सपनों को उगते हुए देखना

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सपने सभी देखते हैं लेकिन कुछ लोग अपने सपनों को साकार करने के लिए उन्हें असलियत की जमीन पर बोते, उन्हें अंकुरित होकर उगते हुए भी देखते हैं। आज अलीगढ़ से 16 किलोमीटर दूर एटा मार्ग पर एक ग्रामीण कालेज, पद्मोदय यूनीवर्सल कालेज में मैंने डा. पद्मा शर्मा और डा. उदय वीर शर्मा दम्पती के सपने को उगते देखा। इससे कुछ दिन पूर्व रामनगर, नैनीताल में भी ऐसे ही एक सपने को उगते हुए देखा था।

सुबह 4.45 बजे द्वारका, दिल्ली से चल कर दिल्ली-लखनऊ शताब्दी से लगभग 8 बजे अलीगढ़ जंक्शन पहुंचा तो कालेज के निदेशक श्री मानव शर्मा का फोन मिला, “मैं समीक्षा शर्मा का भाई मानव शर्मा बोल रहा हूं। स्टेशन पर आपको मिलूंगा, लेकिन आपको पहचानूंगा कैसे? ”

मैंने अपनी पहचान बताई और कहा “कि आज के समय का लेखक खोजिएगा, बीते हुए समय का नहीं। आप पहचान जाएंगे। और, सचमुच उन्होंने पहचान लिया।” उनके साथ पहले उनके घर गया रमेश विहार, जिसके बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पापा की कोशिश से यहां ऐसी कम से कम छह कालोनियां बसी हैं। घर के गेट पर पहुंचे तो नजर उसके बाशिंदों के नाम पर पड़ी- डा. उदय वीर शर्मा, पीएच. डी., डी.लिट्. और डा. पद्मा शर्मा, पीएच. डी., डी.लिट्.। पता लगा, पद्मा जी और उदय वीर जी ने रिटायर होने के बाद सपना देखा कि अपना जीवन शिक्षक के रूप में बिताया है तो अवकाश प्राप्त जीवन भी मां सरस्वती की सेवा में लगाएं। अलीगढ़ शहर में कई स्कूल-कालेज हैं, पब्लिक स्कूल हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा की ऐसी कोई अच्छी सुविधा नहीं है। उन्होंने तय किया कि वे गांव के बच्चों को अच्छी शिक्षा देंगे। पास में जो कुछ पूंजी थी, उससे और पेंशन की राशि से उन्होंने एक विद्या केन्द्र खोलने का सपना देखा और वह सपना उगा ‘पद्मोदय यूनीवर्सल कालेज’ के रूप में।

लेकिन, यह समीक्षा और मानव कौन? पद्मा जी और उदयवीर जी की बेटी और बेटा हैं ये दोनों। दोनों ही उच्च शिक्षित। देश-विदेश में रहे हैं। मानव दक्षिण अफ्रीका, लीबिया और कनाडा में शिक्षक रहे हैं। वे कनाडा के स्थाई निवासी भी हैं। समीक्षा जी विभिन्न विषयों पर लिखती रहती हैं। पिछले दिनों हार्वर्ड की एक पत्रिका में इन दोनों भाई बहनों का आलेख छपा है। समीक्षा को अमेरिका में शिक्षिका की नौकरी भी मिली है, लेकिन माता-पिता की बढ़ती उम्र को देखते हुए उनके सपने को साकार करने के लिए भाई-बहिन कालेज के काम को संभालने में जुटे हुए हैं।

वहां जिज्ञासाओं से भरे मानव जी के दो प्यारे बच्चे मिले विक्रमादित्य और विदिता। विक्रमादित्य ने जर्मन शैफर्ड नस्ल के अपने नए छोटे से दोस्त ‘पेंथर’ से मिलाया जो चमकती आंखों और हिलती पूंछ से प्यार जताने लगा। दही-मट्ठा, काटेज चीज और नमक-हींग की रोटी का नाश्ता करके हम पद्मोदय यूनीवर्सल कालेज के लिए निकले। बाहर आसमान से सूरज आग बरसाने लगा था। रास्ते में महाकवि बिहारी याद आए। वहां चिलचिलाती धूप में पेड़ों की छांव भी छांव चाह रही थी। उस अथाह गर्मी में भी यहां-वहां कहीं-कहीं नीम, पीपल और बरगद के पेड़ पत्तियों के हरे आंचल की छांव से ढके हुए थे। कहीं कोई गुलमोहर, कहीं कोई अमलतास अपने सुर्ख तथा पीले फूलों की मुस्कराहट बिखेर रहा था।

हम कालेज पहुंचे जहां पद्मा जी और उदय जी ने हमारा स्वागत किया। पता लगा, वे हर रोज एकदम सुबह कालेज में चले आते हैं और निर्माणाधीन भवन के काम की निगरानी करते हैं। मानव बताते हैं कि कालेज परिसर में वसंत ऋतु में चारों ओर हजारों फूल खिले हुए थे। डा. उदयवीर ने मुझे क्यारी में लगा जुही का पौधा दिखाया। बोले, “देखता हूं, इस पर फूल कब आते हैं, अभी तो पौधा ही बढ़ रहा है।” फिर वे मुझे गोशाला में ले गए, जहां दो गायों, उनकी बछिया और एक होलस्टीन फ्रेजियन नंदी से भेंट हुई। पता लगा, इन्हीं के दूध से दही-मट्ठा और चाय बनाते हैं।

बच्चे आ चुके थे। गर्मी का आलम देख कर बहुत छोटे बच्चों को नहीं बुलाया गया था। तीसरी, चैथी से आठवीं कक्षा तक के लगभग 70 बच्चे मौजूद थे। कक्षा में पहुंचे तो सभी बच्चों ने एक सुर में गीत गाकर स्वागत किया। तभी मैंने भी उनसे वचन ले लिया कि विज्ञान की बातें और सौरमंडल की सैर करने के बाद वे मेरे साथ धरती पर जीवन की धड़कन का गीत गाएंगे। बच्चों ने एक स्वर में कहा, “हां, हम गाएंगे।” गांव के उन बच्चों को बेझिझक बातें करते देख कर मन बहुत खुश हुआ। वे सवाल पूछने को बेताब थे।

DSCN3216लेकिन, पहले उन्होंने अपनी ही सोच-समझ से बनाए गए दो माडल दिखाए जो उन्होंने मुझे दिखाने के लिए खुद अपने हाथों से बनाए थे। उन्हें बनाने के लिए बच्चों ने प्लास्टिक की बोतलों, कार्डबोर्ड, फालतू प्लास्टिक, मुलायम तार, वाशरों और कीलों का प्रयोग किया था। उन्होंने बताया, उनमें से एक माडल ‘बीज बोने की मशीन’ का था और दूसरा खेत की मिट्टी को काट कर एकसार करने वाला ‘तवेदार हैरो।’ गांव के बच्चे थे, इसीलिए उन्होंने गांव की जरूरत के बारे में ही सोच कर अपने माडल बनाए थे। बहुत अच्छा लगा माडल देख कर। मैंने पूछा, “फसलों के बीज तो छोटे-बड़े होते हैं, इस बोआई की मशीन से कौन-सी फसल के बीज बो सकते हैं?” एक बच्चे ने माडल को ऊपर उठा कर दिखाया और कहा, “यहां एक छलनी लगी है। उसे घुमा कर सेट कर सकते हैं। फिर चाहे सरसों के बारीक बीज बोने हों या गेहूं, मक्का या ज्वार-बाजरा के बड़े बीज, छलनी के उस साइज के छेदों से वही बीज नीचे जमीन में गिरेंगे।”

“अगर बीजों को चिड़ियां खा गईं तो?” उदय वीर जी ने पूछा तो एक बच्चे ने जवाब दिया, “यह देखिए, बीज के पाइप के नीचे यहां गिरने के बाद यह पुर्जा उन्हें मिट्टी से ढक देता है।” बच्चों ने जो कुछ बनाया था, उन्हें उसके एक-एक हिस्से का पता था। कबाड़ से जुगाड़ कर उन्होंने बोआई मशीन और हैरो बना डाला था। हमने तालियां बजा कर उन्हें शाबासी दी। उदय वीर जी ने प्रोत्साहन के रूप में उनको बच्चों को पांच सौ रूपए का नकद पुरस्कार दिया।

फिर हमने विज्ञान की बातें कीं। मैंने बच्चों को बताया कि मैंने असली विज्ञान अपने बचपन में प्रकृति की प्रयोगशाला में पढ़ा। वह प्रयोगशाला मेरे गांव में थी। यहां आपके गांव में भी प्रकृति की वैसी ही प्रयोगशाला है जिसमें तरह-तरह के पेड़-पौधे हैं, पशु-पक्षी हैं, रंग-बिरंगी तितलियां हैं। यहां माटी में बीज उगते हैं। दोस्तो, क्या तुमने कभी सेम या मटर के बीजों को उगते हुए गौर से देखा है? अगर नहीं तो अब देखना। देखना कि धरती में नमी पाकर उनमें कैसे अंकुर फूटते हैं। फिर दो पत्तियों की हथेलियां हवा में निकल आती हैं। उनमें लंबी, पतली अंगुलियां निकल आती हैं जो हवा में हिल कर यहां-वहां डोलते हुए किसी टहनी या लकड़ी का सहारा ढूंढती हैं। सहारा छूने पर उससे लिपटना शुरू कर देती हैं। उनके सहारे पौधा ऊपर उठता जाता है।….दोस्तो, तुम इस तरह पेड़-पौधों को देखोगे तो तुम्हें उनसे प्यार हो जाएगा। वे भी तुमसे प्यार करने लगेंगे। तब तुम उनकी बातें समझने लगोगे। उनका मुरझाया हुआ चेहरा देख कर तुम समझ जावोगे कि उन्हें प्यास लगी है। उन्हें पीने को पानी दोगे तो उनकी कलियां और फूल मुस्कुरा उठेंगे।

मैंने उनसे कहा, दोस्तो, एक बड़े कृषि वैज्ञानिक हुए हैं- डा. नार्मन अर्नेस्ट बोरलाग। वे कहते थे, “पेड़-पौधे हमसे बातें करते हैं। लेकिन, उनकी बातें वे ही लोग सुन सकते हैं जो उनके बहुत नजदीक होते हैं।” इसलिए आप सभी पेड़-पौधों के नजदीक जाना, उनसे प्यार करना, उनकी बातें सुनना।

इसी तरह अपने आसपास के जीव-जंतुओं और कीट-पतंगों को भी गौर से देखने की कोशिश करना। इन दिनों यहां चिड़ियों की ऐसी आवाजें सुनाई दे रही हैं- ‘कुहू! कुहू! कुहू!’ और ‘कुटरु! कुटरु! कुटरु!’ जानते हो, ये कौन-सी चिड़ियां हैं? बच्चों ने कोयल को पहचान लिया। मैंने कोयल के जीवन की बातें उन्हें बताईं। बताया कि वह अपना घोंसला नहीं बनाती। कव्वे के घोंसले में बहुत चालाकी से अपने अंडे दे देती है। इतना ही नहीं, कोयल की बिरादरी की दूसरी चिड़ियां, यानी कुक्कू, पपीहा और चातक भी अपने अंडे दूसरी चिड़ियों के घोंसलों में देती हैं। ‘कुटरु! कुटरु’ की भाषा में इन दिनों बड़ा बसंता अपनी पत्नी से बातें करता है। और भी कई चिड़ियों के बारे में बच्चों से बातें कीं।

उसके बाद गांव के उन बच्चों को लेकर मैं सौरमंडल की सैर पर निकला। हमारा ‘कल्पना’ अंतरिक्ष यान पहले सूरज के निकट गया और फिर ग्रहों-उपग्रहों की सैर पर ले गया। हमने सौरमंडल में 8 ग्रह, 8 बौने ग्रह, हजारों क्षुद्रग्रह, उल्का पिंड और एक धूमकेतु भी देखा। मंगल ग्रह की परिक्रमा कर रहे भारत के अपने मंगलयान को मन की आंखों से देख कर बच्चे बहुत खुश हुए। जीवन से वीरान सौरमंडल में अपनी धरती पर जीवन की हलचल देख कर उन्हें जीवन का महत्व समझ में आया। तब हम सबने मिल कर जीवन का गीत गाया।

स्कूल में उन सभी से विदा लेकर घर आए, जहां नन्हीं विदिता के साथ जुरैसिक पार्क ओर डाइनोसारों के माडल पर बातें कीं। शाम को विक्रमादित्य, विदिता और समीक्षा जी से विदा लेकर, पैंथर से हाथ मिला कर मानव जी की धड़धड़ाती मोटरसाइकिल में अलीगढ़ जंक्शन की ओर चला। ढलती शाम के समय ऊंचे, हरे पेड़ों पर मैनाएं ऊंची आवाज में चहचहा कर अपने दिन भर के अनुभव एक-दूसरे को सुना रही थीं। स्टेशन पर मानव जी से भी विदा लेकर लखनऊ-नई दिल्ली शताब्दी ट्रेन का इंतजार करने लगा। उन स्कूली बच्चों की बातें, उनके सवाल याद आते रहे। ट्रेन में बैठ जाने के बाद भी मैं उनकी बातें याद करता रहा। अब भी याद करता रहता हूं।

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