एक यात्रा- आज से अतीत तक

इस बार मध्य प्रदेश की आइसेक्ट यूनिवर्सिटी से विज्ञान दिवस के मौके पर विद्यार्थियों को संबोधित करने का आमंत्रण मिला तो मन ही मन फौरन मन ने मन बना लिया कि जरूर चलना है। डा. शंभु अवस्थी का फोन आया था, “इंजीनियरी सूचना प्रौद्योगिकी, विज्ञान, प्रबंधन और कला के विद्यार्थी हैं। आप आएंगे तो अच्छा लगेगा।

अच्छा तो मुझे भी लगेगा अवस्थी जी, विद्यार्थियों से विज्ञान की बातें करके। मैं जरूर आवूंगा। वहां आसपास भी कुछ है- जंगल, पेड़, पहाड़, पशु-पक्षी, नदी या झील-तालाब? खाली समय मिला तो देखना चाहूंगा।”  

भोजपुर में प्राचीन भोजेश्वर मंदिर है, बेतवा नदी के किनारे। यूनिवर्सिटी से नौ-दस किलोमीटर दूर। आप वहां जा सकते हैं, ”  डा. अवस्थी ने कहा।  

मन ने कहा- अरे वाह, राजा भोज की नगरी भोजपुर! एक ओर आधुनिक विज्ञान, इंजीनियरी, प्रबंधन और कला की शिक्षा का केन्द्र, आइसेक्ट यूनिवर्सिटी और दूसरी ओर विज्ञान, वास्तु शिल्प, जल प्रबंधन और प्रकृति संरक्षण का प्राचीन केन्द्र, भोजपुर! आज और आज से लगभग एक हजार वर्ष पहले के इन शिक्षा केन्द्रों को देखना एक बिल्कुल नया अनुभव होगा।

मन में यही सोच लेकर दिल्ली से 27 फरवरी 2015 को अल-सुबह शताब्दी ट्रेन से भोपाल के लिए रवाना हुआ। वहां पहुंचा तो सारथी बलराम स्टेशन पर ही मिल गए और लगभग 25 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के ग्राम-मेंडुवा, पोस्ट-भोजपुर स्थित आइसेक्ट यूनिवर्सिटी कैंपस की ओर ले चले। लगभग पचास मिनट बाद हम दोनों ओर खड़ी पहाड़ियों के बीच, दाहिनी ओर के हरे-भरे खेतों को देखते हुए आइसेक्ट यूविर्सिटी के विस्तृत, शांत और सुंदर कैंपस में पहुंच गए। राह में फागुन की गुनगुनी हवा में कुछ खिले और कुछ खिलने के लिए बेचैन पलाश के पेड़ मिले, जिनसे मन ही मन सुबह मिलने का वादा करके मैं अतिथि गृह में चला आया। डा. अवस्थी ने खिड़की के उस पार का दृश्य दिखाते हुए कहा, “यहां से आपको दूर तक फैली हरियाली और पीछे वह पहाड़ दिखाई देगा।मैंने वह दृश्य देखा और उसे आंखों में बसा लिया।

प्राचीन भोजेश्वर मंदिर
प्राचीन भोजेश्वर मंदिर

उस दिन और कोई काम न होने के कारण भोजपुर जाने का निश्चय किया। चाय पीकर 4.30 बजे सारथी बलराम के साथ भोजपुर की ओर प्रस्थान किया। वहां भोजेश्वर मंदिर का प्राचीन स्थापत्य देखने के साथ ही उस विशाल बांध के अवशेषों को भी देखना था जिसे बहु प्रतिभाशाली राजा भोज ने ग्यारहवीं सदी में बनवाया था। रास्ते भर मैं उस महान परमार राजा भोज के बारे में सोचता रहा। कैसा अद्भुत राजा था वह? उसकी विविध रुचियों के बारे में जान कर हैरानी होती है। उसकी रुचि के कई क्षेत्र थे: वास्तुशिल्प, जल-प्रबंध, औषधि विद्या, प्रकृति संरक्षण, धातु विज्ञान, योग, संगीत, कला, साहित्य, शिक्षा……और भी न जाने क्या-क्या। साहित्य में उसकी इतनी रुचि थी कि कहा जाता था, उसके राज्य में जुलाहे भी संस्कृत में कविताएं रचते थे। और, शिक्षा के प्रसार के लिए उसने अनेक भोजशालाएं स्थापित की थीं। वे भोजशालाएं विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित थीं। उनमें अध्ययन-अध्यापन के लिए कक्षाएं, पुस्तकालय और आवासीय भवन होते थे जिनमें शिक्षक, संगीतकार, नर्तक, मूर्तिकार और अन्य विद्धान रहते थे। मध्य प्रदेश के धार जिले में आज भी मौजूद भोजशाला उन प्राचीन विद्या केन्द्रों की याद दिलाती है।

भोजपुर की ओर जाते हुए दोनों ओर दूर-दूर तक फैले हुए गेहूं के खेत दिखाई दे रहे थे जिनकी बालियों में बकौल शायर इकबाल, सूरज अपनी किरणों से भरपूर सोना भर रहा था। कुछ दिनों बाद वे गेहूं के सुनहरे खेतों में बदलने वाले थे।

            यह सब सोच ही रहा था कि बलराम की आवाज सुनाई दी, “बस, पहुंचने ही वाले हैं भोजपुर। वह देखिए, सामने पहाड़ी पर प्राचीन भोजेश्वर मंदिर।मैंने देखा, सामने सूखी, काली, पथरीली पहाड़ी पर ग्यारहवीं सदी का प्राचीन भव्य भोजेश्वर मंदिर खड़ा था। पुल के नीचे धीरे-धीरे बेतवा बह रही थी जो बीमार और दुर्बल नज़र आ रही थी।

गाड़ी से उतर कर मैं तेज कदमों से पहाड़ी पर स्थित भारी-भरकम शिलाखंडों से बने उस अधूरे मंदिर के प्राचीन स्थापत्य को देखने के लिए पहाड़ी पर चढ़ने लगा। पास जाकर कुछ देर पत्थर की सीढ़ियों पर बैठा। कल्पना में ग्यारहवीं सदी में पहुंचा और सामने से अपने राजदरबारियों के साथ आते राजा भोज को देखा। उसे भोजेश्वर मंदिर के निर्माण कार्य का निरीक्षण करते हुए देखता रहा। वह निर्माणाधीन मंदिर के एक ओर समतल में खड़ा होकर सामने कंकड़-पत्थरों और मिट्टी से बनी मजबूत ढलान यानी रैंप पर मजदूरों द्वारा मंदिर तक बड़ी कुशलता से चढ़ाए जा रहे भारी शिलाखंडों की ओर देखता रहा। फिर गर्भगृह में जाकर एक ही पत्थर को काट कर बनाए जा रहे विशाल शिवलिंग और चार कोनों पर बन रहे ऊंचे शिला-स्तंभों को गौर से देखा। पूरे भोजेश्वर मंदिर की चिनाई बिना गारे के ही भारी शिलाखंडों से की जा रही थी।

मंदिर की पहाड़ी से उतर कर सामने की दूसरी पहाड़ी की समतल पटांगण जैसी पथरीली सतह पर आनुपातिक माप के अनुसार कारीगर छेनी-हथौड़ियों से विशाल मंदिर के अष्टकोणीय तल, गर्भगृह, स्तंभों और शिखर के रेखांकन उकेर रहे थे। कहीं मंदिर के प्रवेश द्वार और उसके सामने के पटांगण तथा पत्थरों के क्रमिक सोपानों के चित्र उकेरे हुए थे। उससे कुछ दूर एक और पहाड़ी पर कारीगरों की कार्यशाला थी जिसमें वे पत्थरों को माप और तराश कर उनमें मूर्तियां गढ़ रहे थे। नीचे बेतवा पर बने विशाल बांध की नीली, निर्मल जलराशि की नन्हीं लहरों में सूर्य की किरणें सितारों-सी जगमग पैदा कर रही थीं। बांध के उस पार राजा भोज का राजप्रासाद दिखाई दे रहा था। राजा की योजना के अनुसार बेतवा के दोनों ओर विशाल चट्टानों के किनारे से भारी पथरों की चिनाई करके इस क्षेत्र के उत्तरी और दक्षिणी भाग में बांध बना दिए गए थे ताकि इस पूरे भू-भाग में फसलों की सिंचाई की जा सके।

और हां, ‘सिंहासन बत्तीसी’ की रचना भी तो यहीं हुई थी। यहीं कहीं इन पहाड़ियों पर ही राजा भोज को मिला होगा, किंवदंतियों में वर्णित विक्रमादित्य का वह सिंहासन, जिस पर बैठने का प्रयास करने पर उसे 32 योगिनियों ने रोक कर कहा होगा कि जब तुममें उस न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य के गुण होंगे, तभी तुम इस सिंहासन पर बैठ सकोगे। और फिर, उन्होंने राजा भोज को उसकी न्याय-प्रियता और दयालुता की बत्तीस कहानियां सुनाई होंगी।….

मैं इन्हीं कल्पनाओं में खोया हुआ था कि ‘बेर ले लो! बेर ले लो बाबू जी!’ की आवाज सुन कर मेरी तंद्रा टूटी। सामने सूखी टहनियों और फूस की छांव में दो ग्रामीण योगिनियां बैठी आवाज दे रही थीं। एक बेर और खीरे बेच रही थी, दूसरी अमरूद। जामुन जैसे काले बेर देख कर मुंह में पानी भर आया और खरीद लिए। पता लगा, सूखे बेर उबाल कर काले बनाए गए हैं। कुछ अमरूद लिए। “ये चीजें इतनी महंगी क्यों बेच रही हो,” पूछने पर एक योगिनी बोली, “हम दूर मंडी से खरीद कर लाती हैं ये चीजें। इस महंगाई में इतना दाम तो होगा ही बाबूजी। दिन भर थोड़ा-बहुत बिक जाता है, बस यही आमदनी है।” मैंने पूछा, “अपने खेतों में नहीं होती यह चीजें? ” तो बोलीं, “कहां अपने खेत! मंडी से लेना पड़ता है।” अभी कुछ देर पहले का मेरी कल्पना का भरा-पूरा बांध न जाने कहां गायब हो गया। जालीदार बाड़ के पार राजा भोज के उस हजार साल पुराने बांध के भारी, काले पत्थरों की दीवार के अवशेष दिखाई दे रहे थे। मैंने योगिनियों से पूछा, ”यह बाड़ क्यों लगी है? ” उन्होंने कहा, “इन चट्टानों से फिसल कर कुछ लोग नीचे बेतवा में गिर गए थे। इसलिए यह बाड़ लगा दी गई।” नीचे बेतवा हरी काई की चादर ओढ़ कर लेटी हुई थी।

 

बेतवा
बेतवा

मैंने बलराम से कहा, “चलते हैं। बेतवा से भी तो मिलना है, बीमार है वह।” उतर कर नीचे आए। पुल पर से ही काई-कुंभी की चादर ओढ़े बेतवा की हल्की कल-कल की कराह सुनाई दी। मैं देर तक उसे देखता, सुनता रहा। सोचता रहा, कभी कितनी निर्मल थी यह नदी! होशंगाबाद के उत्तर में विंध्य क्षेत्र से निकल कर, मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश तक की 590 किलोमीटर लंबी यात्रा करके हमीरपुर में यमुना में समाहित हो जाने वाली बेतवा औद्योगिक कचरे से लगातार दूषित होती गई। हजारों-हजार पशु-पक्षियों, मानवों और पेड़-पौधों की सदियों से प्यास बुझा रही बेतवा इतनी दूषित हो गई कि वर्ष 1991 में इसमें पलने वाली हजारों मछलियां मर कर उतराने लगी थीं। तब बेतवा के बीमार पड़ने की खबर देश भर के अखबारों की सुर्खियों में छपी थी। पर्यावरण वाहिनी ने बेतवा को बचाने की आवाज उठाई, इस आवाज ने जन आंदोलन का रूप लिया और प्रदूषण पर पाबंदी लगाने की कोशिश की गई। लेकिन, औद्योगिक इकाइयां फिर भी पनपती रहीं और भोपाल, विदिशा, रायसेन और नदी तट पर बसे अन्य नगरों की औद्योगिक इकाइयों का जहरीला कचरा बेतवा को लगातार बीमार बनाता रहा। इसका पानी सिंचाई तक के लिए बेकार हो गया।

11ऊपर तार पर बैठा एक कबूतर और उसकी बगल में बैठा किंगफिशर ध्यान से बेतवा को देख रहा था। बहुत देर तक चुपचाप सुनता रहा मैं कराहती बेतवा की करुण कहानी। मेरे पास उसे सांत्वना देने के लिए सिर्फ यह खबर थी कि अब सरकार ने अपनी राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में उसे भी सफाई और उसके जल को प्रदूषण मुक्त करने के लिए चुन लिया है। उसे ढाढस बंधाते हुए मैं मन ही मन बुदबुदाया- आमीन! और, भरे मन से वापस लौटा।

गेहूं के विस्तृत खेतों पर आसमान से सूरज की तिरछी किरणें पड़ रही थीं। आगे बढ़ ही रहा था कि राह से थोड़ा नीचे खड़े पलाश के तन-मन से खिले युवा पेड़ ने बुला लिया। मिला उससे। तोते की चोंच जैसे नारंगी रंग के फूलों से लदी शाखों पर चमकीले जामुनी रंग का नर और धानी हरे रंग की मादा सन बर्ड चहक रही थी। मैं पेड़ के पास पहुंचा तो वे चहकती हुई उड़ कर दूसरे पेड़ पर चली गईं। मैंने उस युवा पेड़ का तना सहलाया तो लगा जैसे मेरे पूरे मन-आंगन में पलाश के फूल खिल उठे हों।

अब आसमान से धीरे-धीरे शाम उतरने लगी थी। पक्षी अपने नीड़ों की ओर लौट रहे थे। मैं भी आइसेक्ट यूनिवर्सिटी के अतिथि गृह में अपने नीड़ की ओर लौट चला। राह में एक जगह कीकर का एक मोटा द्विशाखित ऊंचा पेड़ मिला जिसकी दोनों शाखों के सिरे बेरहमी से कलम कर दिए गए थे। पल भर वहां रुका। उनमें से एक शाख के सिरे से फूटी, गहरे हरे रंग की नन्हीं टहनी को देख कर बहुत खुश हुआ। वहां ज़िंदगी फिर से पनप रही थी और कीकर जैसे कह रहा था- लाख काटो, मैं फिर पनप उठूंगा। आगे एक चौराहे पर कुछ केले, ब्रेड और दही खरीद कर मैं कमरे में चला आया। मैस का छोटा लड़का आकर बता गया कि आपका भोजन यहीं कमरे में दे जाएंगे। भोजन किया ही था कि मैस में काम करने वाला महेंद्र पूछने आ गया कि खाना कैसा था? बात करते हुए मैं उसके साथ छत पर गया। वहां से दूर तक परिसर में फैले शुभ्र-सफेद भवनों को और आसमान में जगमगाते तारों को देखा। महेंद्र को उनमें से कुछ तारों के बारे में बताया। टैक्नोलाजी ब्लाक के पार सड़क के किनारे खड़े पेड़ों की ओर इशारा करके मैंने उससे कहा, “कल सुबह उनसे मिलने जाना है।”

“किनसे? ”

“उन पेड़ों से। बुला रहे थे, उनसे बातें करनी हैं।”

उसने बड़ी मासूमियत से पूछा, “सर, सुना तो है, पेड़ों में भी प्राण होता है, और वे बातें करते हैं। लेकिन, वे बोलते कैसे हैं? ”

“उनसे तो मन ही मन बात की जाती है। जो लोग पेड़ों को अच्छा मानते हैं, उनके पास जाते हैं, उनसे प्यार करते हैं, उनसे मन ही मन बातें हो जाती हैं, ” मैंने कहा।

“सर, मैं भी चलता। आपको उनसे बात करते हुए देखता, लेकिन सुबह काम बहुत होता है। छात्रों के लिए नाश्ता बनाना पड़ता है।”

“कोई बात नहीं?, तुम कभी और जाकर उनसे बातें करना।”

महेंद्र सोचता हुआ सीढ़ियां उतर कर चला गया।

DSCN250511सुबह तैयार होकर मैं तेजी से उस पार पेड़ों से मिलने गया। रोड पर डामर बिछाया जा रहा था। मैं किनारे-किनारे आगे बढ़ा और कल के देखे पलाश के पास पहुंचा। वह आज कुछ और अधिक खिल चुका था। पेड़ के नीचे और पीछे गेहूं के खेत की मेंड़ पर भी कुछ पुराने फूल गिरे हुए थे। मैंने मन ही मन पलाश से कुछ देर तक बातें कीं। उसके फोटो खींचने लगा तो वह खुश हो गया। लगा, शाखों पर जैसे फूल मुस्कुरा उठे। सड़क के दूसरी ओर एक घनी पत्तियों वाला पेड़ था। पहचानने की कोशिश की, लेकिन पहचान नहीं पाया। दूर से साइकिल पर बांस की टोकरियां लेकर टोकरी बुनकर को आते देखा तो उन्हें रोक कर पेड़ का नाम पूछा।

वे बोले, “हम तो इसे खाकरा कहते हैं। छीला भी कहते हैं। इसकी लकड़ी छीलते हैं।” उनके जाने के बाद थोड़ा आगे बौर से लदा एक और अपरिचित पेड़ मिला, लेकिन वह आम का पेड़ नहीं था। सड़क पर जाते दो कामगारों से पूछा तो उन्होंने कहा, “अचार है। इसके छोटे-छोटे फल लगते हैं। उन्हें खाते हैं हम।” उन पेड़ों के पीछे पूरी पहाड़ी पर घना जंगल था। यहां-वहां चिड़ियां चहचहा रही थीं। थोड़ा आगे, सड़क के दाईं ओर बांसों का एक हरा-भरा, बड़ा झुरमुट दिखा तो कानों में प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत  ने गुनगुनाया: ‘बांसों का झुरमुट/संध्या का झुटपुट/हैं चहक रहीं चिड़ियां/टी-वी-टी टुट्-टुट्! ”

खिलने के लिए बैचेन कुछ और पलाश के पेड़ों से भी भेंट हुई। फिर कैंपस में लौट आया। टैक्नोलाजी ब्लाक के सामने से धीरे-धीरे आगे बढ़ा। आसपास तार पर बैठी काली, चमकीली ड्रोंगो चिड़ियां बीच-बीच में लान की घास में टिड्डों पर झपटतीं और उन्हें लेकर फिर ऊंचे तार पर बैठ जातीं। याद आया, यह चिड़िया उत्तर भारत में भुजंगा या कोतवाल कहलाती है, लेकिन मध्य प्रदेश में लोग इसे करंजुआ कहते हैं। चारों ओर लंबे-चौड़े लानों में लगी दूब में टिड्डे और दूसरे कीटों के रूप में इन्हें भरपूर भोजन मिल जाता है। इसलिए सुबह से ही इनका भोजन उत्सव शुरू हो जाता है। वे काफी पास जाने पर भी डर नहीं रही थीं। उन्हें पता था, कैम्पस में उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

चाय पीने पीछे कैंटीन की ओर बढ़ा तो सामने लान में, अपने रंगीन पंखों की पोशाक पहने एक अकेला किंग फिशर सतर्क हुआ और उड़ कर पहले एक पेड़ पर और फिर सामने पुस्तकालय भवन के ऊपर जाकर बैठ गया। कैंटीन में महेन्द्र मिल गया। वह मेरे लिए चाय बनाने लगा तो मैं बैंच पर बैठा सामने दस-पंद्रह गौरेयों की दाना चुगती टोली को देखता रहा। यह देख कर अच्छा लगा कि उनमें आम घरेलू गौरेयों के अलावा जंगल की कुछ पीताभ चिरैयां भी हैं। मैंने सोचा, कैम्पस में उनका यह मेल-जोल विभिन्न प्रदेशों से आए विद्यार्थियों के लिए अनुकरणीय उदाहरण हो सकता है। एक गिलास गरमा-गरम चाय पीकर कमरे की ओर लौटा। बरामदे में पहुंचा ही था कि अचानक कान में तेज डंक लगा। मैं दर्द से तिलमिला उठा। हथेली से कान को झाड़ा तो बालों में उलझी एक बर्र उड़ कर सामने बैठ गई। किसी तरह बिना कान सहलाए दर्द को सहने की कोशिश की। डरता रहा कि कहीं व्याख्यान से पहले चेहरा न सूज जाए। बर्र के डंक की पीड़ा झेलते हुए महाकवि जायसी के महाकाव्य ‘पद्मावत’ की पंक्तियां याद हो आईं जिनमें जायसी ने पद्मावती की कमर का वर्णन करते हुए लिखा है:

बसा लंक बरनै जग झीनी। तेहि तें अधिक लंक वह खीनी।।

परिहंस पिअर भये तेहिं बसा। लीन्हे लंक लोगन्ह कहं डंसा।।

अर्थात् ‘यह जग बर्र की कमर को पतली कहता है लेकिन पद्मावती की कमर उससे भी पतली है। इसी ईष्र्या से बर्र पीली पड़ गई और लोगों को डंसती फिरती है!’

बर्र भी ठीक, जायसी भी ठीक, लेकिन उस समय मेरे पास दर्द झेलने के अलावा और कोई चारा न था। मैं कुछ देर बाद दिए जाने वाले अपने व्याख्यान के बारे में सोचने लगा। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार पहले आडिटोरियम में विद्यार्थियों को सौरमंडल की सैर करानी थी और दोपहर के बाद ‘विज्ञान और जीवन’ विषय पर बोलना था। तभी युवा कवि और ‘इलैक्ट्रानिकी आपके लिए’ के सह-संपादक मोहन सगोरिया मिलने आ गए। उन्होंने बड़ी आत्मीयता के साथ अपना कविता संग्रह ‘दिन में मोमबत्तियां’ भेंट किया। फिर अगवानी के लिए डा. अवस्थी आए। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति और भारतीय प्रबंधन संस्थान (आइ आइ एम), अहमदाबाद से आए प्रोफेसर रघु से परिचय कराया।

आडिटोरियम में कुलाधिपति संतोष चौबे जी से भेंट हुई जो कवि, कथाकार, उपन्यासकार होने के साथ-साथ समाज में वैज्ञानिक चेतना फैलाने के लिए भी कई दशकों से निरंतर काम कर रहे हैं। विज्ञान दिवस का आयोजन उनके संबोधन से शुरू हुआ। उन्होंने बताया कि ‘विज्ञान दिवस’ डा. सी.वी. रामन द्वारा की गई महान खोज ‘रामन प्रभाव’ के उपलक्ष में मनाया जाता है। ‘रामन प्रभाव’ की खोज 28 फरवरी 1928 को हुई थी और इस खोज के लिए डा. सी.वी. रामन को वर्ष 1930 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

DSCN253011मैं अपने व्याख्यान में लगभग 175 विद्यार्थियों और शिक्षक-शिक्षकाओं को सौरमंडल की सैर पर ले गया। सैर से वापस लौटने पर हमने धरती पर जीवन का गीत गाया। फिर, भारतीय प्रबंधन संस्थान के प्रोफेसर रघु ने मैकेनिकल इंजीनियरी से संबंधित अपना सार-गर्भित व्याख्यान दिया। जाते-जाते संतोष चौबे जी ने मेरे लिए डा. अवस्थी से कहा, ”इन्हें स्टूडियो में ‘विज्ञान गीत’ और ‘गैलीलियो’ नाटक सुनाइए।

दोपहर के भोजन के बाद मैंने एक सेमीनार हाॅल में विद्यार्थियों और अन्य श्रोताओं को संबोधित करते हुए जीवन में विज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला। विद्यार्थियों को सदैव जिज्ञासु दृष्टि से अपने आसपास की दुनिया को देखने और प्रकृति के रहस्यों का सच अपने साथियो और आम लोगों को बताने की सलाह दी। उनको यह भी बताया कि हमें अपने जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और गलत परंपराओं तथा अंधविश्वासों का विरोध करना चाहिए। और, सबसे बड़ी बात यह कि जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए। व्याख्यान के बाद हमने कुछ विद्यार्थियों के विज्ञान माडल देखे जिनके बारे में उन्होंने बहुत उत्साह के साथ हमें बताया।

इसके बाद हमने होशंगाबाद रोड पर आइसेक्ट के स्कोप कैम्पस में स्थित स्टूडियो का रुख किया। वहां विज्ञान के विविध विषयों पर रिकार्ड किए हुए, संगीतबद्ध मधुर विज्ञान गीत सुने। संतोष चौबे जी द्वारा अनूदित बर्तोल्द ब्रेख्त के प्रसिद्ध नाटक ‘गैलीलियो’ के कई अंश सुने जिसमें गीतों से नाट्य प्रभाव को और अधिक उभारा गया है। स्टूडियो में चौबे जी का सान्निध्य मिला। उनसे बातचीत में पता लगा कि ‘गैलीलियो’ नाटक का सफल मंचन भी किया गया है। उन्होंने स्वयं अनेक विज्ञान नाटकों का लेखन और मंचन किया है। उनकी पुस्तक ‘कंप्यूटर एक परिचय’ इस विषय पर पहली किताब थी जो बेहद लोकप्रिय हुई। उन्होंने बच्चों के लिए ‘कम्प्यूटर की दुनिया’ और ‘कम्प्यूटर आपके लिए’ श्रंखला में भी अनेक पुस्तकें लिखी हैं। वे लोक संगीत का भी संकलन कर रहे हैं। भारतीय इंजीनियरिंग सेवा तथा भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुने जाने के बावजूद उन्होंने अपनी कलम और शिक्षा के जरिए समाज सेवा की राह चुनी। उनकी इतनी रुचियों और जिम्मेदारियों के बारे में जान कर मैंने क्षमा मांगते हुए उनसे एक नितांत व्यक्तिगत सवाल पूछने की अनुमति चाही। उनके हामी भरने पर मैंने पूछा, ”प्रशासन, कला, साहित्य, संस्कृति, विज्ञान…..इतनी सारी व्यस्तता के बाद आप सोते कब हैं?

वे केवल मुस्कुराए, लगा शायद यह उत्तर वे स्वयं भी खोज रहे हैं। उनसे मिल कर सचमुच बहुत खुशी हुई। उनकी पुस्तकें ‘अपने समय में’, ‘कला की संगत’, ‘प्रतिनिधि कहानियां’ और ‘इस अ-कवि समय में’, मुझे जहां मैं था उससे आगे का रास्ता सुझा रही हैं।

उनसे विदा लेकर डा. अवस्थी के साथ मैं हबीबगंज रेलवे स्टेशन के लिए निकला। आईसेक्ट यूनिवर्सिटी के आतिथ्य के लिए आभार व्यक्त कर चलने लगा तो वे बोले, ”मैं साथ चल रहा हूं। आपको ट्रेन में बिठा कर लौट आवूंगा।“ आतिथ्य की आत्मीयता से एक बार फिर भीगा। वे अपने साथ स्टेशन ले गए और मुझे मेरी केबिन की बर्थ तक पहुंचाया। मेरे सामने की बर्थ पर जो हमसफर आकर बैठे, उन्हें उन्होंने नमस्कार किया और मुझसे बोले, “आपका परिचय कराता हूं। ये हैं, डा. ज्ञान चतुर्वेदी।” मैंने भी हाथ जोड़े और खुश हुआ कि सफर में कर्म से डाक्टर और कलम से व्यंग्यकार ज्ञान जी का साथ रहेगा। उन्हें माह भर पहले ही घोषित पद्श्री सम्मान के लिए हार्दिक बधाई दी और कहा, “आपको यह सम्मान मिलना सभी को रास आया, इस बात की भी बधाई अन्यथा आप जानते ही हैं, हर साल पद्म सम्मान के नामों पर कैसी बहस होती है।” उनके साथ सफर करना संयोग से मेरे लिए व्यंग्य विधा पर बात करने का अच्छा मौका बन गया। मैं एक अरसे से सोचता आ रहा था कि विज्ञान लेखन में व्यंग्य विधा की बहुत गुंजाइश होने के बावजूद लिखा क्यों नहीं जाता? उनसे चर्चा शुरू की तो उन्होंने कहा, “आइए, खाना खाते हैं। साथ-साथ चर्चा भी कर लेंगे।”

मैंने हंसते हुए जवाब दिया, “आजकल ट्रेन में खाने के लिए कौन पूछता है? सरकार भी आगाह करती रहती है कि अनजान लोगों का दिया कुछ खाएं नहीं। लेकिन, आपको तो सारा देश जानता है, इसलिए कोई खतरा नहीं है।”

“चार रोटी हैं। मैं केवल दो खाता हूं। दो आपके लिए हैं, ” उन्होंने कहा तो आभार व्यक्त कर उनके साथ खाना शुरू किया। मैंने कहा, “मैं वैज्ञानिक विषयों पर लिखता हूं।” वे बोले, “जानता हूं।” उनके लेखन के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक नया, बड़ा उपन्यास पूरा किया है। खाना खाने के बाद मैंने कहा, “आपने खाना खिला दिया है, अब एक गुरु मंत्र भी दीजिए।”

“क्या?” ज्ञान जी ने पूछा तो मैंने कहा, “विज्ञान लेखन में व्यंग्य विधा में लगभग कुछ नहीं लिखा गया है जबकि इस विधा के लिए यह बहुत उर्वर क्षेत्र है। मैंने एकाध कोशिश की। शोधपत्र के फार्मेट में एक व्यंग्य लेख लिखा, ‘कुत्ते की दुम टेढ़ी क्यों?’ कि, कैसे 12-वर्षीय शोध परियोजना बनी, बजट मिला, कई नस्लों और आकार-प्रकार के कुत्ते खरीदे गए, उनके लिए वातानुकूलित प्रयोगशाला बनाई गई, दूध और मांस की नियमित आपूर्ति की गई, दुम पर तरह-तरह की धातुओं और बांस की नलियां चढ़ाई गईं, विदेश में कुत्तों का अध्ययन किया गया आदि-आदि। और, बारह वर्ष बाद जब नली हटाई गई तो पता लगा दुम फिर भी टेढ़ी ही है। इस परियोजना में कहां क्या घोटाले हुए, पाठक पढ़ते-पढ़ते समझता रहता है।”

“ अच्छा प्रयास है, ” ज्ञान जी ने कहा।

“ तो, हम विज्ञान लेखन में इस विधा का प्रयोग किस तरह करें? ” मैंने पूछा तो वे बोले,

“ विज्ञान को विज्ञान ही रहने दें और बात बयां करते-करते उसी में से व्यंग्य का कटाक्ष उभरे ताकि पाठक को उसके जरिए विज्ञान की पूरी जानकारी भी मिले और असंगत बात व्यंग्य बन कर भी उभरे।”

सोने का वक्त हो चला था। उनका आभार व्यक्त कर मैं भी चादर ओढ़ कर सो गया। भोपाल-निजामुद्दीन सुपरफास्ट एक्सप्रेस तेजी से दिल्ली की दिशा में दौड़ रही थी…..खट्…..खटाक! खट्….खटाक! खट्….खटाक!

 

 

 

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