भीष्म जी के सौ वर्ष

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सौ वर्ष के हो गए हैं भीष्म साहनी जी। ‘हैं’ इसलिए क्योंकि भीष्म जी जैसे लोग कभी विदा नहीं होते। वे धरती में आते हैं, लोगों के दिलो-दिमाग में छा कर उनकी भावनाओं और विचारों में समा जाते हैं और सदा उन्हीं के बीच रहते हैं। उनके बारे में सोचता हूं तो लगता है जैसे उनसे बातचीत कर रहा होऊं।

नैनीताल से एम.एस.सी. करने के बाद दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में पहली नौकरी लगी तो नौकरी की खुशी के साथ-साथ मन यह सोच-सोच कर खुश होता था कि अब भीष्म जी और हिंदी के बड़े साहित्यकारों को देखने और सुनने का मौका मिलेगा। ‘चीफ की दावत’ पढ़ने के बाद भीष्म साहनी जी मेरे प्रिय कथाकार बन गए थे। मैंने उन्हें पत्र भेजा था और उनका स्नेहिल उत्तर पाकर मैं अभिभूत हो उठा था। यह जानकर वे बहुत खुश हुए कि मुझे दिल्ली में नौकरी मिल गई है और लिखा कि दिल्ली आने पर उनसे जरूर मिलूं।
मिलने पर भीष्म जी बहुत खुश हुए। उन्होंने मेरे काम के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि मक्का की फसल पर अनुसंधान कर रहा हूं। लेखन पर बात हुई। मैंने बताया कि ‘कहानी’ में कहानी आने वाली है। उन्होंने लिखते रहने की सलाह दी और कहा कि खूब पढ़ना चाहिए। पत्रिकाओं में कहानियां पढ़ते रहो और देश-विदेश के लेखकों की कहानियां, उपन्यास भी पढ़़ते रहना। उन्होंने मुझे लेव तालस्ताय की कहानियों की एक मोटी किताब दी। उन कहानियों का अनुवाद भीष्म जी ने ही किया था। चाय पीकर थोड़ी देर बाद मैंने चलने के लिए आज्ञा मांगी तो वे गेट तक छोड़ने आए और कहा, “आते रहना। मुझे अच्छा लगेगा।” वहां से निकला तो लगा जैसे मैं सातवें आसमान पर उड़ रहा था।
भीष्म जी और शीला जी के स्नेह और सरल व्यवहार के कारण मैं प्रायः उनके घर जाने लगा। कुछ दिन नहीं जाता तो वे नाराज होते थे। कई बार देखा, शीला जी सितार पर अंगुलियां चलाते हुए, आंखें बंद करके संगीत की धुन में खोई हुई हैं। दो-एक बार ऐसा भी हुआ कि वहां गया तो उन्होंने दरवाजा खोल कर भीतर आने को कहा। बैठने का इशारा करके धीरे से बोलीं, “हम लोग धीरे-धीरे बात करेंगे। भीखम (भीष्म जी को वे घर में वे इसी नाम से संबोधित करती थीं) कहानी पूरी करने वाले हैं। हमारी बातचीत से कहीं उनका ध्यान न बंटे।” हम चुपचाप चाय पीते रहे। थोड़ी देर बाद मुस्कराते हुए भीष्म जी आए और कहा, “मुझे बताया नहीं देवेन के बारे में?” शीला जी बोलीं, “जानबूझ कर नहीं बताया। हम दोनों आपकी कहानी पूरी होने का इंतजार कर रहे थे।” फिर बातचीत में भीष्म जी भी शामिल हो गए।
कई बार शीला जी बंबई (अब मुंबई) गई होती थीं जेठ बलराज साहनी के परिवार से मिलने। तब भीष्म जी अकेले होते। वही चाय बनाते। एक बार देर शाम ऐसे ही मौके पर मैं वहां पहुंचा तो वे खुश होकर बोले, “अच्छा हुआ तुम आ गए। अब खाना साथ खाएंगे।” मैं अचकचाया तो पूछा, “अभी खाना खाया तो नहीं?” मैंने कहा, “नहीं, लेकिन मैं अभी होटल में खावूंगा।” वे बोले, “बस ठीक है। ऐसा करते हैं, मैं रोटी लगवा के आता हूं। आओ, तुम तब तक चूल्हे पर दाल-सब्जी देखो।” मैं उनके साथ किचन में गया। आटा वे गूंध चुके थे। मुझे वहां छोड़ कर वे रोटी लगवाने जाने लगे तो मैंने पूछा, “कहां बनवाएंगे रोटी?” बोले, “पास में ही सांझा चूल्हा है। वहीं पर लगवा लाता हूं।”
नेकर और टीशर्ट पहने दुबले-पतले भीष्म जी आटा लेकर तेजी से बाहर निकल गए। मैं भारी उलझन में था। दाल-सब्जी गैस के चूल्हे पर पक रही थी। मैं पूसा गेट पर देबी होटल में खाना खाता था। गैसे के चूल्हे के बारे में कतई कुछ नहीं जानता था। दाल-सब्जी उबलती जा रही थीं। मेरे हाथ-पैर फूल गए। अब क्या करूं? दाल-सब्जी जल गई तो क्या होगा? चूल्हे को छूने से भी डर रहा था। परेशानी में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि तभी भीष्म जी आ गए। बोले, “सब्जी शायद तले लग रही है। चलाई नहीं?” मैंने कहा, “चलाई थी।” उन्होंने कोई बटन घुमा कर गैस बंद कर दी और बोले, “चलो, अब गरमा-गर्म खाना खाते हैं।” प्लेटें लेकर हम डाइनिंग टेबल पर आ गए और बातें करते हुए खाना खाने लगे। बातचीत में वे अक्सर नए लेखकों की कहानियों के बारे में पूछते थे कि इधर कौन-सी कहानियां पढ़ीं, किस पत्रिका में पढ़ीं, कहानी का थीम क्या था, वगैरह। कहते थे, तुमसे बातें करके मुझे नए लेखकों और उनकी कहानियों की जानकारी मिलती है। पढ़ता मैं भी हूं लेकिन इतना सब कुछ कहां पढ़ा जा सकता है।
उनका स्नेह और उनकी आत्मीयता भीतर तक भिगो देती थी। मन करता था, उनके आसपास ही रहूं। लेकिन, उसी बीच पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय से नियुक्ति पत्र आने पर मैंने वहां जाने का मन बना लिया। झिझकते हुए भीष्म जी को बताया तो उन्होंने पूछा, “वहां किस तरह का काम करना होगा?”
मैंने कहा, “अनुवाद एवं प्रकाशन निदेशालय में कृषि की पाठ्य पुस्तकों का अुनवाद तथा संपादन, मौलिक पुस्तक लेखन और किसानों की पत्रिका का संपादन।” उन्होंने गंभीर होकर कहा, “देखो देवेन, मैंने वर्षों अनुवाद का काम किया है। यह बोझिल काम है। इससे मौलिक लेखन पर असर पड़ता है। मौलिक लेखन के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता। फिर, नौकरी में अनुवाद काम उबाऊ भी होता है। क्यों, यहां क्या दिक्कत है? रिसर्च के काम में हो, दिल्ली के साहित्यकारों की संगत में हो। मुझे तो लगता है, तुम्हारा यहां रहना ज्यादा अच्छा रहेगा। लेकिन, क्या करना है, यह तो तुम्हीं तय करोगे।”
कभी-कभी सोचता हूं, काश मैं दिल्ली छोड़ कर न जाता और उनकी संगत में रहता तो शायद मेरा भविष्य कुछ और होता। फिर सोचता हूं, लेकिन तब मैं वह न होता जो आज हूं। भविष्य तो समय स्वयं गढ़ता है।
इन दिनों उनकी खूब चर्चा हो रही है। लोग उनके बारे में बातें कर रहे हैं। वे जवाब भी दे रहे हैं अपनी कहानियों, उपन्यासों और नाटकों के जरिए। गए कहां वे, हम सब के बीच ही हैं भीष्म जी।

 

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