचार अटक जाते- माया मां। अंत में स्वामी जीवानंद ने उन्हें ही अपनी ‘जननी’ बनने का गौरव देने का निश्चय किया। उनसे उन्होंने कहा- ‘मैं युवा काया में नया जन्म लेना चाहता हूं। लेकिन, चाहता हूं कि मेरे जन्म में काम, यौन और भोग-लिप्सा की छाया न पड़े। मैं जन्म लेना चाहता हूं- पीपल की पवित्र डाली से उगे पूर्ण वृक्ष की तरह। मृत्युलोक में पुनः नई काया में आने के लिए मुझे जड़ों का संबल दो जननी! मैं तुम्हारे गर्भ से पैदा होना चाहता हूं, तुम्हारे ही जीवन रस पर पलकर तुम्हारे अंक में खेलना चाहता हूं। मुझे अपने शिशु के रूप में स्वीकार करो माया मां!’

मया मां यह सब सुनकर अवाक् रह गई। सहसा कुछ समझी नहीं। स्वामी जीवानंद ने तब उसे समझाया कि वे बिना किसी यौन-विधान के उसकी कोख से जन्म लेना चाहते हैं। उसे सचमुच अपनी मां बनाना चाहते हैं। उनके नए जन्म में उनका परम भक्त डाॅ. सूरजभान उनकी मदद कर रहा है। फिर उन्होंने माया मां को विस्तार से समझाया और उससे त्याग की प्रार्थना की। माया मां से जीवानंद की कुंवारी मां बनने का त्याग। मां के रूप में शिशु जीवानंद को पाल-पोसकर बड़ा बनाने और उचित शिक्षा दिलाने का त्याग। स्वामी जी के लिए कुछ भी कर सकने वाली, समर्पित सेविका माया मां ने इसे स्वयं पर स्वामी जी की अनुकंपा ही माना। सैकड़ों सेविकाओं में से उन्होंने अपनी जननी बनने के लिए केवल उसे ही चुना। उसने अपनी स्वीकृति दे दी। तब स्वामी जीवानंद ने उसे इस ‘अनुष्ठान’ की गोपनीयता का संकल्प दिलाया। उसके बाद उन्होंने जब अचानक माया मां के चरण छू लिए तो उनके प्रति श्रद्धा से उसकी आंखों से आंसुओं की धार फूट पड़ी।

वांशिगटन पहुंचने के बाद तीसरे दिन डाॅ. सूरजभान ने स्वामी जीवानंद को फोन किया और महिला के साथ आने को कहा। अपनी प्रयोग्याला में उन्होंने डाॅ. जीवानंद की बांह से मांस का सूक्ष्म अंश निकालकर प्रयोग के लिए सुरक्षित रख लिया। फिर माया मां के साथ वे लोग ‘फर्टिलिटी सेंटर’ में गए जहां डाॅ. सूरजभान ने माया मां की पूरी जांच के लिए व्यवस्था करा दी। उन्होंने माया मां के गर्भ मे भ्रूण के प्रतिरोपण का सही समय बताने के निर्देश  दिए।

माह भर बाद ‘फर्टिलिटी सेंटर’ ने 20 से 25 तारीख का समय प्रतिरोपण के लिए उपयुक्त बताया। अगले माह तीसरे सप्ताह में डा. सूरजभान ने अपनी तकनीक के अनुसार एक सद्यः  निषेचित डिंब का न्यूक्लियस निकालकर उसमें स्वामी जीवानंद के शरीर की कोशिका का न्यूक्लियस रोप दिया। और, आठ कोशिकाओं का हो जाने पर उसे माया मां के गर्भ में स्थापित करा दिया।

भ्रूण सामान्य रूप से बढ़ने लगा। तब स्वामी जीवानंद ने अपनी योजना के अनुसार माया मां के रहने और उसकी पूरी देखभाल के लिए चुपचाप लंदन में व्यवस्था करा दी। बाबा गोकुल दास को पूरी व्यवस्था पर नजर रखने और गोपनीयता बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंप दी।

नौ माह बाद लंदन के एक क्लिनिक में स्वामी जीवानंद के क्लोन शिशु का जन्म हुआ। उस समय वहां स्वामी जीवानंद, डाॅ. सूरजभान, बाबा सेवक दास और बाबा गोकुल दास उपस्थित थे। स्वामी जीवानंद ने डाॅ. सूरजभान से हंसकर कहा- ‘लो, डाॅक्टर सूरजभान, आपकी खोज तो पूरी हो गई। दुनिया जाने-न-जाने लेकिन आप तो अब जान गए कि आपने आदमी का क्लोन बना लिया है…जो आपके सामने आपकी महान खोज से अनजान हाथ-पैर हिला रहा है। बधाई हो! बस इतनी प्रार्थना है कि इसे गोपनीय परीक्षण ही मानते रहें। आज के बाद आप इस प्रयोग को भूल जाएंगे। इस बारे में जैसा पहले से ही तय है- न कुछ कहना है, न लिखना है। आपको इसकी पूरी कीमत दी जाएगी। मेरे सेवक आपकी सेवा में कोई कमी नहीं रखेंगे। आप चाहेंगे तो इस बच्चे से मिल भी सकेंगे, लेकिन इस तरह कि जैसे इसे पहली बार देख रहे हों। आज से ही यह शिशु हमारे परिवार का सदस्य है।’

डाॅ. सूरजभान अपनी उस अनुसंधान रचना को काफी देर तक बड़े ध्यान से देखते रहे। फिर स्वामी जीवानंद से बोले- ‘इसमें अपना चेहरा देखिए स्वामी जी। जन्म के समय आप ऐसे ही रहे होंगे- बिल्कुल ऐसे ही। यही नाक-नक्श।’ स्वामी जीवानंद 50 वर्ष पहले के जमना को देखने लगे। सहसा उन्होंने पूछा- ‘इसका नाम? इसका नाम क्या होना चाहिए सेवक दास? तुम्हीं रखोगे इसका नाम।’

‘जमना। जमना लाल।’

‘ठीक है, जमना ही ठीक रहेगा। जय जमना! तुम्हारे मुंह से यही पहला नाम निकला है- यही रहेगा।’ स्वामी जी ने कहा और गौर से सेवक दास की ओर देखा। बाद में स्वामी जीवानंद ने बाबा गोकुलदास के साथ अकेले में बातें करके पूरी व्यवस्था का जायज़ा लिया। सब कुछ ठीक था।

स्वामी जीवानंद समय-समय पर लंदन जाकर उन लोगों से मिलते रहते थे।

माया मां से वे अक्सर कहा करते थे कि मां, मेरे दो शिशु हैं- एक मैं और एक जमना। माया मां के लिए यह नया जीवन था। जो वह वैरागिन बनने से पहले तक नहीं पा सकी थी, वह अकस्मात उसे अब मिल गया था। वह जमना में ही जैसे खो गई। धीरे-धीरे जमना बड़ा होने लगा।

माया मां ने जमना से स्वामी जीवानंद का परिचय उनके आदेश के अनुसार ‘स्वामी जी’ के ही रूप में कराया था। वे आते और जमना से खूब बातें करते। उनके आश्रमों, सेवकों और देश-विदेश में फैले उनके शिष्यों के बारे में उसे माया मां से पता लगता रहता था। समझ आने पर जमना ने पिता के बारे मे उसे माया मां से पता लगता रहता था। समझ आने पर जमना ने पिता के बारे में भी काफी समय तक पूछा। इसके उत्तर में माया मां ने उसे सदा यही बताया कि स्वामी जी ही उसके सर्वस्व हैं- माता, पिता, बंधु और सखा सभी कुछ। वह उसे बताती कि उन्हीं की अनुकंपा से उसका जन्म हुआ है। बड़ा होकर वह जब जन्म का जीव विज्ञान समझने लगा तो उसने मन ही मन अनुमान लगाकर अपने प्रश्नों का समाधान कर लिया। फिर इस बारे में उसने कभी नहीं पूछा।

अवकाश के दिनों में वह बाबा गोकुलदास के साथ यूरोप, अमेरिका और भारत में स्थित उनके विभिन्न आश्रमों में भी आने-जाने लगा। शहरों की भारी भीड़-भाड़ और कोलाहल से दूर शांत-एकांत आश्रमों का वातावरण उसे बहुत अच्छा लगता। वहां उसे बिल्कुल दूसरी ही तरह का जीवन दिखाई देता। इस तरह स्वामी जीवानंद के विभिन्न आश्रमों और वहां की जीवन पद्धति से भी जमना अच्छी तरह परिचित होने लगा।

अध्ययन पूरा करके जमना ‘इंजीनियर जे. लाल’ बन गया। कंप्यूटरों में उसकी गहरी रूचि थी इसलिए उसने इसी क्षेत्र में उपाधि ली और एक प्रसिद्ध अमेरिकी कंप्यूटर साॅफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर बन गया।

जब से स्वामी जीवानंद को पता लगा कि वे असाध्य रोग से पीड़ित हैं और ठीक नहीं हो सकेंगे, तभी से वे भावी योजना बनाने में जुट गए। एक-एक बात अपने विश्वस्त सेवक बाबा सेवक दास को बताते ताकि कहीं कोई गलती न हो। भक्तों और सेवकों के देखते-देखते एक बार फिर जमना लाल जीवानंद का युवा चोला प्राप्त कर ले, बस यही उनकी अंतिम इच्छा थी। जमना लाल अपने जीवन के 27 वर्षों में उनके काफी निकट आ चुका था और उनके ही आश्रम-परिवार का सदस्य  होने के कारण उनका बहुत आदर करता था। स्वामी जीवानंद को विश्वास था कि जमना उनका उत्तराधिकारी बनना अपना सौभाग्य समझेगा। देश-विदेश में फैले इतने आश्रमों की सारी संपत्ति और उनके खातों में जमा अपार धनराशि का स्वामी बनना भला कौन अपना सौभाग्य नहीं समझेगा- उन्होंने सोचा।

स्वामी जीवानंद का संदेश पाकर जमना लाल और माया मां गोकुलदास के साथ भारत लौटे और सीधे स्वामी जी के पास पहुंचे। बाद में स्वामी जीवानंद ने बाबा सेवक दास के साथ जमना लाल को अपने निजी कक्ष में बुलाया और उसे पास बुलाकर बोले- ‘‘मैं जो कुछ कहने जा रहा हूं उसे ध्यान से सुनो जमना। मैं 27 साल से अपने मन में एक सपना लेकर चल रहा हूं। तुम्हें अच्छी तरह मालूम है, यहां भारत और अमेरिका व यूरोप में मेरे कितने आश्रम हैं। तुमने उनकी व्यवस्था पर भी ध्यान दिया होगा और उनमें मौजूद संपत्ति पर भी। टैक्सस के आश्रम में तुमने चुनिंदा कारों का काफ़िला भी देखा है। बाकी आश्रमों में भी किसी चीज की कमी नहीं है। हां, शायद तुम्हें इस बात का पूरा अनुमान न हो कि स्विस बैंकों के गोपनीय खातों और भारत, अमेरिका व यूरोप के तमाम बैंक खातों में हमारा अकूत धन जमा है। इस सबके साथ हमारे हजारों शिष्य- शिष्याएं और सेवक-सेविकाएं भी हैं। और, इस सबसे ऊपर है मेरा नाम- जीवानंद स्वामी जीवानंद।…मैं इस सबका उत्तराधिकारी तुम्हें बनाना चाहता हूं…तुम्हें जमना लाल…’’

जमनालाल अवाक् रह गया। फिर सहज होकर बोला- ‘मुझे ? मुझे क्यों?’

जीवानंद बोले- ‘मैंने अभी कहा था न कि मैं पिछले 27 साल से एक सपना लेकर चल रहा हूं? यही सपना है वह…कि मेरी इस तमाम धन-संपत्ति के उत्तराधिकारी तुम बनोगे।…27 साल से मैं इस घड़ी की प्रतीक्षा करता रहा हूं।’

‘लेकिन, यह सब आप मुझे क्यों देना चाहते हैं यह मैं नहीं समझ पा रहा हूं स्वामी जी? मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूं कि यह सब मुझे क्यों लेना चाहिए?’

‘इसलिए क्योंकि यह सब तुम्हारा है। और, तुम मेरे उत्तराधिकारी हो।’

जमना लाल ने वर्षों पहले जो प्रश्न अपने भीतर दबा लिया था वह अब पूछ लिया- ‘क्या मैं आपका पुत्र हूं?’

क्षणभर स्वामी जीवानंद जमना लाल की ओर देखते रहे। फिर बोले- ‘नहीं।’

‘तब क्यों आप मुझे अपनी संपूर्ण धन-संपत्ति का वारिस बनाना चाहते हैं? मुझे बचपन से बताया गया है कि आप मेरे सर्वस्व हैं। क्या मतलब है इसका? कौन हैं आप और मेरे साथ आपका क्या संबंध है?’ जमनालाल ने खिन्न होकर कहा।

‘सर्वस्व ही हूं तुम्हारा जमनालाल। पेड़ का अपनी शाखा से उगे पेड़ से क्या होता है- बता सकते हो? वही संबंध है मेरा तुम्हारे साथ।…तुम मेरी प्रतिलिपि हो जमना….मेरा क्लोन हो…मैं तुम हूं और तुम मैं हो।…इसीलिए जो कुछ मेरा है वह तुम्हारा है।’

ठगा-सा रह गया जमना लाल। सोचने लगा- क्लोन हूं मैं? स्वामी जीवानंद के ही अंश से बना एक और जीवानंद। बाकी कोई नहीं है मेरा- न पिता, न भाई, न बहिन? और मां?

तब उसने पूछा- ‘मां मायावती कौन हैं?’

‘तुम्हारी पवित्र जननी जिसके गर्भ से तुमने जन्म लिया। वह तुम्हारे रिश्ते से मेरी भी मां है जमना। उसने तुम्हें सिर्फ जन्म दिया है। अपनी कोख में पालकर और फिर पाल-पोसकर बड़ा किया है तुम्हें। लेकिन, उनका कोई अंश नहीं है तुममें। तुम संपूर्ण रूप में मेरे हो- ‘मैं’ ही हो। इसलिए तुम मेरे उत्तराधिकारी बनोगे।’

 

यह सब सुनकर जमना लाल अचानक अपने-आप को बिल्कुल अकेला महसूस करने लगा, जैसे उसका दुनिया में कोई भी न हो। सच्चाई ने उसे सभी संबंधों से काट कर अलग कर दिया। उसी मनःस्थिति में वह बोला- ‘अगर मैं यह स्वीकार न करूं? आपका उत्तराधिकारी न बनूं तो?’

‘तुम्हें बनना होगा। तुम पर मेरा अधिकार है। इसलिए जो मैं चाहूंगा तुम वही करोगे।’

युवा जमना लाल तैश में आ गया- ‘नहीं करूंगा। मैं आपका उत्तराधिकारी नहीं बनना चाहता। आपकी संपत्ति, आपके धन और आपके तथाकथित साम्राज्य से मुझे कुछ लेना-देना नहीं है।…आप अपने विचार, अपनी इच्छाएं मुझ पर ज़बर्दस्ती नहीं थोप सकते। मेरा अपना दिमाग है, मैं अपनी तरह से सोच सकता हूं। अपने निर्णय ले सकता हूं। मैं जो चाहता हूं वही करूंगा। मैं कंप्यूटर इंजीनियर हूं और उसी क्षेत्र में आगे बढ़ूंगा।….मैं आपका आदर करता हूं लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि आपके कहने पर आश्रम का सफेद चोला पहनकर रात भर में स्वामी बन जाऊं। मैं अपने ढंग से जीऊंगा।’

बीमार स्वामी जीवानंद का चेहरा अचानक तमतमा उठा। उन्हें अपनी पूरी योजना विफल होती हुई दिखाई देने लगी। इसलिए कड़े स्वर में कहा, ‘नहीं जीओगे। सिर्फ़ उस तरह जीओगे जैसे मैं कहूंगा। तुम्हें इसी उद्देश्य से तैयार किया गया है। तुम्हें बनाने में मैंने लाखों रूपए खर्च किए हैं। तुम्हारे पालन-पोषण, तुम्हारी शिक्षा पर कितना व्यय हुआ है इसका अनुमान भी तुम नहीं लगा सकते….मैंने इतना कुछ किया तुम्हारे लिए और तुम….तुम मेरा उत्तराधिकारी तक नहीं बनना चाहते? तुम बनोगे! मेरे उत्तराधिकारी बनोगे। तुम्हारे पास और कोई रास्ता नहीं है…न मेरे पास है…मत भूलो जमना, जो जीवन दे सकता है वह…’ कहकर उन्होंने बाबा सेवक दास की ओर देखा।

सेवक दास ने जमना से साफ-साफ कहा- ‘अब आप कहीं नहीं जा सकते। जो स्वामी जी चाहते हैं वही हम सब चाहते हैं। स्वामी जी की इच्छा हमारे लिए आदेश है और उनका आदेश पूरा करने के लिए हम जान भी दे सकते हैं। इसलिए बात की गंभीरता को समझिए। अभी यह बात सिर्फ़ स्वामी जी मेरे और तुम्हारे बीच है। इंजीनियर के रूप में क्या मिल जाएगा तुम्हें? कितना धन कमा लोगे जीवन भर में?’

जमना लाल मामले की गंभीरता को समझ गया। यह भी समझ गया कि अपनी ही इच्छाओं को आगे बढ़ाने के लिए स्वामी जीवानंद ने उसे ‘तैयार’ करवाया है। उसका अपना कोई अलग अस्तित्व नहीं है। यह बात भी वह अच्छी तरह समझ गया कि इन लोगों के लिए जीवन का अर्थ है- केवल धन-संपत्ति और छद्म नाम। फिर भी वह बोला- ‘जीवन का अर्थ केवल धन कमाना नहीं है बाबा। मैं समझता था आप लोगों के पास इतना कुछ होते हुए भी इससे  कोई मोह नहीं है। जीवन का अर्थ अपने आपके दायरे से बाहर निकल कर दूसरों के बारे में सोचना और उनकी तकलीफों को दूर करने में साथ देना भी है। जीवन का अर्थ नए ज्ञान की तलाश करना भी है।’

‘यह सब कुछ तुम मेरे उत्तराधिकारी बनकर भी तो कर सकते हो जमना।’ स्वामी जीवानंद ने कमजोर आवाज़ में कहा।

जमना के मस्तिष्क में उथल-पुथल मची हुई थी। वह बैचेन होकर काफी देर सोचता रहा। कोई रास्ता न देखकर और कुछ सोचकर अंत में उसने कहा- ‘ठीक है, मैं तैयार हूं।’

स्वामी जीवानंद की आंखों में चमक लौट आई। उन्होंने जमना लाल को पास बुलाया और आशीर्वाद दिया। फिर सेवक दास से उसे बाकी बातें समझाने को कहा।

 

कुछ ही दिन बाद बाबा सेवक दास ने निर्विकल्प समाधि में भक्तजनों को स्वामी जीवानंद के दर्शन  कराने की घोषणा की। भक्तों में उत्साह की लहर दौड़ गई। एक सुबह उन्होंने स्वामी जी के आसन के ठीक पीछे का द्वार खोल दिया। भक्तों ने दरवाजे़ की दूरी के भीतर कांच के डिब्बे में स्वामी जीवानंद की समाधिस्थ काया के दर्शन किए। भक्तों की भीड़ उमड़ती रही। सामने कीर्तन कक्ष में अखंड कीर्तन चलता रहा। बाबा सेवक दास ने ठीक सातवें दिन बाबा के युवा रूप में अवतरित होने की भी घोषणा कर दी। छठे दिन आधी रात में स्वामी जीवानंद के नश्वर शरीर को समाधि में गाड़ दिया गया।

सातवें दिन भक्तों की अपार भीड़ लग गई। स्वामी जी के अवतरित होने के विचार ने जैसे उन्हें बौरा दिया। वे कीर्तन और स्वामी जी का जयघोषणा करते हुए सुधबुध खोकर नाचते रहे। कई भक्त आसन के पीछे के बंद द्वार पर आंखें गड़ाए रहे।

प्रातः काल, पहले की तरह धीरे-धीरे द्वार खुला और युवा स्वामी जीवानंद प्रकट हुए। वे आकर आसन पर बैठ गए। उनके जयघोषणा को सुनकर युवा स्वामी भी चकित रह गए। उन्होंने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया और जब शांति छा गई तो बोले, ‘मेरे बच्चो, मैं लौट आया हूं तुम्हारे पास- अपने इस नए युवा चोले में। सुख-दुःख में तुम्हारा साथ देने और तुम्हें आनंद की राह दिखाने के लिए। परम आनंद के लक्ष्य तक तुम्हें पहुंचाने के लिए। बहुत कठिन है मनुष्य की काया प्राप्त करना। इसलिए इस काया को सुख दो…आनंद दो…मैं निर्विकल्प समाधि से जाग कर लौट आया हूं- तुम्हारे साथ रहने के लिए….अब मैं फिर…तुम्हारे पास हूं मेरे बच्चो।…सुखी रहो।’

बाबा सेवक दास उन्हे भीतर चले गए।

समाधि के चमत्कार की चर्चा चारों ओर होने लगी। भक्तों ने यह बात दूर-दूर तक फैला दी। जिन्हें सहसा विश्वास न होता वे आश्रम में आकर युवा जीवानंद के दर्शन कर विश्वास करने लगे। भक्त देखते- वही नाक- नक्श, वही हाव-भाव और प्रवचन देने का वही अंदाज!

फिर भी काफी लोगों को इस पूरे घटनाक्रम पर विश्वास नहीं था। कुछ युवकों ने कई दिन तक इसका विरोध किया और इक्कीसवीं सदी में भी ऐसी अवैज्ञानिक घटनाओं की पुनरावृत्ति को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। बीसवीं सदी के ‘बाल भगवानों’ और ‘अवतारों’ की वापसी बताया। कुछ राजनीतिक दलों ने इस तरह की घटनाओं के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि वह धर्म के ठेकेदारों के साथ मिलकर समाज को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर करने वाली ताकतों का साथ दे रही है।

विरोध बढ़ता गया। घटना की वैज्ञानिक जांच की मांग की जाने लगी। सरकार के जिए जवाब देना कठिन हो गया। एक-दो राजनीतिक दलों ने प्राचीन परंपराओं और धर्म का नाम लेकर भक्तों का साथ दिया लेकिन विरोध को किसी तरह दबाया न जा सका। दबाव में आकर सरकार ने अंततः एक जांच समिति नियुक्त करके उसे सच्चाई का पता लगाने का उत्तरदायित्व सौंप दिया।

जांच समिति ने वैज्ञानिकों के सुझाव पर सच्चाई का शत- प्रतिशत पता लगाने के लिए ‘डी.एन.ए. जांच’ कराने का निश्चय किया। आश्रम से वृद्ध स्वामी जीवानंद के कुछ बाल प्राप्त किए गए और फिर युवा स्वामी के रक्त का नमूना लेकर दोनों की ‘डी.एन.ए. छाप’ तैयार करवाई गई।

‘डी.एन.ए. जांच’ से पूरी तरह साबित हो गया कि रक्त और बाल एक ही व्यक्ति के हैं। समिति इस नतीजे पर पहुंची कि वृद्ध और युवा स्वामी एक ही व्यक्ति हैं क्योंकि ‘डी.एन.ए. जांच’ गलत हो ही नहीं सकती।’ भक्त सड़कों पर निकल आए। दोनों राजनीतिक दलों ने इसे धर्म की विजय बताया। लेकिन, खुले विचारों वाले लोग इससे संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें यह सब एक ढोंग और धोखाधड़ी लगता रहा। मगर वे कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो गया था कि दोनों स्वामी एक ही हैं।

 

लगभग सात माह बाद आश्रम के घुटन और तनाव भरे वातावरण में परिवर्तन हुआ। युवा स्वामी जीवानंद को लगा, अब बाबा सेवक दास और उनके साथियों को उन पर विश्वास होने लगा है। उनकी कड़ी नज़र अब पीछा नहीं करती थी। स्वामी जी आश्रम के आसपास टहल सकते थे। यों भी, स्वामी जीवानंद ही साबित हो जाने के बाद विशेष खतरा नहीं रह गया था। वैज्ञानिक जांच ने उनका अपना अस्तित्व मिटा दिया था।

आश्रमों की सारी व्यवस्था युवा स्वामी जीवानंद के इशारे पर चलने लगी। अब उनका आदेश ही अंतिम आदेश होता। बाबा सेवक दास ने देखा कि युवा स्वामी का मन आश्रम में रम गया है। उसे वृद्ध स्वामी जीवानंद की बात याद आ गई- सुख-संपत्ति किसे अच्छी नहीं लगती? सुख तो सभी भोगना चाहते हैं सेवक!

सेवक दास युवा स्वामी को देखते रहते और उन्हें वह जमना लाल याद आ जाता जिसके साथ वह घर छोड़कर भागे थे। बिल्कुल ऐसा ही तो था जमना लाल! कीर्तन-कक्ष में भक्तगण स्वामी जीवानंद की युवावस्था का चित्र देखते और हू-ब-हू उन्हीं को अपने सामने देखकर अगाध श्रद्धा से विह्वल हो उठते।

उच्च शिक्षा-प्राप्त युवा स्वामी जीवानंद उर्फ़ जमनालाल ने भारत और विदेशों में फैले अपने आश्रमों की व्यवस्था को सुधारने का निश्चय किया। उन्होंने प्रत्येक आश्रम के प्रबंधक से संपत्ति और विभिन्न स्रोतों से मिलने वाली दान राशि के आय-व्यय का ब्योरा मांगा। इससे प्रबंधकों में खलबली मच गई। ऐसा कभी नहीं हुआ था। सभी स्वामी जी के सेवक और विश्वासपात्र थे। फिर आय-व्यय का ब्योरा कैसा? जो कुछ था, स्वामी जी के चरणों में समर्पित था। यही उत्तर प्रबंधकों ने स्वामी जी को भी दिया। हां, भौतिक संपत्ति की उन्होंने सूची बनाकर दे दी। युवा स्वामी जी को आश्रमों की ऐसी दुरव्यवस्था देखकर काफी आश्चर्य और दुःख हुआ। भारत स्थित प्रधान आश्रम की पूरी व्यवस्था बाबा सेवक दास के हाथों में थी। युवा स्वामी के नए आदेश से वे तिलमिला उठे। स्वामी जीवानंद ने सदा उन पर आंख मूंद कर विश्वास किया था। उनके किसी काम पर कभी अंगुली नहीं उठाई थी। उन्हीं के प्रतिरूप, उन्हीं के अंश युवा स्वामी ने उनसे अब आय-व्यय का हिसाब मांगा है? उस धन-संपत्ति का हिसाब जिसे जुटाने में उन्होंने अपना जीवन लगा दिया। जिसे जमा करने के लिए उन्होंने क्या-कुछ नहीं किया? जिसकी सुरक्षा के लिए वे स्वामी जीवानंद के सबसे बड़े विश्वासपात्र बने। जीवनभर के लिए उनके सेवक बन गए। आज चाहे भारत के आश्रम हों या विदेशों में फैले उनके तमाम आश्रमों में, जो भी अकूत संपत्ति है- वह सब उन्होंने और जीवानंद ने ही तो जुटाया था। इसलिए उस पर उनका भी उतना ही हक है जितना इस युवा स्वामी का।…सोचते-सोचते क्रोध से कांपने लगे सेवक दास।

लेकिन, तभी उन्हें स्वर्गीय जीवानंद के शब्द याद आ गए- तू क्यों उदास होता है रे? तेरा-मेरा साथ थोड़े ही छूटेगा? हमारा साथ तो बना ही रहेगा…

उन्होंने सोचा- साथ तो बना हुआ है लेकिन यह धन-संपत्ति का हिसाब? क्या हो गया है युवा स्वामी जी को? उसे मुझ पर विश्वास नहीं है? मुझ पर- जिसकी सहमति से उसका जन्म हुआ, पला-बढ़ा और आश्रम-श्रंखला के साम्राज्य का स्वामी बना?

फिर अचानक अहसास हुआ कि उन्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए। युवा स्वामी तो उनका वही अभिन्न जीवानंद है। इसके प्रति वही समर्पण और श्रद्धा बनाए रखनी होगी। बाबा सेवक दास ने निश्चय किया कि वे उन्हें स्वामी जीवानंद से मिले अटूट विश्वास के बारे में बताएंगे और आय-व्यय के संबंध में भी बात करेंगे।

इसी बीच युवा स्वामी ने समाचारपत्रों में विज्ञापन देकर, स्वयं इंटरव्यू लेकर एक सेक्रेटरी की नियुक्ति कर ली। बाबा सेवक दास से उन्होंने सिर्फ़ इतना ही कहा कि उनके तमाम कामों की सुनियोजित ढंग से सही समय पर पूरा करने में मदद के लिए सेक्रेटरी का होना जरूरी है। वह उनके सारे दैनिक कार्यक्रमों की डायरी रखेगा। सेवक दास ने उनसे जब यह कहा कि यह सब तो वे अब तक देखते ही रहे हैं तो युवा स्वामी हंसकर बोले- ‘देखने और सुनियोजित ढंग से काम को पूरा करने में बड़ा अंतर है बाबा सेवक दास। वह आप नहीं समझेंगे। ये प्लानिंग और मैनेजमेंट की बातें हैं। आपकी उस तरह की ट्रेनिंग नहीं है। सच पूछिए तो आप लोगों ने धन-संपत्ति जमा तो जरूर की लेकिन उसका सही उपयोग और इनवेस्टमेंट नहीं कर सके। इसलिए मैं चाहता हूं कि हमारे सभी आश्रमों का एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा हो ताकि उनकी व्यवस्था सही रूप में हो सके। आश्रम ही हर शाखा के आय-व्यय का हिसाब और आडिट होना चाहिए और स्विस तथा अन्य बैंकों में बेकार पड़े धन का उचित इनवेस्टमेंट किया जाना चाहिए। हम यह पैसा शेयरों में लगा सकते हैं, इससे भारत में अपनी एयरलाइंस शुरू कर सकते हैं, इलेक्ट्रानिक मीडिया के बाज़ार को देखते हुए महानगरों में अपने आडियो और वीडियो स्टूडियो खोल सकते हैं, कंप्यूटर की हार्डवेयर या साॅफ्टवेयर कंपनी खोल सकते हैं। सरकार की नई पर्यटन नीति का लाभ उठाकर देश भर में सितारा-होटलों की श्रंखला शुरू कर सकते हैं, उद्योग लगा सकते हैं…क्यों? इसी पैसे से हम अरबों रुपए पैदा कर सकते हैं सेवक दास। कुछ समझे?’

बाबा सेवक दास कुछ देर तक युवा स्वामी के चेहरे को टुकुर-टुकुर ताकते ही रह गए। सोचने लगे- यह कौन-सा जीवानंद है, धन-संपदा जोड़ने की भूख उसमें भी थी लेकिन इस तरह तो उसने कभी सोचा ही नहीं? क्या है इस नए जीवानंद के मन में?

‘नहीं समझे सेवक…?’ युवा स्वामी ने पूछा।

सेवक दास अचकचाकर बोले- ‘समझ रहा हूं स्वामी जी, लेकिन इतना सब कुछ होते हुए…’

‘इतना कुछ है, इसीलिए तो इसके उचित इनवेस्टमेंट की आवश्यकता है। धन से धन पैदा होना चाहिए तभी उसका पूरा लाभ मिल सकता है।’ युवा स्वामी ने कहा।

‘और, भजन-कीर्तन…’

ठठाकर हंस पड़े युवा स्वामी। बोले- ‘वह तो बहुत कर चुके आप लोग। उसी की राह से तो धन आता रहा है! वह भी चलता रहेगा। भक्तों को दान-पुण्य का शौक है तो वे करते रहेंगे। लेकिन, सोचता हूं उन्हें भी इसके बदले में कुछ-न-कुछ मिलना जरूर चाहिए। इसलिए योग और वेदांत की शिक्षा तथा अनुसंधान के लिए एक अकादमी खोलना चाहता हूं।…कितना कुछ करना है सेवक दास। इसके लिए प्रशासनिक ढांचा मजबूत बनाना ही होगा।’

सेवक दास का मन उलझन में पड़ गया। वे सोचने लगे- नए प्रशासनिक ढांचे में उनका क्या होगा? न योग-वेदांत में उनका दखल है, न नए स्वामी की नई योजनाओं के क्षेत्र का ही उन्हें अनुभव है। तब? कल नए शिक्षित, प्रशिक्षित और अनुभवी लोग आ गए तो उनकी स्थिति क्या होगी? हंस मध्ये वको यथा? उनकी ही क्यों, स्वर्गीय जीवानंद के उन तमाम प्रिय शिष्यों का क्या होगा जो अब तक उनके आश्रमों के लिए भक्तगण और धन-संपदा दोनो जुटाते रहे हैं?

सेवक दास आशंकित हो उठे। पहली बार उन्हें अपने भविष्य की चिंता होने लगी। उन्होंने सपने मे भी नहीं सोचा था कि कभी ऐसा भी हो सकता है। उन्होंने गोकुल दास को विश्वास में लेकर इस बारे में बात की। नए स्वामी की भावी योजनाओं से उन्हें भी भविष्य के लिए खतरा महसूस हुआ। उन्हें यह भी लगा कि आश्रम के आय-व्यय के बहाने उनके व्यक्तिगत खर्चों का भी पता लगाया जाएगा। और, आगे चलकर वे स्वेच्छा से खर्च भी नहीं कर सकेंगे। इस तरह लगता है, धीरे-धीरे उनके हाथ बांध दिए जाएंगे।

सेवक दास और गोकुल दास दोनों ने चुप बैठने के बजाय कुछ करने का निश्चय किया।

सेवक दास ने युवा स्वामी को काफी समझाने का प्रयास किया कि आज आश्रम की जो कुछ भी धन-संपदा है उसे स्वर्गीय स्वामी जीवानंद के अटूट विश्वास से बटोरा है। उनकी सबसे बड़ी पूंजी ही उनका विश्वास था और उसी विश्वास के आशीर्वाद से ये स्वामी जी के आजीवन सेवक और सखा बन गए। उन्होंने कभी आय-व्यय की बात तक नहीं पूछी क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि आश्रम में जो कुछ भी आया है वह इस सेवक के सहारे ही आया है। अब तक यही होता रहा है।

लेकिन, उनकी बातें सुनकर युवा स्वामी ने साफ-साफ कह दिया- ‘आय-व्यय का पूरा ब्योरा जिस तरह आश्रम की विदेश स्थित शाखाओं से लिया जा रहा है वैसे ही आपको भी देना है। आप इसमें विलंब कर रहे हैं। आपको यह ब्योरा देने के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से एक सप्ताह की छूट देता हूं। यदि तब तक ब्यौरा नहीं मिला तो मुझे कुछ और सोचना पड़ेगा।’

सेवक दास खून का घूंट पीकर रह गए।

सप्ताह भर बाद युवा स्वामी के आदेश पर आश्रम की व्यवस्था का उत्तरदायित्व एक अन्य अनुभवी बाबा को सौंप दिया गया और बाबा सेवक दास को चेतावनी दे दी गई। सेवक दास ने इसे अपना अपमान समझा और अपने विश्वस्त आश्रमवासियों के साथ मिलकर युवा स्वामी का विरोध शुरू कर दिया। उन्होंने युवा स्वामी की भावी योजनाओं का ‘भंडाफोड़’ करते हुए उन्हें आश्रम की मूल धारणा और नीतियों के खिलाफ बताया। उन्होंने आश्रमवासियों और भक्तों को समझाने का प्रयास किया कि युवा स्वामी आश्रम को किसी कारखाने में बदल देना चाहते हैं, अध्यात्म को उद्योग में बदलना चाहते हैं। वे हरिकीर्तन को मशीनों के शोर में बदलकर आश्रमवासियों और भक्तगणों को असहाय मज़दूर बना देना चाहते हैं।

लेकिन, बाबा सेवक दास का साथ देने वाले आश्रमवासी बहुत कम थे। इसलिए उनके विरोध का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अब तक जो कुछ बटोरा था उसे अपनी आंखों के सामने जाता हुआ देखकर सेवकदास बुरी तरह बौखला उठे। वे अब बता देना चाहते थे कि युवा स्वयं जीवानंद नहीं हैं। उन्होंने कोई चोला नहीं बदला बल्कि आम आदमी की तरह देह त्याग कर वे भी इस संसार से विदा ले चुके हैं और यह नया स्वामी वैज्ञानिक तिकड़म से पैदा किया गया है…लेकिन उन्हें खूब पता था कि उनकी बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा। युवा स्वामी स्वामी जीवानंद साबित हो चुका था और भक्तगणों की उसी में अटूट श्रद्धा थी।

उधर युवा स्वामी सब कुछ शांतिपूर्वक देख रहे थे। बाबा सेवक दास के विरोध से वे कतई विचलित नहीं हुए। उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि सेवक दास कुछ नहीं कह सकते। यदि कहेंगे तो स्वामी जीवानंद की सहज मृत्यु या हत्या के फेर में पड़ जाएंगे। उनके शव को गायब करने की साजिश में फंस जाएंगे।

बाबा सेवक दास को लगा, वे असहाय हो गए हैं। उनके विरोध का कोई अर्थ नहीं रह गया हे। रहे भी कैसे, नए स्वामी की स्थापना का अनुष्ठान तो आखिर उन्हीं के हाथों संपन्न हुआ था। बहुत सोचते रहे सेवक दास और एक दिन अचानक बाबा गोकुलदास के साथ आश्रम से गायब हो गए।

 

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रांगण में दो श्वेतकेशी संन्यासियों को भटकते हुए देखकर कुछ छात्र चौंके। संन्यासी जनन जैविकी प्रयोगशाला की ओर जाना चाहते थे। छात्रों के पूछने पर एक संन्यासी ने कहा- वे डा. सूरजभान से मिलना चाहते हैं। वर्षों पहले वे इस प्रयोगशाला में उनसे मिले थे।

‘डा. सूरजभान? भारतीय वैज्ञानिक? वे तो पांच साल पहले अपने देश को वापस लौट गए। हम लोग उनका बहुत आदर करते थे। मेरे गुरु थे वे।’ एक छात्र ने कहा।

संन्यासी ने कहा- ‘मेरा शिष्य था वह। भारत में कहां गया होगा? कहां मिलेगा? मैं बाबा सेवक दास हूं।’

‘प्रयोगशाला से पता करके बताता हूं। यहां उनका पता जरूर होगा।’ कहकर छात्र डा. सूरजभान का पता मालूम करने चला गया और अन्य छात्र दोनों संन्यासियों से ‘योग’ और ‘अध्यात्म’ के बारे में प्रश्न पूछने लगे।

छात्र ने लौट कर बताया- ‘डा. सूरजभान विजिटिंग प्रोफेसर बनकर एक वर्ष के लिए स्विट्जरलैंड चले गए थे और फिर लौटकर भारत में ‘राष्ट्रीय जनन जैविकी संस्थान’ के निदेशक बन गए। अब भी वे वहीं हैं।’

बाबा सेवक दास और गोकुल दास जल्दी से जल्दी भारत वापस लौटना चाहते थे। टैक्सास स्थित अपने आश्रम में जाने का उनका बड़ा मन था लेकिन इसमें खतरा था। वहां से तुरंत पता लग जाता कि वे दोनों अमेरिका में हैं। उन्होंने वही तरकीब अपनाने का निश्चय किया जो अमेरिका आने के लिए अपनाई थी। वाशिंगटन विश्वविद्यालय से वे सीधे एक नामी उद्योगपति भक्त के पास पहुंचे और उसे कृतार्थ कर बोले- ‘कुछ दिन यहां भक्तों के बीच बिताना चाहते थे लेकिन स्वामी जी का संदेश मिला है कि किसी महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अनुष्ठान के लिए तत्काल भारत लौटना है। कितनी देर में भिजवा सकते हो शिष्य?’

‘जो भी पहली फ्लाइट मिल जाएगी प्रभु!’’ उद्योगपति ने कहा। घंटा भर बाद उसने भारत के लिए वापसी के दो हवाई यात्रा के टिकिट स्वामी सेवक दास के चरणों में अर्पित कर दिए।

भारत लौटते ही बाबा सेवक दास और गोकुल दास बंगलौर के लिए रवाना हो गए। वहां पहुंचकर उन्होंने राष्ट्रीय जनन जैविकी संस्थान’ के निदेशक डा. सूरजभान के घर का पता लगाया और उनसे मिलने चल पड़े।

 

 

‘साधू?’ नौकर की बात सुनकर डा. सूरजभान ने आश्चर्य से कहा- ‘साधुओं का मुझसे क्या काम? क्यों मिलना चाहते हैं वे?’

‘आने दीजिए। क्या पता कोई पहुंचे हुए संत-फकीर हों।’ उनकी श्रीमती जी अचानक बोलीं।

डा. सूरजभान मना न कर सके। बोले- ‘अच्छा ठीक है, बैठाओं उन्हें। कहो अभी आते हैं।’

साधुओं की बात सुनते ही डा. सूरजभान खिन्न हो उठते थे। इस बारे में बात करने पर वे चिड़िचिड़ा उठते। उन्हें उन पर कोई विश्वास नहीं था। वे कहते भी थे कि साधू-संन्यासी ढोंगी होते हैं और झूठ बोलते हैं। वे आपको अपनी बातों से केवल भरमाते हैं। आपको कुछ दे नहीं सकते।

लेकिन, डा. सूरजभान के मन की बात कोई नहीं जानता था। कोई भी नहीं। उनकी पत्नी सुशीला भी नहीं। डा. सूरजभान अवसाद के रोगी थे। उन पर आए दिन गंभीर निराशा का दौरा पड़ता। उन्हें लगता  कि वे जीवन में कुछ नहीं पा सकेंगे। साधुओं और बाबाओं की बात उठते ही या उन्हें देखने पर उनको अपने उस सफल प्रयोग की याद आ जाती जो उन्होंने करीब सत्ताईस वर्ष पहले किया था। उसमें उन्हें सफलता मिल गई थी। पहला ‘मानव क्लोन’ उन्होंने तैयार किया था लेकिन उस समय की परिस्थिति में और उस स्वामी की शर्त के कारण वे अपने प्रयोग की सफलता की घोषणा नहीं कर पाए थे। स्वामी ने उन्हें चुप रहने के लिए मुंहमांगी रकम और सुख-सुविधाएं दी थीं। उसके साल भर बाद ही प्रथम मानव क्लोन तैयार करने का सेहरा दो अमेरिकी वैज्ञानिकों के सिर बांध दिया गया। डा. सूरजभान हाथ मलते रह गए। जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि का श्रेय उन्हें नहीं मिल सका। बस तभी से अवसाद के शिकार हो गए। अचानक हाथ लगी ‘मुंहमांगी’ रकम खाने-पीने और सुख-सुविधाएं बटोरने में ही समाप्त हो गई। एक और भी कारण था जिससे उन्हें लगता कि वे जीवन में कुछ नहीं पा सकेंगे। उन्होंने अपनी इच्छा से, सुशिक्षित सुशीला से प्रेम-विवाह किया था। परिवार के कई सपने संजोए थे उन्होंने, लेकिन पिछले पच्चीस वर्षों से परिवार में वे दोनों अकेले ही रह गए। सुशीला की कोख नहीं भरी। परीक्षण से उन्हें यह भी पता लग गया कि इसका कारण वे स्वयं है लेकिन सारे वैज्ञानिक सोच के बावजूद वे सुशीला की कोख को किसी अज्ञात ‘दानकर्ता’ के शुक्राणुओं से नहीं भरवाना चाहते थे। न सुशीला ही ऐसा गर्भ चाहती थी। किसी के लिए उसके क्लोन का सृजन कर लेने वाले डा. सूरजभान खुद खाली हाथ रह गए। यह दंश भी उन्हें सालता रहता। इसलिए अब वे हर कमी के लिए स्वयं को दोषी मानते थे। उन्हें लगता, अगर वे मुंहमांगी रकम के मोह और कुछ कर दिखाने के अति उत्साह से तब बच गए होते तो प्रथम मानव क्लोन बनाने की सफलता का श्रेय उन्हें मिलता। उस क्लोन पर हो सकता है उनका हक़ होता…या हो सकता है वह उन्हीं का क्लोन होता। मुंहमांगी रक़म के बदले स्वामी ने सब कुछ भूल जाने और भविष्य में कोई भी संबंध न रखने की शर्त भी रख दी थी। प्रसूति गृह में शिशुओं को जन्म दिलाने के बाद जिस तरह डाक्टर उनके बारे में भूल जाते हैं- उन्होंने सोचा था उसी तरह वे भी क्लोन को भुला देंगे और नए क्लोन तैयार करते रहेंगे। लेकिन, जब सफलता का श्रेय ही नहीं मिला तो उनका मन उखड़ गया।

फिर भी अपने बनाए हुए क्लोन को वे भूल नहीं सके। अक्सर उसके बारे में सोचने लगते…कि न जाने कहां होगा वह? स्वामी के किस आश्रम का संन्यासी होगा..?

बैठक में आते ही डा. सूरजभान की दृष्टि उन दोनों साधुओं पर पड़ी। क्षण भर वे उन्हें घूरते रहे। लंबे सफेद बाल, सफेद दाढ़ी, गेरुवे वस्त्र।

‘नहीं पहचाना…? लगता है हमें भूल गए हो डा. सूरजभान?’ सेवक दास ने हंसते हुए कहा।

उसकी हंसी और आवाज से डा. सूरजभान उसे पहचान गए। बोले- ‘बाबा सेवक दास है न आप?’

‘हां। और यह हैं गोकुल दास’।

‘कहिए कैसे हैं आप लोग? सत्ताईस साल बाद आज मैं कैसे याद आ गया? स्वामी जीवानंद कैसे हैं..?’ डा. सूरजभान ने बिना किसी उत्साह के पूछा।

बाबा सेवक दास ने कहा- ‘सब कुछ ठीक है।’

‘तो फिर कैसे आना हुआ…? क्या कोई दूसरा प्रयोग कराना चाहते हैं? आपके और हमारे संबंध तो उसी दिन समाप्त हो गए थे जिस दिन उसका जन्म हुआ था। आप लोगों की शर्त थी- उस बारे में भूल जाऊंगा। मैं भूल चुका हूं। सब कुछ। उसको भी और आप सबको भी। इसकी कीमत आप मुझे दे चुके हैं। फिर क्यों आए हैं आप लोग…?’

बाबा सेवक दास मुसकराए। बोले- ‘सत्ताईस साल पहले स्वामी जी की आज्ञा से आपके घर पर आए थे। आज भी उन्हीं की आज्ञा का पालन कर रहे हैं। बात यह है डा. सूरजभान कि स्वामी जी एक परे्यानी में फंस गए हैं। उन्हें आपकी मदद की आवश्यकता है।’

रूखी हंसी के साथ डा. सूरजभान ने कहा- ‘मेरी मदद की आवश्यकता है? एक दिन उन्होंने मेरी मदद की थी- अपनी शर्तों के साथ!….क्या परेशानी है उनकी? कहीं क्लोन तो आड़े नहीं आ रहा है…?’ क्लोन के बारे में अपनी पूरी जिज्ञासा दबाकर उन्होंने सिर्फ इतना ही पूछा ताकि बाबाओं को यह न लगे कि क्लोन में उनकी कोई रुचि है।

‘हम क्या कहें, हम तो मात्र सेवक हैं। इतनी ही प्रार्थना है कि आप सिर्फ एक दिन के लिए आश्रम में चल दें। यह आपका स्वामी जी और हम पर व्यक्तिगत उपकार होगा।’

‘ठीक है, लेकिन इस बार मदद के लिए आप लोगों को मेरी शर्त माननी होगी।… शर्त यह है कि मुझे क्लोन से एकांत में मिलने दें। मैं अपनी रचना से बात करना चाहूंगा।’

‘स्वामी जी को इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी। सच मानिए तो वे आपको अपने क्लोन से मिलाने के लिए ही आश्रम में आमंत्रित कर रहे हैं।’

डा. सूरजभान गद्गद हो उठे। सत्ताईस साल बाद अपनी रचना से मिलने के विचार से उन्हें रोमांचित कर दिया। अगले ही दिन वे आश्रम के लिए चल पड़े।

प्रवचन का समय हो चुका था। भक्त कीर्तन-कक्ष में एकत्र हो रहे थे। बाबा सेवक दास और गोकुल दास के साथ डा. सूरजभान भी कीर्तन कक्ष में पहुंचे और एक ओर बैठ गए। चारों ओर अगरबत्तियों की भीनी सुगंध फैल रही थी।

कीर्तन काफी देर तक चला। बीच-बीच में जीवानंद स्वामी का जयघोष भी हुआ। डा. सूरजभान का दम घुट रहा था लेकिन बाबा सेवक दास ने कहा- ‘इस समय स्वामी जीवानंद यहीं मिल सकेंगे।’ तभी सामने के द्वार से दमकते चेहरे वाले युवा स्वामी जीवानंद ने प्रवेश किया। उन्हें देखकर डा. सूरजभान चौंक उठे। उन्होंने बाबा सेवक दास से पूछा- ‘स्वामी जीवानंद कहां हैं…? ये कौन है?’

‘यही हैं आपके स्वामी जीवानंद!’ कुटिल मुस्कान के साथ सेवक दास ने कहा- ‘क्यों, नहीं पहचान रहे हैं?’ आपको तो पहली दृष्टि में पहचान लेना चाहिए। आप ही की रचना है!’

सेवक दास के स्वर की कड़वाहट डा. सूरजभान से छिपी न रह सकी। उनकी आंखों में क्रोध कौंधने लगा। लेकिन, डा. सूरजभान अब उनकी ओर ध्यान देने के बजाय एकटक युवा स्वामी को देखने लगे। सोचने लगे …तो यह है वह क्लोन! उनके हाथों तैयार हुआ विश्व का प्रथम मानव क्लोन। मगर वृद्ध स्वामी जीवानंद कहां हैं? स्वामी जीवानंद का जयघोष तो भक्त इसी युवा स्वामी के लिए कर रहे हैं?

उन्होंने सेवक दास से पूछा- ‘वृद्ध स्वामी जीवानंद कहां हैं?’

‘स्वर्गलोक में। मृत्युलोक में इसे छोड़ गए हैं।’ युवा स्वामी की ओर संकेत करते हुए सेवक दास ने कहा।

‘तो यह भी स्वामी ही बना…?’ उन्होंने उत्सुकता से पूछा।

‘बना नहीं परम पूजनीय स्वामी जीवानंद बना गए। उन्होंने क्या सोचा था और क्या हो गया! कहते थे- उनका ही प्रतिरूप होगा यह और लगेगा जैसे वे ही युवा चोले में लौट आए हैं। उन्हें क्या पता था कि यह उनकी धन-संपत्ति पर  कुंडली मार कर बैठ जाएगा और उनके बाल सखा, उनके विश्वस्त शिष्यों तक को नहीं पूछेगा। उनके चरणों की धूल था वह सेवक दास जिसे इसने बुहार कर आश्रम से बाहर फेंक दिया है।’ गुस्से में कांपते हुए वृद्ध सेवक दास ने कहा।

डा. सूरजभान समझ गए कि किसी गहरी साजिश के तहत क्लोन को स्वामी जीवानंद के आसन पर बैठा दिया गया होगा। और उसे स्वामी का युवा अवतार घोषित कर दिया गया होगा। उन्हें लगा, उसने भूतपूर्व स्वामी के विश्वस्त बाबाओं की बातें आंख मूंद कर मान लेने से मना कर दिया होगा और अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय लेता होगा। इसलिए सेवक दास और दूसरे बाबा रुष्ट हो गए। यह सोचकर उन्हें खु्शी  हुई कि क्लोन का ओढ़ा हुआ नहीं बल्कि अपना व्यक्तित्व है।

युवा स्वामी ने भक्तों की भीड़ में बाबा सेवक दास को किसी से बतियाते और बड़बड़ाते हुए देख लिया था। कुछ देर बाद उनकी ओर संकेत करते हुए स्वामी ने कहा- ‘बाबा सेवक दास, आप कुछ पूछना चाहते हैं?’

सेवक दास ने ऊंची आवाज में कहा- ‘हां, पूछना चाहता हूं।…भक्तों की इस भीड़ के सामने पूछना चाहता हूं कि आप कौन हैं?’

बेहद शांत भाव से युवा स्वामी बोले- ‘मैं वही हूं जिसे आप उस द्वार से इस आसन तक लाए बाबा सेवक दास। वही स्वामी जीवानंद। आपको आज अचानक यह शंका क्यों हुई, जान सकता हूं?’

‘हां, क्योंकि आप जीवानंद नहीं है।’ क्रोध में भर कर सेवक दास ने कहा।

‘जीवानंद नहीं हूं? तो कहां है जीवानंद?’

‘तुम जमना लाल हो, जीवानंद नहीं’।

‘ठीक कहते हो सेवक दास। इस आसन पर बैठने से पहले, स्वामी बनने तक जमना लाल ही तो था मैं। जीवानंद तो तुम्हारे साथ ही बना न?’

‘तुम अब भी जमना लाल हो। आज मैं यह साबित कर सकता हूं।’ सेवक दास ने कहा और फिर डाॅ. सूरजभान की ओर संकेत करके बोले- ‘ये हैं वे डाॅ. सूरजभान, जिन्होंने तुम्हें बनाया। तुम्हें आज तक इनके बारे में नहीं बताया था।’

‘क्यों नहीं बताया था सेवक दास?’

सेवक दास तुरंत जवाब न दे सके। वे घबरा उठे। तभी अपनी उसी शांत मुद्रा में युवा स्वामी बोले- ‘इसलिए नहीं बताया बाबा सेवक दास, क्योंकि धन-संपत्ति की हवस में आप लोग आश्रम का उत्तराधिकार किसी को न देकर मृत्यु के बाद भी स्वयं ही संभालना चाहते थे। इसके लिए आपने स्वामी जीवानदं के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा और आश्रम की अकूत संपत्ति में से थोड़ा-सा धन खर्च करके स्वामी जीवानंद का क्लोन तैयार करवा लिया ताकि वह हू-ब-हू स्वामी जीवानंद हो और चोला बदलने के नाम पर उनके बाद उसे युवा स्वामी जीवानंद के रूप में भक्तों के सामने रख दिया जाए। आप चाहते थे, वह नया स्वामी आंख मूंदकर आपके आदेशों का पालन करता रहे और आपकी काली करतूतों में आपका साथ देता रहे। उसने ऐसा नहीं किया और आश्रम की धन-संपत्ति के बेहतर और कल्याणकारी उपयोग की योजना बनाने लगा। यह आपको पसंद नहीं आया और आप किसी भी तरह युवा स्वामी को अपदस्थ करने के अभियान में जुट गए। अभी भी आप वही कर रहे हैं, क्यों?…लेकिन आप यह भूल रहे हैं सेवक दास, मुझे इस आश्रम और इसकी शाखाओं का उत्तरदायित्व संभालने के लिए बनाया गया है। इनका उत्तराधिकार मुझे मिला है। इसलिए मैं इनकी व्यवस्था को सुधारूंगा और धन को सही रूप में इनवेस्ट करूंगा।…हां, आपने मुझ पर एक बड़ा उपकार किया है। आप मेरे रचनाकार, मेरे असली जनक को यहां ले आए हैं। मैं बचपन से पूछता ही रह गया कि मुझे जन्म किसने दिया लेकिन न स्वामी जीवानंद ने मुझे कभी यह बताया और न आपने। मां माया ने भी स्वामी जीवानंद को ही सर्वस्व मानने को कहा।….आप लोगों ने थोड़ा-सा धन देकर इस मेधावी वैज्ञानिक को कितना बड़ा दंड दे दिया? पहला क्लोन बना लेने के बावजूद इन्हें इसका श्रेय तक नहीं मिला है।…बाबा सेवक दास, अपराधी हैं आप लोग। दंड तो आप लोगों को मिलना चाहिए।’

यह कहकर युवा स्वामी उठे और भक्तों के बीच जाकर डा. सूरजभान के गले लग गए। भावावेश में डा. सूरजभान की आंखों से खु्शी के आंसू बहने लगे। उन्हें लगा, जीवन में पहली बार उन्होंने भी कुछ पा लिया है।

सेवक दास कीर्तन-कक्ष से बाहर जाने लगे। लेकिन कुछ भक्तों ने उन्हें पकड़ लिया। डाॅ. सूरजभान ने उनसे कहा- ‘आप लोगों को देखकर मुझे बिल्कुल भी संदेह नहीं हुआ था कि आप लोग यह सब अपनी हवस के लिए कर रहे हैं। अति उत्साह में मुझे यही लगा कि आप लोग सचमुच मेरी सहायता करना चाहते हैं। आप लोगों ने क्लोन की योजना तो बना ली लेकिन यह भूल गए कि काया से काया का निर्माण तो हो जाता है लेकिन मनुष्य का व्यक्तित्व उसके परिवेश से बनता है। बच्चा जिस वातावरण में पलता-बढ़ता है उसका उसके व्यक्तित्व पर, उसके व्यवहार और सोच पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए जीवानंद से हू-ब-हू वही जीवानंद तो बन गया लेकिन उनके परिवेश ने दोनों को अलग-अलग व्यक्तित्वों में ढाल दिया। यह तो तुम्हें पता होगा सेवक दास कि स्वर्गीय स्वामी जीवानंद किस वातावरण में पले-बढ़े और युवा स्वामी जीवानंद की परवरिश और शिक्षा कहां हुई?’

सेवक दास चुप रहे। युवा स्वामी ने कहा- ‘मेरी शिक्षा लंदन में हुई। यहां आने से पहले मैं अमेरिका में कंप्यूटर इंजीनियर था।’

‘सुना सेवक दास? उच्च शिक्षा प्राप्त वह कंप्यूटर इंजीनियर अपने बुद्धिबल और अपने तर्कों के बल पर आगे बढ़ना चाहेगा न? और, तुम तो सिर्फ यह गेरुवा चोला पहनकर छल-बल से आगे बढ़े होंगे और वही छल तुम लोगों ने उत्तराधिकार के लिए किया। एक वैज्ञानिक संभावना का कैसा दुरुपयोग करना चाहा तुम लोगों ने!’ डाॅ. सूरजभान ने कहा।

‘लेकिन तुम्हें तो पूरा पैसा दे दिया गया था। तुमने पैसे के लिए प्रयोग किया। फिर इस बारे में तुम्हें बोलने का क्या हक़ है?’ अचानक कुढ़ कर सेवक दास ने कहा।

‘अपनी उसी गलती का खमियाज़ा भुगत रहा हूं बाबा सेवक दास। इतना बड़ा प्रयोग करने के बाद भी अनाम और अज्ञात हूं। विज्ञान-जगत में कौन जानता है आज मुझे?’

कीर्तन-कक्ष में शांति थी। ढोलक, मंजीरे और खड़ताल सभी शांत पड़े थे। भक्तजन अवाक् होकर युवा स्वामी, डाॅ. सूरजभान और बाबा सेवक दास की बातें सुन रहे थे। वे स्वयं को सबसे अधिक ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। जिनहें उन्होंने दिव्य पुरूष माना था उन्हें इतनी बड़ी साजिश का सूत्रधार जानकर उनका मन दुःख और क्रोध से भर उठा। जिसे वे मानसिक शांति का केंद्र मान रहे थे वह आश्रम उन्हें कुटिल चालों का केंद्र लगने लगा। अब कुछ छिपा नहीं था, सब कुछ स्पष्ट हो चुका था। बीच-बीच में उठने वाला ‘जय जीवानंद स्वामी’ का जयघोष भी रुक गया। युवा स्वामी को स्वामी जीवानंद की प्रतिलिपि जानने के बाद वे भी सहसा साधारण मनुष्य बन गए।

युवा स्वामी ने भक्तजन के मन और स्थिति की गंभीरता को समझ लिया। इसलिए बोले- ‘आप लोग निराश न हों। झूठ और आडंबर से सच ज्यादा सुखद होता है। और, अब आपके सामने सिर्फ़ सच है। मैं जानता हूं, आपके लिए अब मैं वह चमत्कारी और दिव्य पुरुष नहीं रहा। मामूली मनुष्य बल्कि मामूली मनुष्य का क्लोन रह गया हूं। लेकिन उस आडंबर से इस सच्चाई पर आप ज्यादा विश्वास कर सकते हैं। सच मानिए, एक दिन यही होना था। इसकी भनक इन बाबा सेवक दास को लग गई इसलिए यह बौखला उठे। इनकी बौखलाहट से यह काम जल्दी हो गया। जब इन्हें पता लगा कि मैं आश्रम की व्यवस्था को सुधारना चाहता हूं, आय-व्यय का पूरा हिसाब रखना चाहता हूं, आश्रमों की विपुल धनराशि को उद्योगों, शेयर बाजार, कंप्यूटर कंपनी, एयरलाइंस या होटल श्रंखला जैसे कामों में लगाना चाहता हूं तो इन्हें लगा मैं इनके द्वारा बटोरे हुए धन को हथियाना चाहता हूं। इन्होंने सोचा, यह सब कुछ हो गया तो इनकी स्थिति कुछ भी नहीं रहेगी। मैंने आप भक्तों के लिए योग-वेदांत के अध्ययन और अनुसंधान के लिए ‘योग-वेदांत अकादमी’ खोलने का निश्चय किया है। उसमें आप लोग सचमुच कुछ सीख सकेंगे। लेकिन, बाबा सेवक दास को यह योजना भी पसंद नहीं है क्योंकि उन्होंने सिर्फ गेरुवा चोजा पहना है- योग-वेदांत का कोई अध्ययन नहीं किया है।

योग-वेदांत अकादमी की बात सुनकर भक्तों ने जयघोष किया- ‘जय जीवानंद स्वामी!’

युवा स्वामी ने हाथ जोड़ दिए- ‘नहीं। यह जान लेने के बाद भी कि मैं आपकी तरह ही एक सामान्य मनुष्य हूं, आप लोग जयघोष कर रहे हैं? अब यह जयघोष नहीं होगा। व्यक्ति की इतनी पूजा न करें कि वह स्वयं को सर्वशक्तिमान या दिव्य पुरुष मान ले। आप लोग हमारी योजनाओं को कार्यान्वित करने में सहायता करें। हम आश्रम की धन-संपत्ति से एक ट्रस्ट की स्थापना कर रहे हैं। उसकी ओर से योजनाओं को लागू किया जाएगा। आश्रम में आप लोगों की श्रद्धा रही है, उसे बनाए रखें। इसका चोला बदलने में हमारी मदद करें! यही मेरा अंतिम प्रवचन है।’

तनाव भरे वातावरण में सहसा हंसी गूंज उठी।

 

डा. सूरजभान विचारों में खोए हुए थे। युवा स्वामी उर्फ़ इंजीनियर जे. लाल की आवाज से वे चौंके- ‘सब कुछ संभव हो जाएगा लेकिन आपका नुकसान भला कैसे पूरा हो सकता है? जब भी आप मुझे देखेंगे आपको अपने प्रयोग की याद आएगी…याद आएगा कि यह हाड़-मांस का जीता-जागता विश्व का पहला मानव क्लोन आपने बनाया, लेकिन इस उपलब्धि का श्रेय आपको नहीं किसी और को मिला….’

डा. सूरजभान हंसते हुए बोले- ‘अरे नहीं, मिस्टर लाल, आप मिल गए तो मुझे मेरी उपलब्धि मिल गई।…सब चलता है! श्रेय भी सबको नहीं मिलता। तुम्हें याद है, बेतार के तार की खोज प्रोफेसर जगदीश चंद्र बसु ने कर ली थी? लेकिन, श्रेय मिला मार्कोनी को।…सब चलता है लाल!’

 

देवेंद्र मेवाड़ी

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