बेल का वह सुकोमल स्पर्श

सुबह के धुंधले उजाले में सैर करते समय अचानक हाथ से अमृत बेल की हवा में झूलती नर्म बांह छू गई। मैं आगे बढ़ गया लेकिन बेल की बांह का वह सुकोमल सिरा जैसे मेरे हाथ को ही नहीं, मन को भी छूकर जगा गया है। बगल की सोसायटी में उगी वह हरी-भरी अमृत बेल यानी गुडुची या गिलोय हमारी चहारदीवारी पर चढ़ कर अनार के पेड़ पर छा गई है और अब वहां से अपनी लंबी, पतली बांहें फैला कर यहां-वहां सहारा ढूंढ रही है। जिस बांह ने मेरा हाथ छू लिया है, उसे आस बंध गई होगी कि, है- आसपास कोई सहारा जरूर है जिस पर लिपट कर हवा में वह और आगे बढ़ सकती है! बेल के सिरे की जिन बेहद संवेदनशील कोशिकाओं ने अचानक मेरा हाथ छू लिया, वे उस सहारे पर लिपटने के लिए बहुत सजग हो गई होंगी। उन्हें क्या पता कि वह मेरा हाथ था, एक चलते-फिरते आदमी का हाथ।

सुबह की शीतल हवा में अपार्टमेंट की परिक्रमा करते-करते अगले दो चक्करों में बेल से बच कर निकला लेकिन मन नहीं माना और अगले चक्कर में फिर उस अमृत वल्लरी को छूता हुआ निकल गया। सोचता रहा, वल्लरी को क्या लगा होगा? शायद यही कि हां, यहां सहारा है। दुबारा छूकर उसकी दुविधा दूर हो गई होगी। लेकिन, मैं तो उसके लिए वहां खड़ा होकर स्थाई सहारा नहीं बन सकता। फिर क्या करूं? आते-जाते उसे कोई तोड़ कर फैंक न दे। सैर के आखिरी चक्कर में उस सुकोमल बेल को सावधानी से पकड़ कर, धीरे से अनार की डाली पर लिपटा आया।

लेकिन, वह तो जैसे पूरे मन पर लिपट गई। कैसे पता लगता होगा इस अमृतबेल जैसी तमाम लताओं, बेलों को कि किस ओर बढ़ना है, कैसे सहारा खोजना है और सहारा मिल जाने पर कैसे उस पर लिपट कर ऊपर बढ़ना है?

वर्षों पहले अपनी पुस्तक ‘हाॅर्मोन और हम’ के लिए ‘पेड़-पौधे और हार्मोन’ विषय पर लिखते समय पेड़-पौधों की कई तरह की गतियों के बारे में पढ़ा था कि क्यों तना सदा जमीन से ऊपर की ओर बढ़ता है, क्यों जड़ें जमीन में नीचे की ओर बढ़ती हैं, क्यों पौधे अंधेरे से प्रकाश की ओर और जड़ें पानी की ओर बढ़ने लगती हैं।…तब मैंने लिखा था, ‘प्यास से तड़पती हुई जड़ें भूमि में नमी की दिशा में बढ़ने लगती हैं। यदि किसी बक्से में पौधे उगा कर आप एक किनारे की ओर किसी सछिद्र पात्र में पानी रख दें, तो सभी पौधों  की जड़ें उसी दिशा में मुड़ जाएंगी। और, कभी खीरे की लतिका या मटर के पौधे की पतली उंगलियां आपने गौर से देखी हैं? लगता है जैसे उनकी उंगलियों में आंखें हों। मटर का छोटा-सा पौधा जमीन से उठता है। उसे हवा, पानी, धूप, सब कुछ मिलता है। सूरज की किरणें उसकी बांहें पकड़ कर खड़ा होना, उठना भी सिखाती हैं, लेकिन वह फिर-फिर गिर जाता है। उसकी मरमरी पत्तियों के हाथों से पतली-सी उंगलियां निकलती हैं और वे किसी आधार को छूने की कोशिश करती हैं।…उंगलियों रूपी वे तंतु या टेंड्रिल जब किसी आधार से छू जाते हैं तो उसे जकड़ लेते हैं।  मटर की क्यारियों में माली छोटी- डंडियां खड़ी कर देता है। मटर के पौधे उन्हें तंतुओं की उंगलियों से पकड़ कर सीधे खड़े हो जाते हैं।’…

‘और सेम की वल्लरी, सूखी निर्जीव टहनी पर किस तेजी से लिपटती हुई ऊपर तक चढ़ जाती है। उसमें तंतु नहीं होते, लेकिन शरीर का हर भाग टहनियों पर लिपटता चला जाता है। यह शिक्षा उसे कहां से मिली?’…

यह भी लिखा था कि उत्तर के लिए आइए डार्विन के पास चलें। और, आज अमृत बेल यानी गिलोय के बढ़ने और सहारे पर लिपटने का रहस्य जानने के लिए एक बार फिर डार्विन के पास चलता हूं।…

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में डार्विन इन सवालों का जवाब खोजते रहे कि आखिर पेड़-पौधों में तरह-तरह की गतियां क्यों होती हैं? वे क्यों प्रकाश की ओर मुड़ते हैं? उन्हें छुअन यानी स्पर्श का एहसास कैसे हो जाता है? बेलें कैसे किसी दीवाल, पेड़ या दूसरे सहारे पर चढ़ जाती हैं? वे छूकर सहारे को कैसे पहचान लेती हैं?

जवाब खोजने के लिए उन्होंने 100 से भी अधिक पौधों की प्रजातियों पर प्रयोग किए। उन्होंने लिखा, ‘‘लोग समझते हैं, प्राणियों की तरह पौधों में गति की कोई विशेषता नहीं होती, लेकिन पौधे अपने लाभ के लिए या आवश्यकता पड़ने पर  गति करते हैं। वे जमीन में खड़े रहते हैं। हवा और पानी उन्हें भोजन मुहैया करते हैं।’’

विज्ञान प्रसार से प्रकाशित ‘चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा’ पढ़ने पर इस बारे में खुद डार्विन की लिखी यह जानकारी मिली, ‘‘सन् 1864 की वसंत ऋतु में मैंने आरोही पौधेां के बारे में एक लंबा लेख लिखा और उसे प्रकाशनार्थ लिनिएन सोसाइटी के पास भेजा। इस लेख को मैं चार महीनों में लिख सका लेकिन जब मुझे प्रूफ शीट मिली तो मैं इतना अस्वस्थ था कि मुझे उन्हें अत्यंत खराब दशा में छोड़ना पड़ा और बहुधा मेरी अभिव्यक्ति शैली अस्पष्ट थी। उस लेख पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन सन् 1875 में जब उसे संशोधित करके एक पृथक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया तो उसकी अच्छी बिक्री हुई। मैं इस विष्य पर काम करने के लिए सन् 1858 में प्रकाशित एसा ग्रे के एक लघु लेख को पढ़ कर प्रेरित हुआ। उन्होंने मेरे पास कुछ बीज भेजे जिन्हें मैंने उगाया। मैं उनके टेंड्रिल और तने की चक्रीय गति को देख कर इतना चकित और विस्मित हुआ कि मैंने अन्य प्रकार के आरोही पौधों को भी प्राप्त करके इस विषय का पूरा अध्ययन किया। दरअसल, उनके टेंड्रिलों और तनों की गति प्रथम दृष्टि में अत्यंत जटिल लगती थी, पर वास्तव में वह अत्यंत सरल थी। मैं इस दिशा में इसलिए और भी आकर्षित हुआ कि मैं हैंसलो द्वारा अपने व्याख्यानों में सहारे पर लिपटने वाले पौधों के बारे में दिए गए इस स्पष्टीकरण से बिल्कुल संतुष्ट नहीं था कि उनमें सर्पिल शिखर विकास की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यह व्याख्या अत्यंत दोषपूर्ण सिद्ध हुई। आरोही पौधों द्वारा प्रदर्शित कुछ अनुकूलन उतने ही सुंदर हैं जितने आर्किडों में पर-निषेचन सुनिश्चित करने के लिए हुए अनुकूलन।’’

यहां डार्विन जिस पुस्तक की बात कर रहे हैं, उसका नाम है, ‘मूवमेंट्स एंड हैबिट्सः क्लाइम्बिंग प्लांट्स’ यानी आरोही पौधों की गतियां और व्यवहार। यह पुस्तक 1875 में छपी जिसके लिए डार्विन के बेटे जार्ज डार्विन ने चित्र बनाए।

डार्विन पौधों की गतियों पर प्रयोग करते रहे और उनके नतीजों के आधार पर उन्होंने अपने बेटे फ्रैंसिस डार्विन के साथ मिल कर एक और पुस्तक लिखी- ‘द पावर आफ मूवमेंट इन प्लांट्स’। डार्विन के एक परम शिष्य जार्ज रोमानीज ने इस पुस्तक के संपादन में मदद दी। पौधेां की गति संबंधी ये प्रयोग 1877 में शुरू किए गए और 6 नवंबर 1880 को पुस्तक प्रकाशित हो गई। शुरू में 1500 प्रतियां छापी गईं जो हाथों-हाथ बिक गईं। इसमें डार्विन ने पौधों में गति की विशेषता को विकास का ही हिस्सा बताया और कहा कि कि इस विशेषता से पौधों का वातावरण के लिए अनुकूलन होता है। वे अपने-आप को परिस्थिति के अनुकूल ढाल लेते हैं।

अमृत बेल यानी गिलोय
अमृत बेल यानी गिलोय

स्पर्श की संवदेनशीलता से बेल बढ़ कर दीवाल, जाली, पेड़ या किसी सहारे पर चढ़ जाती है। स्पर्श से सजग होकर कोशिकाएं आक्सिन नामक वृद्धि हार्मोन बनाने लगती हैं और वे  बढ़ने का संदेश देने वाले इस हार्मोन को अन्य कोशिकाओं में भी भेज देती है। इस कारण बेल बढ़ने लगती है और सहारे के गिर्द लिपट जाती है। यानी, बेल के बढ़ने और सहारे से लिपटने में वृद्धि हार्मोनों का हाथ होता है। अगर टेंड्रिल हैं तो वे बढ़ कर सहारे को जकड़ लेते हैं। जड़ें धरती में माटी के कण-कण को पहचान कर आगे बढ़ती हैं। अगर, उनकी राह में कोई कठोर चीज आ जाए जो उससे किनारा करके आगे बढ़ती जाती हैं।

तो, इतने संवदेनशील होते हैं बढ़ते हुए पौधे। मेरे हाथ से छू जाने पर अमृतबेल की बढ़ती बांह को भी लगा ही होगा कि आसपास सहारा है। खैर, कोई बात नहीं, मैंने उसे अनार की डाली का पक्का सहारा तो थमा ही दिया है। फिर, दिल की बात भी तो जुड़ी है इस बहुवर्षीय बेल से। असल में वनस्पति विज्ञानियों ने इसका नाम टिनोस्पोरा कार्डिफोलिया रखा है और कार्डिफोलिया का अर्थ है दिल के आकार की पत्तियां।

अच्छा है कि अमृत बेल अनार के पक्के सहारे पर खड़ी है अन्यथा बेल देख कर मुझे हमेशा प्रख्यात लेखक शैलेश मटियानी जी के शब्द याद आ जाते हैं जो उन्होंने सन्’ 60 के दशक में अपने एक पत्र में मुझे लिखे थे, ‘‘जीवन में सदा किसी पेड़ की तरह बढ़ने की कोशिश करना जो आंधी-तूफान में भी अपनी जड़ों पर खड़ा रहता है, उस बेल की तरह नहीं जो आंधी आने पर सहारे के साथ ही धाराशायी हो जाती है।

 

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