सुनो वीरेन

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यार अचानक यह खबर

कि, अलस्सुबह चार बजे बरेली से चले गए तुम।

यकीनन नहीं लगी

यकीन करने लायक।

जा कहां सकने वाला ठैरा तुम जैसा

खिलंदड़ा आदमी?

अरे, जहां रहे, तुम तो वहीं रहे सदा

जैसे नैनीताल, जैसे इलाहाबाद, या फिर दिल्ली

या तुम्हारा प्यारा बरेली।

वहां रहे तो वहीं रहे ना? बोलो गुरू?

पूछ लो किसी से भी

जवाब मिलेगा- यहीं है वीरेन।

हां, कुछ यार-दोस्त कहते जरूर थे कि

तुम्हें देखा लखनऊ में, दिल्ली में

और न जाने कहां-कहां।

वहां सुनते रहे, तुम्हारी कविता के रसिक तुम्हारे मुख से

तुम्हारी कविताएं।

सुनो प्यारे, वहां से लौटे ही कब तुम?

वे बताते हैं, अब भी तुम्हारा वहीं का

अता-पता।

इसलिए यकीन करने लायक नहीं है

यह खबर कि

वीरेन चला गया अलस्सुबह बरेली से।

हां, हो सकता है

किसी से कहा हो तुमने

कि, तुम जा रहे हो

नैनीताल, इलाहाबाद, दिल्ली, लखनऊ या रांची

और जल्दी लौट आवोगे।

मुस्कराए होंगे वे यह सुन कर

और, कहा होगा मन ही मन

कि कह लो वीरनेदा, कह लो

पर जानते हैं हम कि तुम

कहीं नहीं जावोगे

यहीं रहोगे हमारे बीच।

अच्छा सुनो वीरेन

याद है तुम्हें आधी सदी पहले

जब एकाकी रहने वाला मैं

देवेन एकाकी हो गया था

तो तुमने भी वीरेंद्र से इंद्र को

दफा कर दिया था!

शहर नैनीताल में तब हम

साहित्य की तख्ती में

बारहखड़ी लिखना सीख रहे थे-

झील की लहरों से,

रातों को सड़क पर भागती चिनार की पत्तियों,

पहाड़ों से उतर कर

पेड़ों से गलबहियां भरते कोहरे,

चहकती चिड़ियों, हवा के झौंकों,

नावों और नाव चलाने वालों,

रिक्शा चालकों,

सर्दी से ठिठुरते लोगों

और नेपाली मजदूरों से।

तुम सजाते गए अपने शब्द कविता में

और मैं अपने गद्य में।

याद है तुम्हें

उखड़ जाता था सईद

जब तुम भरी माल रोड में

उसे टांगों से जकड़ कर

उठा लेते थे हवा में?

तब मुझे बेटा कहने का दम

पिता के अलावा केवल तुम में था

तुम धीरे से आते और

मेरी कहानियों में

प्रवेश कर जाते थे।

और हां,

लड़कियों के बारे में तुम्हारे वे

रहस्यमय, मनगढंत किस्से

जो तुम एकांत में

सिर्फ मुझे और मुझे ही

सुनाते थे!

तुम्हारी वे हरकतें

जो केवल तुम और तुम ही

कर सकते थे प्यारे।

याद है तुम्हारा वह

गहराती शाम के अंधेरे में

हमें डी एस बी के पीछे

सड़क ऊपर, जंगल में ले जाना

और सन्नाटे में सहसा हंसने-रोने की

अजीबो-गरीब आवाजें निकाल कर

आते-जाते इक्का-दुक्का राहगीर के

होश उड़ा देना!

फिर, अचानक “अबे भागो, क्या कर रहे हो?

पकड़े जावोगे”, कह कर

हमें भी भयभीत करना, और

सिर पर पैर रख कर

भागने की हिदायत देना।

अपने नटखट अंदाज में एक बार

नाव में हमें बिठा कर, उसे

धीरे से ताल में धकेल कर

तुम कूद गए थे

नाव का निशाना चूक कर

गहरे पानी में!

खींचा था हमने तुम्हें

तुम्हारा भीगा, हरा

ट्वीड का कोट पकड़ कर

और फिर घर में डांट से बचने के लिए

राक हाउस के मेरे कमरे में

सुखाए थे तुम्हारे कपड़े हीटर पर!

जब तुम नैनीताल के अलावा

इलाहाबाद में भी थे

याद है, गंगानाथ झा हास्टल में तुमने

दिया था मुझे एक

चीनी मिट्टी का चिकना गिलास

जिसकी सतह पर

आज भी तैर रहीं हैं वे मछलियां दोस्त।

और, पंतनगर को तो कहां भूले होगे दोस्त

जहां तुम पास के नगर से

कोयले के ट्रक में गिरते-पड़ते

बीयर की तीन बोतलें लाए थे।

बैठक में बैठ कर हम दोनों

पीते हुए कहते रहे-

असली आनंद तो तीसरी बीयर में बंद है।

कि, तभी कुहनी लगी,

भटाक की आवाज के साथ

और, सीमेंट के फर्श पर फैल गया था

वह प्रतीक्षित आनंद।

हम चौपाए बन कर

चूसना चाहते थे वह आनंद

कि पत्नी ने बुहार दिया उसे।

 

और, वह हम्माद के घर में

देशी-विदेशी शास्त्रीय संगीत की वे चुनिंदा

मनमोहक और दुर्लभ धुनें

और, मित्र मंगलेश के नायाब आलाप।

रात के तीसरे पहर हुए थे

घर जाने को तत्पर

लेकिन, छोड़ने को नहीं हुआ तैयार

हम्माद का वह हर वक्त का साथी स्कूटर

और, सोता रहा रात्रि के उस तीसरे पहर

पंचर पहिए पर सिर टिका कर।

बिलकुल सुनसान था

उस रात नवाबों का वह सोया हुआ शहर

और, पैदल नापी थी हमने

उस पाश कालोनी से

हजरतगंज के मुहाने तक की वह सड़क

जहां सोए थे फुटपाथ पर

दिन भर के थके-मांदे रिक्शा चालक।

“भला कौल चलेगा इतनी देर रात वीरेन?”

जवाब में तुमने कहा था-

“केवल यही मेहनतकश रिक्शा वाले दोस्त

जो बखूबी समझते हैं किसी की

बेटाइम परेशानी का अर्थ।”

जाग गया था वह रिक्शा वाला

तुम्हारी आवाज और प्यार भरी थपकी से

और, सचमुच चल पड़ा था तुम्हें घर तक छोड़ने

निशातगंज के उस पार।

 

तरह-तरह के सोम रसों का स्वाद

देर रात तपते-बुझते

हीटर के केवल एक तार पर

भरे-पूरे कुकर में

खिचड़ी उबालने की

असंभव को संभव बनाने की कठिन कवायद,

वह भी कहां भूले होगे दोस्त।

भूले नहीं होगे पंचकूला की वह देर रात भी

जब देश की सोहबत में

कविता और कवियों और किताबों और दोस्तों

और जगहों से गुजरते हुए

हम आंगन में आकर

तारों भरे आकाश को छूने लगे थे!

और उस रात इंतजार करती थी तुम्हारी

बरेली की ट्रेन।

दूरभाष पर यदा-कदा

दुर्लभ संवाद में

दिल से पूछते थे तुम

‘देबदा, यार क्या हो रहा ठैरा?

लछिम बौ को प्रणाम कहना।’

लछिम तुम्हारी क्लास फैलो हुई,

साठ की सरहद पार कूदने को

तत्पर तुम,

आंखों में जुगनू चमकाते

अल्हड़ लड़कों की उत्कंठा से उससे पूछते

“बी.ए. में क्या कहती थीं

क्लास की लड़कियां मेरे बारे में लछिम बौ?”

दोस्त, बहुत दिनों बाद

मैं आया था तुम्हें देखने

दिल्ली के राकलैंड अस्पताल के

उस वार्ड में

जहां तुम सोए थे गहरी नींद में

आपरेशन के बाद।

फिर कविताओं में ही भेंट हुई तुमसे

यदा-कदा जब जहां संभव हुआ।

 

अभी चंद दिन पहले ही तो

देहरादून में मिले थे तुम

पुस्तक मेले में

जहां धूप खिले चेहरे से

मुस्करा रहे थे तुम

‘कवि ने कहा’ की अपनी

चुनिंदा कविताओं के कवर पर।

ले आया मैं

तुम्हारा वह चमकता चेहरा

कि, बच्चू अब कहां जावोगे बच कर?

कि, अचानक यह खबर

कि चले गए हो तुम

आज अलस्सुबह चार बजे बरेली से।

चटपट खोजी वह किताब

और देखा,

नहीं तुम कहीं नहीं गए

मौजूद हो वहीं

अपनी कविताओं में

मुस्कराते, चमकते चेहरे के साथ।

 

  • देवेंद्र मेवाड़ी (28 सितंबर 2015, 3.45 बजे)

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