लो, हरियल आ गए

Yellow-footed_green_pigeon_(Treron_phoenicoptera)_Photograph_by_Shantanu_Kuveskar

परसों दोपहर बाद किचन की खिड़की के पास खड़ा सामने हरे-भरे कुसुम के पेड़ को देख रहा था कि अचानक उसकी शाखों पर हलकी हलचल हुई। गौर से देखा तो कबूतरों की तरह दिखाई देने वाले दो हरियल कुसुम की शाखों पर यहां-वहां फुदक रहे थे। थोड़ी देर बाद दो हरियल और आ गए। फिर एक और, जो दूसरे हरियलों से छोटा था। उन्हें देखते रहने पर भी, पलक झपकने के बाद भ्रम हो जाता था कि वे कहां पर बैठे हैं। उनका हरा-पीला और धूसर रंग कुसुम की पत्तियों और शाखाओं से इतना घुल-मिल गया था कि आंखें उन्हें खोजती रह जातीं।

कुछ देर बाद पांचों हरियल दूसरी ओर के पेड़ों की तरफ उड़ गए। उन्हें देखने में इतना डूबा रहा कि उनके पैरों का रंग देखना याद नहीं रहा या देखा होगा तो भूल गया। वे तो उड़ गए पर मैं परेशान कि वे कौन से हरियल थे ? पतली पूंछ वाले या चौड़ी पूंछवाले? सिंदूरी सीने वाले या पीले पैरों वाले? अब कैसे पहचानूं ?

कहते हैं, हरियल पेड़ों पर ही रहते हैं। जमीन पर नहीं उतरते। पानी पीने के लिए भी नहीं। रसीले फलों और पत्तियों पर जमा ओस से प्यास बुझा लेते हैं। प्रोफेसर हरिदत्त वेदालंकार ने अपनी पुस्तक ‘कालीदास के पक्षी’ में लिखा है कि ‘रघुवंश’ में कालीदास ने हारीत यानी हरियल का एक बार वर्णन किया है। कालीदास कहता है कि रघु की सेनाएं मलय पर्वत के उन प्रदेशों में पहुंची जहां काली मिर्च के वनों में हारीत उड़ रहे थे। उन्होंने हरियल के बारे में प्रचलित इस किंवदंती का भी उल्लेख किया हैः ‘गही टेक छूटयो नहीं, कोटिन करौ उपायध्हारित धर पग न धरै, उड़त-फिरत मरि जाय।’
घर के आसपास आजकल कोयल कूक रही है, बुलबुलें और गौरेयां भी चहक रही हैं। मैनाओं के कुछ जोड़े भी आसपास दिखाई दे जाते हैं। बाकी मैनाएं शायद प्रवास पर आई थीं, वापस लौट गईं हैं। अच्छा हुआ अब हरियल भी आ गए हैं।
हरियल को हारीत, हारिल या हारीतक भी कहा जाता है। ये कबूतरों और फाख्तों के बिरादर हैं। ये प्रायः दस-बीस के झुंड में रहते हैं और पेड़ों पर ही निवास करते हैं। जमीन पर इन्हें बहुत कम देखा गया है। हरे-भरे पेड़ों की पत्तियों के बीच बैठे हरे-पीले, लजीले हरियलों को एक नजर में पहचानना कठिन होता है। पता ही नहीं लगता कि कौन-सी पत्तियां हैं और कौन-से हरियल। पीपल, बरगद, अंजीर आदि के पेड़ इन्हें अधिक पसंद है क्योंकि इनकी शाखों पर शरण भी मिल जाती है और खाने के लिए इनके स्वादिष्ट फल भी मिल जाते हैं। अन्य पेड़ों पर भी ये रहते हैं। पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर पतली सूखी टहनियों से अपना घोंसला बनाते हैं।

आमतौर पर सभी हरे कबूतरों को हरियल कहा जाता है। पर पक्षी वैज्ञानिक डाॅ. सालिम अली के अनुसार इनकी कई प्रजातियां हैंः जैसे पीले पैरों वाला हरियल, नारंगी सीने वाला हरियल, पोंपादोर हरियल, सुई-पूंछ हरियल, चपटी-पूंछ हरियल और बड़ा हरियल।

Yellow-footed-Green-Pigeon-Iain-Campbell-पहले-हरे और धूसर रंग के हरियल के पैर भी पहले होते हैं। पीले पैर इनकी खास पहचान हैं। ये देश भर में पाए जाते हैं और जहां तक संभव हो पेड़ों पर ही रहते हैं। मार्च से जून तक घोंसले बनाते हैं जिनमें मादा हरियल दो सफेद चकमीले अंडे देती है।

नारंगी सीने वाले हरियल का सामने का भाग नारंगी रंग का होता है और पूंछ सलेटी-धूसर रंग की। शरीर हरे पीले रंग का होता है। ये हरियल हिमालय के निचले इलाकों, मणिपुर, पूर्वी तथा पश्चिमी घाट और तमिलनाडु में पाए जाते हैं। मार्च से सितंबर तक घोंसले बनाते हैं।

पोंपादोर हरियल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और दक्षिण-पश्चिमी भारत में मुंबई से केरल तक पाए जाते हैं। ये देखने में हू-ब-हू पीले पैरों वाले हरियल ये लेकिन उनसे थोड़ा छोटे लगते हैं। इनकी खासियत है इनके लाल पैर। दिसंबर से मार्च तक घोंसले बनाते हैं।

पहले-हरे रंग के सुई-पूंछ वाले हरियलों की पूंछ लंबी सुई जैसी दिखाई देती है। ये निचले हिमालयी क्षेत्र में ऊंचे, घने पेड़ों पर पाए जाते हैं। इनका सीना नारंगी-गुलाबी रंग का होता है। अप्रैल से जून तक प्रजनन ऋतु में घोंसला बना कर अंडे देते हैं।

चपटी पूंछ वाले हरियल भी हरे-पीले रंग के होते हैं लेकिन सिर का ऊपरी भाग और सीना नारंगी रंग का दिखाई देता है। ये हरियल हिमालयी क्षेत्र में पहाड़ों के पैताने के हरे-भरे वनों में पाए जाते हैं। कश्मीर और उत्तर-पूर्वी भारत में भी होते हैं। इनकी प्रजनन ऋतु अप्रैल से जून या अगस्त तक है।

बड़ा हरियल इन सभी कबूतरों से बड़ा और लगभग कौवे के बराबर होता है। ये हरे शाही-कबूतर भी कहलाते हैं। गुलाबी-धूसर रंग के इन कबूतरों की पीठ और पूंछ चमकीले हरे रंग की होती है। ये पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश के पूर्वी तट, कन्याकुमारी से मुंबई तक के पश्चिमी तट क्षेत्र और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तक में पाए जाते हैं। फलाहारी हैं और पानी पीने के लिए भूमि पर उतरते हैं। मार्च से जून तक प्रजनन ऋतु में घोंसले बनाते हैं।

हरियल बहुत प्यारे और निराले पक्षी हैं। शिकारियों ने इन्हें निर्ममता से मारा है जिसके कारण इनकी संख्या काफी कम रह गई है। इन्हें बचाने के लिए हमें हरियाली बढ़ानी होगी ताकि घने, हरे-भरे पेड़ों की डालियों पर लजीले हरियल लुका-छिपी खेलते रहें और इनकी संख्या भी बढ़ सके।

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