कल्पतरु की छांव में

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पहले मुझे भी कहां पता था कि वहां मेरी मुलाकात दिल्ली के मेधावी छात्रों और विज्ञान के लिए समर्पित शिक्षकों के साथ ही कल्पतरु और कई जाने-अनजाने हरे साथियों से भी होगी! कब से मन में यह इच्छा थी कि कभी कल्पतरु जरूर देखूंगा। लेकिन, इस बार कल्पतरु तो देखा ही, उसकी छांव में भी कुछ पल बिताने का मौका मिल गया। दिल्ली राज्य विज्ञान शिक्षक फोरम का आभार कि उसने मुझे यह सुनहरा अवसर दिया।

हुआ यह कि एक दिन फोरम के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा. जी. एस. अधिकारी का फोन आया। बोले, “बहुत पहले एक बार आपसे फोन पर बात हुई थी कि आपको हम अपने किसी कार्यक्रम में बुलाएंगे।” मैंने कहा, “जी हां, बात हुई थी।” याद आया उनसे कई साल पहले एक क्षेत्रीय विज्ञान प्रदर्शनी में भेंट हुई थी।

“क्या आप पहली अगस्त को दिल्ली में मेधावी विद्यार्थियों के हमारे पुरस्कार वितरण समारोह में आ सकेंगे?”

मैंने कहा, “जी, मुझे विद्यार्थियों और आप लोगों से मिल कर बहुत खुशी होगी।”

वे बोले, “इस बारे में हमारे फोरम के अध्यक्ष श्री पी.एन. वार्ष्णेय जी आपसे बाकी बात करेंगे।” वार्ष्णेय जी ने बात की। बताया कि दिल्ली राज्य विज्ञान शिक्षक फोरम विज्ञान शिक्षकों का एक स्वयंसेवी मंच है जो दिल्ली राजधानी क्षेत्र में विज्ञान की शिक्षा को हर संभव बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है। फोरम गरीब तथा अभावग्रस्त विद्यार्थियों के लिए विज्ञान शिक्षण शिविरों का भी आयोजन करता है और विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञानार्जन के लिए विज्ञान यात्राएं आयोजित करता है। पुरस्कार वितरण कार्यक्रम महाराजा अग्रसेन माडल स्कूल, पीतमपुरा में होगा जिसमें लगभग 100 मेधावी विद्यार्थी, अभिभावक, फोरम के सदस्य और स्कूल की प्रधानाचार्या के साथ ही उनके सहयोगी भी होंगे।

“जी, मैं जरूर आवूंगा। विद्यार्थियों और शिक्षिकों से मिलना मेरा सौभाग्य होगा,” मैंने कहा। नियत तिथि को सुबह अपना बैग कंधे में लटकाया और विद्यार्थियों, शिक्षिकों से मिलने चल पड़ा। पूछताछ कर महाराजा अग्रसेन माडल स्कूल की भव्य इमारत के गेट पर पहुंच गया। भीतर आयोजकों की हलचल थी। उन्होंने मुझे हाथों-हाथ लिया। स्कूल के प्रागंण में हरे-भरे पेड़ों को देखकर बड़ी खुशी हुई। कि, तभी दो बच्चियों ने मुझे तिलक लगाया और फूलों की थाली लेकर वे सामने विद्या की देवी सरस्वती की मूर्ति तक चलीं। वहां थाली मेरे हाथों में दी। मैं अब समझा कि मैंने मां सरस्वती के चरणों में पुष्प अर्पित करने हैं। किए।

मुख्य द्वार के सामने प्रागंण में दस-बारह बच्चों की एक-सी पोशाक में सजी-धजी बैंड की टोली मुस्तैदी से खड़ी थी। मैंने सोचा, कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा या कोई आला अफसर आ रहा होगा। मैं बच कर किनारे से निकलने लगा तो आतिथेयों ने रोक लिया। प्रधानाचार्य श्रीमती प्रतिभा कोहली ने संकेत करके टोली के सामने बुलाया। मैंने झिझकते हुए  पूछा, “मुझे क्या करना है?” उन्होंने कहा, “सलामी लेनी है।” “मुझे?” मैं चौंका। यह सब मुझे पता नहीं था। खैर, कंधे पर झोला संभाले, माथे पर दाएं हाथ की हथेली टिका कर मैं सेल्यूट की मुद्रा में सीधा खड़ा हो गया। इसके साथ ही बच्चों की बैंड टोली का ढोल बजा- ‘ढम!’ और, इसके साथ ही सभी वाद्य समवेत स्वर में स्वागत की धुन गाने लगे। धुन थमी तो मैंने तेजी से मुख्य द्वार की ओर कदम बढ़ाए।

दो बिटियाओं ने फिर वहां फूलों की थाली के साथ मेरा मार्गदर्शन किया और महाराजा अग्रसेन की प्रतिमा के निकट ले गईं। विद्या का यह केन्द्र उन्हीं के नाम पर स्थापित किया गया है। वहां भी पुष्पांजलि दी। फिर प्रधानाचार्या महोदया के कक्ष में अतिरिक्त निदेशक शिक्षा, अवकाशप्राप्त अन्य शिक्षा उपनिदेशकों और शिक्षिकों-शिक्षिकाओं से औपचारिक परिचय हुआ। यह जानकर बेहद खुशी हुई कि दिल्ली राज्य विज्ञान शिक्षक फोरम अब तक 30,000 से अधिक बच्चों को अपने विज्ञान-शिक्षण शिविरों में विज्ञान की शिक्षा दे चुका है। वर्ष 2014 में आठवीं कक्षा के भी 700 से अधिक विद्यार्थी शिक्षण-शिविरों में पढ़ाई कर चुके हैं। इन शिविरों में दिल्ली राज्य विज्ञान शिक्षक फोरम के 100 से अधिक सदस्यों और विज्ञान शिक्षकों ने समर्पित रूप से निःशुल्क अध्यापन किया।

DSCN359211मेधावी विद्यार्थियों को पुरस्कार तथा प्रमाणपत्र वितरण से पूर्व फोरम के अध्यक्ष श्री पी.एन. वार्ष्णेय  ने फोरम की गतिविधियों की जानकारी दी। अतिरिक्त निदेशक (शिक्षा) ने विज्ञान शिक्षा की आवश्यकता पर बल देते हुए इस दिशा में हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया। प्रधानाचार्या प्रतिभा कोहली जी ने उनके स्कूल में आयोजन करने के लिए फोरम के प्रति आभार व्यक्त किया।

मुझे विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर बोलना था। बोला। मैंने अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि मैं जब विज्ञान कहता हूं तो मैं हमारे आसपास की दुनिया, हमारी प्रकृति के रहस्यों के सच की बात करता हूं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करता हूं तो उससे मेरा मतलब तर्कसंगत सोच से है जो विज्ञान के ज्ञान पर आधारित है। अपनी बात को समझाने के लिए मैंने अपने कई अनुभवजन्य उदाहरण दिए। बताया कि विज्ञान का निष्कर्ष विज्ञान विधि से हासिल होता है, यानी वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं, उसका अवलोकन या प्रेक्षण करते हैं, फिर उसका विश्लेषण करते हैं, उस पर तर्क करते हैं, तब किसी नतीजे यानी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। इसी निष्कर्ष से कोई सिद्धांत बनता है। किसी भी कही गई बात को विज्ञान यों ही स्वीकार नहीं कर लेता है, बल्कि उसे प्रयोग तथा परीक्षण की कसौटी पर कसता है। अंधविश्वासों के मामले में हमें भी इसी तरह की जांच करनी चाहिए। अगर बिल्ली के रास्ता काटने की बात है तो उसे खुद जांचिए – एक बार, दो बार, चार बार। अगर आप देखते हैं कि इस सबका कोई असर नहीं पड़ता तो आप क्यों एक पुराने अंधविश्वास को ढो रहे हैं? इसी तरह सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण तथा अन्य घटनाओं से जुड़े अंधविश्वासों से भी मन को मुक्त कर लेना चाहिए। यह जानकारी समाज में अन्य लोगों तक पहुंचा कर वैज्ञानिक सोच का प्रसार करना चाहिए। मैंने विद्यार्थियों से जीवन में नए सपने देख कर विज्ञान के नए रहस्यों का पता लगाने की अपील की।

DSCN360011कार्यक्रम में दिल्ली राजधानी क्षेत्र से आए हुए मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। उन्हें फोरम के सदस्यों और शिक्षकों ने विज्ञान के विषय पढ़ कर जीवन में आगे बढ़ने और विज्ञान के क्षेत्र में कुछ कर दिखाने की शुभकामनाएं दीं।

प्रांगण की हरियाली बार-बार अपनी ओर आकर्षित कर रही थी।

 

 

मेरी उत्सुकता देख कर प्रधानाचार्य प्रतिभा जी ने आसपास के पेड़-पौधे और कैक्टस हाउस दिखाया। फिर माली लछमन को यह कह कर मेरे साथ भेज दिया कि यह आपकी जिज्ञासाओं के जवाब देकर आपको पेड़-पौधों से मिला देगा।

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कल्पतरु

स्कूल में देश-विदेश के उन नाना प्रकार के पेड़-पौधों का संग्रह देख कर मैं हैरान रह गया। उससे भी अधिक आश्चर्य यह देख कर हुआ कि स्कूल का हर पेड़-पौधा लछमन को पहचानता था! उसके पास आते ही वे जैसे खुश हो जाते। सबसे पहले मुझे उसने दिखाया युवा कल्पतरु। मैं पहली बार कल्पतरु देख रहा था। गेट के पास खड़ा था वह। मैंने उसे गौर से देखा और देर तक देखता रहा। कल्पतरु से जुड़ी पौराणिक कहानी याद आती रही। यह भी याद आया कि इसे ही परिजात भी कहते हैं। लेकिन, तस्वीरों में जो कल्पतरु देखे थे, उनका तना बहुत मोटा था। लछमन से पूछा तो उसने बताया, “यहां अभी खाद-पानी में उग रहा है इसलिए ऊंचा हो गया है। यहां भी बाद में मोटा हो जाएगा। गर्म देश का पेड़ है, अफ्रीका से यहां आया। दक्षिण भारत में यह कई जगह होता है।”

लछमन ने जब यह बताया कि किताबों में इसका नाम एडेनसोनिया डिजिटाटा होता है तो मैं उसके ज्ञान का कायल हो गया। उसने कहा, “वैसे डिजिटाटा वहां हैं, उन बड़े गमलों में। आइए, दिखाता हूं।” वहां सीमेंट के दो बड़े गमलों के पास गए तो लछमन ने कहा, “ये दोनों पौधे लखनऊ के राष्ट्रीय वनस्पति उद्यान से मंगाए हैं। एक बड़ा कल्पतरु वहां है, गेट के सामने कैक्टस हाउस के पास,” उसने इशारे से बताया। फिर कहा, “वहां फिर चलेंगे, पहले यहां इस मोरिंगा के पेड़ को देख लीजिए।”

मोरिंगा
मोरिंगा

“मोरिंगा?” मेरे दिमाग में घंटी-सी बजी। नाम सुना हुआ लगा। तभी लछमन ने कहा, “इस पर कान लगा कर तने को हाथ से ठक-ठकाइए तो आपको सुर सुनाई देगा।” मेरा मन बच्चे की तरह मचला और मैंने मोरिंगा के उस मोटे, सलेटी तने पर कान लगा कर उस पर तबले की तरह थाप दी। अरे वाह! उसके भीतर से मुझे कान में तबले की जैसी थाप सुनाई दी! थाप सुनते ही याद भी आ गया कि यह हमारा अपना सहजन है। इसका काष्ठ कार्क की तरह होता है। लेकिन, इसका इतना मोटा और ऊंचा पेड़ मैं पहली बार देख रहा था। कुछ वर्ष पहले फरवरी के अंतिम दिनों में इलाहाबाद गया था तो संगम से लौटते समय, घिरती शाम के धुंधलके में घरों के आसपास खिले सफेद-क्रीमी फूलों के गुच्छे देख कर लगता था, उन पेड़ों पर जैसे चांदनी के झूमर लटक रहे हों। स्वप्निल सौंदर्य था उनका। वे पेड़ सहजन के ही थे। हम लोग नहीं जानते, लेकिन पोषण गुणों की खान है मोरिंगा। प्रोटीन, विटामिन, खनिज सभी इसमें पाए जाते हैं।

वहीं लछमन ने धारीदार पत्तियों वाली वेरीगेटेड बांस की भरी-पूरी सुंदर गाछ दिखाई। एक पेड़ वेरीगेटेड चंपा का भी था वहां। मैंने कहा, “चंपा के फूल तो आमतौर पर सफेद होते हैं लेकिन यहां स्कूल के आगे मैंने लाल-सफेद फूलों वाली चंपा देखी।” लछमन ने उत्साहित होकर कहा, “हमने स्कूल में लाल फूलों वाली चंपा भी लगाई हुई है।”

डिजर्ट रोज
डिजर्ट रोज

आगे बढ़े और कल्पतरु के दूसरे युवा वृक्ष की ओर गए। उससे पहले मोटे, बेडौल तने वाले मगर सुंदर पौधों पर नजर पड़ी। प्रधानाचार्य प्रतिभा जी पास में ही खड़ी थीं। बोलीं, “ये एडेनियम के पौधे हैं। यह ‘डिजर्ट रोज’ भी कहलाता है। मरूस्थली पौधा है।” उथले गमलों में, पत्थर की रोड़ियों के बीच बेडौल तना पसार कर एडेनियम धूप ताप रहे थे। उनमें से कुछ पौधों पर चटख लाल रंग के फूलों की बहार आई हुई थी। उन्होंने हमें बोंसाई कार्नर और कैक्टस हाउस भी दिखाया। बाद में लछमन ने मुझे उसमें तरह-तरह के कैक्टसों की प्रजातियां, ग्राफ्ट किए हुए कैक्टस, अगेव और एलो के पौधों का संग्रह भी दिखाया और उनके बारे में बताया। अब तक मैंने एलोवेरा के ही पौधे देखे थे। वहां इतने सारे एलो के पौधे देख कर चकित रह गया।

रूद्राक्ष
रूद्राक्ष

हम खेल का मैदान पार करके दूसरी ओर के पौधा-घर की ओर जा रहे थे कि मैंने लछमन से कहा, “पिछले साल मैंने जगजीत नगर, कनखल के डी ए वी स्कूल में पहली बार रूद्राक्ष के पेड़ देखे।” उसकी आंखों में चमक जागी। उसने कहा, “मैंने भी लगाया है, रूद्राक्ष। आइए, दिखाता हूं।” वह मुझे रूद्राक्ष के पौधे के पास ले गया। लगा, उसे देखकर किशोर उम्र का रूद्राक्ष भी खुश हो गया है। मैंने कहा, “रूद्राक्ष कह रहा है, पास आ जावो।” वह पास गया और मैंने दोनों का फोटो खींच लिया। फिर हम पौधालय के भीतर गए। लछमन ने उन तमाम सकुलेंट यानी मांसल पौधों के बारे में बताया। तभी पौधालय की छत के पास खड़े ऊंचे पेड़ों पर बैठी एक चिड़िया जोर से बोल उठी, ‘कुड़…कुड़….कुड़….कुड़!’ मैंने पूछा, “इस चिड़िया को पहचानते हो? क्या नाम है इसका?” लछमन ने कहा, “यहां तो पता नहीं, हमारे यहां सतना, मध्य प्रदेश में इसे कोड़की कहते हैं।” उसने मुझे छोटी-छोटी पत्तियों वाला फाइकस भी दिखाया।

बाहर दीवार के साथ छह गमलों में लगे, दो-चार फुट ऊंचे पौधों की ओर इशारा करके उसने कहा, “ये भी कल्पतरु के पौधे हैं। कलकत्ता से मंगाए हैं।” हम फाइकस पांडा के ऊंचे पेड़ों के पास से होकर पिछले गेट के पास पहुंचे। पास में ही चंपा पर बहार आई हुई थी। गेट से दीवार तक एक हरी-भरी बेल फैली हुई थी जो बड़े सफेद- क्रीमी रंग के फूलों से लदी हुई थी।

एडेनियम
एडेनियम

फिर हम रूफ-टाप गार्डन देखने के लिए करीब 72 सीढ़ियां चढ़ कर स्कूल की लंबी-चैड़ी छत पर पहुंचे। वहां भी पौधों का संसार बसा हुआ था। गमलों में तरह-तरह के पौधे धूप का आनंद ले रहे थे। वहां नाना आकार प्रकार के एडेनियम खिले हुए थे। सभी नाटे कद के यानी बोंसाई। एक एडेनियम के पौधे में एक ओर सफेद फूल खिले हुए देख कर मैंने लछमन से पूछा तो उसने बताया, “उस शाख पर मैंने सफेद फूलों वाली दूसरी प्रजाति की ग्राफ्टिंग कर दी थी। दूसरी शाखों पर दूसरे रंग के फूल खिलेंगे।”

“यानी, एडेनियम की पूरी बिरादरी में एक-दूसरे की कलम लगाई जा सकती है?”

लछमन ने कहा, “हां” और मुझे ग्राफ्टिंग किए हुए कई पौधे दिखाए। वहां एक ओर बोगेनवेलिया पर भी बहार छाई हुई थी। एक ओर लंबाई में एगेव की तरह-तरह की प्रजातियां लगी थीं। कुछ एडेनियम गमलों में छत की मुंडेर पर बैठे हुए थे। उनके बैडौल तने काफी मोटे हो चुके थे।

पैकीपोडियम
पैकीपोडियम

एक दीवार के पास मैडागास्कर और अफ्रीका के मूल निवासी मोटे, लंबे, तीखे कांटों वाले पैकीपोडियम से भेंट हुई। पैकीपोडियम यानी मोटे पैर वाला! यूनानी भाषा में ‘पैकस’ का अर्थ मोटा और ‘पोडोन’ का अर्थ पैर होता है। इसलिए लैटिन भाषा में इसका नाम पैकीपोडियम रख दिया गया। सचमुच उसका पैर मोटा था और चारों ओर तीखे कांटों से घिरा हुआ था। इसमें यह पौधा पानी जमा कर लेता है ताकि रूखे-सूखे मौसम में काम आए। लेकिन, ऊपर को तना पतला था, उस पर टहनियां थीं, जिन पर हरी-भरी पत्तियां निकल आई थीं। यह भी एक सजावटी पौधा है और लोग इसे चाव से लगाते हैं। यों यह मैडागास्कर और अफ्रीका का मूल निवासी पौधा है।

पौधों से मिल कर हम लौट आए। आज के कार्यक्रम में स्वागत के समय हमें सिरेमिक के पाट में एक-एक एडेनियम का पौधा भेंट किया गया था। प्रतिभा जी के कमरे में पहुंचा तो उन्होंने वह पौधा दिखा कर कहा, “यह अब आपकी अमानत है। साथ ले जाइएगा।” पहचान जताने के लिए मैंने उसकी पत्तियों को प्यार से छुआ। यानी, उससे हाथ मिलाया। टैक्सी में बैठ चलने लगा तो लछमन के हाथ उसका एक और साथी मिल गया। आते समय पिछली सीट पर मैं अकेला बैठा था। अब हम तीन साथ थे और घर DSCN367411की ओर जा रहे थे। घर में उन्हें मेरा छोटा-सा अध्ययन कक्ष बड़ा पसंद आया और वे किताबों की रैक के ऊपर बैठ कर भीतर और बाहर का नजारा लेने लगे। अक्सर वे धूप ताप कर फिर वहां किताबों के पास आ बैठते हैं।

 

 

 

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