मंदाकिनी घाटी में

हिम मंडित चौखंबा का भव्य शिखर
हिम मंडित चौखंबा का भव्य शिखर

दिल्ली लौटकर लग रहा है जैसे किसी स्वप्नलोक से लौट आया हूं।

गुप्तकाशी के तमाम दृश्य मन में उभर कर, रह-रह कर उस स्वप्नलोक की याद दिलाते हैं। पहाड़ों के पैताने दूर तक बहती वह दूधिया मंदाकिनी, चारों ओर खिले पुष्प की पंखुड़ियों की तरह उठे ऊंचे नीले पहाड़, उस पार उत्तर में दमकता हिम मंडित चौखंबा का भव्य शिखर, उसके बाईं ओर चमकती केदारनाथ की धवल चोटी….ओह, सब कुछ कितना अद्भुत, कितना स्वप्निल।

मुझे कहां पता था कि कभी इस तरह अचानक यहां दूर पहाड़ों के बीच गुप्तकाशी के इस गांव में भी आकर बच्चों से विज्ञान की बातें करने का मौका मिल जाएगा? मैंने तो फेसबुक मित्र श्रीमती उमा भट्ट को एक बार इतना भर लिखा था कि कभी रूद्रप्रयाग आकर वहां स्कूली बच्चों से विज्ञान की बातें करना चाहता हूं। और, अब एक अरसे बाद उनका फोन आया तो उन्होंने बताया, आपको गुप्तकाशी के एक स्कूल में चलना है। शाम तक गुप्तकाशी के उस स्कूल के अध्यक्ष लखपत सिंह राणा जी का भी फोन आ गया। वे बोले, “हमारे स्कूल में आपका स्वागत है।” उन्हें शायद उम्र की जानकारी दे दी गई थी। इसलिए कहने लगे, “आप तो पिता समान हैं। आइए, यहां आपको कोई दिक्कत नहीं होगी।” मैंने कहा, “आप पिता समान कह रहे हैं राणा जी। एक बार भेंट हो जाएगी तो फिर आप मुझे दोस्त के समान मानने लगेंगे।”

दिल्ली से देहरादून और देहरादून से गुप्तकाशी की राह पकड़ी। मैं उत्साह के साथ यात्रा की तैयारी में जुट गया। रकसैक कसा और पत्नी लक्ष्मी के साथ दून शताब्दी से सफर पूरा करके देहरादून, मित्र एम.एस. बिष्ट जी के घर पहुंचा। वहां से उमा जी के मार्गदर्शन में अगले दिन सुबह 8 बजे लगभग सवा दो सौ किलोमीटर दूर गुप्तकाशी के लिए प्रस्थान किया। रूद्रप्रयाग तक श्री भट्ट और उनके भाई का भी साथ था। भाई साहब ही नई गाड़ी चला रहे थे जो हवा से बातें करते हुए हमें हरे-भरे जंगल के बीच से ऋषिकेश की ओर ले चली। पता लगा, यहां कई बार हाथी भी सड़क को पार करते हुए मिल जाते हैं। हम मुनि-की-रेती को पीछे छोड़ कर व्यासी पहुंचे। वहां राणा जी के ढाबे पर आलू के चटपटे गुटकों के साथ चाय पी।

गाड़ी फिर उड़ चली। हमारे दाहिनी ओर स्वच्छ और धीर-गंभीर गंगा बह रही थी। हम पहाड़ों के सीने पर मोड़-दर-मोड़ पार करते जा रहे थे कि आगे की सीट पर बैठी उमा जी ने पीछे मुड़ कर कहा, “देखिए, सामने तोता घाटी।” तोता घाटी? मैंने पूछा तो उन्होंने कहा, “हां, सुना है, सड़क उस पहाड़ी की चट्टान के कारण आगे नहीं बढ़ रही थी। तब यहीं के निवासी किसी तोता सिंह ने दशरथ माझी की तरह उसे काट कर रास्ता बना दिया था।” मैंने देखा, सामने पहाड़ी का कटा हिस्सा दिखाई दे रहा था। उसे पार कर आगे बढ़ते रहे। सत्रह-अठारह किलोमीटर आगे बाईं ओर के ऊंचे पहाड़ों की ओर इशारा करके फिर उमा जी ने कहा, “यह दाल घाटी है।” मैं फिर चौंका। पूछा, “दाल घाटी कैसा नाम है?” वे बोलीं, “पहाड़ पर गौर से देखिए, जंगल-झाड़ियों के बीच तरतीबवार दाल बोई हुई है। गहत के पौधे दिखाई दे रहे हैं।” हां, वहां दाल के पौधे दिखाई दे रहे थे। गहत यानी कुलथी या होर्स ग्राम। मैंने कहा, “लेकिन, यहां इस फसल को देखता कौन है?” उन्होंने कहा, “कोई नहीं। लोग आकर, जगह साफ करके गहत बो जाते हैं। जब फसल पक जाती है तो उसे काट कर ले जाते हैं। इस तरह गहत की उपज मिल जाती है।” “अद्भुत!” मैंने कहा, “झूम खेती का नमूना है यह।” उन्होंने वहां दाहिनी ओर जंगल में बहुतायत से उगे जैट्रोफ़ा के पौधे भी दिखाए।

पहाड़ के मोड़ों को तेज गति से पार करती गाड़ी ऋषिकेश से लगभग 70 किलोमीटर दूर देवप्रयाग पहुंची। मैं भागीरथी और अलकनंदा का संगम देख कर चहक उठा। कहा, “यहां एक मिनट रोक दीजिए। फोटो लेना चाहता हूं। सड़क किनारे गाड़ी रूकी तो कैमरा लेकर बाहर कूदा। लेकिन, यह क्या? कैमरे ने साथ नहीं दिया। संगम के उस दुर्लभ दृश्य का क्या होगा? निराशा में ही ध्यान आया, मोबाइल के कैमरे से ही फोटो खींच लूं। मैंने कुछ फोटो खींचे और उमा जी से अनुरोध किया कि कुछ वे खींच दें। काम चल गया। हम भागीरथी का पुल पार कर पहाड़ पर आगे बढ़े। आगे और आगे।

कीर्तिनगर, श्रीनगर होते हुए श्रीकोट से धारीदेवी पहुंचे। श्रीनगर से वहां तक रुकी-थमी अलकनंदा के बांध का पानी विशाल झील का रूप ले चुका था। धारीदेवी मंदिर को नई तकनालाजी से बांध में उसके ही मूल स्थान पर ऊपर उठाया जा रहा था। कलिया सौड़ तक बांध का पानी डबाडब भरा हुआ दिखाई देता रहा। कल की कल-कल बहती अलकनंदा की जगह वह विशाल झील देख कर ही शायद वहां कोई पक्षी भी उड़ता नहीं दिखाई दिया। नदी के चहेते पंछी बांध के पानी को समझने की कोशिश कर रहे होंगे। नदी किनारे के जिन गोल पत्थरों और रेत के आसपास उन्हें जो भोजन मिलता रहा होगा, वह अब डबाडब पानी में डूब चुका था।

उस पार पहाड़ के पैताने नदी की रेत में शायद गलती से भटका या प्यासा एक घुरड़ जरूर दिखा, जिसके पैर रेत में चलने पर धंस रहे थे। वह सहमा हुआ यहां-वहां देख रहा था। खांकरा, नारकोटा और गुलाब राई होते हुए हम रूद्रप्रयाग पहुंच गए। गुलाब राई? अरे, यह तो वही जगह है जहां पर कभी जिम कार्बेट ने रूद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ मारा था।

गाड़ी रूकी। दोनों सहयात्रियों को कहीं आगे जाना था। उमा जी ने बताया, अब आगे की यात्रा ट्रैकर में करेंगे। एक ट्रैकर में जगह मिल गई। रकसैक ट्रैकर की छत पर लिटा दिया गया। भयंकर उमस थी। उमा जी को आगे की सीट मिल गई। मैं पिछली तिरछी सीट पर तिरछा होकर बैठ गया। सवारियां आती रहीं। आठ सीटों पर 13 सवारियां! उनमें से एक दम्पति दो दिन के नवजात बच्चे को लेकर सफर कर रहे थे। एक भाई जी पतली बीड़ी का सुट्टा मारते हुए भीतर घुस ही रहे थे कि मैंने हाथ जोड़ दिए, “भाई जी, बीड़ी बाहर पी लो।” सज्जन थे, मान गए। ड्राइवर से चलने को कहा तो पता लगा एक सवारी खाना खा रही है।

बमुश्किल चलने का मुहूर्त आया और ड्राइवर ने फुल वाल्यूम में फड़कते गीत लगा कर गाड़ी आगे बढ़ाई। गाड़ी चलने के साथ ही मेरे ठीक आगे, किनारे की सीट पर बैठी युवती ने खिड़की से बाहर को उखालना (उल्टियां) शुरू कर दिया। छीटों से बचने के लिए मैंने अपना छोटा बैग मुंह के आगे लगा लिया।

गनीमत बस अब यह थी कि अब मंदाकिनी के किनारे-किनारे सीधे चलना था। सिल्ली पार कर तिलवाड़ा पहुंचे। वही तिलवाड़ा जहां पर 31 वर्ष पहले जून 1984 में पत्रकार मित्र नवीन जोशी और मैं बस से उतर गए थे और टिहरी के पहाड़ की चोटी पर नाथगांव तथा धरियांज गांव में पहुंचे। थे। हम वहां गांव में एक रात रुके भी थे।

तिलवाड़ा, अगत्स्यमुनि, पेडूबगड़, चंद्रावती और उससे आगे भी बगल में बाईं ओर बहती मंदाकिनी के उस पार पहाड़ वर्ष 2013 की भयानक आपदा की कहानी कह रहे थे। पहाड़ के पैताने की उतरी परतें और हुंकारती-फुंकारती, हरहराती नाराज नदी के नाखूनों के गहरे निशान सवा दो साल बाद भी वहां मौजू़द थे। उमा जी बता रही थीं, वहां नदी किनारे के कई स्कूल और मकान बह गए थे। अगत्स्यमुनि के पास मंदाकिनी के ऊपर केबल के तार से लोगों को आर-पार उतारने वाली लोहे की ट्राली झूल रही थी। कई जगह सड़क इतनी संकरी हो गई थी कि गाड़ियां सरक-सरक कर आगे बढ़ रही थीं। कई जगह क्रुद्ध मंदाकिनी ने मनुष्यों की बनाई पुरानी सड़क ही नेस्तनाबूद कर दी थी। वहां पहाड़ पर नई सड़क बना दी गई थी।

बांसवाड़ा पहुंचे तो उमा जी ने मंदाकिनी के उस पार चीड़ के हरे-भरे पेड़ों से ढकी धार (पहाड़ी) की ओर इशारा करके कहा, “वहां देखिए, पेड़ों के बीच एक पुराना मकान दिखाई दे रहा है।” मैंने ट्रैकर की खिड़की से वह मकान देखा। उन्होंने कहा, “पवालिया है उस गांव का नाम और उस मकान में चंद्रकुंवर बर्तवाल रहते थे।”

“चंद्रकुंवर बर्तवाल! प्रकृति का वह अनुपम चितेरा कवि जिसने कभी नीचे कल-कल बहती इसी मंदाकिनी को देखकर ये पंक्तियां लिखी होंगी: “हे तट मृदंगोत्तालध्वनिते/लहर वीणा-वादिनी/मुझको डुबा निज काव्य में/हे स्वर्ग सरि मंदाकिनी!” अपने जीवन के अंतिम छह वर्ष उन्होंने इसी मकान में बिताए थे।

हम भीरी, काकड़ागाड़ और कुंड होते हुए गुप्तकाशी पहुंचे तो वहां बाजार में नवीन हमारा ही इंतजार कर रहा था। उसके साथ गाड़ी में बैठ कर दो-एक किलोमीटर आगे नरोत्तम गांव में जैक्स वीन नेशनल स्कूल के पास पहुंचे। मुझे वहीं स्कूल में रुकना था। स्कूल के संस्थापक और अध्यक्ष लखपत सिंह राणा छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के अधिवेशन में भाग लेकर आज ही देर रात तक लौटने वाले थे। नवीन भारी रकसैक की ओर लपका तो मैंने कहा, “नहीं, नहीं, अपना बोझ मैं खुद उठाता हूं।”

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जैक्स वीन नेशनल स्कूल

सड़क के नीचे उतर कर तिमंजिला स्कूल में पहुंचे। वहां पहली मंजिल पर ही राणा जी का निवास था। घर में उनकी श्रीमती जी विजयलक्ष्मी, बिटिया वंशिका और बेटे मानव तथा श्रेष्ठ। सभी पैर छू कर प्रणाम करने लगे। मैं मना ही करता रह गया। विजयलक्ष्मी बोलीं, “हमें कुछ ऐसा पता था कि कोई बड़े बुजुर्ग आने वाले हैं।” मैंने कहा, “मैं ही हूं वह।” मिल कर बच्चे खुश हो गए। नन्हे श्रेष्ठ ने कमरा दिखाते हुए कहा, “आपका कमरा यह है। जूते बाहर उतारने हैं।” मैं जूते बाहर उतार कर कमरे में गया। साफ-सुथरा और शांत कमरा, डबल बेड और एक तरफ पूजा के लिए मंदिर। दीवारों पर संतों, महापुरूषों के फ्रेम किए हुए चित्र। मंदिर में दीए की लौ प्रकाश फैला रही थी। दैवी माहौल था। ‘अतिथि देवो भव’ के लिए सर्वथा उपयुक्त।

तभी श्रीमती राणा ने कहा, “आप लोग खाना खा लीजिए। लंबी यात्रा में बहुत भूख लगी होगी।”

उमा जी और मैंने कहा, “नहीं, अभी रहने दीजिए।” वे नहीं मानी।

पूछा, “किस चीज की रोटी खाएंगे- गेहूं या कोदा?”

मैंने कहा, “अगर मंडुवा (कोदा) है तो मैं उसकी एक रोटी खाऊंगा।”

दिल्ली में ‘प्रभात खबर’ अखबार के कृषि और किसानों पर केन्द्रित दीपावली विशेषांक के लिए वैकल्पिक फसलों पर ताजा लेख लिख कर आया था। कोदा (मंडुवा) सुन कर मन प्रसन्न हो गया।

खाना खा कर बाहर खुले बरामदे में आया तो चारों ओर देखता ही रह गया। सामने ऊखीमठ का विशाल पहाड़ जिसकी चोटी के पास सुना देवरिया ताल है। दाहिनी ओर की नीली पर्वतमाला के पीछे तुंगनाथ की चोटी दिखाई दे रही थी तो उत्तर में नीला-हरा मध्य महेश्वर का शिखर था। चौखंबा के हिम शिखर से बादल अठखेलियां कर रहे थे।

DSCN41011111नीचे बहती मंदाकिनी। स्कूल से नीचे दूर तक फैले सीढ़ीदार खेतों में धान की पकी हुई पीली फसल। जगह-जगह धान की कटाई चल रही थी। चाय पीते हुए पश्चिम के ऊंचे पहाड़ को देख ही रहा था कि वहां ढलता सूरज और श्वेत बादल आंख मिचौली खेलने लगे। ढलते-ढलते सूरज ने बादलों के बीच से आसमान में दूर तक अपनी किरणों की तेज सर्च लाइट फैंकी और फिर सांझ घिर आई। ऐसा सम्मोहक दृश्य था कि संध्याबाती की उस वेला में कानों में स्वतः ही जागर के बोल गूंजने लगे:

ए संध्या झुकि गैछ भगबानो, नीलकंठ हिमाला

ए संध्या झुकि गैछ हो देबो अगासा रे पाताला!

अंधेरा गहराने के साथ ही ऊखीमठ का पहाड़ जगमगाती बिजली के बल्बों से हजारों सितारों की तरह चमक उठा। एक, दो, चार, छः करके तारे उगते गए और धीरे-धीरे पूरा आसमान तारों से भर गया। मानव बेटे ने इशारा करके बताया कि ऊखीमठ में उन दो रोशनियों के पास के प्राचीन मंदिर में उषा और अनिरूद्ध का विवाह हुआ था। कहते हैं, वह मंडप आज भी मौजूद है लेकिन देखने की अनुमति नहीं है। बीच में खाने के लिए पूछा गया तो मैंने कहा, “राणा जी आ जाएं तो साथ खाएंगे।”

बिजली की झिलमिल रोशनी और खामोश नीले पहाड़ों को देख कर बाद में भीतर आया तो अचानक आवाज आई, “प्रणाम सर!” उस गौरववर्ण युवक को गौर से देखा।” किस समय आए आप?” पूछा तो मैंने बताया। मुझे लगा कहीं यही तो राणा जी नहीं? मैंने तो मन में एक अधेड़ व्यक्ति के रूप में उनकी छवि बनाई थी। वे बोले, “नहा कर अभी आता हूं। फिर बातें करते हैं।”

वे आए तो हम खाना खाते-खाते आधी रात तक बातें करते रहे। मैं उनकी और उनके स्कूल की कहानी सुनता रहा और उन्हें संक्षेप में अपनी कहानी बताई। तभी पता चला कि उनके स्कूल का नाम जैक्स वीन नेशनल स्कूल क्यों है? कौन हैं ये राणा जी और कौन जैक्स वीन?

आइए, सुनते हैं इनकी कहानी।

गुप्तकाशी में एक जगह है, कालीमठ। वहां तीर्थयात्री आते रहते हैं। वहीं गांव में कभी एक मजदूर परिवार रहता था, घास-फूस की छत के नीचे एक कमरे में। मजदूर श्री मुकुंदी सिंह राणा, उनकी पत्नी श्रीमती यशोदा देवी, दो बेटे और एक बहिन। आजीविका का साधन, सिर्फ दिन भर मजदूरी। परिवार के भरण-पोषण के लिए कालीमठ से चार किलोमीटर दूर दयुण गांव में कुल पुरोहितों यानी पंडितों के खेतों में रात में भी मजदूरी कर लेते थे। इसके अलावा बस एक भैंस का सहारा था। कुछ और आमदनी के लिए पिता ने चाय की दुकान खोली। बड़ा बेटा तेज था। ग्राहकों को चटपट चाय पिलाता। उनसे बातें करता।

उन्हीं ग्राहकों में पास के एक किराए के कमरे से 24-25 वर्ष का एक विदेशी युवक भी आने लगा। बच्चा उनसे भी खूब हिल-मिल गया। युवक दूर देश फ्रांस से ध्यान योग और आध्यात्म सीखने आया था। वे चिकित्सा विज्ञान में एम डी और मनोचिकित्सक थे। बच्चे को ध्यान का क्या पता? वह मौन बैठे युवक को छेड़ता रहता। युवक उसे समझाता। उसे स्कूल जाने और पढ़ने के लिए कहता। लेकिन, स्कूल में पढ़ने के लायक आमदनी नहीं थी। वह बार-बार युवक से उसका नाम पूछता। युवक बताता- जैक्स वीन। बच्चे ने वह नाम रट कर याद कर लिया। जैक्स वीन कभी दुकान पर चाय पीने आते, कभी बच्चा उनके कमरे में चाय दे देता।

डा. जैक्स वीन ने मजदूर पिता को समझाया कि बच्चे को स्कूल भेजना चाहिए। पढ़ाई का खर्च स्वयं देने की बात की। और, इस तरह वह बच्चा यानी लखपत सिंह राणा स्कूल जाने लगा। पढ़ने में तेज था इसलिए पास होकर आगे बढ़ता रहा। राजकीय इंटर कालेज कोटमा, रुद्रप्रयाग से हाईस्कूल तथा इंटर और हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय, गढ़वाल से उच्च शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान ट्यूशन करता रहा। पढ़ाई करके गांव के चाचा के पास कुरुक्षेत्र चला गया। वहां भी ट्यूशन किए और फिर एक पब्लिक स्कूल में भी कुछ अरसे तक पढ़ाया। फिर लखपत का मन बैचेन हुआ कि ऐसा एक स्कूल उसके अपने इलाके में भी होना चाहिए। यही निश्चय करके वह गुप्तकाशी वापस लौटा। डा. जैक्स वीन ने उसका स्वागत किया और उसे स्कूल खोलने के लिए प्रेरित किया।

वर्ष 1998 में भीषण वर्षा के दौरान भूस्खलन में एक कमरे का वह घर बह गया। परिवार के लोग बच गए और भैंस भी। पिता मजदूरी और भैंस का दूध बेच कर परिवार का खर्च चलाते रहे। वे कालीमठ से बसेरा उठा कर गुप्तकाशी के गांव में आ गए। वहां सिर छिपाने की जगह खोजी।

डा. जैक्स वीन के साथ ही उनके भतीजे और उनके मित्रों से मिली मदद से एक किराए के कमरे में स्कूल शुरू किया। शिक्षा की यह ज्योति डा. जैक्स वीन ने जगाई थी, इसलिए स्कूल का नाम रखा डा. जैक्स वीन नेशनल स्कूल। और, इसके संस्थापक तथा अध्यक्ष हैं, तब का वही बच्चा यानी लखपत सिंह राणा।

यह केवल कहानी नहीं बल्कि जिंदगी की सच्ची कहानी है जो हमें प्रेरणा देती है कि अगर हिम्मत, इच्छा और लगन हो तो कितनी ही और कैसी भी कठिनाइयों का सामना करके जीवन में सफलता पाई जा सकती है। आज जैक्स वीन नेशनल स्कूल की अपनी तिमंजिला इमारत है, पढ़ाई के कक्ष हैं, छात्रावास है, भोजन का मैस है, खेल का मैदान है और उन्हें प्यार से पढ़ाने और सिखाने वाले शिक्षक-शिक्षिकाएं हैं। स्कूल बारहवीं कक्षा तक अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा के लिए सी बी एस ई से मान्यता प्राप्त है। कर्मचारी भविष्य निधि के लिए पंजीकृत है। स्कूल में वर्तमान में 525 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं।  40 विद्यार्थी छात्रावास में रह रहे हैं। स्कूल में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे वर्ष 2013 की केदार घाटी आपदा से पीड़ित परिवारों से हैं। कुछ बच्चों के माता-पिता गरीबी के कारण उन्हें पाल-पोस या पढ़ा नहीं सकते। वे छात्रावास में रहते हैं।

राणा जी बताते हैं, वर्ष 2013 की भीषण आपदा के समय स्कूल की ओर से लगभग 3,000 पीड़ित तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की मदद की गई। स्कूल के कमरों में लोगों को आश्रय दिया गया। तब मैस में बड़े पैमाने पर खिचड़ी पका कर भोजन की व्यवस्था की गई थी। आपदा के दिनों में वे अपने दो-चार साथियों के साथ उफनती मंदाकिनी नदी के किनारे जाते रहे। वे अपने साथियो के साथ अस्पताल से शवों को ले जाते और अंतिम संस्कार के लिए शवों के सीने पर दो-दो अगरबत्तियां जला कर उन्हें नदी में प्रवाहित कर देते। उफनती नदी में बाकी कुछ संभव ही नहीं था। तब कई गैर सरकारी संस्थाओं और लोगों ने मदद की थी। डा. जैक्स वीन का मदद का हाथ तो सदा ही साथ रहा। आज भी साथ है। अब वे ब्रहमचारी विज्ञानानंद कहलाते हैं और अल्मोड़ा के एक दूरस्थ स्थान में मां आनंदमयी आश्रम में आध्यात्मिक जीवन बिता रहे हैं।

आधी रात बीत चुकी थी। मैंने कहा, अब विश्राम किया जाए। मैं भी अपने कमरे में विश्राम करने चला गया, यह सोच कर कि एकदम सुबह उठ कर चैखंबा का शिखर देखना है। सुबह पांच बजे का अलार्म भी लगा लिया। अलार्म बजने से पहले उठा और बरामदे में जाकर चैखंबा को देखा। वहां अभी रोशनी कम थी। सामने ऊखीमठ के पहाड़ के ऊपर आसमान में भोर का तारा दमक रहा था। दाहिनी ओर, ऊपर व्याध तारामंडल के तारे चमक रहे थे। मैं देर तक उन्हें देखता रहा। फिर अपने रकसैक से अपनी छोटी-सी इलैक्ट्रिक कैटल निकाल कर पानी गरम किया। नींबू पानी पिया और गिलास में ग्रीन-टी बना कर बरामदे के छोर पर जाकर फिर से खड़ा हो गया। मुझे उगते सूरज का इंतजार था।

पूर्व में ऊखीमठ और मध्य महेश्वर के शिखरों के पार कहीं सूरज ने अपनी दिन की यात्रा शुरू कर ली थी। आसमान में तैर रहे रुई के फाहों से चंद बादलों के टुकड़ों पर सहसा लालिमा छाने लगी। चौखंबा के शिखर पर रोशनी का टीका चमका। और, तभी मैंने देखा तुंगनाथ शिखर की ओर से जैसे आसमान में सुनहरी भेड़ों का रेवड़ तेजी से धूप चरने के लिए आगे बढ़ चला। बादलों के वे टुकड़े सूरज की सुनहरी किरणों से स्वर्णिम हो गए। “अद्भुत!” मैंने कहा और मनोहारी मंदाकिनी घाटी को दूर तक देखता रहा। घाटी में हलकी धुंध उठने लगी थी। बादल प्यार से चौखंबा से गलबहियां भरने लगे।

आज ही बच्चों को विज्ञान आख्यान सुनाना था। इसलिए नहाने की तैयारी में लग गया। राणा जी नहा-धोकर व्यवस्था देखने चले गए। मैं नहा कर तैयार हुआ तो नाश्ता भी तैयार था। अद्भुत! मार्छा यानी रामदाना की मुलायम रोटी, घी, पहाड़ी पालक का साग और घर का दही! “मार्छा की रोटी गर्मा-गर्मा ही खानी है घी के साथ” बहू विजयलक्ष्मी ने कहा तो रोटी का निवाला लिया। कितना कोमल, कितना स्वादिष्ट! पहाड़ के इस स्वर्ग में स्वर्गिक भोजन। याद आया, कभी दक्षिणी अमेरिका में इंका और मय सभ्यताओं की प्रमुख फसल था रामदाना यानी चौलाई।

DSCN416111बच्चों से मिलने का समय हो रहा था। राणा जी ने कहा, “आइए, पहले स्कूल दिखा दूं।” उन्होंने एक कमरे का संग्रहालय दिखाया, फिर पुस्तकालय, वीडियो कांफ्रेस कक्ष जिसमें बच्चे, आनलाइन पढ़ाई कर सकते हैं, फिर नर्सरी के नन्हें बच्चों की कक्षा। उन्होंने बड़ी कक्षाओं के कमरे दिखाए और फिर छात्रावास, मैस तथा भोजन कक्ष। प्रधानाचार्य सुनीता रानी जी और शिक्षक-शिक्षिकाओं से परिचय कराया। प्रांगण में बच्चे जमा हो चुके थे। हम उनके पास गए। उन चहकते बच्चों के स्वागत बोल चिड़ियों के मधुर कलरव से सुनाई दे रहे थे। मुझे पहले कहानी सुनानी थी और फिर उन्हें सौरमंडल की सैर पर ले जाना था।

तो, पहले बच्चों को बातों में लगाया और फिर बातों-बातों में उन्हें बताया कि अब मैं तुम्हारी ही उम्र का बच्चा रवि बन जाता हूं और तुम्हें अपनी कहानी सुनता हूं। दोस्तो, मैं रवि और मेरे सहपाठी विजय, चेतन, मनु और मानसी पहाड़ में पैदा हुए। वहीं पले-बढ़े। वहीं स्कूल जाने लगे। हमारे गांव में हरा-भरा, घना जंगल था। वहां खूब जंगली जानवर रहते थे। हमारे गांव में सुबह-शाम रंग-बिरंगी चिड़ियां चहचहाया करती थीं। लेकिन, एक दिन हमें गांव से शहर आना पड़ा। हम यहीं पढ़ने लगे। हमें अपने गांव के पशु-पक्षी बहुत याद आते थे। उन्हें याद कर हम अक्सर उदास हो जाते।

जानते हो हमने फिर क्या किया? हम ‘ज़ू’ यानी चिड़ियाघर जाने लगे। वहां पशु-पक्षियों को देखते। एक बार वहां हमें डा. गजानन अंकल मिले। वे हमें अपने कालयंत्र में अतीत में ले गए। वहां हमने खूब चीते भी देखे। लेकिन, पशु-पक्षियों का निर्ममता से शिकार होते भी देखा। हम दुःखी होकर लौट आए। सप्ताह भर बाद गजानन अंकल हमें भविष्य की यात्रा पर ले गए। वहां हमने पचास साल बाद का चिड़ियाघर देखा। उसमें हमने देखा…

क्या देखा? मैंने यानी रवि ने पूछा, “दोस्तो, जरा सोचो, चिड़ियाघर में हमने वहां क्या देखा होगा? मान लो तुम लोग पचास साल बाद वहां गए, तो बताओ तुमने वहां क्या देखा?”

बच्चों ने मजेदार जवाब दिए। कल्पेश ने कहा, “वहां तो कोई पेड़-पौधे या पशु-पक्षी थे ही नहीं।” लेकिन, दीक्षा बोली, “वहां तो केवल रोबोट थे!” वंशिका ने एक नई कल्पना की। उसने कहा, “वहां आज के आइसक्रीम के ठेलों की जगह आक्सीजन के ठेले लगे थे। लोग सांस लेने के लिए आक्सीजन खरीद रहे थे।” नितिन का जवाब था, “वहां पेड़-पौधे होंगे, आज से भी अधिक,” तो वैष्णव का कहना था, “चिड़ियाघर में और बाहर भी वहां रोबोट ही रोबोट थे।”

शुभ शुक्ला की कल्पना थी, “हर जगह मकान ही मकान ही मकान थे, पेड़-पौधे नहीं। मंदाकिनी नदी में बहुत कम पानी रह गया था। लोग स्वार्थी हो जाएंगे। अपने ही बारे में सोचते थे, प्रकृति के बारे में नहीं।” अजय कंडारी ने कहा, “वहां फिर से केदारनाथ की जैसी भीषण आपदा आ गई थी।”

इसके बाद उन्हें उमा जी ने अपनी हरि-की-दून की कठिन यात्रा की कहानी सुनाई। बाद में मैं उन्हें सौरमंडल की सैर पर ले गया। पहले सूरज के पास और फिर 8 ग्रहों यानी बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून के पास। हमने उनके 183 चंद्रमा भी देखे। बुध और शुक्र ग्रह के आकाश में तो कोई चंद्रमा ही नहीं था! हमने एक धूमकेतु भी देखा और लाखों एस्ट्रायड यानी क्षुद्रग्रह भी। लौट कर हम सुंदर पहाड़ों से घिरी मंदाकिनी घाटी के आसमान से आए और फिर जैक्स वीन नेशनल स्कूल के प्रांगण में सुरक्षित उतरे। धरती पर आकर हम सभी ने बड़े जोश के साथ जीवन का गीत गाया।

फिर सभी से विदा लेकर हम यानी मैं और उमा जी अपनी वापसी की यात्रा पर निकल पड़े। श्रीनगर तक राणा जी की कार में नवीन के साथ और फिर देहरादून तक टैक्सी में। मैं फिर अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ दिल्ली लौट आया। लौटने के बाद से ही लग रहा है कि जैसे किसी स्वप्नलोक से लौट आया हूं।

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