मलेरिया दिवस और बच्चे

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इस बार विश्व मलेरिया दिवस (25 अप्रैल 2015) प्रख्यात वैज्ञानिक तथा शिक्षाविद् पद्मभूषण प्रोफेसर यशपाल और दिल्ली के बारह राज्यों से आए राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता के विजेता बच्चों के सान्निध्य में बीता।

‘मलेरिया- एक चुनौती और निवारण के उपाय’ विषय पर स्कूली बच्चों के लिए हिंदी में राष्ट्रीय स्तर की निबध प्रतियोगिता का आयोजन विज्ञान लोकप्रियकरण की प्रमुख संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ और सी एस आई आर-ओपन सोर्स ड्रग डिस्कवरी (ओ एस डी डी) ने किया जिसमें 7,000 से अधिक निबंध प्राप्त हुए। इन सभी निबंधों का मूल्यांकन एक 14-सदस्यीय समिति ने किया। 25 निबंध पुरस्कार और 26 निबंध प्रोत्साहन पुरस्कार के लिए चुने गए।

DSC_2078मलेरिया दिवस-2015 के अवसर पर इन विजेता बच्चों को राष्ट्रीय बाल भवन, नई दिल्ली में प्रोफेसर यशपाल के हाथों स्मृति-चिह्न और प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। पुरस्कृत 25 बच्चों को पूर्व घोषणा के अनुसार टेबलेट भी भेजे जाएंगे। समारोह में सी एस आई आर-ओ एस डी डी की परियोजना निदेशक डा. सरला बालाचंद्रन, विज्ञान प्रसार के निदेशक डा. आर.गोपीचंद्रन, राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता की मूल्यांकन समिति के अध्यक्ष देवेंद्र मेवाड़ी, विज्ञान प्रसार के वैज्ञानिक ‘डी’ और प्रतियोगिता के संयोजक श्री निमिष कपूर और उनके सहयोगी उपस्थित थे।

समारोह में  प्रोफेसर यशपाल ने बच्चों को छोटे से मच्छर की बड़ी करतूत के बारे में बताया कि कैसे वह इतने बड़े और बुद्धिमान प्राणी मनुष्य को भी बीमार बना देता है। डा. सरला ने मलेरिया के इलाज के लिए अब तक किए गए प्रयासों और कुनैन से लेकर क्लोरोक्विन, प्राइमाक्विन और आर्टेमिसिन कंबिनेशन तक अनेक औषधियों के बारे में बताया। मैंने बच्चों और उनके अभिभावकों को बताया कि सभी निबंधों को पहली, दूसरी और तीसरी श्रेणी में छांटा गया। तीसरी और दूसरी श्रेणी को छोड़ कर प्रथम श्रेणी के निबंधों को पुनः पढ़ा गया और उनमें से प्रथम-प्लस निबंध खोजे गए। इस तरह 25 प्रथम-प्लस निबंध पुरस्कार के लिए चुने गए और 26 प्रथम श्रेणी के निबंधों की प्रोत्साहन पुरस्कार के लिए संस्तुति की गई।

DSC_2160निबंधों में बच्चों ने अपनी रचनात्मकता का भी खूब परिचय दिया। श्रीगंगानगर, राजस्थान की तनुश्री शर्मा ने लिखा:“मच्छरों का कहर है ऐसा छाया/हर किसी को अस्पताल पहुंचाया।” खंडवा, मध्य प्रदेश की गायत्री संजय वर्मा ने निबंध की शुरुआत ही इस तरह की: “मां ने जब स्कूल में नाम-पता लिखवाया- ‘गायत्री संजय वर्मा, मलेरिया आफिस के सामने, आनंद नगर, खंडवा’ तो मैं मां से पूछती रहती थी कि मां यह मलेरिया क्या है? मां बताती, यह एक बीमारी है बेटी।’…बिजनौर, उत्तर प्रदेश के अमन चौहान ने मलेरिया रोग का स्वयं अपना अनुभव बताते हुए निबंध लिखा। एक बिटिया ने मच्छर को प्यार से दुतकारा: “मच्छर भैया जाओ ना/हमसे प्रीत लगाओ ना! ” सुआरी देबबर्मा ने त्रिपुरा में मलेरिया का हाल बयान किया तो झारखंड की महिमा मेहता ने लिखाः “गंदे पानी का जमाव, बन जाता आवास/पनपते उसमें मच्छर, करते अपना विकास।” पीलीभीत के प्रांजल पटेल ने तो निबंध में अखिल भारतीय मच्छर सम्मेलन का भी आयोजन कर दिया!

            DSC_2061मैंने बच्चों को संक्षेप में मलेरिया रोग के इतिहास और मलेरिया परजीवी की रोमांचक खोज के बारे में बताया। बताया कि रोम, यूनान और मिस्र के शक्तिशाली साम्राज्य मलेरिया ने ही नेस्तनाबूद किए और विश्व विजय का सपना देखने वाले सम्राट सिकंदर महान को भी, कहते हैं, नन्हे मच्छर ने ही मार गिराया। और, प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में हजारों-हजार सैनिक बमों और बंदूक की गोलियों के अलावा घातक रोग मलेरिया से भी मारे गए। आजादी के समय हमारे देश में ही 10 करोड़ से भी अधिक लोग मलेरिया से पीड़ित होते थे जिनमें से लाखों रोगी जान से हाथ धो बैठते थे। जब लोगों को यह पता नहीं था कि यह रोग क्यों होता है तो उन्होंने ‘माल एयर’ यानी दूषित हवा को इसका कारण माना और वे इस रोग को ‘माल एयर’ और फिर मलेरिया कहने लगे। फ्रांसीसी सेना के एक सर्जन थे लैवरन। उन्हें सन् 1880 में सूक्ष्मदर्शी से देखने पर मलेरिया के रोगी के खून में सूक्ष्म आकार के रोगाणु दिखे तो उन्हें लगा यह रोग हो सकता है इन्हीं रोगाणुओं के कारण होता हो। लंदन के एक वैज्ञानिक पैट्रिक मैंसन को मच्छरों पर शक हुआ कि कहीं ये तो मलेरिया नहीं फैलाते।

यही शक अल्मोड़ा, भारत में पैदा हुए रोनाल्ड रास को भी हुआ। वे जब ब्रिटिश सेना में डाक्टर बने और सिकंदराबाद में सेवा करने लगे तो मच्छरों की जांच में जुट गए। वे उनकी चीरफाड करते और देखते। उन्होंने बोतल में मच्छर बंद करके उसका पानी अपने सेवक लक्ष्मण को पिलाया लेकिन उसे मलेरिया नहीं हुआ। फिर अपने सहायक हुसैन खान की मच्छरदानी के भीतर मच्छर डाल कर उनकी चीर-फाड़ करके देखने लगे। ऐसा करते-करते उन्नीसवें दिन उन्हें मच्छर के आमाशय पर फफोले जैसे दिखे। तब उन्हें लगा कि हो न हो, मलेरिया का राज कहीं इन्हीं फफोलों में न छिपा हो। दो दिन बाद फफोले और बड़े हो गए।

तभी रोनाल्ड रास का तबादला कलकत्ता हो गया। उन्होंने वहां भी अपने सहायक मोहम्मद बख्श पर यह प्रयोग जारी रखा। रात में मच्छरदानी के भीतर मच्छर मोहम्मद बख्श को काटते और सुबह रोनाल्ड रास उसके खून की और मच्छरों के आमाशय की जांच करते। एक दिन उन्होंने देखा कि मच्छर के आमाशय से हजारों-हजार सूक्ष्म रोगाणु मच्छर की लार ग्रंथियों में जा रहे हैं। उन्हें मलेरिया का रहस्य समझ में आ गया। यानी, रोगाणु मच्छरों के पेट में पनपते हैं, फिर उनकी लार ग्रंथियों में आ जाते हैं। और, जब मच्छर मनुष्यों को काटते हैं तो रोगाणु उनके शरीर में पहुंच जाते हैं। मलेरिया के रहस्य का पता लगने पर उन्होंने खुश होकर यह कविता लिख दीः

‘दिस डे रिलेंटिंग गाड

हैथ प्लेस्ड विद इन माइ हैंड…

यानीः

दयालु ईश्वऱ ने आज

सौंप दी है मेरे हाथ में

वह अद्भुत चीज; धन्य हे

ईश्वर। उसी के आदेश पर,

भरे आंसुओं और बोझिल सांस के साथ

उसी के रहस्यमय कर्म के सहारे

खोज लिए हैं मैंने तेरे वे विषाक्त बीज

अरी ओ लाखों लोगों की हत्यारी मृत्यु।

जानता हूं मैं इसी छोटे से रहस्य से

बचेंगे असंख्य लोगों के प्राण।

अरी ओ मृत्यु, कहां है तेरा वह दंश?

और, ओ कब्र मेरी वह विजय?

– रोनाल्ड रास

रोनाल्ड रास को उनकी इस खोज के लिए सन् 1902 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

लेकिन, क्या हर मच्छर मलेरिया फैलाता है या किसी खास प्रजाति के ही मच्छर यह रोग फैलाते हैं? यह सवाल उठा इटली के वैज्ञानिक गियोवानी बाटिस्टा ग्रासी के मन में और उन्होंने इस बात का पता लगाने के लिए तरह-तरह के मच्छरों पर प्रयोग किए। वहां कहा जाता था- जहां ‘जंज़ा-रोने’ मच्छर होते हैं, वहां मलेरिया रोग अधिक होता है। ग्रासी ने जंजा़-रोने मच्छरों की हरकतों पर ध्यान दिया। पता लगा, इनकी मादाएं दिन भर छिपी रहती हैं और रात को हमला करती हैं। नर मच्छर केवल फूलों का रस चूसते हैं, मनुष्यों को नहीं काटते। फिर मालूम हुआ, ये ‘जंज़ा-रोने’ ही ‘एनोफेलीज’ प्रजाति के मच्छर हैं और इन्हीं की मादाएं मलेरिया फैलाती हैं।

मैंने बच्चों से कहा, दोस्तो पेरू देश में बुखार आने पर रोगी को वहां के निवासी अपने पवित्र पेड़ ‘क्विन-क्विना’ की छाल का काढ़ा पिलाते थे। इससे उसका बुखार उतर जाता था। एक बार सिनकोन की काउंटेस वहां की राजधानी लीमा गई और बुखार से पीड़ित हो गई। वहां के एक मूल निवासी के सुझाव पर उन्हें ‘क्विन-क्विना’ की छाल का काढ़ा पिलाया गया। वे ठीक हो गई। तब इस पेड़ का नाम सिनकोना पड़ गया। इससे मलेरिया के इलाज के लिए जो दवा बनाई गई, वह कुनैन कहलाई। आज हम सभी जानते हैं कि मलेरिया ‘प्लाज़्मोडियम’ नामक सूक्ष्म प्रोटोजोआ से होता है और इसका जीवन-चक्र मच्छरों और मनुष्यों के शरीर में पूरा होता है।

दोपहर बाद सभी बच्चों को दिल्ली  में द्वारका स्थित राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान संस्थान की सैर पर ले जाया गया। वहां संस्थान के वैज्ञानिक डा. एम.एस.मल्होत्रा, डा. बी.एन. नागपाल, डा. अनूप अनविकर, डा. अरविंद नाथ और डा. पद्मावती त्यागी ने बच्चों को मलेरिया रोग के बारे में रोचक जानकारी दी। डा. बी.एन. नागपाल ने अपनी रोचक शैली में मच्छरों और मलेरिया पर एक विशेष प्रस्तुति भी दी। बच्चों ने कई सवाल भी पूछे। मलेरिया अनुसंधान पर एक वृत्तचित्र भी दिखाया गया। अन्य विशेषज्ञों और सहयोगियों ने इस अवसर पर आयोजित विशेष प्रदर्शनी में नमूने दिखा कर बच्चों को विभिन्न प्रकार के मच्छरों तथा उनके अंडे, प्यूपा तथा लार्वाओं की पहचान के बारे में बताया। माइक्रोस्कोप में मलेरिया के रोगी की लाल रक्त कणिकाओं में प्लाज़्मोडियम परजीवी का संक्रमण भी दिखाया।

सभी वैज्ञानिकों ने बच्चों से एक स्वर में कहा कि मलेरिया से बचना है तो हमें अपने आसपास का वातावरण स्वच्छ रखना होगा। सभी वैज्ञानिकों और सहयोगियों ने संस्थान के प्रवेश द्वार पर सर रोनाल्ड रास की मूर्ति के सामने बच्चों के साथ समूह फोटो खिंचवा कर इस अवसर को यादगार बना दिया।

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