काक कथा- 1

सिल्वर ओक
सिल्वर ओक

मेरे घर के ठीक सामने, शयन कक्ष की बालकनी के उस पार सिल्वर ओक के एक पेड़ पर एक काक दम्पति का घर है। हालांकि, काक पति-पत्नी काफी समय से उस प्राकृतिक घर में रह रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से घर में उनकी आवाजाही काफी बढ़ गई है। इन दिनों वे तीन शाखाओं के बीच सूखी टहनियों और शायद घास से बने अपने घर-घोंसले की मरम्मत में बड़ी मेहनत और मनोयोग से  जुड़े हुए हैं। काक चेष्टा का उदाहरण ऐन अपनी आंखों के सामने देख रहा हूं। मैं तो पिछले आठ साल से अपार्टमेंट के अपने कंक्रीटी घर-घोंसले में कुछ भी नहीं करा पाया हूं। न मरम्मत, न रंग-रोगन। काक दम्पति किस तैयारी में लगे हैं?

कोरी आंख से उनकी गतिविधि पर नजर रख रहा था लेकिन अब बेटे की छोटी-सी दूरबीन मिल गई है जिससे नीड़ के निर्माण को थोड़ा और करीब से देख सकता हूं। दो-तीन दिन काक दम्पत्ति   बारी-बारी से चार-पांच मिनट के अंतर पर आते रहे। आकर घोंसले में कुछ काम कर जाते और फिर उड़ जाते। शायद निर्माण सामग्री ला रहे हों। इतनी दूरी से साफ-साफ पता नहीं लग पा रहा है। टहनियों  का झाबा तो पहले से बना हुआ है। शायद पिछले या उससे पिछले साल बनाया था। उससे पहले बाईं ओर के पेड़ की ऊंचाई में इनका घोंसला था। वह शायद अन्य पक्षियों को साफ दिखाई देता होगा क्योंकि एक बार मैंने उस घोंसले के पास जबरदस्ती लड़ते-झगड़ते यानी इंडियन ट्रीपाई यानी महालट को देखा था। काक पति-पत्नी कर्कश आवाज में चीखते हुए, उस पर बार-बार झपट रहे थे। महालट शिकारी पक्षी है और अंडों-बच्चों का दुश्मन। हो सकता है तब घोंसले में अंडे या बच्चे रहे हों। अपने या फिर कोयल के भी। दोनों कौवे जी-जान से महालट को भगा रहे थे।

उसके बाद ही शायद उन्होंने उस दूसरे पेड़ में घनी पत्तियों-डालियों के बीच नए नीड़ के निर्माण का निर्णय लिया होगा। मेरा तो एक दिन अचानक ही उस ओर ध्यान गया जब देखा कि अब शाम ढले काक दम्पत्ति बाईं ओर के पेड़ पर आ जाते हैं। फिर जब वसंत आ गया, बौर खिल गए और बौराई हुई कोयल यहां-वहां कूकने लगी तो फिर काक दम्पत्ति का घर-घोंसला याद आया। लेकिन, इतनी दूर से कोयल और कोयलिया की कौवों को चकमा देकर उनके घोंसले में अंडे देने की चालाकी नजर नहीं आती।

इतने दिनों से इस काक दम्पत्ति को काम में बराबर जुटा हुआ देख रहा हूं। पति-पत्नी का बराबर का सहयोग भी दिखाई दे रहा है। पति-पत्नी का ऐसा स्नेह तो मैंने केवल सारस और धनेश दम्पतियों में ही सुना था। कौवे को चालाक और धूर्त कह कर नाहक ही बदनाम किया गया है। समझ में नहीं आता, कोयल के बच्चों को भी जो अपने बच्चों की तरह पाले उसे भला धूर्त कैसे कह सकते हैं? जबकि, केवल मीठी बानी के लिए उस कोयल पर सारा प्यार न्योछावर किया जाता है जो छल से कौवों के घोंसले में अपने अंडे दे देती हैं। बहरहाल, नीड़ का निर्माण जारी है। यों भी मई-जून से अगस्त तक कौवों का घोंसला बनाने का समय तो है ही। घोंसला बन जाएगा तो काक मां उसमें 4-5 अंडे दे देगी।

कौवा
कौवा

पहले तक घर के आसपास रहने और कांव-कांव करने वाला ‘कागा’ ही संदेशवाहक माना जाता था। उसकी कांव-कांव को नए महमानों के आने का पूर्व संकेत माना जाता था। होली गाई जाती, ‘उड़ रे कागा पछिम दिशा, खबर मंगा मोरे बालम की…’। पर्व-उत्सव पर कौवों के हिस्से का काक-ग्रास रखा जाता। श्राद्ध पक्ष में तो कौवों की जम कर आवभगत की जाती है। उत्तराखंड में तो उत्तरायणी यानी मकर संक्रांति को बच्चे कौवों को पकवानों के काक-ग्रास देकर उनसे अपनी कामना पूरी करने को गाते हैं, ‘ले कावा बड़, मैं कैं दे ठुल-ठुल गड़!’ (ले कौवे बड़ा, मुझे देना बड़ा -बड़ा खेत)। कड़ाके की सर्दी में लोग दो लोटे पानी डाल कर काक-स्नान कर लेते हैं । कई लोग सतर्क रह कर काक-निद्रा ले लेते हैं तो कभी-कभी कुछ लोगों को ‘कौवा चला हंस की चाल’ की व्यंग्योक्ति भी सुननी पड़ती है।

लेकिन, हमारे पड़ोसी काक दम्पति के कारण हमारी कालोनी में किसी को कुछ नहीं सुनना पड़ा है क्योंकि वे अपना जीवन जी रहे हैं और हम अपना, एक -दूसरे के जीवन में कोई दखल दिए बिना इस काक-दम्पति के कई बिरादर पीछे, थोड़ी दूर पीपल के महावृक्ष के आश्रय में रहते हैं। पास ही में एक बड़ा कूड़ाघर है जहां उन्हें कचरे में खाने को कुछ न-कुछ मिल जाता है। यों भी, इन्हें किसी भी खाने से कोई परहेज नहीं है। ये सर्वभक्षी हैं। शाकाहार या मांसाहार में जो कुछ भी मिल जाए , खा लेते हैं। रसोई का बचा-खुचा भेाजन, रोटी, अनाज, फल, मरे हुए जानवरों का मांस, मरे हुए चूहे, मेंढक, छिपकली, चिड़ियों के अंडे, कीड़े आदि कुछ भी कौवों का भोजन है। इस तरह यह प्रकृति का सफाई कर्मचारी भी है। वातावरण को साफ रखने के लिए कौवों का भी होना जरूरी है।

इस बीच यहां  झमाझम वर्षा हुई। हवा के तेज झौंके चले जिनसे सिल्वर ओक के पेड़ के साथ काक दम्पति का घर-घोंसला भी झूलता रहा। काक दम्पति घोंसले के भीतर न जाने क्या कारीगरी कर रहे हैं कि पेट के बल भीतर गहराई में उतर जाते हैं। सिर्फ पूंछ का कुछ हिस्सा भर दिखाई देता है। हो सकता है अंडों और शिशुओं  के लिए पंख, रूई और कपड़े के टुकड़ों से मुलायम बिछौना तैयार कर रहे हों। कौन जाने?

(सत्यजीत रे के कोर्वस काक की कथा फिर किसी समय…)

 

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