पावस में पहाड़

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नैनीताल

बारिश में नहाए पेड़ों और पहाड़ों को छुए, घाटियों से ऊपर उठ कर यहां-वहां तैरते और पहाड़ों को अपने आगोश में लेते घने कोहरे की बूंदों को महसूस किए, रुई के फाहों की तरह आसमान में बिखरे और कभी तेजी से घिरकर गरजते, बरसते बादलों को देखे लंबा समय बीत गया था। इसलिए सोचा, इस बार पावस में एक फटक पहाड़ हो आवूं यानी वही, जिसे छू कर आ जाना कह सकते हैं!

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धूप तापती नावें

नैनीताल पहुंच कर इस बार की भरपूर बारिश से लबालब भरी नैनी झील को भर आंख देखा। उसके हरे-नीले जल में तैरती सैकड़ों मछलियां देखीं। कभी चीना पीक से तो कभी टिफन टाॅप या शेर-का-डांडा से भागता हुआ कोहरा आता और पूरी झील के साथ ही चिनारों, दूसरे पेड़-पौधों, बिजली के लैंप पोस्टों और यहां तक कि सड़कों और इमारतों को भी ढक लेता। झील के किनारों पर खड़े बारिश से निझूत (भीगे) पेड़ झील के पानी में अपनी परछाइयां देख रहे होते और कहीं बारिश में नहाई चंद नावें हलकी धूप ताप रही होतीं। गैराज की एक छत पर एक श्वान मां अपने चार बच्चों के साथ शाम की गुनगुनी धूप की गरमाहट ले रही होती। देखते ही देखते आसमान से फिर बूंदें टपकने लगतीं और जिसे जहां जगह मिलती, सिर छुपा लेता। माल रोड पर तब छाताएं टहलने लगतीं।

सुबह सूरज शेर-का-डांडा की हरी-भरी पहाड़ी पर धूप की चादर डाल कर उसे धीरे-धीरे चीना पीक और फिर अयारपाटा से लेकर तल्लीताल तक फैला देता।

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गरूड़ ताल

ऐसी ही एक सुबह टैक्सी लेकर हम अपनी यादों में बसे सातताल, भीमताल और नौकुचियाताल से वर्षों बाद मिलने गए। वर्षों क्या, मैं तो आधी सदी बाद। तब मैं और मेरा दोस्त नवीन नैनीताल से पैदल यात्रा करके इन तालों से मिलने जाया करते थे। तब वहां केवल ताल थे, घने हरे-भरे पेड़-पौधे थे और उन पेड़ों में चिड़ियां बसती थीं। जंगल और ताल हमसे बातें करते थे। सात ताल की वही हरियाली देख कर मन बहुत खुश हुआ। वहां जगल की वही भीगी-भीगी खुशबू मौजूद थी। पेड़ों और पहाड़ों की गोद में शांत लेटे गहरे हरे-नीले गरुड़ ताल से पानी में हाथ डाल कर हाथ मिलाया। मन ही मन मैंने उससे पूछा, ‘कैसे हो दोस्त?’ उसने भी मन ही मन जवाब दिया, ‘ठीक हूं। आधी सदी बाद आ रहे हो, यह क्या बात हुई?’ मैंने कहा, हां वर्षों बाद आ रहा हूं, लेकिन दोेस्त तुम्हारी गहरी-हरी नीली छवि तो मन में सदा बसी रहती है। याद है, तब हम तुम्हें क्या कहते थे? स्याही ताल!’ वह मुस्कराया और उसके चेहरे पर फैली नन्हीं लहरों की लकीरें मेरे पास तक चली आईं। मुझे लगा, वह भी गौर से मेरे चेहरे पर मेरी उम्र की लकीरें पढ़ रहा है।

हम दोनों मन ही मन बातें कर रहे थे कि सन्नाटे में पीछे से आवाज आई, ‘यह तो महाभारत के यक्ष का जैसा ताल लगता है।’ मेरी पत्नी लक्ष्मी ने कहा तो मुझे वह सचमुच यक्ष का ताल लगा जिसकी ओर से लगातार यक्ष प्रश्न पूछे जाते रहेंगे। हमने आगे चलने का निश्चय किया।

गरुड़ ताल से विदा लेकर हम हरे जंगल की सर्पीली सड़क पर आगे बढ़े और सहसा आर-पार फैले विशाल ताल के किनारे-किनारे से होकर बीच में पहुंचे। वहां पेड़ों के बीच फैली चाय-पानी और फास्टफूड की बस्ती देख कर खुशी नहीं हुई। इसलिए कि खान-पान के ये अड्डे शोरगुल फैलाने के अलावा मनुष्यों की फास्टफूड जूठन से वहां के पशु-पक्षियों की खान-पान की आदत बिगाड़ते रहेंगे। क्या हम चंद घंटे वहां प्रकृति की शांत गोद में सुकून से नहीं बिता सकते?

ऊंचे पेड़ों में वहीं कहीं एक अकेली ब्लू मैगपाई यानी लमपुछिया चिड़िया चीख रही थी। कौन जाने वह क्या कह रही थी? हो सकता है, फास्टफूड की जूठन की ही शिकायत कर रही हो।

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मुर्गाबी

सामने हरे रंग का भरपूर भरा हुआ राम ताल फैला हुआ था, दूर पहाड़ों के वक्ष तक। किनारे एक मुर्गाबी एक ही जगह खड़ी-खड़ी चोंच से पीठ खुजलाती थी। दो-एक पंख भी रेत में गिरे हुए थे। उसके पास तक गया, लेकिन वह वहां से हटी नहीं, डरी नहीं। क्या हो गया था उसे? क्या फास्टफूड की जूठन से बीमार पड़ गई थी? पता नहीं। पत्नी के साथ किनारे-किनारे कांग्रेस घास की घनी बढ़वार को पार कर आगे बढ़ा। वहां श्वेत बत्तखों का झुंड पानी में नहाने और डुबकियां लगाने का खेल खेल रहा था। फोटो खींचने लगा तो वे और भी उत्साहित हो गईं।

बेटी, बेटा और बहू नाव वाले के साथ नाव में पूरे ताल की परिक्रमा कर रहे थे। वे बांई ओर पहाड़ की ओट में गए और बहुत देर बाद वहां से लौटे तो लगा उस तरफ भी लंबा ताल है। लौट कर उन्होंने नाव वाले से मिली जानकारी के अनुसार बताया कि वहां राम ताल से जड़ी सीता ताल है। पत्नी और मैंने ताल की पृष्ठभूमि में एक-दूसरे की तस्वीरें लीं। काफी देर हो चुकी थी, इसलिए वहां से वाया भीमताल नौकुचिया ताल की ओर निकले। सात ताल के हरे-भरे जंगल को उत्तराखंड में पक्षियों के एक प्रमुख आवास के रूप में दर्ज़ किया गया है। सोचा, कभी फुर्सत से आकर चिड़ियों से मिलूंगा।

सात ताल से वापस फरसौली गांव और वहां से सीधे भीमताल और फिर वहां से करीब 5-6 किलोमीटर आगे नौकुचियाताल। नैनीताल जिले का सबसे बड़ा ताल है यह, पहाड़ों के बीच जिसके नौ कोने हैं। इसीलिए नौकुचिया ताल कहलाता है। किंवदंती है कि जो भी इसके नौ कोने एक साथ देख लेगा, वह या तो राजा बन जाएगा या इहलोक से चला जाएगा। मैंने मन में ताल से कहा, भाई मुझे कभी राजा बनने की चाह नहीं रही, इसलिए तुम्हारे नौ कोने दिख भी जाएं तो मुझे प्रजा ही रहने देना। और, जहां तक इहलोक से जाने की बात है तो जैसा कि शायर ने कहा है, सभी के लिए उसका भी एक दिन मुकर्रर है। विज्ञान दृष्टि से विचार किया तो इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वहां प्रकृति ने इस करीने से पहाड़ सजाए हैं कि उनके बीच फैले ताल के नौ कोने एक साथ कभी दिख ही नहीं सकते।

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कमल

नौकुचिया ताल हर आने वाले का अपने कमल के फूलों से स्वागत करता है। दो-चार खिले फूलों से उसने हमारा भी स्वागत किया। पचास वर्ष पहले आया था तो ताल का किनारा केवल प्रकृति का बनाया हुआ था। कमल भी तब खूब खिले हुए थे। अब बड़ी-सी कमल वाटिका को सीमेंट-कंकरीट की दीवार से अलग कर दिया गया है। पक्की सड़क पर लोग चहलकदमी कर सकते हैं, वहां से नौकायन के लिए नावें ले सकते हैं। तथाकथित विकास के चिह्नों से हट कर प्राकृतिक रूप में केवल ताल को देखने या उसकी तस्वीरें लेने के लिए बड़ी कोशिश करनी पड़ती है।

कमल वाटिका के आखीर में सीढ़ियों के पास जीन कस कर सिकंदर खड़ा था। मैंने पास जाकर उससे पूछा, “कैसे हो दोस्त?” तो उसने आंख उठा कर मेरी ओर देखा और हिनहिनाया। मैंने कहा, “फोटो खीचूंगा, जरा देखो इधर।” वह बार-बार हिल रहा था। उसके मालिक ने कहा, “बेटा, स्माइल करो, अंकल फोटो खींच रहे हैं।” सिकंदर ने मेरी ओर देखा और मैंने फोटो खींच लिया।

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नटखट बंदर

कमलवाटिका और ताल को बांटने वाली बटिया से उस पार पहुंचे तो रेलिंग के साथ-साथ थोड़ा आगे बढ़े। तभी वहां के बाशिंदे तीन बंदरों को आते देखा-दो वयस्क और एक बच्चा। वे बेझिझक आगे आए कि तभी न जाने क्या हुआ कि बच्चे ने बेटी का पांयचा पकड़ा। जब तक कुछ समझते, एक बड़ा बंदर तीखे दांत दिखा कर झपटने की मुद्रा में आगे बढ़ा। पत्नी ने छाते का सहारा लेकर उसे किसी तरह डरा कर भगाया। नटखट बच्चा रेलिंग की उस तरफ से फिर भी झांकता रहा। लगता है, बड़े बंदर ने बेटी के मोबाइल को कोई हथियार समझ लिया था और बच्चे को बचाने के लिए झपटने को तैयार हो गया। असल में वे भी क्या करें। हम मनुष्यों ने उनके घरों पर कब्जा कर लिया है। वे जाएं तो जाएं कहां? ऊपर से उन्हें हम रोटी और फास्ट फूड खिला कर उनकी प्राकृतिक आहार की आदत को बदल कर उनके पाचन-तंत्र के साथ अन्याय कर रहे हैं।

ताल के किनारे की सड़क पर एक लड़का भुने भुट्टे बेच रहा था। बीस रूपए का एक भुट्टा, वह भी पतला-सा। मन ने कहा छोड़ो। छोड़ दिया। ताल के किनारे-किनारे दूर तक गए। बीच में कहीं किसी चिड़िया की चहक या ताल में निकट ही किसी मछली की ‘डुबुक’ की आवाज के अलावा चारों ओर सिर्फ सन्नाटा था।

भीमताल
भीमताल

लेकिन, यह सब कुछ तो ‘कभी धूप, कभी छांव’ के माहौल में हो रहा था। अब, जब लौटने लगे तो जैसे ओने-कोनों से आसमान में बादल भी लौट आए। हमने भीमताल का रुख किया तो देखा आमसान में दो-एक पैराग्लाइडर हवा में तैर रहे थे। नीचे हरे भरे पेड़-पौधे और खेत थे। भीमताल पहुंच कर वसंत के ढाबे में चाय की घुटुक ले ही रहे थे कि झमाझम बारिश शुरू हो गई। भाग कर पेड़ों के नीचे से उस पार फैले ताल और उसके हरे-भरे पेड़ों से भरे टापू की तस्वीरें लीं। नावें किनारे पर विश्राम कर रही थीं। पहाड़ों से घना कोहरा उतर कर पूरे ताल पर छा जाने की पुरजोर कोशिश करता रहा। थोड़ी देर बाद बारिश थमी और ताल भी निखर उठा। कोहरा तेजी से ऊपर चोटियों की ओर दौड़ रहा था।

हमने नैनीताल की राह पकड़ी। फरसौली गांव के पास सड़क के मोड़ से मुड़ते समय सामने चोटियों से उतरते हुए घने कोहरे को देखा। वह पेड़, पहाड़, गांव, खेत सभी को आगोश में ले रहा था। चंद क्षणों के बाद वहां केवल कोहरा ही कोहरा था। लेकिन, भुवाली में मौसम साफ था। हम बाजार से निकल कर चीड़ के जंगल को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे कि पाइंस आते-आते चारों ओर से घने कोहरे ने हमें घेर लिया। इतना घना था कोहरा कि ऐन सामने खड़े चीड़ और बांज के पेड़ भी धुंधले दिखाई देने लगे। कोहरे से मिलने को मन मचल उठा। मैंने गाड़ी के सारथी चंदन से कुछ देर गाड़ी सड़क के किनारे रोकने को कहा और सड़क पर तेजी से चलते हुए कोहरे में प्रवेश कर गया।

IMG_20150823_143346कोहरा घना था लेकिन मैं सड़क को देख सकता था। कोहरा मेरे चेहरे को शीतल बूंदों से सहलाता रहा। पीछे गाड़ी की आंखें कोहरे में धुंधली-सी चमक रही थीं। आने और जाने वाली इक्का-दुक्का गाड़ियों के हार्न की आवाज उनकी रोशनी से पहले पहुंच रही थी जबकि रोशनी की गति आवाज की तरंगों से तेज होती है। लेकिन, कोहरे की मोटी परत अगर उसका रास्ता रोक रही हो तो वह भी क्या करे!

कोहरे के भीतर पेड़ों की अमूर्त रचनाएं दिखाई दे रही थीं। मैं गाड़ी में वापस आकर बैठा ही था कि तभी सन्नाटा भांप कर सड़क के ऐन किनारे पर अचानक नीचे से ‘कुनस्यालू’ आकर जिज्ञासा से चारों ओर देखने लगा। मैंने कहा, “कुनस्यालू! देखो कुनस्यालू!” जब तक कोई और देखता वह पलट कर नीचे उतर गया। बेटे ने पूछा, “कुनस्यालू क्या?” मैंने कहा, “मार्टेन। हिमालयन यलो थ्रोटेड मार्टेन। गहरे भूरे-पीले और काले रंग का मार्टेन, जिसे पहाड़ में चितरौला भी कहा जाता है।” खुशी हुई कि मेरे बचपन में देखे जीव-जंतु आज भी पहाड़ में कम ही सही, लेकिन मौजूद तो हैं।

कोहरे को पार करते हुए हम नैनीताल पहुंच गए। वहां फिलहाल मौसम साफ और खुशनुमा था। झील में कई नावें तैर रही थी। उन पर अयारपाटा की चोटी के पास से सूरज कभी-कभी अपनी रोशनी डाल देता था। जहां झील में उसकी रोशनी पड़ती, पानी की नन्हीं लहरों में सितारे से झिलमिलाने लगते। टिफिन टाप से लेकर चीनापीक तक आसमान में फिर बादल उमड़ने लगे। हमने मल्लीताल की राह पकड़ी और ठंडी सड़क से खरामा-खरामा चल कर तल्लीताल में अपने पर्यटक निवास में पहुंच गए। हम अब पहाड़ में पावस के कई रंग देख चुके थे।

 

 

 

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