जहां भारत में भाप का पहला इंजन दौड़ा था

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दून शताब्दी धड़धड़ाती हुई तेजी से मेरे गंतव्य रुड़की की ओर भाग रही है। अभी-अभी मेरठ स्टेशन पीछे छूटा है। लेकिन, स्टेशन की इमारत पर मेरठ पढ़ते ही वहां सन् 1857 में आजादी के लिए भड़की बगावत की पहली चिंगारी मन के आकाश में कौंध गई। तब मेरठ छावनी में 34 बंगाल के 85 सिपाहियों ने चर्बी लगे कारतूसों को चलाने से मना कर दिया था। वह भी अप्रैल का ही महीना था। उस घटना के बाद पूरे उत्तर भारत में अंग्रेजों के खिलाफ नफरत की जो आग फैली और क्या-कुछ हुआ, वह इतिहास में दर्ज है।

ट्रेन रुड़की की ओर बढ़ती जा रही है। वह रुड़की, जहां मेरठ के सैन्य-विद्रोह से छह वर्ष पहले 22 दिसंबर 1851 को पिरान कलियर गांव के पास भारत में भाप का पहला इंजन दौड़ा था। अग्रेजों ने ‘थामसन’ नामक वह इंजन इंगलैंड से मंगाया था। यानी, सन् 1853 में भारत में बंबई से थाने तक चली पहली पैसेंजर रेलगाड़ी से दो वर्ष पहले रुड़की में भाप का इंजन दौड़ चुका था। तब गंगा नहर का निर्माण किया जा रहा था। सोलानी नदी पर एक लंबे और मजबूत जल-सेतु का निर्माण करने के लिए मिट्टी की जरूरत थी। भाप के उस इंजन के साथ दो वैगन जोड़ कर मिट्टी ढोई गई। सुना है वह जल-सेतु आज भी वहां मौजूद है।

मेरठ में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत और भारत में भाप का इंजन, इन दोनों बातों में क्या संबंध? संबंध है। दूर फ्रांस में बैठा, रोमांचक यात्राओं की कहानियां लिखने वाला उस दौर का एक बड़ा लेखक इन दोनों बातों को जोड़ कर एक उपन्यास बुनने की कल्पना कर रहा था। वह लेखक था जूल्स बर्न। उसने भारत में सन् 1857 के सैन्य विद्रोह के बाद की पृष्ठभूमि और भाप के इंजन को लेकर एक उपन्यास लिखा- ‘डेमान आफ कानपुर।’ बाद में इस उपन्यास को पहला और ‘टाइगर्स एंड ट्रेटर्स’ को दूसरा भाग मान कर इन्हें ‘स्टीम हाउस’ के नाम से एक ही पुस्तक का रूप दे दिया गया।

दून शताब्दी भाग रही है। अब मुज्जफ्फरनगर स्टेशन पीछे छूट चुका है।

304मुझे याद आ रहा है, जूल्स वर्न के उपन्यास ‘डेमान आफ कानपुर’ के कथानक में सन् 1857 के विद्रोह के बाद घटी हिंसक घटनाओं में कानपुर शहर पर कब्जा करने के दौरान अंग्रेज कर्नल मुनरो की पत्नी की हत्या कर दी गई है। मुनरो को किसी ‘नाना साहिब’ पर संदेह है जो घटना के बाद भूमिगत हो चुका है। एक इंजीनियर मिस्टर बैंक्स है जो कर्नल मुनरो, कैप्टन हुड, एक फ्रांसीसी व्यक्ति मोंशियर माक्लेर और उनके सहयोगियों को एक अनोखे वाहन में उत्तरी भारत की रोमांचक यात्रा पर आमंत्रित करता है। वाहन भाप के इंजन से चलता है जो हाथी के आकार का बनाया गया है। उसके पीछे पहियों पर चलने वाले कमरे जुड़े हैं। यात्रा पर निकलने के बाद पता लगता है कि मुनरो अपनी पत्नी की हत्या का बदला लेना चाहता है और नाना साहिब को खोज रहा है। जानता हूं, जूल्स वर्न का यह बहुचर्चित उपन्यास नहीं है, लेकिन भारत के संदर्भ में यह जरूर महत्वपूर्ण है।

दून शताब्दी भागती जा रही है- खट….खटाक…खट्, खट्…..खटाक्…खट्! बीस मिनट रूकने के बाद अब सहारनपुर पीछे छूट गया है। बस, अगला स्टेशन रुड़की है। हां, वही रुड़की स्टेशन जहां सुना है, भारत में चले उस पहले भाप के इंजन थामसन का एक माडल रखा है। मुझे वहां उतर कर केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान पहुंचना है, जहां कल को संस्थान के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और अन्य कर्मियों के लिए ‘लोक जीवन में विज्ञान की अवधारणा’ विषय पर व्याख्यान देना है। यहां आने का आत्मीय आमंत्रण संस्थान के मुख्य वैज्ञानिक और हिंदी लेखक यादवेन्द्र पांडेय जी से मिला था और अभी-अभी उनका संदेश मिला है कि स्टेशन पर सारथी गोपाल आपका इंतजार कर रहा है। गोपाल ने मुझे पहचान लिया है और मैं उसके साथ संस्थान के स्वर्ण जयंती अतिथि गृह की ओर चल पड़ा हूं।

हरे-भरे, ऊंचे वृक्षों के बीच एकदम शांत, एकांत वातावरण में स्थित है यह अतिथि गृह जिसके प्रांगण में खूबसूरत लाल, पीले सफेद और गुलाबी रंग के गुलाब खिले हैं। लान की मखमली हरियाली में धूप सेंकती हुई गिलहरियां एक-दूसरे का पीछा कर रही हैं। मटमैली सतबहिनें पौधों की छांव में अपना भोजन खोज रही हैं। बगल में चीड़ के पेड़ पर बहार आकर जा चुकी है। उसकी एक ऊंची शाख पर सुई जैसी पत्तियों के गुच्छे के बीच दो शंकु विकसित हो चुके हैं। इन कड़े फलों के कारण ही तो चीड़ कोनिफर यानी शंकु कहलाता है। सामने चौड़े लान में जैकरेंडा यानी नीले गुलमोहर का ऊंचा पेड़ खड़ा है जिसकी शाखों के सिरे नन्हीं कलियों की अनगिनत बुंदकियों से भर चुके हैं। इस पर बहार बस आने को है।

लेकिन, गेट के करीब सीमेंट के एक बड़े गमले में बोगेनवेलिया गुलाबी फूलों की बहार में झूम रहा है। चहारदीवारी के पार बहुत ऊंचे, बल्कि आसमान छूते सिल्वर ओक के पेड़ों पर शानदार सुनहरी बहार आई हुई है। उनके आसपास के उतने ही ऊंचे पेड़ों की शाखों में मैनाएं और कुछ दूसरी चिड़ियां चहचहा रही हैं। कहीं पत्तियों में छिपा बड़ा बसंता कुटरू कुटरू….कुटरू…बोल रहा है। पास के आवासीय भवनों की अमराइयों में कोयल कूक रही है- कुहू! कुहू! कुहू!

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सोलानी नदी पर जलसेतु

आसपास नजर डाल कर कमरे में आया ही था कि आतिथेय यादवेन्द्र पांडेय जी आ गए जिनसे अब तक केवल फोन पर या ई-संदेश पर ही भेंट हुई थी। उन्होंने रुड़की शहर, यहां स्थित केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान और अन्य प्रसिद्ध संस्थानों के बारे में बताया। साथ ही, रुड़की की पहचान, उस विशाल गंगा नहर के बारे में बताया जो हरिद्वार से शुरू होकर रुड़की शहर के बीच से होते हुए कानपुर तक जाती है और वहां गंगा में ही समाहित हो जाती है। यह कब और क्यों बनाई गई थी पूछने पर यादवेन्द्र जी बोले, “कल सुबह चल कर देखेंगे, तब बताऊंगा। फिलहाल आप हिंदी अधिकारी श्री सूबे सिंह और श्री मेहर सिंह से बातें करें।” बातें कीं और ढलती शाम के समय मेहर सिंह गंगा नहर के निकट नए पुल की सैर करा लाए। वहां शहर के आबाल-वृद्ध बड़ी संख्या में शीतल हवा में सैर के लिए आए हुए थे।

दूर पश्चिम में सूरज ढल रहा था। नए पुल के समानांतर उस पार वह प्राचीन जल-सेतु था जिसका निर्माण अंग्रेजों के शासनकाल में आज से 161 वर्ष पहले किया गया था। उसके नीचे से आ रहे नाले का पानी सूरज की तिरछी किरणों से चांदी की तरह चमक रहा था। मैंने पूछा, “वह नाला कौन-सा है?” जवाब में मेहर बोले, “नाल्ला नहीं जी, सोलानी नदी है। बरसाती नदी है। बरसात के दिनों में इसके आर-पार पानी भर जाता है। इसी पर तो वह पुराना पुल बनाया गया।”

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नई नहर और वर्कशाप

बाईं ओर शाम के सिलहुट में पेड़ों के बीच एक ऊंची चिमनी दिखाई दे रही है। मेहर बोले, “वह देखो सर वर्कशाप। अंग्रेजों के जमाने में बनी थी कहते हैं।” फिर पास में ही खड़े एक आदमी से उन्होंने पूछा, “सुनो भाई साब, क्या आप इधर ही रहते हो? ” उस आदमी ने हामी भरी तो कहा, “यह वही पुरानी वर्कशाप है ना? क्या अब भी चल रही है?”  आदमी ने कहा, “हां जी, इसमें आज भी काम चल रहा है। बताओ, डेढ़ सौ साल से ऊपर हो गए, पर बाहर की दीवारें वैसी ही वैसी हैं। उन पर जमीन से कलरी तक नहीं चढ़ी है। इस वर्कशाप में लोहे का काम किया जाता था, आज भी किया जा रहा है।” उनका आभार जता कर हम लौट आए। रात का भोजन यादवेन्द्र जी के साथ किया। दिन भर की थकान थी। अतिथि गृह के शांत वातावरण में जल्दी ही नींद आ गई।

सुबह यादवेन्द्र जी के साथ पुरानी गंगा नहर और सोलानी नदी पर बने जल-सेतु के इतिहास में झांकने निकल गया। पुराने पुल को पार कर उन्होंने गाड़ी रोकी और बाहर आकर पूछा, “इस पुल को देखिए। इसे देख कर आपको किसी पुरानी फिल्म का कोई प्रसिद्ध गीत याद आता है? ”

मैंने कहा, “नहीं, याद तो नहीं आ रहा है।”

“नन्हा-मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं, बोलो मेरे संग- जय हिंद! जय हिंद! ”

‘सन् आफ इंडिया’ फिल्म के इस गाने की शूटिंग इसी पुल पर की गई थी। शकील बदायूंनी का लिखा हुआ यह गीत कभी टी.वी. पर सुनें तो इस पुल को जरूर याद करें,” उन्होंने कहा।

मैं पुल पर कुछ दूर तक गया। देखा, उस पार नीचे, सिकुड़ी-सिमटी सोलानी नदी के किनारों पर प्रवासी पक्षियों के झुंड बैठे थे। संभव है, यह तय कर रहे हों कि आने वाले वर्षों में इस सूखते, गंदले पानी के आसपास आएं कि न आएं।

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जलसेतु पर 161 वर्ष पूर्व की नहर

फिर हम पुल के नीचे उतरे। देखा, पुल के नीचे यहां से वहां तक ऊंचे-ऊंचे मेहराब ही मेहराब हैं। उनके पार सुबह के सूरज की तेज धूप चमक रही थी। धूप के उस पार नया पुल और नई गंगा नहर थी। हमने मेहराब के भीतर कदम बढ़ाए तो यादवेन्द्र जी बोले, “मैंने वर्षों पहले इस पुल के नीचे मेहराबों के आर-पार अभ्यास के लिए जा रहे भारतीय सेना के धड़धड़ाते टैंकों को देखा है।” पुल के बीच में पहुंचे तो देखा छत से बीच-बीच में पानी की बूंदें टपक रही हैं। यानी, अब हमारे सिर ऊपर अंग्रेजों के शासनकाल में  बनी नहर फैली हुई थी। मेहराब के दूसरे सिरे से बाहर निकल कर हम छोटी सीढ़ियों से जलसेतु की दुछत्ती के मुहाने पर पहुंच गए। भीतर फैली दुछत्ती की चार-पांच फुट ऊंची छत यहां-वहां टपक रही थी। वह पिछले 161 वर्षों से जैसी थी वैसी की वैसी ही है। और, उसके ऊपर थी वह पुरानी, चौड़ी गंगा नहर जिसे हमें ऊपर पुल पर जाकर देखना था। हम ऊपर पुल के किनारे आए और जलकुंभी की घनी चादर से ढकी उस उम्रदराज नहर को देखा, जिसमें अब भी पानी बह रहा है लेकिन केवल कुछ ही फुट ऊंचा। समय ने उसे विश्राम दे दिया है लेकिन उसकी बुलंदी में कहीं कोई कमी नहीं आई है। लेटी-लेटी वह नहर अपने समानांतर कुछ दूर बह रही नई-नवेली गंगा नहर के आधुनिक पुल पर दौड़ रही मोटर-गाड़ियों का कोलाहल भर सुनती होगी। उसके अपने प्राचीन जल-सेतु पर तो अब केवल आसपास के गांवों के बाशिंदों की साइकिलें या दुपहिया चलते हैं और केवल किसानों तथा कामगारों के पैरों की थाप सुनाई देती है।

सच यह है कि कभी इन्हीं ग्रामीणों की सेवा के लिए यह पुल और नहर बनाई गई थी। यादवेन्द्र जी बता रहे हैं, “कहते हैं, सन् 1837-38 में भयंकर सूखे के कारण इस इलाके में अकाल पड़ा था। तब शाही तोपखाने के कर्नल प्रोबी काटले ने हरिद्वार से कानुपर तक 560 किलोमीटर लंबी गंगा नहर निकालने की योजना बनाई। योजना को उस समय के लेफ्टिनेंट गवर्नर जेम्स थामसन का भी समर्थन मिल गया। बड़े पैमाने पर काम शुरू हुआ लेकिन हरिद्वार में धर्माचार्यों ने गंगा को बांधने का विरोध किया। कहते हैं काटले ने उन्हें भरोसा दिया कि गंगा की धारा बांध में से भी लगातार बहती रहेगी। उसने गंगा के घाटों की मरम्मत भी कराई। सन् 1842 में गंगा नहर की खुदाई शुरू हो गई। लेकिन, सबसे बड़ी समस्या पिरान कलियर गांव के पास, जहां से जमीन तो नीची थी ही, आगे सोलानी नदी का चौड़ा पाट भी था। उसमें से नहर कैसे जाए? ”

“तो कैसे गई नहर? ” मैंने पूछा।

“काटले ने सोलानी नदी पर एक्विडक्ट यानी जलसेतु बनाने का निश्चय किया। पास के मेहवड़ गांव से नीची जमीन को मिट्टी से पाट कर, भराई करके ऊपर उठाया और हरिद्वार से आ रही नहर के लिए जमीन से 25 मीटर की ऊंचाई पर आधा किलोमीटर लंबा जलसेतु बनवाया। जिस जगह से मिट्टी की भराई शुरू की गई, वहां नहर के दोनों ओर दो विशाल शेरों की मूर्तियां बनवा दीं। ये शेर आज रुड़की के प्रतीक चिह्न बन चुके हैं।”

11131980_670814019714759_461090480_nमेहवड़ गांव हमारे बाईं ओर दाहिनी ओर फैला था। उसके बीच नहर पर एक पुराना पुल था। मैंने कहा, “यह पुल भी पुराना लगता है।” यादवेन्द्र जी ने बताया, “यह भी काटले ने ही बनवाया। कहते हैं, मेहवड़ गांव के लोगों ने कहा कि नहर निकाल कर आप हमारे गांव को बीच से दो हिस्सों में बांट रहे हैं। हम यह नहीं होने देंगे। और, आप मांस खाते हैं, मदिरापान करते हैं, आपको गंगा का जल भी नहीं छूने देंगे। किंवदंती है कि काटले ने कहा, नहर से आपके खेतों में सिंचाई होगी। यह आप लोगों के भले के लिए बनाई जा रही है। गांव बंटेगा नहीं, आर-पार पुल बना दिया जाएगा। जब तक गंगा नहर का काम पूरा नहीं होगा, कुरता-धोती पहनूंगा, मांस-मदिरा का सेवन नहीं करूंगा और घोड़े पर सवारी करूंगा। किंवदंती है, पता नहीं कितना सच है।”

हम पुरानी गंगा नहर के दोनों ओर बने उन विशाल शेरों के पैताने पहुंच चुके थे। हमने उनकी संगत में फोटो खींचे और आगे आस्था के एक बड़े केन्द्र कलियर शरीफ की ओर बढ़ चले जहां दुआ मांगने हर साल हजारों लोग आते हैं।

हम लौटे नई गंगा नहर के पास से, जिसके किनारे पक्की चिनाई के थे। उसमें गंगा का निर्मल पानी अविरल बह रहा था। उसके पार दोनों शेर पुरानी गंगा नहर की मुस्तैदी से रखवाली कर रहे थे। नई नहर के पुल पर ट्रैफिक की भीड़-भाड़ थी। हम उसमें से निकल कर वापस केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के कैम्पस में पहुंचे। पुराने अतिथि गृह में जाकर नाश्ता किया। पास में ही स्कूल था जिसके प्रांगण में सीता-अशोक पर बहार आई हुई थी। मैंने यादवेन्द्र जी को बताया कि हम लोग दूसरे अशोक को ही अशोक समझते हैं जबकि हमारा अपना देशज अशोक सीता-अशोक है जो सामने खिला हुआ है। किंवदंती है कि सीता जी की पद-चाप से सीता-अशोक खिल उठा था। फिर वे अपने कार्यालय चले गए और मैं अतिथि गृह के अपने नीड़ में।

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टैगोर आडिटोरियम में

दोपहर बाद वे फिर आए और मुझे केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर एस.के. भट्टाचार्य से मिलाने ले गए। उनसे मिला और उनके साथ पुस्तकालय में हिंदी की चुनिंदा पुस्तकों का संग्रह देखा। फिर टैगोर आडिटोरियम में जाकर व्याख्यान दिया। व्याख्यान से पूर्व गुरुदेव रवींद्र टैगोर की स्मृति को नमन किया और श्रोताओं को बताया कि उन्होंने स्वयं एक विज्ञान की पुस्तक लिखी थी- ‘विश्व परिचय’, जिसे उन्होंने प्रोफेसर सत्येन्द्र नाथ बसु को समर्पित किया था। अपने व्याख्यान में मैंने विज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और हिंदी में विज्ञान लेखन की बातें कीं। विज्ञान की जानकारी कुछ इस तरह आम लोगों तक पहुंचाने की बात की कि बकौल गालिब ‘अपना कहा आप ही समझे तो क्या समझे/मजा कहने का जब है, एक कहे और दूसरा समझे।’

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हुसैन की पेंटिंग की छांव में हम

व्याख्यान के बाद बाहर निकले तो प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसेन से भेंट हो गई। कलाकार-रचनाकार तो अपनी कला या रचना में ही जीवित रहता है और केन्द्रीय अनुसंधान संस्थान की लाबी की दीवाल पर तीन खड़ी और एक आधार पट्टिका पर चित्रित पेन्टिंग में हुसेन मौजूद थे। लगता था उन्होंने इसे अपने लंबे ब्रुशों से अभी-अभी पेन्ट किया है। यह पेन्टिंग संस्थान की बेशकीमती विरासत है। कुलपति एस. के. भट्टाचार्य जी ने कहा, “लगता है हमें इसे कांच के आवरण में सुरक्षित कर लेना चाहिए।”

अतिथि गृह जाते हुए कुछ समय यादवेन्द्र जी के आंगन में बिताया जहां हरियाली और पुरसुकून शांति थी। काफी देर तक हम विज्ञान, हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के बारे में बातें करते रहे और फिर अतिथि गृह में चले गए। वहां भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के डा. पराग चतुर्वेदी मिलने आ गए। उनसे वैज्ञानिक लेखों के अनुवाद पर काफी बातें हुईं। उनसे यह भी पता लगा कि आज के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई आई टी) की शुरूआत सन् 1854 में स्थानीय युवकों को सिविल इंजीनियरी का प्रशिक्षण देने के लिए सिविल इंजीनियरी स्कूल के रूप में हुई थी। लेफ्टिनेंट गवर्नर जेम्स थामसन की संस्तुति पर 25 नवंबर 1847 को यह भारत का पहला इंजीनिरी कालेज बन गया और बाद में उन्हीं के नाम पर यह थामसन कालेज कहलाया। सन् 1949 में यह रुड़की विश्वविद्यालय बन गया और फिर 21 सितंबर 2001 को इसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई आई टी) का दर्जा दे दिया गया।

यादवेन्द्र जी के साथ देर रात तक स्वर्ण जयंती अतिथि गृह के प्रांगण में चहलकदमी करता रहा। आसपास ऊंचे, लंबे पेड़ों के साये नजर आ रहे थे। उनके बीच से दिखते आसमान में यहां-वहां तारे टिमटिमा रहे थे। एकदम सुबह दिल्ली को कूच करना था, इसलिए उनसे विदा लेकर कमरे में लौटा और रक-सैक में कपड़े पैक किए। फिर रुड़की के अतीत को याद करते-करते सो गया।

सुबह ठीक छह बजे सारथी गोपाल अतिथि गृह के बाहर मौजूद थे। पीठ पर रक-सैक कस कर उनके साथ रुड़की स्टेशन की ओर रवाना हुआ। गंगा नहर पार करते हुए देखा, पूर्व में सूर्य उग रहा था और पश्चिम के आसमान में अभी भी चांद चमक रहा था। रुड़की के आसमान में उस दिन एक साथ सूरज और चांद दोनों को देखने का मौका मिला। जन शताब्दी को प्लेटफार्म पर आने में अभी देर थी। ऊपर तार पर बैठे कबूतर स्टेशन पर आदमियों की हलचल को बहुत गौर से देख रहे थे।

तभी देहरादून से जन शताब्दी आ पहुंची और अपने डिब्बे में भीतर जाते-जाते मैंने मन ही मन कहा, “अलविदा रुड़की। कभी फिर मिलेंगे।” जन शताब्दी ने स्पीड पकड़ ली….खट-खटाक-खट! खट-खटाक-खट! और, मैं भारत में बिछाई गई उन पहली रेल की पटरियों, पहले भाप के इंजन ‘थामसन’ और जूल्स वर्न के ‘डेमोन आफ कानपुर’ की कल्पनाओं में खो गया।

 

रेखाचित्र: श्री यादवेन्द्र पांडेय, चीफ साइंटिस्ट  सी बी आर आई  के सौजन्य से

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