बाल साहित्य की प्रयोगशाला में

DSCN3387

वहां प्रकृति थी, जिज्ञासाओं के जुगनू आंखों में लिए बच्चे थे, घुले-मिले, दोस्तों और साथियों की तरह साथ निभाते-सिखाते शिक्षक थे और उन्हीं के बीच थे बच्चों के लिए रचनाएं रचने वाले रचनाकार। वह बाल साहित्य की एक ऐसी शानदार और जानदार प्रयोगशाला थी, जिसमें बच्चे और बड़े सभी अपनी-अपनी तरह से प्रयोग कर रहे थे। और फिर, उन प्रयोगों के निष्कर्ष को परख भी रहे थे। मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव था वह।

बाल साहित्य की वह प्रयोगशाला मैंने जून माह में प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली कौसानी में देखी। हालांकि, आयोजक श्री उदय किरौला पिछले कई वर्षों से रचना-कर्म के इन प्रयोगों-परीक्षणों में शामिल होने के लिए बुला रहे थे, लेकिन किसी-न-किसी कारण जाना संभव नहीं हो सका था। लेकिन, इस बार मैंने काफी पहले ही तय कर लिया था कि वहां जाना है तो जाना ही है।

हां, तो जाने के लिए रात 10.30 बजे दिल्ली स्टेशन पर रानीखेत एक्सप्रेस से उत्तराखंड के पहाड़ों की ओर रवाना हुआ। अल सुबह पांच बजे पहाड़ों के पैताने हल्द्वानी पहुंचा। पीठ पर अपना भारी रक-सैक लाद कर स्टेशन से बाहर निकला तो सारथी अनिल की टैक्सी में अन्य सहयात्रियों के साथ अल्मोड़ा शहर के लिए रवाना हुआ। न्यूजीलैंड से माता-पिता की सेवा में आए राजीव भुवाली में भीमताल रोड पर अपने मकान के पास उतरे। याद है, रात में ट्रेन में उन्होंने गर्मजोशी से हाथ बढ़ाते हुए कहा था, ‘हाई, गुड ईवनिंग! आइ एम राजीव।’ उनसे संक्षिप्त बातचीत हुई और फिर वे रात्रि विश्राम के लिए लेट गए।

मैंने पूछा, “आप भी पहाड़ जा रहे हैं?”

बोले, “यस, आइ बिलोंग टु माउटेंस।”

उन्हें जान कर खुशी हुई कि मैं भी पहाड़ों का निवासी हूं। उनका एक बेटा और एक बेटी न्यूजीलैंड में नौकरी करते हैं। उम्र के नवें दशक में भुवाली में रह रहे उनके माता-पिता वहां की स्वास्थवर्द्धक जलवायु में खुशी से अपना वानप्रस्थ जीवन बिता रहे हैं।

सुबह 8 बजे अल्मोड़ा पहुंचा। बच्चों की पत्रिका ‘बाल प्रहरी’ और उत्तराखंड की ज्ञान-विज्ञान समिति से जुड़े साथी मेरे अल्मोड़ा पहुंचने का इंतजार कर रहे थे। पहली बार मिल रहे थे, इसलिए एक-दूसरे को पहचानने की उत्सुकता बनी हुई थी। खैर, कोणार्क होटल के सामने ही साथी प्रमोद तिवारी मिल गए। बाद में साथी नीरज पंत और अनिल पुनेठा मिल गए। साथी अनिल पुनेठा ने रात में ओढ़ने के के लिए घर से लाकर जो कंबल दिया था, उसकी गर्माहट सदा अनुभव करता रहूंगा। भूख लग आई थी। एल्युमिनियम फाइल में लपेटे आलू के दो पराठे बैग में रखे थे। मैं जानता था, पत्नी के इतने प्यार से बनाए पराठे खराब हो ही नहीं सकते, इसलिए नहा-धो कर प्यार से वे खाए।

इसी बीच सुदूर पिथौरागढ़ से मेरे रचना-कर्म पर शोध कर रहीं चंचल गोस्वामी आ गईं। उनके मन में और नोट-बुक में अनेक सवाल थे। उन सवालों पर डेढ़-दो घंटा चर्चा की और जवाब दिए। वे गईं तो मित्र नीरज ने आकर बताया, विद्यार्थी सौरमंडल की सैर पर चलने के लिए तैयार हैं। “कितने विद्यार्थी हैं?” मैंने पूछा, तो वे बोले, “करीब 450 हैं। हाईस्कूल और इंटर की ही बालिकाएं हैं, बाकी नहीं।”

11401566_386488291543161_2765685139086431664_n“ठीक है, चलते हैं,” मैंने कहा, और हम सीढ़ियां उतर कर पास के राजा आनंद सिंह बालिका इंटरकालेज की ओर चल पड़े। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि तथा पर्यावरण विज्ञानी डा. जीवन सिंह मेहता जी भी हमारे साथ थे। प्रधानाचार्य श्रीमती सावित्री टमटा से मिले और फिर उस हाल में गए जहां 450 बालिकाएं सौरमंडल की सैर के लिए तैयार बैठी हुई थीं। वहां साथियों ने जीवन और समाज में विज्ञान के महत्व पर एक शानदार गीत गाने के बाद मुझे विद्यार्थियों को सौरमंडल की सैर पर ले जाने के लिए कहा। मैं उन 450 छात्राओं से मुखातिब हुआ। उनसे तारों भरे आसमान की बातें कीं। अमीर खुसरो की आसमान पर लिखी पहेली सुनाई। आकाशगंगा और तारों के बारे में कुछ सवाल पूछे। फिर तारों के बारे में उनके साथ एक गीत गाया,

आसमान में लाखों तारे

टिमटिमाते तारे

सारे कितने सारे।

और, जब मुझे लगा कि वे अब तारों भरे आसमान में सौरमंडल की सैर के लिए पूरी तरह तैयार हैं तो मैं उन्हें लेकर सौरमंडल की यात्रा पर रवाना हो गया। सूर्य के पास जाकर हमने उसे गौर से देखा, उसके बारे में जाना और सौर लपटों से बचते हुए वे आठों ग्रह, उनके उपग्रह, कुईपर पट्टी, आठ बौने ग्रह और उनके चंद्रमाओं की ठंडी, वीरान दुनिया को देखते हुए सौरमंडल के सीमांत तक पहुंच गए। राह में हम सभी ने बौने ग्रह प्लूटो की ओर तेजी से बढ़ता, पृथ्वी से छोड़ा गया न्यू होराइजंस अंतरिक्ष यान भी देखा। हमने सौरमंडल के सीमांत के पार विशाल धूमकेतुओं का घर यानी ऊर्ट बादल भी देखा। वापसी की यात्रा में अंतरिक्षयात्री छात्राओं ने दूर से एक शानदार धूमकेतु और छूटते उल्का पिंड भी देखे। धरती पर लौट कर उन सभी ने मेरे साथ जीवन का गीत गाया। अंतरिक्ष के बारे में जिज्ञासाओं से भरी छात्राओं ने रोचक सवाल पूछे। एक छात्रा ने पूछा, ‘अगर पूरे सौरमंडल में जीवन ही नहीं है तो फिर एलियन कहां से हो सकते है? दूसरी छात्रा ने पूछा, “मंगल ग्रह का फोबोस चांद पश्चिम से क्यों उगता है? एक और छात्रा का सवाल था, “क्या बुध ग्रह से भी सूर्य के अधिक निकट कोई ग्रह है? एक बालिका ने पूछा, ”पृथ्वी पर ही जीवन क्यों है?” सभी के उत्तर दिए। धरती पर लौट कर हम प्रधानाचार्य सावित्री जी और अन्य शिक्षिकाओं को धन्यवाद देकर गोविंद बल्लभ पंत राज्य संग्रहालय में गए। वहां श्रोताओं से ‘विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ पर लंबी बातचीत का मौका मिला।

पहली शाम से ही लगातार यात्रा और भागदौड़ में था, इसलिए देर शाम ‘भूमिका’ में भोजन किया और रोशनी बुझा कर कोणार्क के किनारे के कमरे के एकांत में चुपचाप सो गया। बाहर की रोशनी में देखा, कमरे की खिड़की के ठीक सामने एक विशाल हरा-भरा तुन का पेड़ था।

आंख लगने को ही थी कि भौं-भौं का कुहराम मच गया। ‘फाड़ डालेंगे’, ‘देख लेंगे’, ‘यहां आने की हिम्मत कैसे की तुमने’ के अंदाज में गली के श्वान अपने इलाके में शायद गलती से आ गए किसी अन्य श्वान पर टूट पड़े। कुहराम के बीच उस अनजान श्वान की रिरियाहट और भय की कूं-कूं की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। लेकिन, बाकी श्वान थे कि शेर बने हुए थे…‘छोड़ेंगे नहीं’ की भौं-भौं से पूरी गली को गुंजा रहे थे।

वह कुहराम तभी रूका जब अचानक बारात के बैंड ने पूरे माहौल को थर्रा दिया। बैंड का हर बाजा सप्तम पर चीखना चाहता था। उस नक्कारखाने में भला भौं-भौं की तूती क्या सुनाई देती! बैंड आगे बढ़ा तो काफी देर तक कुछ लटपटाती आवाजें बहस में उलझी रहीं। उन्होंने शायद लोरी का काम किया। धीरे-धीरे मुझे नींद आ गई। रात के सन्नाटे में बस दो-एक बार कहीं कोई चिड़िया बोली, बस।

चिडियों की ही आवाज से सुबह-सबेरे नींद खुली। रक-सैक से जरूरी चीजें निकाल कर दो गिलास गुनगुना नींबू-पानी बना कर पिया। फिर खिड़की के पार तुन पर चहकती बुलबुलों के जोड़े का दोगाना सुनते हुए एक गिलास ग्रीन-टी बनाई और दूर पहाड़ों को देखते हुए उसके घूंट भरे। नीचे कहीं किसी पेड़ पर कोई कोयल अपने मधुर स्वर में प्रभाती गाने लगी थी। मैं चौंका, अमराइयों से दूर यहां पहाड़ में भी कोयल!

दिल्ली से चलते समय ही मन बना लिया था कि पहाड़ जा रहा हूं तो स्वादिष्ट, रसीले काफल जरूर खाऊंगा। नहा-धो कर बाहर सड़क पर आया। देखा, दो-तीन आदमी सिर पर टोकरी रखकर ‘काफल’, ‘काफल ले लो’ कह रहे हैं। उनमें से एक दीवार के सहारे पीठ लगा कर बैठा तो मैं उसकी ओर लपका। पूछा, “कैसे दिए काफल?”

“दो सौ रूपए किलो,” उसने कहा।

“कुछ कम करोगे?”

“दो सौ में भी मिल नहीं रहे हैं। जंगलों में हैं ही नहीं काफल। रेट ठीक लगा रहा हूं।”

बहरहाल, पचास रूपए के पाव भर काफल लिए। उसने अपनी चैड़ी हथेली से थैले में काफल भरे। कुछ फिर डाले। थैली को हाथ से उठा कर अनुमान लगाया और मुझसे कहा, “ये लीजिए पाव भर।”

मैंने कहा, “बिना तोले?”

“किसी भी दुकान पर तुलवा लीजिए। ज्यादा ही निकलेंगे।”

मैंने पचास का नोट दिया और चलते-फिरते मुट्ठी भर कर रसीले काफल खाने लगा। खाते-खाते अपना पूरा बचपन, गांव के काफल के वे पेड़, गेहूं के नल से बुनी वे काफलों से भरी सुनहरी टोकरियां शिद्दत से याद आती रहीं। उनके रस से मन भीतर तक भीगता रहा और वर्षों बाद ‘पाया हुआ जैसा’ मान कर मैं गुठलियां भी निगलता रहा। बाद में ‘भूमिका’ रेस्टोरेंट में जाकर चाय और बटर टोस्ट का नाश्ता किया और कौसानी जाने के लिए साथी नीरज पंत जी का इंतजार करने लगा।

वे अपनी कार में सपरिवार आए। पूनम जी गाड़ी चला रही थीं और नीरज बेटी राशि के साथ बैठे हुए थे। हमने अल्मोड़ा से 53 किलोमीटर दूर कौसानी की राह पकड़ी।

पहाड़ की सपीर्ली सड़क पर अल्मोड़ा की ऊंचाई से उतरते हुए कोसी नदी के किनारे पहुंचे। वहां के साफ-सुथरे शिवालिक रेस्टोरेंट में गर्मा-गर्म चाय पी। रेस्टोरेंट का रंग-ढंग शहर के ही किसी रेस्टोरेंट की तरह था। चाय पी ही रहे थे कि ‘बाल प्रहरी’ के संपादक और तीन दिवसीय बाल साहित्य संगोष्ठी के मुख्य आयोजक उदय किरौला जी का फोन आ गया कि कहां तक पहुंच चुके हैं। साथी नीरज ने बताया तो पता लगा 80 बच्चों की टोली पंत-वीथिका में पांच-दिनी लेखन कार्यशाला के समापन की प्रतीक्षा में है। उस अवसर पर वे हमारी उपस्थिति चाहते हैं। हम कोसी पार कर तेजी से कौसानी की ओर बढ़े। आगे कटारमल का बोर्ड देखा तो याद आया, वहां ऊपर उस पहाड़ पर सुना है तेरहवीं सदी का प्रसिद्ध कटारमल सूर्य मंदिर है। नीरज जी से पूछा तो उन्होंने कहा, “हां, है। अगली बार आप आएंगे तो जरूर वहां ले चलेंगे।” हम चीड़ वृक्षों से ढके पहाड़ों से निकलती सर्पीली सड़क पर आगे बढ़ते रहे।

बाद में सुंदर सामेश्वर घाटी का चौरस इलाका आया जहां दूर-दूर तक, पानी भरे खेतों में धान की रोपाई की जा रही थी। नीरज ने बताया, वहां आज भी हुड़के की थाप पर उत्तराखंड के प्रसिद्ध कृषि गीत ‘हुड़किया बौल’ के बोल गूंजते हैं। वहां यह परंपरा आज तक जीवित है। खेतों में महिलाओं को कतार में धान रोपते हुए देख कर मेरे मन के आकाश में, बचपन में सुने हुड़किया बौल का गीत गूंजने लगाः

ये सेरी का मोल्यू तुम भोग लगाला हो

सेवा दिया, बिदो हो

ये गों का भूमिया देवो, दैणा होया हो  !

10653483_387265291465461_7933948701063430618_nकौसानी पहुंचे। हरा-भरा कौसानी। दूर-दूर तक फैले पहाड़ और पहाड़ों पर फैले जंगल। चीड़ के जंगलों में कई जगह आग लगने से चारों ओर धुआं-धुआं फैला हुआ था। होटल के कमरे में सामान रखा और सीधे पंत-वीथिका की ओर बढ़े। सीढ़ियां उतर कर नीचे, पत्थरों से चिने और चौड़े पत्थरों से छाई छत वाले मकान में पहुंचे। यही पंत वीथिका थी। वही पंत वीथिका, जहां  20 मई 1900 को प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म हुआ। भीतर पहुंचे तो बच्चे चहके। वहां मौजूद शिक्षक साथियों से परिचय हुआ और बच्चों का कार्यक्रम आगे बढ़ा। वे सब अखबार की टोपियां पहने हुए थे जो उन्होंने स्वयं बनाई थीं। हमारा स्वागत करते हुए उन्होंने हमें भी एक-एक टोपी पहनाई ताकि हम भी उनकी तरह, उनमें ही शामिल हो जाएं। हम शामिल हो गए। बच्चों ने पहले एक स्वर में गाया: ‘उत्तराखंड मेरी जन्म भूमि, मेरी मातृ भूमि/मातृ भूमि, मेरी पितृ भूमि’ और फिर, ज्ञान-विज्ञान का न केवल चक्षु बल्कि मन के सभी द्वारों को खोल देने वाला मधुर गीत गाया।

हमारे सामने उन बच्चों की अपने हाथों से बनाई किताबें सजी हुई थीं जिनके नाम भी उन्होंने स्वयं तय किए थे- बाल मन, प्रकृति, बाल बिगुल, बाल विज्ञान, बाल वाणी, बाल प्रेरणा, नई किरण….। उनके साथ एक मोटी, 80-85 पेजी हस्तलिखित, सजिल्द पत्रिका ‘कौसानी’ भी रखी थी जिसमें कार्यशाला में आए हर बच्चे की एक-एक रचना संकलित थी- कविता, कहानी, लेख या चित्र। पूरी पत्रिका का चित्रांकन और सज्जा बच्चों ने ही की थी। हमने वह पत्रिका बच्चों के लिए ही लोकार्पित की।

DSCN3365फिर शुरू हुआ नन्हें बाल कवियों का कविता पाठ, जिसका संचालन भी बाल संचालकों ने ही किया। उस प्रस्तुति में बच्चों का उत्साह और आत्मविश्वास देखते ही बनता था। वे कविता सुनाने में बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे थे। यह सब देख कर साफ पता लग रहा था कि उन्होंने अपने मित्र शिक्षक-साथियों से पिछले पांच दिनों में कितना-कुछ सीखा है। उनके मन के रचनात्मक तार झंकृत हो चुके थे। दूर-दूर गांवों से आए 80 बच्चों में से आसपास के बच्चे अगले तीन दिनों तक राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में भी भाग लेने वाले थे। संगोष्ठी में विभिन्न प्रदेशों के लगभग 150 बाल साहित्यकार कौसानी पहुंचने वाले थे- उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, दिल्ली और उत्तराखंड से। रचनात्मक ऊर्जा से भरे बाल रचनाकारों को उनकी जिज्ञासा जगाने के लिए मैंने विश्व की सबसे छोटी कहानी सुनाई। कि, ट्रेन के एक डिब्बे में दो यात्री सफर कर रहे थे। एक ने दूसरे से कहा- ‘क्या तुम भूतों पर विश्वास करते हो? उसने कहा नहीं तो और गायब हो गया!’ बच्चे हैरान कि ये क्या हुआ? ऐसा कैसे हो सकता है? जब उनसे पूछा कि क्या उन्होंने, उनके दोस्तों ने या उनके घर वालों में से किसी ने भी कभी भी भूत देखा है? बच्चों ने कहा, ‘‘नहीं।’’ उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि कोई ऐसे और यों ही गायब हो सकता है। मैंने कहा, “तो फिर ऐसी भ्रामक और अंधविश्वास की बातों पर विश्वास क्यों करना चाहिए? बिल्कुल विश्वास नहीं करना चाहिए।” बच्चों ने हामी भरी।

1461852_387265454798778_2624404507017215845_nमैंने बात का रूख पलटा। उनसे पूछा, “अच्छा दोस्तो, मान लो, जो गायब हुआ, वह एलियन था।” उनके चेहरे चमके। बोले, “वह तो शायद गायब हो सकता है। हो सकता है, उसके पास ऐसी कोई तरकीब हो!” यानी, बच्चों को पृथ्वी से इतर लोकों में जीवन की संभावना पर विश्वास था। फिर मैंने उनके साथ मिल कर अपना ‘तारों का गीत’ गाया। लखनऊ से आए गीतकार घनानंद पांडे जी ने अपने मधुर कंठ से एक गीत सुनाया। नीरज पंत ने ‘इत्ता बड़ा पेड़!…..पेड़ में इतनी सारी टहनियां! टहनियों पर इतनी सारी पत्तियां! पत्तियों में इतनी सारी चिड़ियां!….चहचहाती  चिड़ियां’….चीं….चीं…चीं…’ और ‘तगड़ा चिकन, तगड़ा चिकन, तगड़ा चिकन!’ जैसे गीतों के साथ एक्शन में कुछ खेल कराए जिनमें बच्चों ने बड़े उत्साह से भाग लिया। साथी उदय किरौला ने टोपी की कहानी कहते, सिखाते कई तरह की टोपियां बना दीं और अंत में बच्चों को चकित करते हुए उसे कमीज में बदल दिया! फिर प्रतिभागी बच्चे विदा हुए और हम लोग भी अनासक्ति आश्रम के आंगन में गांधी जी की प्रतिमा के सामने चहारदीवारी पर बैठ कर चारों ओर के दृश्य देखने लगे।

DSCN3507घनानंद पांडे ‘मेघ’ जी से परिचय हो चुका था। इसलिए उनका साथ मिल गया। हम दोनों काफी देर तक व्यक्तिगत जीवन और लिखने-पढ़ने की बातें करते रहे। फिर उनके कमरे में गए। जहां के एकांत में उन्होंने अपने मधुर स्वर में अपनी दो कविताएं सुनाईं: ‘मां! तुम कैसे जी लेती हो’ और ‘चीड़ के जंगल’। उनकी मंत्रमुग्ध कर देने वाली मधुर आवाज में मेरे बचपन में ही विदा हो गईं मां साकार हो उठी। मन भर उठा। दूसरी कविता में चीड़ के वन गुनगुनाने लगे। फिर हम बाहर आए। सामने के ढाबे पर खाना खाया। पांडे जी ने बताया कि पंत वीथिका के सामने एक दूकान में अब भी पीतल के गिलासों में गरमा-गरम अदरक की चाय मिलती है। उन्होंने आठ वर्ष पहले पी थी। हमने तय किया कि शाम की चाय वहीं पीएंगे। पांच बजे के आसपास हम दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरे। सड़क मोड़ से उतरे ही थे कि दाहिनी ओर हाइड्रेंजिया के गुलाबी फूलों से लदी झाड़ी ने मोह लिया। उन फूलों की बहार स्वप्निल सौंदर्य बिखेर रही थी। उतार में चलते-चलते पांडे जी अचानक रुके और दाहिनी ओर, छोटी-सी चाय की दुकान की ओर इशारा करके कहा, “यही है। आइए।” हम भीतर जाकर बैठ गए और पांडे जी ने आवाज दी, “दो अदरक की बढ़िया चाय, गिलास में!” उन्होंने बुजुर्ग दूकानदार को बताया कि आठ साल पहले इसी दूकान में उनके हाथ से बनी अदरक की चाय पी थी। वैसी ही चाय पीने आए हैं अब।”

दूकानदार ने हमारी ओर गौर से देखते हुए कहा, “वैसी ही चाय हुई महराज अब भी। देता हूं अभी।” वे चाय बनाने लगे और हम बातें करने लगे। तभी बैंच से दबे पांव एक छोटी-सी बिल्ली आकर पांडे जी की गोद में बैठ गई  और आंखें मूंद कर घुरघुराने लगी। मैंने कहा, “देखिए, आपकी गोद में कितने आराम से बैठ गई है। जीव-जंतु भी जानते हैं, कौन प्यार करेगा, किसके पास जाना है।” अभी बात कर ही रहे थे कि वह उठी और मेज पर से होती हुई मेरी गोद में आकर बैठ गई। तभी चाय भी आ गई और वह प्यार जता कर दूकानदार के पास जाकर बैठ गई।

एक चाय से मन नहीं भरा। हमने एक-एक और चाय बनाने को कहा। अदरक की मोहक खुशबू और स्वाद वाली दो-दो चाय पीकर हम टहलते हुए सड़क ही सड़क आगे बढ़े कि सायंकालीन सैर भी हो जाएगी। अनासक्ति आश्रम की ओर की सड़क पर मुड़े ही थे कि बगल में एक कार आकर रुकी। दरवाजा खुला। एक युवक ने बाहर आकर कहा, “नमस्कार। पहचानिए में कौन हूं।” मैंने दिमाग पर जोर डाला, लेकिन पहचान नहीं पाया। युवक ने कहा, “आप देवेंद्र मेवाड़ी हैं। मैंने आपको पहचान लिया है। मुझे पहचान रहे हैं?”

मुझे अपनी ओर चुपचाप ताकता हुआ देख कर बोले, “मनोहर चमोली मनु।” मैंने खुश होकर कहा, “अच्छा, तो आप हैं। कहां हैं आपके हाथ-पैर। आइए, पहले गले लगते हैं।” इस तरह इस बच्चों के प्रिय युवा लेखक मनोहर चमोली से पहली बार भेंट हुई, हालांकि बच्चों के लिए उनकी लिखी 33 कहानियों का एक-एक शब्द मैं पहले पढ़ चुका था। उनसे मिलने की बहुत उत्सुकता थी और उदय जी से उनके आने के बारे में दो-तीन बार पूछ भी चुका था। उन्होंने कार में आए अपने दूसरे बाल साहित्यकार साथियों से परिचय कराया, “ये हैं प्रदीप बहुगुणा दर्पण और ये मोहन चौहान।” उन्होंने कार से चलने का आग्रह किया। मैंने कहा, “हम तो पदयात्री हैं मनु जी। आप चलिए, वहीं मिलेंगे।” हम सड़क पर आगे चलते रहे। बाईं ओर चीड़ के ऊंचे पेड़ हवा में सरगोशियां कर रहे थे। सरला बहन संग्रहालय के निकट एक मोड़ पर आकर हम सीमेंट की मेंड़ पर बैठे। वहां काफी देर तक अपनी जिंदगी के पृष्ठ पलट कर एक-दूसरे को सुनाते रहे। सुनाते-सुनाते अनासक्ति आश्रम पहुंचे। पता लगा, आज भोजन आश्रम के सामूहिक भोजनालय में करना है।

पश्चिम में सूर्य पहाड़ों के पीछे ढल चुका था। एक श्वेत बादल पर डूबते सूरज की लाल किरणें लालिमा पोत रही थी। तभी पश्चिमी आकाश में हीरे की तरह चमकता शुक्र ग्रह दिखाई दिया। उससे कुछ दूर ऊपर बृहस्पति चमक रहा था। मन में विचार आया कि शायद कभी बचपन में कवि सुमित्रानंदन पंत ने भी इन पहाड़ों के ऊपर नीले आसमान में चमकते ग्रह-नक्षत्रों को देखा होगा। हो सकता है, अंधेरे में सोए इन धीर-गंभीर पहाड़ों से ऊपर आकाश में तारों की इसी रहस्यमय दुनिया को देख कर ही उनके मन में वह भाव जागा हो, जब उन्होंने लिखा: ‘न जाने नक्षत्रों में कौन, निमंत्रण देता मुझको मौन!’ कुछ साथियों को शुक्र और बृहस्पति दिखाया। अनासक्ति आश्रम के चौड़े आंगन से सप्तर्षि के तारे और ध्रुवतारे को भी देखा। साथियों से तेज दृष्टि की जांच करने के लिए सप्तर्षि की पतंग की डोर पर छठे तारे वशिष्ठ के साथ उनकी पत्नी अरूंधती के छोटे-से-तारे को देखने की कोशिश करने को कहा। कुछ साथियों ने अरूंधती को भी देखा। अनासक्ति आश्रम के प्रवेश द्वार के पास आंगन में बापू गांधी की प्रतिमा थी। वे लाठी टेक कर गंभीर मुद्रा में कुछ सोच रहे थे। आश्रम में भोजन के लिए स्थान गृहण करने का निर्देश हुआ तो हम कतार में पालथी मार कर बैठ गए। मेरी बगल में मनोहर मनु बैठे। सभी ने साथ भोजन करने, के लिए प्रार्थना की: ‘ओम सहनाववतु सहनोभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै’।……शुद्ध, सात्विक भोजन मिला, भरपेट खाया। सभी थके-मांदे थे, इसलिए रात्रि विश्राम के लिए विदा हो गए।

अगले दिन यानी 12 जून 2015 को प्रातः 4.30 बजे उठा। नींबू पानी और ग्रीन-टी पी। फिर तैयार होकर बाहर निकला और कृष्णा माउंट व्यू होटल की सीढ़ियों से देवदार के वृक्षों की पृष्ठभूमि में, पूर्व में बादलों के बीच से ऊपर उठ रहे सूर्य की तस्वीरें लीं। फिर 76 सीढ़ियां उतर कर सड़़क पर आया और पेड़ों से घिरी उस पहाड़ी सड़क पर आगे बढ़ा। आसपास पेड़ों और झाड़ियों पर पक्षी चहक रहे थे। थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि सड़क के ठीक नीचे एक आदमी चटख पीले रंग की जे सी बी मशीन के जबड़े और दांतों की सफाई कर रहा ताकि वह जमीन में और गहरी गचक मार सके, हरियाली को लील सके। अगली बार आवूंगा तो शायद यहां भी सीमेंट-कंक्रीट का कोई होटल या रिजार्ट खड़ा होगा।

खैर, आगे बढ़ा। दांई ओर देवदार के पेड़ों-पत्तियों के बीच से सूरज आंख मिचैली खेल रहा था। किसी डाल से मीठी ‘सिर्रर्रर्र’ की आवाज आई। भूरे रंग की ‘मुसिया चड़ी’ यानी सीरेटेड लाफिंग थ्रस चिड़िया सुबह का गीत गा रही थी। पंत जी की पंक्तियां कानों में गूंजीं, ‘गाता खग प्रातः उठ कर-/सुंदर, सुखमय जगजीवन!’ कहीं गौरेयां चहक रही थीं तो कहीं बुलबुलें चहक रही थीं। शायद बचपन से यही सब देख-सुन कर पंत जी के मन में यह बिंब उभरा होगा: ‘प्रथम रश्मि  का आना रंगिणि तूने कैसे पहचाना? कहां-कहां हे बाल विहंगिनी पाया तूने यह गाना?

पेड़ों से छन कर आती सूरज की कच्ची धूप में फेफड़ों में खूब प्राणवायु भरते हुए मैं अगली पहाड़ी तक गया और वहां से काफी देर तक विहंगम दृष्टि से दूर-दूर तक फैले नीले पहाड़ों को देखता रहा। नीचे सीढ़ीदार खेत और यहां…वहां कुछ मकान दिखाई दे रहे थे। तभी याद आया, अपने बचपन में कभी इसी पहाड़ी पर तीन मील की कठिन चढ़ाई चढ़ कर, नीचे कोसी के किनारे के अपने धौलरा गांव से वह बालक प्राइमरी स्कूल में पढ़ने आया होगा, जो बाद में विज्ञान कथाकार यमुना दत्त वैष्णव ‘अशोक’ बना।

प्रकृति को मन भरकर देखने के बाद होटल में लौट आया। सीढ़ियों के साथ लगे सीमेंट के गेट के ऊपर रखे गमलों में सोई लिली के फूल सुबह की धूप में अब आंख खोल रहे थे।

आज राजकीय इंटर कालेज, कौसानी में मुझे विद्यार्थियों को सौरमंडल की सैर भी करानी थी। इसलिए तैयार होकर सुबह 9 बजे साथी नीरज पंत के साथ अगली पहाड़ी में कालेज की ओर निकला। मनोहर मनु को पता लगा तो उत्साहित होकर बोले, “वहां तो हम भी चलेंगे।” पूनम जी और बेटी राशि ने हमें कालेज के नीचे तक छोड़ा। वहां से ऊपर थोड़ी चढ़ाई चढ़ने ही लगे थे कि मनोहर मनु, प्रदीप बहुगुणा दर्पण, मोहन  चौहान और घनानंद पांडे ‘मेघ’ जी भी पहुंच गए। कालेज पहुंचे तो पता लगा प्रिसिंपल किसी आकस्मिक कारण से जा चुके हैं। नाशपाती के दो विशाल पेड़ों की छांव के आसपास वाइस प्रिंसिपल तिवारी जी और दो-एक शिक्षक चर्चा करते मिल गए। थोड़ी दूर एक और शिक्षक प्रांगण की धूप में किसी कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ा रहे थे।

मैंने नाशपाती के हरे-भरे पेड़ों की इतनी ऊंची जोड़ी पहली बार देखी। उनके तने से लग कर अपना प्यार जताया। सामने आर-पार इंटर कालेज की पुरानी दो मंजिल इमारत खड़ी थी। कक्षों के नाम वैज्ञानिकों के नाम पर रखे गए थे। हमें पता लगा, इस इंटर कालेज से पढ़ कर कई छात्रों ने देश-विदेश में नाम कमाया है। कई अप्रवासी अपनी इस शिक्षा स्थली को देखने आते रहते हैं।

kausaniशिक्षकों से बात हुई तो वे बोले बच्चों को हाल में बैठा देंगे। आप वहां व्याख्यान दे दीजिए। व्यवस्था की गई। बच्चे पहली मंजिल के हाल में बैठे। माइक की भी व्यवस्था हो गई। इमारत के पीछे से हम हाल में पहुंचे। लकड़ी की लंबी काली शहतीरों और तख्तों से बनी ऊंची छत के नीचे कतारों में बच्चे बैठे थे। परिचय हुआ और बातों-बातों में मैंने बच्चों से आसमान और तारों की बात की। फिर किस्सागोई के सहारे उन्हें कल्पना-यान में बैठा कर सौरमंडल की सैर पर ले गया। ग्रहों, बौने ग्रहों, उपग्रहों, क्षुद्रग्रहों के साथ-साथ धूमकेतु और उल्काओं को देख कर हम धरती पर लौटे। उनके साथ भी अपनी धरती में जीवन की धड़कन को अनुभव करते हुए जीवन का गीत गाया।

11742653_866931740043750_8738596225186888706_nअनासक्ति आश्रम में राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी शुरू होने वाली थी। इसलिए कालेज का पुस्तकालय देख कर, हमने बच्चों और शिक्षक-शिक्षिकाओं से विदा ली और तेजी से वहां पहुंचे। हमारी प्रतीक्षा हो रही थी। सामूहिक खान-पान की नई व्यवस्था भी शुरू हो चुकी थी। इसलिए पहले सभी ने भोजन किया और फिर अनासक्ति आश्रम के हाल में पहुंचे। ‘बाल वाटिका’ के संपादक डा. भैरूलाल गर्ग की अध्यक्षता और मुख्य अतिथि महाराष्ट्र से आए वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री हरीश चंद्र बोरकर के सान्निध्य में उद्घाटन सत्र शुरू हुआ। पहले साथी उदय किरौला, नीरज पंत, गरिमा किरौला और कई महिला साहित्यकारों ने जोशीले उद्बोधन गीत गाए। श्रोताओं में लगभग 150 बाल साहित्यकारों के अलावा बच्चे भी मौजूद थे। यानी, लेखक भी और उनके नन्हे पाठक भी। वरिष्ठ साहित्यकार श्री दिविक रमेश भी संगोष्ठी में उपस्थित थे। चर्चा की शुरूआत साथी मनोहर मनु ने की। उन्होंने दो टूक लहजे में हिंदी बाल साहित्य की अब तक की उपलब्धियों और भावी संभावनाओं के बारे में बताया। राकेश चक्र जी ने बाल-साहित्य की दशा-दिशा पर बात की।

डा. गर्ग ने ऐसे बाल साहित्य के लेखन की जरूरत पर बल दिया जिसकी जड़ें संस्कृति में जमी हों और जो आज के समय के साथ पनपे। वह आदमी से आदमी की दूरी मिटाए। बोरकर जी ने कहा कि हमें आज के बच्चों की, आज के समय की कहानियां लिखनीं चाहिए। ऐसी कहानियों को बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने गैजेटों के कारण अकेले होते जा रहे बच्चों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। इसी बीच बाल साहित्य की कई पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया। वह शाम विभिन्न प्रदेशों से आए 25 से अधिक कवियों की कविताओं से कवितामय हुई। शुरूआत घनानंद पांडे ‘मेघ’ के मधुर स्वर में सरस्वती वंदना और एक अन्य मधुर गीत से हुई।

DSCN340111एकदम सुबह मैं ओर मेघ जी साथी नीरज पंत और उनके परिवार के साथ कौसानी से 17 किलोमीटर दूर बैजनाथ के प्राचीन मंदिर समूह को देखने गए। पार्वती की अनुपम मूर्ति देश भर में केवल वहीं है। लौट कर संगोष्ठी में गए।

अगले दिन (13 जून) की संगोष्ठी बच्चों की काव्य गोष्ठी से शुरू हुई जिसकी अध्यक्षता और संचालन भी बच्चों ने ही किया। देश भर से आए श्रोता बाल-साहित्यकार बच्चों की काव्य प्रतिभा देख कर बहुत खुश हुए और उन्होंने बाल कवियों का खूब उत्साहवर्धन किया।

उसके बाद बच्चों के लिए विज्ञान लेखन पर चर्चा की गई। विज्ञान लेखक इरफान ह्यूमन ने पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञान से जुड़ी रचनाओं की कमी पर चिंता जताई। साथ ही, इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि विज्ञान के विषयों पर हम जो कुछ लिख रहे हैं, क्या उसे बच्चे आसानी से समझ रहे हैं? उन्होंने बच्चों के लिए रोचक विज्ञान कथाओं की जरूरत पर भी बल दिया। बाल साहित्यकार जाकिर अली रजनीश ने कहा कि विज्ञान का मतलब केवल प्रयोगशाला, वैज्ञानिक, यंत्र या मशीनें नहीं है बल्कि विज्ञान का मतलब अपने चारों ओर की दुनिया को समझना भी है। हमें बच्चों के सवालों को टालना नहीं चाहिए बल्कि उनकी जिज्ञासाओं के हर संभव जवाब देने चाहिए। बच्चों को बताना चाहिए कि देखो विज्ञान कितना रोचक है, वह हौव्वा नहीं है। जाकिर ने भी बच्चों के लिए विज्ञान कथाएं जरूरी बताई।

रवीन्द्र रवि ने कई व्यावहारिक उदाहरण देकर समझाया कि देखो, विज्ञान कितना रोचक है। यह विशेष ज्ञान है और हमें प्रकृति के अनजाने रहस्यों के बारे में बताता है। रवि ने कहा कि आज के बच्चे विज्ञान के युग में जी रहे हैं। इसलिए वे अधिक जिज्ञासु और समझदार हैं। हमें उन्हें तमाम चीजों के बारे में बारीकी से बता कर उनमें वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहिए।

DSCN3440मैंने जीवन में विज्ञान के महत्व की बात करते हुए बच्चों के लिए सरल, सहज भाषा और रोचक शैली में विज्ञान लिखने की जरूरत पर बल दिया। यह भी कहा कि बच्चों के लिए विज्ञान लिखते समय हमें अपने मन के आंगन में बच्चों को जरूर बैठा लेना चाहिए अन्यथा हम बच्चों के लिए नहीं बल्कि खुद अपने लिए लिख रहे होंगे।  मैंने परीकथाओं की बात करते हुए, युग बदल जाने के साथ-साथ कल्पनाओं के विज्ञान कथाओं में बदल जाने की गाथा भी सुनाई और बाल साहित्यकारों से विज्ञान कथाएं लिखने की अपील की। मैंने कहा, बाल साहित्यकार बेहतरीन विज्ञान कथाएं लिख सकते हैं क्योंकि वे कहानी लिखने की कला जानते हैं। उन्हें बस विज्ञान पर आधारित कथानक बुनना होगा।

इस बीच सहसा आसमान में बादलों की आवाजाही शुरू हो गई। इतने सारे लोगों का सामूहिक रूप से भोजन करना भी किसी उत्सव से कम नहीं था। और, ऊपर से पूर्वजों के प्रतिनिधि वानरों की खिजबाड़ी! वे कभी टीन की छत पर दौड़ लगाते, कभी दीवारों पर कूदते और कभी हैरान होकर देखते कि ये मनुष्य इतना कुछ आखिर खा क्या रहे हैं? वानर बच्चे तो बहुत पास आकर भी झांक जाते। एक वानर को ऊंची, सोलर-सेलों की चिकनी पट्टी इतनी पसंद आई कि वह लेट कर उस पर पीठ के बल फिसलने का आनंद लेता रहा। भगाने पर, वे पास के ही बहुत ऊंचे देवदार पर आसमान की ऊंचाई तक चढ़ गए।

भोजन करने के बाद अनासक्ति आश्रम के खुले आंगन के पार पहाड़ों और आसमान में उमड़ रहे बादलों की ओर देखने पर जैसे पंत जी की ‘हिमाद्रि’ की पंक्तियां साकार हो रही थीं: ‘मेघों की छाया के संग-संग/हरित घाटियां चलती प्रतिक्षण’…..

10858621_415501255300202_7174310030438795911_nबाल साहित्य की प्रयोगशाला में एक और मजेदार प्रयोग किया गया- बाल कविता और बाल कहानी का विश्लेषण। यानी, बच्चों की कसौटी पर बाल कविता और कहानी। डा. दिविक रमेश, श्री रमेश पंत और डा. सरोज गुप्ता मंच पर और सामने कतार में बैठे टिप्पणी के लिए तैयार बच्चे! राजा चैरसिया, देश बंधु शाहजहांपुरी, धन सिंह मेहता और रुद्रपाल गुप्त ‘सरस’ ने कविताएं सुनाईं और बच्चों ने उन पर बेझिझक अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियां कीं। दिविक जी ने कहा कि उन्होंने देश-विदेश में अनेक बाल साहित्य संगोष्ठियों में भाग लिया है लेकिन कवियों और बच्चों के विश्लेषण का यह अद्भुत प्रयोग पहली बार यहीं देखा।

इसके बाद बच्चों ने बाल कहानी का विश्लेषण किया। डा. महावीर रवांल्टा और डा. प्रभा पंत के सान्निध्य में डा. मोहम्मद अशरद खान ने मुस्लिम पृष्ठभूमि पर आधारित एक विकलांग बच्चे के साहस और स्वाभिमान की मार्मिक कहानी सुनाई। बाल समीक्षकों को कहानी काफी पसंद आई और उन्होंने उसके विभिन्न पहलुओं पर अपनी टिप्पणियां कीं।

DSCN3449इन सत्रों के बीच-बीच में मेघ गर्जना सुनाई देती रही और कुछ नटखट वानर ने अचानक खिड़कियों से भीतर झांक कर यह समझने की कोशिश करते रहे कि आखिर ये लोग बातें क्या कर रहे हैं? आकाश में गरजते मेघ कविवर पंत के शब्दों में ‘पल में जलधर, फिर जलधार’ बन गए। झमाझम बरसती बारिश की बूंदों ने टीन की छत पर संगीत की धुन छेड़ दी तो हम सभी बैठे-बैठे कुछ देर कौसानी में हो रही वर्षा के बारे में सोचने लगे। लेकिन, वह बाहर पेड़-पौधों और धरती को खूब भिगो कर जल्दी ही विदा हो गई। बाहर निकले तो पूरी फिजां ही बदली हुई थी। धरती से मिट्टी की सौंधी-सौंधी गंध हवा में धुल-मिल रही थी। घाटियों और पहाड़ों पर फैला जंगलों की आग का धुवां बर्षा की बूंदों के साथ धुल गया था और सद्यःस्नाता प्रकृति का सौंदर्य निखर उठा था। तापमान अचानक कम हो गया और कुछ लोग वास्कट, हाफ स्वेटर में दिखने लगे। पास में ही चाय के ढाबे पर जाकर हमने चाय पी, गर्म पकौड़े खाए। देर शाम अंधेरे में देखा, वर्षा से जंगलों की आग बुझ चुकी थी और आसमान तारों से जगमगा उठा। मन लोकगीत गाने के लिए मचला। उदय जी, नीरज जी, मैंने और दो-तीन साथियों ने एक-दूसरे की बाहें थामीं और गोल घेरे में झोड़ा गाना शुय किया, “खोलि दे माता, खोल भवानी, धार में किवाड़!”…साथियों के बाजू जुड़ते गए, घेरा बढ़ता गया और झोड़े का समां बंधता गया।

DSCN3476तीसरे दिन (14 जून) प्रातःकाल उठा, ग्रीन-टी पी और कैमरा लेकर होटल से सीधे ऊपर पहाड़ी की ओर निकल गया, अकेला चारों ओर चीड़ वन था। कहीं-कहीं काफल के पेड़, किलमोड़े-घिंघारू और हिंसालू की झाड़ियां। पूरा जंगल चीड़ की गिरी हुई सूखी पत्तियों यानी पिरूल से ढका हुआ। न रास्ता, न पगडंडी। मैं अपनी राह ऊपर और ऊपर चढ़ता गया। पेड़ों से मिला। उनके सहारे खड़ा होकर उनसे मन ही मन बातें कीं। पिरूल में से ऊपर निकल आए सफेद वन फूलों को प्यार से देखा। जो उस वीराने में भी मुस्करा रहे थे। उस खामोशी में वहां मुझे तीन जंगली मुर्गियों ने देखा। मैंने भी उन्हें देखा लेकिन वे पिरूल में तेजी से चल कर आंखों से ओझल हो गईं। मेरे कैमरे की आंख उनमें से केवल एक की ही छवि उतार सकी। आह, कितनी अच्छी लगती है पेड़ों की, प्रकृति की संगत! इन्हीं के बीच रहने का मन करता है। इन जंगलों में कभी घूमे होंगे सुमित्रानंदन पंत और हरे-भरे द्रुमों तथा प्रकृति के इसी मोह में डूब कर कवि ने कहा होगा, “छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया/बाले तेरे बाल जाल में, कैसे उलझा दूं लोचन।” कौन छोड़ना चाहेगा द्रुमों की यह छाया? लेकिन, जाना होगा। संगोष्ठी का सत्र शुरू हो जाएगा।

तो गया, और सीधे हाल में पहुंचा। मंच पर श्री हरिमोहन और डा. हयात सिंह रावत के सान्निध्य में श्री जगदीश जोशी ने बेहद रोचक उदाहरणों के साथ कुमाउंनी आंचलिक बाल साहित्य का परिचय दिया। उन्होंने बच्चों को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए आंचलिक बाल साहित्य की विरासत को बचाए रखने और नई आंचलिक रचनात्मकता को बढ़ावा देने की बात पर बल दिया।

बात व्यक्तिगत है, इसलिए नाम तो नहीं लिख सकता लेकिन, मेरे लिए वह एक आत्मीय अनुभव की घटना थी, उसे बताता हूं। हाल में अचानक एक मित्र आए और दस मिनट कमरे  में चलने को कहा। बाहर आया तो देखा, दो और साथी साथ थे। एक साथी आगे निकल गया। मैं हैरान कि ऐसा क्या जरूरी काम आ पड़ा? खैर, मामले को गंभीरता से लिया और कमरे की चाबी हाथ में लेकर तेजी से उनके साथ गया। दरवाजा खोला, भीतर गए तो पूछा, “क्यों क्या बात हो गई?” तभी, पहला साथी भी भीतर आ गया और तीनों बोले, “आपको तहे-दिल से यह छोटी-सी भेंट देना चाहते हैं।” मैंने चौंक कर कहा, “मुझे क्यों? नहीं-नहीं, यह क्या बात हुई। पहली बार तो मिल रहे हैं।” वे बोले, “इसीलिए। हमें आपसे मिल कर बहुत अच्छा लगा और हमारा मन हुआ कि आपको यह छोटी-सी भेंट दें।” मैं असमंजस और संकोच में गड़ गया। लेकिन, उन्होंने आदर के साथ शुभकामनाएं दीं। भेंट देकर वे बच्चों की तरह उत्साह से भर उठे। मैंने स्नेह-सिक्त आभार व्यक्त किया और हम तेजी से आकर फिर हाल में आकर बैठ गए। दिन में भोजन करते समय सीढ़ियों पर लक्ष्मी आश्रम की प्रेमा दीदी से भी भेंट हो गई। वे बोली, “इन दिनों आपकी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ पढ़ रही हूं।”

उसी दिन बाल साहित्यकारों के सम्मान के साथ वह तीन दिवसीय प्रयोगधर्मी संगोष्ठी सम्पन्न हुई। इस अवसर पर उत्तराखंड बाल साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा तथा ‘बाल प्रहरी’ त्रैमासिक की ओर से 11 बाल साहित्यकारों को ‘बाल साहित्य सम्मान 2015’ से नवाजा गया। अगले वर्ष फिर मिलने की शुभकामनाओं के साथ सभी साथियों ने विदा ली। राजस्थान से आए वरिष्ठ साहित्यकार डा. भैरूलाल गर्ग से वापसी की चर्चा की और सुबह कौसानी से काठगोदाम रेलवे स्टेशन तक साथ जाने की बात तय हो गई।

DSCN3504दोपहर बाद साथी उदय किरौला बोले, “आप लक्ष्मी आश्रम जाना चाहते थे, चलिए हो आते हैं।” मैंने खुश होकर कहा, “चलिए। डेविड भाई से मिलना चाहता हूं।” युवा मित्र रावत जी भी साथ में थे। हम तीनों सामने बांज, बुरांश और देवदार के हरे-भरे पेड़ों से ढकी पहाड़ी की खड़ी चढ़ाई चढ़ कर लक्ष्मी आश्रम पहुंचे। एक बहिन ने स्वागत किया और आफिस में बैठाया। थोड़ी देर बाद डेविड भाई आए तो उनसे गले मिला। उन्होंने मेरे आत्म-कथात्मक संस्मरणों की लेखमाला ‘मेरा गांव: मेरे लोग’ पढ़ी थी जो अब ‘मेरी यादों का पहाड़’ पुस्तक के रूप में  छप चुकी है। यह लेखमाला ‘नैनीताल समाचार’ में छपी थी। डेविड भाई का बड़ा मन था कि वे संस्मरण पुस्तक रूप में छपें। उन्होंने इस बारे में ‘नैनीताल समाचार’ को पत्र भी लिखा था। पुस्तक छपने के बाद पता लगा कि वे पुस्तक को भी पढ़ चुके हैं और कई अन्य लोगों को भी पढ़ा चुके हैं। उनसे मिलना एकदम नया अनुभव था। वे इंग्लैंड के रहने वाले हैं और 1980 के दशक की शुरूआत से लक्ष्मी आश्रम में हैं। श्रीमती डेविड उत्तराखंड से ही हैं। डेविड भाई से हिंदी में तमाम विषयों पर बातें हुईं- पहाड़, पर्यावरण, पहाड़ों से पलायन की समस्या, पहाड़ों की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण आदि। उन्हें मेरे वैज्ञानिक व्याख्यान का पता लगा तो बोले,  “प्रसिद्ध विज्ञान लेखक समर बागची आश्रम में आया करते थे। वे भी यहां स्कूल-कालेजों में विज्ञान के व्याख्यान देते थे।” फिर कहने लगे, “आप भी आएं, अच्छा लगेगा।” पहाड़ों से हो रहे पलायन पर बात करते-करते उन्होंने कहा कि यह पीड़ा दुनिया भर के पहाड़ झेल रहे हैं। उन्होंने ‘पहाड़’ पत्रिका के एक विशेषांक में स्काटलैंड के निर्जन पहाड़ों पर लिखा अपना लेख दिखा कर कहा, “कभी वे सब पहाड़ अपने मूल निवासियों से आबाद थे।” बातों-बातों में उन्होंने मुझे अपनी मेज में रखा पेपर वेट दिखाया जो अद्भुत था। अद्भुत इसलिए कि वह समुद्री कोरल का अवशेष था और इसलिए भी कि उसे न जाने कौन उनकी मेज पर रख गया था!’ कभी फिर लक्ष्मी आश्रम आने का वादा करके हमने डेविड भाई से विदा ली। फिर उतार में उतरते हुए साथी रावत जी के घर पर गर्मा-गर्म पकौड़े खाए, चाय पी और नीचे उतर कर मैं अनासक्ति आश्रम की चढ़ाई चढ़ कर अपने कमरे में पहुंचा। सुबह वापसी के लिए रक सैक की पैंकिंग की। भोजन करके थका-मांदा सो गया।

उठा, सुबह 4.30 बजे। लेकिन, हाय, नल में पानी ही नहीं था। बोतलों के पानी से नींबू-पानी बना कर पिया, ग्रीन टी पी। होटल का पानी का पंप चला तो एक बाल्टी पानी से फटाफट काक-स्नान किया। 6.30 बजे साथी उदय जी आ गए। उनके साथ अनासक्ति आश्रम के आंगन में पहुंच कर टैक्सी का इंतजार किया। टैक्सी आई 8 बजे, सारथी सिद्धहस्त भूपाल सिंह। कौसानी को अलविदा कहा। चौराहे पर उस पार दूकान के बाहर बैठे डेविड भाई दिखाई दिए। मैंने चलते-चलते उन्हें हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। अल्मोड़ा पहुंच कर नाश्ता किया। पता लगा, कैंची से होकर जाने वाला मुख्य मार्ग बंद है। इसलिए रास्ता बदल कर रामगढ़ से होकर गए। रास्ते में सहयात्रियों ने इस यात्रा की यादगार चीज के रूप में चीड़ के सूखे कोन एकत्र किए। मैं राह भर उन्हें किस्से-कहानियां सुनाता रहा। रामगढ़ से भुवाली, भीमताल और 6 घंटे की लगातार यात्रा के बाद 2 बजे काठगोदाम रेजवे स्टेशन पहुंचे। हम तीन यात्रियों को काठगोदाम से बैठना था। डा गर्ग और लोढ़ा जी सपरिवार हल्द्वानी स्टेशन को चले गए। रानीखेत एक्सप्रेस ट्रेन को रात 8.40 बजे जाना था, इसलिए स्टेशन के प्रतीक्षालय में साढ़े छह घंटे इंतजार करना था। सोचा, कुछ खा लूं। रेलवे स्टेशन से बाहर रेलवे के ही व्यावसायिक रेस्टोरेंट में गया। रक-सैक उतारा, बैठा। एक लड़के ने आकर मुस्कुराते हुए पूछा, ‘यस सर?’ मैंने मसाला दोसा का आदेश दिया। दोसा लेकर आया तो वह बातों में लग गया। उसने फिर पूछा, “सर, आप क्या कौसानी से आ रहे हैं?”

मैं हैरान कि इसे कैसे पता लगा? कहा, “हां, लेकिन तुम्हें कैसे पता लगा?” वह पहाड़ का ही लग रहा था।

“मैं कौसानी में रहा हूं। लक्ष्मी आश्रम में आपकी तरह के लोग रहते हैं?”

“मेरी तरह के कैसे?”

“विदेशी। सर आप किस देश के हैं?”

मैंने हंस कर कहा, “भारत देश का।” फिर कुमाउंनी बोली में उससे कहा, “म्यर घर कालाआगर गौं में छ। यां बटी करीब सौ किलोमीटर दूर, धुर में। (मेरा घर कालाआगर गांव में है। यहां से करीब सौ किलोमीटर दूर, पहाड़ की चोटी में।)

वह हंस पड़ा।” एक बात है सर, आपने पहाड़ी भाषा भी अच्छी सीख ली है। अच्छा, मैं बताऊ? आप या तो इंग्लैंड से हैं या फ्रांस से। बताइए कहां से?”

मुझे भी हंसी आ गई। हंसते हुए कहा, “पिछली बार धानाचूली के एक होटल वाला मुझे जर्मन बता रहा था। तब मैंने साथ में बैठी अपनी पत्नी की ओर इशारा करके कहा- मेरी ससुराल नाई गांव में है तो वह बोला-हमारे यहां की बैंणी (बहिन) से शादी कर ली तो आप यहां के जो क्या हो गए!”

उसने सुना और थोड़ा मचल कर पूछा, “अच्छा, सच-सच बताइए सर, आप किस देश से हैं?”

अब मुझे गुस्सा आ गया। कहा, “तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है, जो मैं कह रहा हूं? एक काफी लाओ।”

वह काफी दे गया। थोड़ी दूर खड़ा होकर मुझे कनखियों से देखने लगा। मैं उठने लगा तो वह बिल ले आया। उसके चेहरे पर हंसी लाने के लिए मैंने अतिरिक्त पैसे दिए। वह खुश हो गया और पीठ पर रक-सैक कसने में मेरी मदद की। मैं चलने लगा तो उसने कहा, “सर फिर आइएगा।”

मैंने कहा, “मेरा तो घर ही है यह। आता रहूंगा।”

उस गर्मी में, थके कदमों से प्रतीक्षालय में गया। जहां कौसानी संगोष्ठी से आए कई और साथी मिल गए। उनके साथ गप-शप में काफी समय निकल गया। सात बजे फिर उसी रेस्टोरेंट में गया। उसी लड़के ने प्यार से दही, पराठा खिलाया। लौटा और रानीखेत एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर आई तो जाकर अपनी रिजर्व बर्थ में लेट गया। थका-मांदा था, धीरे-धीरे नींद आ गई।

यात्रा में दिल्ली के अनुभव का नश्तर न लगे तो वह भला क्या यात्रा? अल-सुबह दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन पहुंची तो बुक की हई टैक्सी और ड्राइवर के बदले उसी एजेंसी की दूसरी टैक्सी और दूसरा ड्राइवर पहुंच गया। चरमराती टैक्सी में घर की ओर चला जो घर आने से कुछ पहले ही कराह कर ठप हो गई। ड्राइवर से पैसे पूछे तो वह दिल्ली से कौसानी और कौसानी से दिल्ली की उच्च श्रेणी के रेल के कुल किराए से भी अधिक था। उसे पैसे दिए और सामान लाद कर पैदल घर की ओर चला। यों, कुत्ते मेरे साथ सदा दोस्ती निभाते हैं। लेकिन, उस दिन सड़क पर आराम कर रहे कुत्तों को न जाने क्या हुआ, पीछे पड़ गए। एक ने तो धीरे से जींस के पांयचे में भी दांत गड़ा दिए। उन्हें डांट-डपट कर घर पहुंचा। एजेंसी को फोन पर फोन करके बताया कि ड्राइवर ने फालतू पैसे लिए हैं। आधे घंटे बाद ड्राइवर आया और कुछ पैसे लौटा कर चला गया। मैं क्या कर लेता? दिल्ली की टैक्सियों पर क्या कभी किसी का वश चला है?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *