हैलो होराइजंस ! कैसा है प्लूटो?

न्यू होराइजंस अंतरिक्षयान
न्यू होराइजंस अंतरिक्षयान

कहां कभी मानव ने चिड़ियों की तरह आसमान में उड़ने का सपना देखा था और कहां 17 दिसंबर को किटी हाक की पहाड़ी पर अपनी उड़न-मशीन मे मात्र 12 सेकेंड की पहली उड़ान भरने वाले मानव का अंतरिक्षयान न्यू होराइजंस 98 वर्ष की छोटी-सी अवधि में सुदूर बौने ग्रह प्लूटो के पास पहुंच गया है। 14 जुलाई 2015 को वह प्लूटो से 12,500 किलोमीटर की निकटतम दूरी पर होगा।
प्लूटो सूर्य से लगभग 5 अरब 91 करोड़ किलोमीटर दूर है। हमारी पृथ्वी से भी उसकी दूरी 5 अरब 76 करोड़ किलोमीटर से अधिक है। इतनी दूर तक ‘न्यू होराइजंस’ अंतरिक्षयान को सफलतापूर्वक भेजना मानव के प्रौद्योगिक कौशल का एक और अद्भुत उदाहरण है।
न्यू होराइजंस अमेरिका के केप केनवरल, फ्लोरिडा स्थित अंतरिक्ष अड्डे से 19 जनवरी 2006 को छोड़ा गया था। वह दूरस्थ बौने ग्रह प्लूटो और उसके सबसे बड़े चांद कैरन का निकट से अध्ययन करने के लिए पृथ्वी से भेजा गया पहला अंतरिक्षयान है। 28 फरवरी 2007 को यह विशाल बृहस्पति ग्रह के पास पहुंचा। वहां इसने बृहस्पति, उसके वलयों और चंद्रमाओं पर नजर डाली, बृहस्पति के वायुमंडल में अमोनिया के बादलों को उमड़ते और उसके ध्रुवों पर पहली बार आसमानी बिजली को कड़कते देखा। इसके अलावा आयो चांद पर एक ज्वालामुखी को फटते देखा। उसके बाद बृहस्पति ग्रह के गुरूत्व का लाभ उठा कर वह न्यू होराइजंस प्लूटो की लंबी यात्रा पर निकल गया। इस यात्रा में वह कुछ समय तक शांति से सोने के बावजूद सप्ताह में एक बार पृथ्वी पर कुशल-मंगल भेजता रहा।

प्लूटो पर हृदय के आकर का विस्तृत मैदान
प्लूटो पर हृदय के आकर का विस्तृत मैदान

इस वर्ष की शुरूआत में उसने जाग कर प्लूटो और उसके चांद कैरन पर नजर डालना शुरू किया। हाल ही में जब न्यू होराइजंस ने 80 लाख किलोमीटर दूर से प्लूटो को अपने कैमरे की आंख से भर नजर देखा तो उसे उसकी सतह पर एक ‘दिल’ का आकार दिखाई दिया। वह क्या है, यह तो और पास जाने पर ही पता लगेगा। और हां, एक बात और। जब पृथ्वी से न्यू होराइंज को प्लूटो की ओर भेजा गया था तो वह सौरमंडल का नौवां ग्रह था, लेकिन अब न्यू होराजंस के वहां पहुंचने तक वह बौना ग्रह बन चुका है। खगोल वैज्ञानिकों ने अगस्त 2006 में ग्रहों की नई परिभाषा तय करके उसे बौने ग्रह की श्रेणी में रख दिया था।
प्लूटो सूर्य से इतना दूर है कि जब उसकी खोज हुई, तब से अब तक वह सूर्य की एक परिक्रमा भी पूरी नहीं कर पाया है। करे भी कैसे, उसका एक वर्ष हमारे पृथ्वी के लगभग 248 वर्षों के बराबर होता है जबकि प्लूटो की खोज क्लाउड विलियम टामबाव ने 18 फरवरी 1930 को की थी। यानी, वह सूर्य की पहली परिक्रमा वर्ष 2178 में पूरी करेगा।
इस बौने ग्रह के गोले का व्यास 2,344 किलोमीटर है। इसका एक दिन पृथ्वी के 6.38 दिनों के बराबर होता है। यह अपनी धुरी पर उल्टा घूमता है। इसलिए वहां सूर्य पश्चिम में उगता और पूर्व में डूबता है। प्लूटो सूर्य से इतनी दूर है कि लगभग तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से चलने वाला उसका प्रकाश प्लूटो तक 5 घंटे से भी अधिक समय में पहुंचता है। वहां से सूर्य हमारे भोर के तारे से बस लगभग तीन गुना अधिक चमकदार दिखाई देगा। सूर्य से इतना दूर होने के कारण उसकी सतह का औसत तापमान शून्य से 233 डिग्री सेल्सियस नीचे आंका गया है। यही कारण है कि वहां नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोक्साइड जैसी गैसें जमकर बर्फ बन गई हैं।
अब तक प्लूटो के पांच चंद्रमाओं का पता लग चुका है। ये हैं: कैरन, निक्स, हाइड्रा, केर्बेरास और स्टिक्स। इनमें से कैरन सबसे बड़ा और आकार में प्लूटो से लगभग आधा है। जितनी देर में प्लूटो अपनी धुरी पर एक चक्कर लगाता है, ठीक उतनी ही देर में कैरन उसकी एक परिक्रमा कर लेता है। इस कारण कैरन प्लूटो के एक ही गोलार्ध के आसमान में लगातार एक ही जगह दिखाई देता है। वह न कभी उगता है, न अस्त होता है।
प्लूटो असल में नेपच्यून ग्रह के पार सूरज के चारों ओर फैली बर्फीली गेंदों और चट्टानों की विशाल कुईपर पट्टी का सदस्य है। कुईपर पट्टी की खोज वर्ष 1951 में डच-अमेरिकी खगोल वैज्ञानिक जेरार्ड पी. कुईपर ने की थी। उनका कहना था कि सौरमंडल के निर्माण से जो मलबा बच गया होगा, उससे कुईपर पट्टी बनी होगी। इस पट्टी में असंख्य छोटे-बड़े बर्फीले पिंड हैं और प्लूटो भी उन्हीं पिंडों में से एक है। खगोल विज्ञानियों का कहना है कि न्यू होराइजंस प्लूटो और उसके चंद्रमाओं को भर नजर देखता, उनका अध्ययन करता हुआ प्लूटो के पार चला जाएगा और कुईपर पट्टी के अन्य पिंडों पर नजर डालते हुए आगे बढता जाएगा। आगे और आगे……

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