वहां था तारों भरा अद्भुत आकाश

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कई वर्षों से यह नियम-सा बना लिया है कि नैनीताल जाएंगे तो किलबरी-पंगोट मार्ग पर चीना पीक के नीचे घने जंगल के एकांत में जरूर जाएंगे और वहां से चारों ओर का विहंगम दृश्य देखेंगे। 7 फरवरी को इस बार भी यही किया। सूरज कैमिल बैक की ऊंची, पथरीली पहाड़ी के पीछे उतर गया था और हम पेड़ों के बीच गाड़ी में तेजी से किलबरी-पंगोट मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। हम, यानी मोहन, मनमोहन, नरेश और मैं। सड़क के मोड़ से मुड़ कर आगे बाईं ओर ऊंचाई में लेक प्वांइट पर पहुंचे तो देखा कुछ पर्यटक दूर नीचे दिखाई दे रही नैनी झील के फोटो और अपनी सेल्फी खींच रहे हैं। हम आगे बढ़े और घूम कर दाईं ओर की सीधी सड़क पर आ गए। आगे, पीछे, नीचे, ऊपर बांज, बुरांश, रंयांज और अन्य पेड़ों का हरा-भरा जंगल था। पिछले साल सर्दियों में आए थे तो इन पहाड़ियों में पेड़ों के पैताने बर्फ की चादर बिछी हुई थी। इस बार हम वसंत ऋतु में आए हैं। नीचे ताल के किनारे खड़े चिनार, पापलर और चेस्टनट आदि के समाधि लगाए पेड़ों को वासंती हवा अब जाग उठने की हलकी थपकी दे चुकी थी। कुछ पेड़ों पर तो कलियों नन्हे अंकुर भी फूट रहे थे।

लेकिन, नैनीताल शहर से लगभग छह किलोमीटर ऊपर वहां किलबरी-पंगोट मार्ग पर शाम की हवा में खासी ठंड और जंगल की अपनी नम, मोहक खुशबू थी। हम स्नो-व्यू प्वांइट पर पहुंच चुके थे। बाहर निकल कर हमने नथुने फुलाए और वह शीतल, बल्कि ठंडी, शुद्ध प्राणवायु अपने फेफड़ों में खींची। उस हवा में न धूल थी, न धुंध, न कोहरा। सामने पहाड़ियों और नीचे गहरी घाटियों में गहराते अंधेरे के बीच बत्तियां जलने लगीं। अंधेरे में वे यहां-वहां बिखरे सितारों-सी झिलमिलाने लगीं। तभी, सहसा ऊपर आकाश की ओर देखा। निरभ्र आकाश के रंगमंच पर, पूर्वी क्षितिज के काफी ऊपर हीरे की तरह शुक्र ग्रह चमक रहा था। लगा, उस रात की रंग प्रस्तुति के लिए शुक्र जैसे सूत्रधार बन कर आकाश के रंगमंच पर आ गया हो। ज्यों-ज्यों नीचे धरती पर झिलमिलाती बत्तियों की संख्या बढ़ रही थी, आकाश में भी एक-एक कर मोतियों से चमकते तारे उगने लगे। दक्षिण-पश्चिमी आकाश की ओर नजर गई तो देखा वहां ओरायन यानी मृग तारामंडल में व्याध मृग का पीछा कर रहा था। वह तीन तारों का ‘त्रिकांड’ तीर छोड़ चुका था। उन तीन तारों में से बीच के तारे के नीचे ओरायन नेबुला यानी मृग नीहारिका का हलका, धुंधला तारा समूह भी दिखाई दे रहा था। 

अंधेरा और अधिक गहराया। अब ऊपर तारों भरा अद्भुत आकाश था। हजारों-हजार तारे! छोटे, बड़े, यहां-वहां टिमटिमाते हुए तारे ही तारे। कानों में अमीर खुसरो गुनगुनाने लगे, ‘एक थाल मोती भरा, सबके सिर पर औंधा पड़ा!’ तभी ऊपर आसमान में उत्तर से दक्षिण की ओर आर-पार फैली दूधिया आकाशगंगा पर नजर पड़ी। वहां तो जैसे दूध की विशाल नदी बह रही थी, जिसे देख कर हमारे पूर्वजों ने आकाश में बहती विशाल गंगा की कल्पना कर ली। और हां, याद आया, यूनान के प्राचीन निवासियों ने उसे आकाश में आर-पार फैला दूधिया मार्ग मान लिया था! आज वैज्ञानिक कहते हैं, हमारी इस ‘आकाशगंगा’ मंदाकिनी में करीब 1,00,00,00,00,000  तारे हैं। यह दीपावली की चकरघिन्नी की तरह दिखाई देती है। हमारा सूर्य तो इसके केन्द्र से लगभग 30,000 प्रकाश वर्ष दूर बालू के एक कण के समान है।

ओरायन मंडल
                            ओरायन मंडल

ओरायन यानी व्याध अब आसमान में…….और भी साफ दिखाई देने लगा था। उसके त्रिकांड के ऊपर दोनों ओर दो तारे और नीचे भी दो तारे। मुझे तो वह पहाड़ के वाद्य हुड़का यानी डमरू की तरह लगा। ऊपर बाईं ओर का तारा बेतलगूज यानी आद्र्रा नक्षत्र है। और, नीचे दाहिनी ओर का चमकीला तारा है- राइगेल। और हां, त्रिकांड के तीन तारों से सीधी लकीर खींच कर नीचे देखा तो वहां आसमान का सबसे चमकदार तारा सिरियस यानी व्याध चमक रहा था।

लेकिन, त्रिकांड के तीनों तारों की सीध में ऊपर आसमान में लाल रंग का अलदेबरान तारा यानी रोहिणी नक्षत्र चमक रहा था। मृग मंडल की पौराणिक कथा याद आई। रात के उस अंधेरे में ऊपर आसमान में मृग का रूप रख कर प्रजापति रोहिणी का पीछा कर रहा है और व्याध मृग का पीछा कर रहा है। प्राचीन मिस्र के निवासियों को यह पता लग चुका था कि ग्रीष्म ऋतु आने पर जब सूर्योदय से पहले व्याध तारा दिखाई देने लगता है तो जल्दी ही नील नदी में बाढ़ आ जाती है। उन्होंने इस घटना से दिनों की गणना करके 365 दिन का कलैंडर बना लिया था।

कृत्तिका तारापुंज
कृत्तिका तारापुंज

त्रिकांड के तीन तारों से सीधे ऊपर लाल रंग का रोहिणी नक्षत्र और उसी सीधी रेखा में और भी ऊपर था प्लीएडस यानी कृत्तिका तारा-पुंज। पौराणिक कथा के अनुसार कृत्तिका सात बहनें थीं। और, यह अद्भुत संयोग ही है कि मैं कल धरती पर चूनाखान के वसंत पक्षी मेले में कृत्तिका और उसकी बहन मृणालिनी के साथ घूम रहा था! मतलब, मित्र नवीन पांगती और दीप्ति की नन्हीं प्यारी बेटियों के साथ। टकटकी बांध कर देखने पर कृत्तिका तारापुंज में छह-सात तारे दिखे, लेकिन याद आया, सन् 1610 में गैलीलियो ने जब खुद अपनी बनाई दूरबीन से उस तारा पुंज को देखा था तो उसने वहां 30 तारे देखे थे! आधुनिक दूरबीनों से कृत्तिका पुंज में 300 से भी अधिक तारे देखे जा चुके हैं। गांव में मेरे पिताजी तारों के इस नन्हे झुंड को ‘ग्वैरंकी’ कहते थे और आसमान में उन्हें देख कर समय का सही अनुमान लगा लेते थे कि रात कितने पहर बीत चुकी है।

त्रिकांड के डमरू के ऊपरी दोनों तारों यानी आद्र्रा नक्षत्र और दूसरे तारे के बीच से सीधी रेखा में दूर ऊपर उत्तरी आकाश में कैपला यानी ब्रह्म हृदय तारा चमक रहा था। उसके बाईं ओर, बेतलगूज यानी आद्र्रा नक्षत्र और सप्तर्षि के सामने के दो तारों की सीधी रेखा के लगभग बीच में मिथुन राशि के दो तारे, पोलस्क और कैस्टर यानी हमारे पुनर्वसु नक्षत्र को चमक रहे थे। लेकिन, उन्हें देखने के लिए सिर पीछे की ओर इतना झुकाना पड़ा कि पी-कैप पीछे गिर पड़ी। पीछे सीधा खड़ा पहाड़ था जिस पर अंधेरे में बांज, बुरांश के पेड़ रात्रि विश्राम के लिए चुपचाप सो चुके थे। बस केवल काली छायाओं के रूप में यहां-वहां उनका आकार दिखाई दे रहा था।

सप्तर्षि तारामंडल
                           सप्तर्षि तारामंडल

पहाड़ की चोटी के ऊपर पुनर्वसु चमक रहे थे और उनके पार आकाश में उरसा मेजर यानी सप्तर्षि की पतंग अटकी हुई थी। पतंग के आगे के चार तारों की चौकी पुनर्वसु नक्षत्र की ओर थी और तीन तारों की डोर पीछे पश्चिम-दक्षिण की ओर। कुछ लोग इन्हें चपटी चम्मच के रूप में भी देखते हैं तो पश्चिमी विद्वान उरसा मेजर यानी बड़े भालू के रूप में।

सप्तर्षि में आखिर कौन थे ये पौराणिक आख्यानों के सप्त ऋषि? याद करने की कोशिश की- क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरस, वसिष्ठ और मरीचि। वसिष्ठ? यानी, वसिष्ठ और अरुंधति। अरे वाह! ये तो हमारे विवाह के समय हम वर-वधु को पुरोहित जी ने भी संकेत करके आसमान में दिखाए थे। उन्होंने कहा था, वसिष्ठ और अरुंधति पति-पत्नी हैं। वे जन्म-जन्मांतरों से आकाश में साथ रह रहे हैं। संकल्प करो कि तुम दोनों भी सदैव एक-दूसरे का साथ निभाओगे। हमने तब यह संकल्प किया था। आज वसिष्ठ-अरुंधति को साथ देख कर वह संकल्प फिर याद आया। अपने विवाह के 45 वर्ष बाद उन्हें देख कर बहुत अच्छा लगा। वसिष्ठ-अरुंधति तुम भी साथ-साथ, हम भी साथ-साथ।

उरसा मेजर यानी सप्तर्षि के अगले दो तारों, कृति और पुलह की सीध में आगे धुर उत्तर दिशा में ध्रुव तारा चमक रहा था। मोहन और मनमोहन को मैंने दिखाया ध्रुव तारा। वहीं वह छोटी पतंग या छोटा भालू भी था जिसे खगोल विज्ञानी उरसा माइनर या लघु सप्तर्षि कहते हैं। उसकी पूंछ के सिरे पर ध्रुवतारा चमकता है। ध्रुव तारे के बाईं ओर दूर सप्तर्षि तारामंडल दिखाई दे रहा था। याद आया कि ध्रुव तारे के ठीक दूसरी ओर लगभग इतनी ही दूरी पर अंग्रेजी अक्षर ‘डब्लू’ के आकार में कैसियोपिया यानी शर्मिष्ठा तारामंडल के तारे दिखाई देते हैं। लेकिन, आकाश में इस ऊंचाई पर या तो सप्तर्षि ही दिखाई देते हैं या फिर कैसियोपिया के तारे। सप्तर्षि मंडल जब क्षितिज से नीचे रहेगा, तब ऊपर आसमान में कैसियोपिया का डब्लू साफ दिखाई देगा। गर्मियों में सप्तर्षि की पतंग की डोर के अंतिम तारे मरीचि से नीचे दक्षिण की ओर काल्पनिक रेखा खींचने पर वहां चमकता नारंगी रंग का आक्रटुरस तारा यानी स्वाति नक्षत्र दिखेगा। उसी रेखा को आगे बढ़ाने पर उतनी ही दूरी पर चमकते स्पाइका या चित्रा तारे को भी पहचाना जा सकेगा। गर्मियों में नैनीताल आने पर वे तारे हम जरूर देखेंगे।

”चलें अब?“ मोहन ने कहा, ”अब तक तेंदुओं को भी हमारी खबर लग चुकी होगी।“

”ये बात तो है। इस जंगल में तेंदुए देखे गए हैं। इक्का-दुक्का कारों के आने-जाने और उनकी रोशनी के कारण शायद पास में नहीं आते होंगे, “ मनमोहन बोला।

”लेकिन हम तो गाड़ी की लाइट बुझा कर इतनी देर से यहीं बाहर खड़े हैं। जंगल में वे होंगे तो हम पर जरूर नजर रख रहे होंगे,“ मैंने कहा।

बहरहाल, उस रात जंगल के बीच स्नो व्यू प्वांइट के उस घुप अंधरे में शुक्र ग्रह के साथ ही मृग तारामंडल, मिथुन राशि के पुनर्वसु नक्षत्रों और सप्तर्षि के सातों तारों को मन भर कर देर तक देखा। वसिष्ठ के साथ चमक रहे छोटे-से अरुंधती तारे को देख कर नजर की जांच भी कर ली। आम विश्वास है कि अगर सप्तर्षि के छठे तारे वसिष्ठ के साथ अरुंधति को भी देख लिया जाए तो इसका मतलब है, नजर तेज है! हजारों-हजार तारों की छांव में एक-डेढ़ घंटा बिता कर हम अंधेरे में उस सर्पीली सड़क से वापस लौटे। लेक व्यू प्वाइंट के आसपास से शहर नैनीताल भी बिजली की चमचमाती रोशनी में धरती पर तारों भरे आकाश का एहसास करा रहा था।

 

 

 

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