बच्चों का विज्ञान और कवि का कबूतर

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देश भर के पर्यटक वहां जिम कार्बेट नेशनल पार्क में बाघ, हाथी और चीतल जैसे वन्य जीव देखने जाते हैं लेकिन मुझे वहां कार्बेट पार्क की सीमा से लगे रामनगर के एक गांव में शाइनिंग स्टार स्कूल के बच्चों से मिलने का मौका मिला, जिनकी आंखों में तमाम जिज्ञासाओं के जुगनू चमक रहे थे।

रामनगर दिल्ली से लगभग 250 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के नैनीताल जिले का एक छोटा-सा नगर है और शाइनिंग स्टार स्कूल वहां से लगभग 8 किलोमीटर दूर धुर ग्रामीण इलाके में स्थित है। बच्चों को जीवन में आगे बढ़ने के लिए घिसी-पिटी रटंत विद्या के बजाय वैज्ञानिक सोच के साथ जीवन की सच्ची शिक्षा देने के मकसद से रामनगर में ही पढ़े-लिखे युवा देवेंद्र नेगी ने गांव के बच्चों के लिए शाइनिंग स्टार स्कूल की नींव रखी। उनके स्वप्न को पूरा करने के लिए समान सोच वाले कई साथी साथ आ जुटे और कारवां बनता गया। शाइनिंग स्टार में आज करीब 350 बच्चे शिक्षा पा रहे हैं।

DSCN3147_copyवहां उस ग्रामीण क्षेत्र में जाकर बच्चों से मिलना, उनसे बातें करना और उन्हें विज्ञान की बातें सुनाना मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव रहा। मैंने बात आसपास के विज्ञान से शुरू की। मैंने उनके स्कूल के आसपास कौन-सी चिडि़यां देखीं, किन चिडि़यों की आवाजें सुनीं, उन चिडि़यों की मजेदार बातें बताईं। उन्हें पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से प्यार करने की बात समझाई कि जब हमारे आसपास हरियाली रहेगी, हमसफर पशु-पक्षी रहेंगे, तभी यह दुनिया रहने लायक रहेगी। उन्हें बताया कि कल यह दुनिया वैसी होगी जैसी वे इसे बनाएंगे। उन्हें उजड़ते वनों और बेघर होते वन्य जीवों के बारे में बताया। बताया कि आज अगर बंदर हमारे घर-आंगन में पहुंच रहे हैं, तो वे अपना वह खोया हुआ घर खोज रहे हैं जहां कभी हरे-भरे वृक्षों में उनका अपना घर था। उस घर में उनका भोजन था। जंगल कट कर वहां मकान और बाजार बन गए तो वे जाएं तो कहां जाएं?

मैंने कहा, दोस्तो विज्ञान कोई परखनली, मेंढकों की चीरफाड़ या समीकरणों को रट लेना नहीं है। यह बस सोचने का एक तरीका है। जब किसी बात को परख कर, उस पर प्रयोग और परीक्षण करके उसे आजमा लिया जाता है और उसके नतीजे का पता लगा लिया है तो वह परखी हुई बात ही विज्ञान कहलाती है। याद रखना चाहिए कि ‘चमत्कार’ से कुछ नहीं होता। यह केवल मन का भ्रम है। होता वह है, जो असलियत में होता है। सुबह सूरज निकलता हुआ दिखता है और शाम को वह पश्चिम में डूबता हुआ दिखाई देता है। लेकिन, सच यह है कि न सूरज उगता है, न डूबता है। यह तो इसलिए होता है क्योंकि हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। सूरज दूर आसमान में जहां है, वहीं रहता है।

इसलिए दोस्तो, चीजों के बारे में तर्क करो, सोचो कि क्या ऐसा हो सकता है? समाज में कई अंधविश्वास फैले हुए हैं। उन पर आंख मूंद कर विश्वास मत करो। एक अंधविश्वास यह है कि बिल्ली रास्ता काट जाए तो अनिष्ट होता है। यह केवल झूठ और भ्रम है। बिल्ली के रास्ता काटने पर हम खुद चल कर देख सकते हैं कि क्या होता है। सच यह है कि कुछ भी नहीं होता। मैं पिछले 35 वर्षों से देख रहा हूं। इसी तरह सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण आकाश में पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य की विशेष स्थिति के कारण होते हैं। आकाश की इस अद्भुत घटना को सुरक्षित तरीके से जरूर देखना चाहिए। मैं सन् 1980 से सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण देख रहा हूं। ग्रहण के दौरान पानी पीता हूं, चाय पीता हूं, खाना खाता हूं क्योंकि मुझे मालूम है, ग्रहण का पानी, चाय या भोजन पर कोई असर नहीं पड़ता है। मेरे परिवार के सदस्य भी यही करते हैं। 

इसी तरह भूतों के काल्पनिक भय से नहीं डरना चाहिए। उनके बजाय ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों में एलियनों की कल्पना करनी चाहिए कि अगर कभी वे हमारी धरती पर आ जाएं तो क्या होगा? क्या वे खूंखार होंगे या हमारी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाएंगे? इस तरह सोचोगे तो तुम्हारी कल्पना को पंख लग जाएंगे। 

 बाद में मैं शाइनिंग स्टार स्कूल के उन बच्चों को सौरमंडल की सैर पर ले गया। हम पृथ्वी से सीधे सूरज के पास पहुंचे। उसे देख कर और उसके बारे में जानकर आगे बढ़े। हमने बुध, शुक्र, मंगल, क्षुद्र ग्रहों की पट्टी, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून यानी आठों ग्रहों और उनके चंद्रमाओं की सैर की। हमने बौने ग्रह सेरेस, प्लूटो, होमीया, ईरिस, मैकमैक और सेडना को भी देखा और सौरमंडल के सीमांत पर धूमकेतुओं के घर ऊर्ट क्लाउड को देख कर वापस लौटे। वापसी में हमने एक धूमकेतु और कई उल्का पिंड भी देखे। धूमकेतु को देखना कोई अपशकुन नहीं है। इससे कोई अनिष्ट नहीं होता है। सौरमंडल के वीरान ग्रहों से अपनी पृथ्वी पर लौट कर हमने जीवन का गीत गाया और धरती पर जीवन को बचाने का संकल्प लिया।

DSCN3157 copyबच्चों से विदा लेकर वह शाम मित्र कवि शिरीष मौर्य के साथ बिताई।…

वे अपने बेटे को शहर के स्कूल से निकाल कर शाइनिंग स्टार स्कूल की जमीनी शिक्षा से जोड़ने की खुशी जाहिर कर रहे थे। बेटा आसपास के पेड़ों और उड़ती चिडि़यों को देख कर खुश हो रहा था। शिरीष बोले, “अब यहां यह मेरा बेटा जमीन की खुशबू पहचानेगा, यहां की हवा, यहां की बोलचाल और यहां की प्रकृति में बढ़ेगा।” उनके चेहरे पर बेटे को जमीन से जोड़ने की दीप्ति थी।

देर शाम तक हमने बहुत बातें कीं, साहित्य की, विज्ञान की। किताबों की भी चर्चा की। लंबी कविताओं पर अनिल कार्की के शोध कार्य और उनके कथा संग्रह ‘भ्यास कथा और अन्य कहानियां’ पर बातचीत की। मेरी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ को भी याद किया। वीरेन डंगवाल पर प्यार लुटाया। मैंने मित्र कवि को अपनी यादों के कैनवस पर चित्रित कुछ स्मृति चित्र दिखाए।

ढलती शाम के वक्त सहसा कवि मित्र ने अपने घर की छत की ओर इशारा करके कहा, “वहां देखिए, कुछ दिखाई दे रहा है? ”

DSCN3155“कबूतर,” मैंने कहा।

“सात-आठ दिन से यह कबूतर वहीं, उसी जगह बैठा है।”

“अरे! कहीं नहीं जाता? उड़ता नहीं,” मैंने पूछा तो बोले, “उड़ता था, अपने साथी के साथ। दोनों छत के इसी कोने से आसमान में उड़ान भरते थे।”

“तो वह दूसरा कबूतर कहां है?”

“पता नहीं। मुझे संदेह है, कहीं बिल्ली का शिकार न हो गया हो। शायद यही हुआ होगा।….शायद इस कबूतर को अच्छी तरह पता होगा।” उनके शब्द भीग रहे थे। मुझे आघात-सा लगा। कबूतर बिना हिले-डुले एकटक सामने आकाश में देख रहा था।

उन्होंने आगे कहा, “मैं तभी से छत पर जाकर कबूतर के पास दाना-पानी रख आता हूं। बस इतनी गनीमत यह है कि वह कभी-कभी दाना चुग लेता है शायद। मैं फिर दाना-पानी रख देता हूं। यह कब तक यों ही बैठा रहेगा, कुछ पता नहीं।”

“लगता है, अपने उस साथी का इंतजार कर रहा है। लेकिन, ऐसा कब तक चल सकेगा….” मैंने कहा और झोले में से अपना कैमरा निकाल कर लान में से ही छत के कोने पर बैठे कबूतर की तस्वीरें लीं। कवि मित्र मुझे चहारदीवारी के पास ले गए। वहां उससे लगी हुई एक झाड़ी थी। बोले, “देखिए, झाड़ी पर क्या लटका है? ”

DSCN3164एक छोटा-सा घोंसला लटका था। कहने लगे इस चहारादीवारी पर पलस्तर करते कहीं घोंसले और चिडि़या के अंडों को नुकसान न पहुंचे, यह सोच कर मैं इसे हाथ में लेकर संभालता रहा। शाम को काम बंद होने के बाद झाड़ी पर लटका देता। यह नन्हीं फूलचुही का घोंसला है और इसके भीतर उसके दो अंडे हैं। वह रात भर इसी में रहती है। दिन में भी आती रहती है।” घिरते अंधेरे में मैंने घोंसले की तस्वीर उतार ली।

लान में ही बैठे थे कि लेब्रेडोर नस्ल का काले रंग का उत्साह से भरा ‘चार्जर’ आकर सूंघने, लिपटने लगा। शिरीष बोले, “बस-बस हो गया, अब जाकर आराम से बैठ जाओ।” मगर वह कहां मानने वाला था। मुस्कुराती आंखों और हिलती पूंछ से प्यार जताता रहा। सीमा जी बाहर निकलीं तो उसे देख कर बोलीं, “अभी देखो कितना खुश हो रहा है। कल क्या हाल बना रखा था?”

“क्यों क्या हुआ?” मैंने कवि मित्र से पूछा तो वे बोले, “एक सड़क हादसे में एक पिल्ला और उसकी मां चल बसे। दो पिल्ले बच गए थे। मैं उन्हें घर ले आया। उन्हें टोकरी में प्यार से रख दिया। हमने उन्हें दूध पिलाया, खाना खिलाया।”

“यह तो आपने बहुत अच्छा किया, ” मैंने कहा।

“लेकिन, चार्जर को शायद प्यार का वह बटवारा पसंद नहीं आया। चुपचाप कोने में जाकर गुमसुम बैठ गया। दोनों आंखों से आंसुओं की धार बहाने लगा। देख कर हम तो हैरान रह गए,” शिरीष बोले।

“तो वे पिल्ले अब कहां हैं?” मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि दो भले लोग पालने के लिए मांग रहे थे। आज ही उन्हें दे आया हूं।”

चार्जर अब भी उत्साह में भर कर हमारे इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहा था जैसे कह रहा हो- मैं हूं ना आपके पास।” कवि मित्र से उन मूक पशु-पक्षियों की संवेदना की वे बातें सुन कर वह शाम मेरी यादों में बस गई।

 

 

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