प्रेमधाम के प्यारे बच्चे

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हाल ही में प्रेमधाम आश्रम, नजफगढ़ दिल्ली में हेनी-पेनी लाइब्रेरी से जुड़े बच्चों को कहानियां सुनाने का मौका मिला। यह मौका मिला पठन-पाठन की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए समर्पित गैरसरकारी संस्था बुकरू और दीप फाउंडेशन के सहयोग से।
बुकरू से आईं शोध छात्रा और मार्गदर्शक सेबंती चटर्जी के साथ पता पूछते हुए नजफगढ़ की राह पकड़ी। वहां हिरनाकूदना की ओर जा रही दिचाऊं रोड पर स्थित प्रेमधाम आश्रम में पहुंचा। प्रांगण में खड़े हरे-भरे छायादार नीम के पेड़ ने मन मोहा। आफिस में आश्रम के निदेशक डा. आर. के. मैस्सी और दीप फाउंडेशन की सचिव सुजाता सूरी से भेंट हुई। डा. मैस्सी ने बताया, आश्रम में 78 बालिकाएं और 62 बालक हैं। वे सभी निराश्रित थे। उन्हें सड़कों, चौराहों और अन्य असुरक्षित स्थानों से यहां लाकर सुरक्षा प्रदान की गई है। यहां वे छात्रावास में रहते हैं और शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। सुन कर खुशी हुई कि कई बच्चे पढ़ाई पूरी करके नौकरी करने लगे हैं। बड़े हो जाने पर आश्रम उनका विवाह भी कराता है।
निराश्रित महिलाओं के लिए करुणाधाम और माताओं के लिए शांतिधाम चलाया जा रहा है। बुजुर्गों के लिए रायल प्लेस बनाया गया है। साथ में सरकार से मान्यता प्राप्त 25 बिस्तरों का ह्यूमन केयर अस्पताल भी चलाया जा रहा है।
मेरी आंखें बच्चों को खोज रही थीं। पूछा, तो वे बोले, “बच्चे तैयार हैं। आइए।” हम उनके साथ सामने हाल में गए तो देखा, 60-70 बच्चे कहानी सुनने के लिए तैयार बैठे हैं। वे हेनी-पेनी लाइब्रेरी के पाठक थे। हेनी-पेनी कौन? यह मैंने पहले ही पता लगा लिया था। हेनी-पेनी एक नन्हीं मुर्गी की अंग्रेजी लोककथा है जो कई सौ वर्षों से सुनाई जा रही है और आज भी लोकप्रिय है। इस लोककथा को सबसे पहले आस्ट्रेलिया के लोक कथाकार तथा इतिहासकार जोसेफ जेकोब्स ने 1890 में अपनी पुस्तक ‘इंगलिश फेयरी टेल्स’ में संकलित किया था। इसलिए वे ही इस लोककथा के ‘डैडी’ माने जाते हैं।
सुजाता जी ने बताया कि दीप फाउंडेशन ने कमजोर वर्ग के बच्चों में पुस्तकें पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए ‘हेनी-पेनी लाइब्रेरी’ खोली है। बच्चे इन पुस्तकालयों में आकर पुस्तकें पढ़ते हैं और अपना ज्ञान बढ़ाते हैं। दीप फाउंडेशन यूनेस्को के ‘रे आफ होप’ प्रयास से जुड़ा है।
1111हम बच्चों से मिले। वे सभी डा मैस्सी को पापा बोलते हैं। पापा ने अपने बच्चों से हमारा परिचय कराया जिनमें नन्ही बिटिया रानी से लेकर 10-15 वर्ष तक के बालक-बालिकाएं थीं। उनसे बातें करते-करते मैंने उनके मन को पढ़ा और उन्हें जानवरों की लोककथा सुनाई। कि, किस तरह गांव से एक बकरा और बकरी जान बचा कर दूर घने जंगल में गए। वहां अपने जैसे चौपाया जानवरों के साथ रहने लगे। फिर बताया कि कैसे उन्होंने एक धूर्त सियार से अपनी और अपने बच्चों की जान बचाई।
इसके बाद मैंने उन्हें एक चिड़ियाघर के पास से प्रोफेसर गजानन की टाइम मशीन में, सुदूर अतीत में भेजा। वहां उन्होंने जंगलों को कटते और निर्ममता से जानवरों का शिकार होते देखा। वे बहुत दुखी हुए। फिर वे प्रोफेसर गजानन के साथ भविष्य में गए। वहां पचास साल बाद 2065 में एक चिड़ियाघर देखा। बच्चे अपनी कल्पना में यात्रा कर रहे थे। मैंने उनसे पूछा, “वहां तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है दोस्तो?” पहली बार वहां बच्चों से यह सुन कर मैं चकित रह गया, “वहां आदमी बंद हैं।” मैंने पूछा, “लेकिन, चिड़ियाघर में आदमियों को किसने बंद किया?” वे अचकचाए। कुछ देर सोचा। फिर कुछ बच्चे बोले, “जानवरों ने।” कुछ और बच्चे बोले, “रोबोटों ने।” बाड़ों में मनुष्यों के बंद होने की अनोखी कल्पना थी उनकी।
कथा-कहानी सुनाने के बाद मैंने उन्हें अपनी पुस्तक ‘सौरमंडल की सैर’ की एक प्रति हेनी-पेनी लाइब्रेरी के लिए दी। और फिर, हम बच्चों के साथ बाहर आए। सभी ने नीम की छांव में चाय-समोसे का नाश्ता किया। खुले प्रांगण में उन बच्चों को बेफ्रिक होकर, मस्ती के साथ खेलते हुए देख कर मन को बड़ा सुकून मिला।
शाम घिरने को थी। हम बच्चों, उनके पापा डा. मैस्सी, सुजाता जी और आश्रम के अन्य लोगों से विदा लेकर लौट आए।

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