मंडुवा की रोटीः सिसुणा का साग

हाल ही में पहाड़ गया था। लौटते समय थोड़ा मंडुवा का आटा भी ले आया, इस मोह से कि महानगर में मंडुवे की रोटी खाते समय घर की याद आती रहेगी।

याद आती भी रही है। जब-जब मंडुवे की रोटी खाते हैं, मन पंछी उड़ कर घर के खेत-खलिहानों में पहुंच जाता है। मंडुवे की बंद और खुली मुट्ठी जैसी बालियां हवा में झूमने लगती हैं। बालियों की अंगुलियां देख कर ही शायद अंग्रेजी में इसे ‘फिंगर मिलेट’ कहा गया होगा। मुझे याद है, मंडुवे की खेती बड़ी मेहनत-मशक्कत का काम होता था। निराई में मंडुवे के घास जैसे पौधों के बीच खरपतवारों को पहचान कर उखाड़ना पड़ता था। निराई के लिए बैल जोत कर दांतेदार दनेला चलाना आसान काम नहीं होता था। इससे पूरा शरीर बुरी तरह थक जाता था। तब थके और पिड़ाते (दुखते) शरीर को गरमाने के लिए मंडुवे का ‘ल्यट’ यानी काला हलुवा खिलाया जाता था।

मंडुवे की संगत में कुछ दूसरी फसलें भी मजे से उगती थीं- चुवा (चौलाई), लोबिया, कौनी और पहाड़ी खीरे। मंडुवे के खेत में यहां-वहां चौलाई की बड़ी-बड़ी मोटी लाल, सिंदूरी, पीली बालें दूर से ही दिखाई दे जातीं। लोबिया की लंबी मोटी फलियां खूब फलतीं। और, मंडुवे के बीच-बीच में लेटी खीरे की बेल पर मोटे-लंबे खीरे लगे रहते। यानी, मंडुवा मिली-जुली खेती के लिए मुफीद फसल थी। मेहनत तो लगती थी, मगर भरपूर उपज भी मिलती थी। मंडुवा साल भर खाने के काम आ जाता था। इसकी एक अच्छाई यह भी थी कि इसे भंडार में काफी समय तक रखना संभव था। इसलिए अच्छे-बुरे वक्त में मंडुवा काम आ जाता था।

मंडुवे की रोटी का जोड़ीदार माना जाता था ‘सिसुण’ यानी बिच्छू बूटी का साग। लोग कहते थे,‘‘मंडुवा की रोटी भली, सिसुणा को साग’। पंजाब में जो महत्व मक्का की रोटी, सरसों के साग का था, वही पहाड़ में मंडुवा की रोटी, सिसुणा के साग का था। हालांकि, मंडुवा रंगभेद का भी शिकार हुआ लेकिन भोजन के मोर्चे पर अड़ा रहा। आखिर आड़े वक्त में तो वही साथ निभाता था। गेहूं की गोरी और चिकनी, चुपड़ी रोटी खाने वाले खाते-पीते परिवार के समझे जाते। मंडुवा गरीब-गुरबों का भोजन माना जाता। उसकी काली रोटी को कमतर मानने वाले कोई कम नहीं थे। लेकिन, तब किसे पता था कि मंडुवा कोई गया-गुजरा अनाज नहीं बल्कि पोषक तत्वों से भरा भोजन है। रोटी काली है मगर गुणवाली है। इतनी गुणी कि वैज्ञानिक भी कह रहे हैं- मंडुवा खाइए, स्वस्थ रहिए।

मंडुवा, मक्का और चावल से अधिक पौष्टिक माना गया है। पोषक गुणों में यह गेहूं की बराबरी करता है। इसमें प्रोटीन है, खनिज हैं और विटामिन भी हैं। इसकी प्रोटीन बेहतर मानी जाती है क्योंकि उसमें खास तौर पर मेथियोनिन नामक ऐमिनो अम्ल पाया जाता है। रुखा-सूखा और असंतुलित आहार लेने वाले लाखों लोगों के भोजन में इसकी कमी रह जाती है। मंडुवा इसकी भरपाई कर देता है। एक बात और। इसमें कैल्सियम, फाॅस्फोरस और आयरन (लौह) तत्व भी काफी होता है। दूसरे अनाजों की तुलना में मंडुवे में कैल्सियम की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। इसलिए दांतों और हड्डियों को मजबूत बनाता है। इसमें जिंक और गंधक भी होता है। इसके अलावा विटामिन-ए और बी 1 भी पाए जाते हैं।

कुल मिला कर यह कि मंडुवा मोटा अनाज ही सही मगर पोषक अनाज है और चुपचाप गरीबों की थाली में पोषक तत्वों से भरपूर रोटी मुहैया करा रहा है।

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