वसंत पक्षी मेले में

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वसंत पक्षी मेला और प्रदर्शनी

कंक्रीट के जंगल, दिल्ली महानगर में अपने फ्लैट के भीतर चिड़ियों के प्रदेश उत्तराखंड की चिड़ियों का मधुर कलरव सुन रहा हूं। सुन रहा हूं और एक-एक चिड़िया की चहक सुन कर याद करने की कोशिश कर रहा हूं की पहाड़ के किस जंगल में कहां सुनी थी मैंने यह आवाज? कुक्कू….कुक्कू…कुक्कू! अरे, यह तो कफुवा बोल रहा है। लगता है, चैत का महीना लग गया है। और यह, काफल पाक्को….काफल पाक्को…काफल पाक्को! काफल पकने लगे होंगे, तभी तो यह काफल पाक्को चिड़िया हमारे जंगलों में बोलने लगी है। और, ये तमाम आवाजें, ये चिड़ियों के गीत…..‘तीन तोला तित्तरी!’….‘न्याहो! न्याहो! न्याहो!’……‘सरग दिदी पांणि-पांणि!’, ‘चीं….चुर….चुर…चु र्र र्र र्र’, ‘टी…टिटिट्…टी…टिटिट्’, ‘कुर….कुर….कुरूरू….कुरूरू!’

मित्र नवीन पांगती सपरिवार
मित्र नवीन पांगती सपरिवार

कमरा चिड़ियों के गीतों से गूंज रहा है। मैं सोच रहा हूं, क्या ये भी पहचानती होंगीं एक-दूसरी प्रजाति की भाषा? खग ही जाने खग की भाषा। लेकिन, क्या कफुवा की ‘कुक्कू! कुक्कू!’ या, ‘पपीहे की न्याहो! न्याहो!’ या, तीतर की ‘तीन तोला तित्तरी’ की भाषा ये तमाम चिड़ियां आपस में भी समझ लेती होंगीं? या, हमारी तरह इनकी भी हिंदी, बंगला, मराठी, तेलगू, रूसी, जापानी, फ्रांसीसी जैसी अलग-अलग भाषाएं होंगीं? द, कौन जाने! खग ही जाने खग की भाषा

चिड़ियां सी डी में से एक-एक कर कम्प्यूटर के पर्दे पर आ-आकर चहचहा रही हैं। उत्तराखंड के घर-आंगनों और वन-प्रांतरों की रंग-बिरंगी चिड़ियां। आभार मुख्य वन संरक्षक (कुमाऊं) अमरजीत सिंह जी, जिन्होंने 6 फरवरी 2015 को द्वितीय उत्तराखंड बसंत पक्षी मेले में यह नायाब सी डी मुझे भेंट की। और, आभार मित्र मोहन राणा जिन्होंने उस अनजान जगह में भी मुझे पहली बार देख कर पहचान लिया और अमरजीत सिंह जी से मिलाया। मित्र

नवीन पांगती का तहे-दिल से शुक्रिया जो अपनी संगत में मुझे हल्द्वानी से कालाढूंगी, बैल पड़ाव होकर 38 किलोमीटर दूर चूनाखान के जंगल में ईको पर्यटन केन्द्र दिखाने ले गए और वापस लाए।

सच कहूं तो बहुत मन था इस वसंत पक्षी मेले को देखने का। दिल्ली के एक अखबार में इसके बारे में एक छोटी-सी खबर पढ़ी थी। उसे पढ़ कर अपने गांव के लक्ष्मण को कालाढूंगी फोन करके अधिक जानकारी मांगी थी। पता लगा, वसंत पक्षी मेला 4 से 8 फरवरी तक है। सुन कर निराश हुआ कि कैसे जा सकता हूं। 5 फरवरी को मुझे हल्द्वानी में गौरव की शादी में शामिल होना था। शामिल हुआ, जहां अचानक नवीन ने अगले दिन पक्षी मेले में चलने की बात की तो मुराद पूरी होती लगी। अगले दिन उनका फोन आ गया और वे अपने परिवार संग मुझे भी ले चले चूनाखान।

मुख्य वन संरक्षक (कुमाऊं) श्री अमरजीत सिंह के साथ मैं
मुख्य वन संरक्षक (कुमाऊं) श्री अमरजीत सिंह के साथ मैं

साल, सेमल आदि तमाम प्रजातियों के पेड़ों से घिरे चूनाखान के इको पर्यटन केन्द्र में पक्षी प्रेमियों, पर्यटकों और स्थानीय निवासियों की हलचल थी। चारों और फैले 34 प्रदर्शनी-मंडपों में उत्तराखंड की विभिन्न स्वयं सहायता संस्थाओं, गैर सरकारी संस्थाओं तथा स्थानीय कारीगरों के हाथों से निर्मित हस्त शिल्प की खूबसूरत वस्तुएं प्रदर्शित थींः सिल पर पिसे तरह-तरह के लूण (नमक), बांस और रिंगाल की टोकरियां, हैट, ऊनी वस्त्र, कालीन, दन, पश्मीना, और भी न जाने क्या-क्या। वहां शुद्ध शहद, बड़ियां और नाना प्रकार की जड़ी-बूटियां भी थीं और आर्गनिक अनाज, दालें, फल और सब्जियां भी। एक ओर स्थानीय किसान भाई जयलाल के खेत की 8 किलोग्राम वजन की मूली और मसालों के कई पैकेट रखे थे। पर्यटन केन्द्र की पक्की इमारत में रंगीन चित्रों, छायाचित्रों और पोस्टरों से उत्तराखंड के पक्षियों की जानकारी प्रदर्शित की गई थी। इको पर्यटन केन्द्र के हाॅल में कार्यशालाएं आयोजित की जा रही थीं। वहां विद्यार्थियों और पक्षी प्रेमियों को बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के डा. राजू और अन्य विशेषज्ञ पक्षी जीवन की तरह-तरह की जानकारी दे रहे थे।

वहीं पता लगा कि उत्तराखंड राज्य के 71 प्रतिशत भू-भाग में घने वन हैं और वहां के वनों, पहाड़ों, मैदानों, नदी-नालों, झरनों और तालाबों के तटों पर चिड़ियों की 691 प्रजातियां पाई जाती है। उन सुंदर वन-प्रांतरों में चिड़ियों की कई और प्रजातियां भी हो सकती हैं जिन्हें पक्षी प्रेमी कल पहचानेंगे। तराई के नम मैदानों, पहाड़ों के पैताने पर फैले गर्म भाबर, निचली पर्वतमालाओं से लेकर 7,000 मीटर से भी ऊंचे हिमालयी शैल-शिखरों की गोद में भारत में पाई जाने वाली चिड़ियों की लगभग 1303 प्रजातियों में से करीब आधी से भी अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।

मैं और मित्र मोहन राणा
मैं और मित्र मोहन राणा

पूरे उत्तराखंड में 14 ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें पक्षियों का स्वर्ग कहा जा सकता है। वहां पक्षी दर्शन के लिए ये बेहतरीन जगहें हैं: गढ़वाल मंडल में अगोरा-बार्सू, दयारा, असान-तिमली, चकराता-कोटी कनासर, चिल्ला-राजाजी, थानो-मालदेवता-लच्छीवाला, देवोलसारी-मागरा, हर-की-दून-चंगसिल-रुइनसार, देवरियाताल-चोपता-तुंगनाथ-मंडल, खिर्सू, बेनोग-सुवाखोली-धनोल्टी। और, कुमाऊं मंडल में बिनसर-जागेश्वर, कालाढूंगी-बौड़, महेशखान, मारचुला-मोहान-कुमेरिया-लोहाचैड़, मुंसियारी-अस्कोट, नंधौर, पंगोट-सातताल, पवलगढ़-कोटाबाग-सीताबनी, ढिकाला-गैराल, झिरना-कालागढ़-फंटो-टुमेरिया।

पक्षियों का यह द्वितीय वसंत मेला पवलगढ़ कंजर्वेशन रिजर्व क्षेत्र में आयोजित किया गया था। यह प्रदेश के वन विभाग की इको पर्यटन योजना की एक अहम गतिविधि है जिसके तहत मुख्य वन संरक्षक (इको पर्यटन), राजीव भरतरी के मार्गदर्शन में देश भर से पक्षी विशेषज्ञों, पक्षी प्रेमियों और विद्यार्थियों को पक्षियों के स्वर्ग उत्तराखंड की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसी प्रयास के अंतर्गत गत वर्ष 5 से 9 फरवरी 2014 तक असान कंजर्वेशन रिजर्व में प्रथम वसंत पक्षी मेले का आयोजन किया गया। पवलगढ़ कंजर्वेशन रिजर्व में आयोजित इस बार के द्वितीय वसंत मेले में 11 नेचर ट्रेल और 2 कार्बेट हेरिटेज ट्रेल बनाए गए जिनमें सुबह-सुबह निकल कर पक्षी-प्रेमी पक्षी-दर्शन के लिए निकल जाते। इन्हें श्री राजीव भरतरी और रामनगर प्रभाग की डीएफओ कहकशां नसीम पक्षी-दर्शन के लिए रवाना कर रही थीं।

नेचर ट्रेल की ये राहें पक्षी-प्रेमियों को पवलगढ़, क्यारी, सीताबनी, रामनगर, मोहान, चूनाखान, बेलपोखरा, कालाढूंगी और रिंगौड़ा क्षेत्र के पक्षियों से मिलाने ले गईं। पक्षी-प्रेमियों का मार्गदर्शन पक्षी विशेषज्ञों के साथ-साथ अभिनेता टाॅम आल्टर, यायावर इतिहासकार शेखर पाठक, छायाकार अनूप साह और अन्य अनेक जाने-माने लोग कर रहे थे। मेले के दूसरे दिन पक्षी प्रेमियों और विशेषज्ञों के अलावा सिंधिया कन्या विद्यालय और वेलहम कालेज, देहरादून के लगभग 400 विद्यार्थियों ने भी नाना प्रजातियों की रंग-बिरंगी चिड़ियों को देखा। अगले दिन 200 स्कूली बच्चों की आंखें कालाढूंगी ट्रेल पर रंग-बिरंगे पक्षियों को खोज रही थीं। विभिन्न नेचर ट्रेलों पर दिन भर में पक्षी प्रेमियों को 60-65 प्रजातियों तक के पक्षी दिखाई दे रहे थे।

किसान भाई जयलाल के खेत की 8 किलोग्राम वजन की मूली
किसान भाई जयलाल के खेत की 8 किलोग्राम वजन की मूली

प्रदर्शनी देखने के बाद हम थक-थका कर पेड़ों की छांव में रखी कुर्सियों पर बैठ कर सुस्ताने लगे। नवीन की नन्हीं बेटियां सामने खानपान के मंडपों से माष के पकौड़े, गुटके और रायता ले आईं। एक मंडप पर मंडुवे की रोटी पूछी तो वह केवल आधी ही मिली। वहां मौजूद महिलाओं ने कहा, ”मंडुवे की रोटी खतम हो गई है। लेसुवा खाओगे?“ ”अरे वाह,“ मैंने कहा, ”जरूर खाएंगे।“ ”उसमें गेहूं की रोटी के भीतर मंडुवा होता है।“ मैंने कहा, ”हां, मैं जानता हूं।“ ”तब तो पिनालू-गडेरी के गुटके भी खाओगे,“ कहते हुए उन्होंने पत्ते के एक दोने में गुटके और अलग से लेसुवा रोटी दे दी। छांव में लाकर हमने उसका स्वाद लिया। तभी पास आए एक अपरिचित, सुंदर, काले कुत्ते ने मेरे साथ दोस्ती कर ली। उसे भी एक टुकड़ा चखाया। उससे पूछा, ”तुम भी मेला देखने आए हो? कैसा लग रहा है दोस्त?“

उसने प्यार भरी पनीली आंखों से देखा और पास आ गया। मैंने उसका सिर थपथपाया। वह फिर मंडपों की ओर चला गया। कुछ देर यों ही बैठे रहे। मैं सामने साल के पेड़ों की ओर देखने लगा। पर्यटन केन्द्र की कनातों के पीछे कहीं पेड़ों के बीच जंगल बैबलर यानी सात भाई तेज आवाज में चहचहा कर खतरे का संकेत दे रहे थे जैसे कहीं कोई बिल्ली देख ली हो। साल के पेड़ों के बीच पेट पर नन्हे बच्चे चिपकाए कुछ बंदर सामने आए और तेजी से ऊंचे पेड़ों पर चढ़ गए। नन्हें बच्चे उनके इशारे पर और भी ऊपर जाकर नीचे झांकने लगे। सभी बंदरों की आंखों में कुतूहल था कि आखिर ये दो पैरों वाले प्राणी यहां हमारे जंगल में आकर क्या कर रहे हैं? दाहिनी ओर की चारदीवारी पर अचानक उछलते-कूदते, सुकीले दांत चमकाते और लंबी पूंछ लहराते चार-पांच लंगूर भी आ टपके। चारों ओर चकित होकर देखते हुए वे भी उछाल मार कर पेड़ों पर चढ़ गए और गौर से आदमियों की हरकतों को देखने लगे।

मिट्टी के पक्षी
मिट्टी के पक्षी

हमारे वहां पहुंचने तक इको पर्यटन केन्द्र केे आसपास के पक्षी काम पर निकल चुके थे। वहां केवल मिट्टी से बने भूरे रंग के निर्जीव पक्षी लकड़ी के स्टैंडों पर बैठे हुए थे- किंगफिशर, कबूतर, कठफोड़वा, हुदहुद, धनेश, बुलबुल, उल्लू, गिद्ध। रामनगर के पक्षी प्रेमी बची बिष्ट ने बताया कि चिड़ियों को पहचानने और उनके प्रति प्यार जगाने के लिए ये पक्षी दस्तकारी से बनाए गए हैं। बच्चे इस हस्तशिल्प में बहुत रुचि लेते हैं। सूरज साल के पेड़ों की फुनगियों के पार जाने लगा था। हम भी वहां तीन घंटे बिता कर, फिर कभी इन हरे-भरे वनों में आने और चिड़ियों से मिलने का मन बना कर वापस लौट आए। वापसी में हमने खेतों में चारों ओर ढलती सुनहरी धूप देखी, कटता हुआ गन्ना देखा, जुगाली करती भैंसें और उनसे बतियाती मैनाएं भी देखीं। लौटते हुए रास्ते भर हमारे मन में उन वनों के अनदेखे वनपाखी चहचहा रहे थे।

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