हवाएं गुनगुनाती थीं प्रार्थनाएं

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भूला नहीं हूं उस दुनिया में बिताए वे पांच दिन। मध्य प्रदेश से यहां दूर देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में रमे गगन देशमुख विश्वविद्यालय के अतिथि गृह भारद्वाज भवन में पहुंचा गए। जहां कतार में खिले गेंदे के फूल और हरे-भरे पेड़ आगवानी के लिए खड़े थे। भीतर पहुंचे। हर दरवाजे पर जूते बाहर उतारने की हिदायत लिखी थी। भीतर बैठक और फिर शयन कक्ष। सब कुछ शांत-प्रशांत। रकसैक उतार कर, वहां की व्यवस्था देख रहे साथियों से मिलने गया। गगन ने उनसे परिचय कराया। नंदू भैया रहने-ठहरने की व्यवस्था देख रहे थे। साथ थे उनके सहयोगी मनीष, भीमराव मिंटू और हरीराम। नंदू भैया बोले, “आपको कोई तकनीफ नहीं होगी यहां। चाय, काफी, प्रज्ञा पेय हर समय उपलब्ध रहेगा। रात में मन करे तो भी आप इस मशीन से चाय-काफी ले सकते हैं। दरवाजा बंद नहीं रहता, केवल उढ़का रहता है।”  प्रज्ञा पेय! मेरे कान खड़े हुए। मन ने कहा यही पीऊंगा। इसलिए उनसे कहा, “प्रज्ञा पेय पिला दीजिए।” नंदू भैया खुश होकर बोले, “मस्त पेय है प्रज्ञा। इसमें 18 जड़ी-बूटियों मिली हुई हैं। यह पेय भी है और औषधि भी।” पिया और बहुत अच्छा लगा मुझे।

प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर
प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर

कमरे और कमरे के चारों ओर के वातावरण में बेहद शांति थी। खिड़की से बाहर, लेकिन पास में ही एक ओर रूद्राक्ष और दूसरी ओर बेल के पेड़ की हरी पत्तियों से भरी शाखें दिखाई देती थीं। खिड़की के पार सड़क किनारे के ऊंचे-हरे-भरे गुलमोहर की फुनगी पर सुर्ख फूलों का ताज नजर आ रहा था। उस हरियाली को देख ही रहा था कि गगन का फोन आ गया, “सर, छह बजने वाला है, नाद योग का समय हो रहा है। आप बाहर निकल कर बाईं ओर आर्यभट पुस्तकालय से ठीक सामने प्रज्ञेश्वर महादेव तक आ जाइए।” मैं बाहर निकला और बताए अनुसार वहां पहुंचा। सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर पहुंचा तो देखा कि एम्फी थिएटर की तरह गोलाकार था प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर स्थल। हरे-भरे पेड़-पौधों, लता-गुल्मों से घिरा। पूर्व, पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चारों दिशाओं में चार द्वार। द्वारों से भीतर गोलाई में चारों ओर लाल कोटा पत्थर के चौड़े सोपान। उनके बीच-बीच में आंखों को सुख पहुंचाती घास की हरियाली। नीचे संगमरमर का फर्श। बीच में संगमरमर से बनी मंदिर की सांकेतिक बाह्य रूपरेखा और बीच में श्याम वर्ण का दीर्घ शिवलिंग। उस पर हवा में टंगे ताम्र पात्र से बूंद-बूंद टपकता जल।

चौड़े सौपानों पर धीरे-धीरे अनेक छात्र-छात्राएं और अन्य परिसरवासी आकर निःशब्द बैठते गए। ठीक छह बजा। हवा में नाद योग की घोषणा के साथ ही वे लोग शांति से ध्यान मुद्रा में बैठ गए। मैंने भी आंखें मूंद लीं। सहसा पूरे आसमान में बांसुरी के मोहक सुर गूंजने लगे। हवा उन सुरों की तरंगें चारों ओर फैलाने लगी। उन्हें सुनते हुए बंद आंखों के पार मैं जैसे देख रहा था, महसूस कर रहा था…..हरे-भरे विस्तृत चरागाह, उनमें हवा से हिलोरती-डोलती ऊंची-ऊंची घास….उनके पार ऊपर उठते ऊंचे पहाड़, उनमें फैले घने जंगल, बीच-बीच में कल-कल बहती, उछलती-कूदती नदी, जंगलों में उड़ते-चहचहाते पक्षी….और, फिर नाद योग के पंद्रह मिनट पूरे हो गए। आंखें खोलीं। चारों ओर शांति व्याप्त थी और इस खामोशी में हवा में जैसे प्रार्थनाएं गूंज रही थीं। गगन ने कहा, “दिन भर के काम के बाद यहां हवा में गूंजते नाद को सुनते हुए केवल यह पंद्रह मिनट का ध्यान सारी थकान उतार देता है, मन को शांति देता है।” दक्षिणी मेहराबदार द्वार पर छाई मालती महकने लगी थी।

मैं दिल्ली शहर से आया प्राणी आसपास वह सब कुछ चकित होकर देख रहा था। छात्र-छात्राएं, आदमी, औरतें सभी थे वहां, लेकिन न कोई फब्ती, न इशारे। सभी की बातचीत में दो ही संबोधन सुनाई दे रहे थे- दीदी और भैया। विश्वविद्यालय के साफ-सुथरे भवन, दीवारों पर कहीं कोई पोस्टर नहीं, रंग-रोगन से लिखे नारे नहीं। एक ओर सड़क पर सफाई कर्मी ध्यान से डस्ट-क्लीनर चला रहा था। क्यारियों, बगियों में लोग चुपचाप काम कर रहे थे। सब कुछ उस तरह जैसे चींटियां अपना काम करती हैं। किसी मोड़ पर बोर्ड में कुलाधिपति के आप्त वचन। आसपास गाड़ियों की कोई चिल्ल-पों नहीं, न कानों के पर्दे फाड़ते हार्न। लगभग सभी साफ-सुथरे, हरियाली से घिरे रास्तों पर चुपचाप, सोचते हुए से यहां-वहां आ-जा रहे थे। अधिकांश की पोशाक भी कुरता, पायजामा या धोती और लड़कियां, महिलाएं सलवार- कुरता या साड़ी में। शाम के धुंधलके में या देर शाम भी छात्राएं बेझिझक यहां-वहां आ-जा रही थीं। सचमुच यह दिल्ली या दूसरे शहरों की दुनिया से दूर, कोई और दुनिया थी।

लौट कर अतिथि गृह आया। नंदू भैया के पास बैठ कर गर्मागर्म प्रज्ञा पेय पीते हुए बातें करने लगा।  उन्होंने बताया 7.30 बजे के बाद भोजन आ जाएगा।

“आ जाएगा? क्या यहां नहीं बनता भोजन? ”

नंदू भैया हंस कर बोले, “नहीं यहां नहीं बनता। भोजनालय में बनता है, सभी के लिए एक-सा मस्त भोजन। कई सौ लोगों के लिए वहीं से लाते हैं, नाश्ता भी और दोनों समय का भोजन भी।”

“तब आप क्या करते हैं खाली समय में?” मैंने पूछा तो बोले “अतिथि गृह का प्रबंध। समय मिलने पर कापी में गायत्री मंत्र लिखता रहता हूं ताकि मन खाली न भटके। फिर भी समय बचता है तो पढ़ता हूं।”

“क्या पढ़ते हैं? ”  मैंने पूछा।

“कोर्स की पुस्तकें। गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से एक एम.ए. कर लिया है। दूसरा एम.ए. संस्कृत विश्वविद्यालय से कर रहा हूं। फाइनल परीक्षा दूंगा इस बार।”

“वाह नंदू भैया, बधाई और शुभकामनाएं।”

उनसे बातें करने के बाद टहलने के लिए बाहर चला आया।

गोधूलि के बाद अब रात गहराने लगी थी। आसपास वीथियों और मार्गों में खिले चंपा के श्वेत पुष्प अपना स्वप्निल सौंदर्य बिखेर रहे थे। गगन साथ था। हम टहल ही रहे थे कि राह चलते यकायक सांभवी मिश्रा मिल गईं। उन्होंने बताया कि कल आपको पत्रकारिता विभाग में व्याख्यान देना है। डा. सुखनंदन सिंह इस बारे में आपसे बात करेंगे। हम संघमित्रा और निवेदिता छात्रावासों के बीच से निकली सड़क पर पेड़ों की कतारों के साथ-साथ विश्वविद्यालय की गोशालाओं तक गए। गाएं तब विश्राम कर रही थीं। गगन ने बताया पास ही में औषधिशाला में गोमूत्र आदि से बनी औषधियां भी मिलती हैं। पूछा, “देखेंगे आप? ”

मैंने कहा, “नहीं गगन मैं पहले ही काफी गोमूत्र पी चुका हूं।”

“कब? ”

“बचपन में। मां जब माह में दो-चार दिन हमारे जानवरों के गोठ में रहने चली जाती थी तो उसे छूने पर दाड़िम की पत्तियों से गोमूत्र छिड़कते थे और ताजा गोमूत्र पीना पड़ता था। मैं मां को बहुत अच्छा मानता था, इसलिए उसे कई बार छू लेता था, इसलिए कई बार गोमूत्र भी पी लेता था।”

भोजन के बाद पत्रकारिता तथा जनसंचार विभाग के युवा विभागाध्यक्ष डा. सुखनंदन और मुकेश बोरा मिल गए। परिचय हुआ तो मैंने डा. सुखनंदन सिंह से कहा, “आइए, हम लोग बातें करते हुए एक-दूसरे को समझें। समझें कि हम एक-दूसरे को क्या योगदान दे सकते हैं। मैं शुद्ध विज्ञान का विद्यार्थी हूं और अपनी जिज्ञासा तथा शौक के कारण अपने चारों ओर की दुनिया के वैज्ञानिक रहस्यों को जानने की निरंतर कोशिश भी करता रहता हूं। यहां, लगता है आप लोग विज्ञान के साथ-साथ विज्ञान से परे भी जानने का प्रयास कर रहे हैं।”

बातचीत में पता लगा कि आध्यात्मिक जीवनचर्या इस विश्वविद्यालय की मौलिक पहचान है। प्रतिदिन सभी विद्यार्थी और आचार्य प्रातः 5 बजे जागते हैं। तब हवा में प्रातःकालीन प्रार्थनाएं गूंजती हैं। वे प्रार्थना, ध्यान, यज्ञ आदि गतिविधियों में भाग लेते हैं। विश्वविद्यालय में कम्प्यूटर साइंस, पत्रकारिता, जनसंचार, शिक्षा, पर्यावरण विज्ञान, भारतीय संस्कृति, पर्यटन, भाषा, मनोविज्ञान, ग्राम प्रबंधन, योग एवं स्वास्थ्य और प्राच्य अध्ययन आदि विषय पढ़ाए जाते हैं। स्नातक, स्नातकोत्तर और डिप्लोमा पाठ्यक्रम चल रहे हैं। पीएच.डी., डी.एस-सी., तथा डी. लिट शैक्षिक कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। विश्व के बारह देशों के विश्वविद्यालयों तथा शिक्षा संस्थाओं के साथ विश्वविद्यालय का अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध भी है।

डा. सुखनंदन ने कहा, “हां, यह देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मिशन का ही एक भाग है। विश्वविद्यालय विज्ञान और आध्यात्म दोनों धाराओं का समन्वय करना चाहता है। यों भी, विज्ञान जीवन में तर्क दृष्टि का विकास करता है और अध्यात्म जीवन को संवेदनाओं तथा भावनाओं से परिपूर्ण करता है।”

हम अतीत से लेकर आज तक के विज्ञान की चर्चा करते रहे। उन्होंने विज्ञान की वर्तमान सीमाओं से परे के संभाव्य विज्ञान पर भी बातें कीं। मैंने जीवन से जुड़े विज्ञान के उदाहरण दिए। रात 11 बजे हम चंपा के जिस श्वेत फूलों भरे पेड़ के नीचे खड़े थे, उसकी ओर संकेत कर मैंने कहा, “चंपा का यह पेड़ इतनी देर से हमारी बातें सुन रहा है। बोल सकता तो हमारी बातचीत में शामिल होकर अपनी बात भी कहता।” फिर मैंने मिरांडा कालेज में हिंदी साहित्य की शिक्षिका डा. संज्ञा उपाध्याय के उस ई-संदेश के बारे में बताया जिसमें उन्होंने मुझसे पूछा था, “ कि महाकवि बिहारी ने नायिका की नाक की लौंग को लक्ष्य कर दोहा लिखा है कि जैसे चंपा की कली पर भौंरा आ बैठा हो। लेकिन, बाद में जगन्नाथ दास रत्नाकर ने व्याख्या करते हुए लिखा है कि चंपा के फूल पर तो भौंरे बैठते ही नहीं। सच क्या है? मैंने उन्हें बताया कि चंपा के फूलों में मकरंद नहीं बनता। इसलिए भौंरे या अन्य कीट उन पर नहीं मंडराते। तो, देखिए इस तरह विज्ञान साहित्य से भी जुड़ गया। असल में प्रकृति से संबंधित हर ज्ञान अंतर्संबंधित है। इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। बीज से निकल कर बढ़ते हुए अंकुर और हमारे शिशु में संवेदना के स्तर पर कोई अंतर नहीं है।”

रात काफी हो गई थी। 11 बज चुका था। अगले दिन मिलने का समय तय करके वे चले गए। मैं भी कमरे में लौट कर सो गया। रात के सन्नाटे में कभी-कभार कोई चिड़िया बोलती थी, बस।

सुबह नहा-धो कर तैयार हुआ ही था कि गगन मेरे लिए एक धोती लेकर आए और बोले, “चलिए, आपको शांतिकुंज घुमा लाता हूं। धोती में बैठना आसान रहेगा।”

गगन ने मुझे धोती पहनाई और हम देव संस्कृति विश्वविद्यालय की मातृ-संस्था शांतिकुंज देखने निकल गए। यज्ञशाला के मंडप में गायत्री मंत्र के उच्चारण के साथ हवन कुंडों में हवन सामग्री की आहुति दी जा रही थी। हवा में हर तरफ भीनी सुगंध थी। हम भी कुछ देर वहां बैठे। फिर गगन ने चारों ओर घुमाया। बाद में अतिथि गृह लौट आए।

श्रीराम प्रशासनिक भवन के एक व्याख्यान कक्ष में पत्रकारिता विभाग के छात्र-छात्राओं तथा अन्य लोगों की उपस्थिति में विज्ञान, विज्ञान और जीवन, वैज्ञानिक मानसिकता तथा हिंदी में विज्ञान लेखन के विविध पहलुओं पर लगभग तीन घंटे तक व्याख्यान देने के साथ-साथ विमर्श भी किया। दोपहर बाद हरी-भरी वीथियों में यों ही टहलता रहा। सायं 6 बजे फिर एक सोपान पर शांति से बैठ कर हवा में तरंगित होते नाद योग के सुर-संगीत को सुनता हुआ कल की तरह उन्हीं चरागाहों और वन-प्रातंरों में मन को सैर कराता रहा। देर शाम भोजन के बाद विश्राम। थका-मांदा था, जल्दी ही नींद आ गई।

सुबह उठा, लेकिन बाहर पेड़ों के बसेरों में सोई चिड़ियां मुझसे भी पहले उठ कर चहक रही थीं। तैयार हुआ और कैमरा लेकर गायों से मिलने सीधा माता भगवती गोशालाओं के पास पहुंचा। सूचना-पट पर उनका विवरण पढ़ाः दुधारू गाएं 44, दूध पीते बछड़े 20, दूध पीती बछियां 24, अन्य बछड़े 18, अन्य बछियां 58, अन्य गाएं 39, बैल 5, नंदी 2, कुल संख्या 210। हरिवंश, गणेश और गंगा उनकी सेवा में लगे थे। गोशाला के भीतर हर गाय के खूंटे के ऊपर उसके नाम की पट्टी लगी थी- कपिला, नंदिनी, मधु, अलकनंदा, उर्मिला, शालिनी, श्यामा, सुनंदा, हर्षा, तारा, कविता….

तभी गोशाला का द्वार खुला और गाएं खुशी से उछलती, कूदती, कुलांचें भरती सामने आम के पेड़ों के बीच खुले बाड़े की ओर चली गईं। पीछे-पीछे मैं भी गया और उन्हें उस खुले बाड़े में खुश देख कर खुश हुआ। मुझे बचपन में अपनी गाय-भैंसों और बैलों का संग-साथ याद आता रहा।

वहां से निकल कर सामने हथकरघा इकाई में गया जहां कतार में कई करघे लगे थे। एक बुनकर तेजी से कुरते का कपड़ा बुन रहा था तो दूसरी ओर दर्जी मशीन पर कपड़ों की सिलाई कर रहा था। इतनी सुबह वे बड़े मन से अपने काम में लगे हुए थे।

DSCN1763दोपहर 12.30 बजे निकट के गायत्री विद्यापीठ में लगभग 300 छात्र-छात्राओं को ‘सौरमंडल की सैर’ पर ले गया। इस अवसर पर प्रिंसिपल श्री श्याम नारायण मिश्र और वाइस प्रिंसिपल श्री भास्कर सिन्हा भी मौजूद थे। छात्र-छात्राओं को किस्सागोई में अपने कल्पना यान में बिठा कर सूर्य से सुदूर ऊर्ट क्लाउड तक की यात्रा की और धूमकेतु तथा उल्का पिंडों को देखते-देखते पृथ्वी पर लौट आए। लौट कर हम सभी ने जीवन का गीत गाया।

सायं आसपास की वाटिकाओं और श्रीराम स्मृति उपवन की सैर की जिसे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य लाभ के लिए एक्यूप्रेशर पार्क के रूप में विकसित किया गया है। वहां प्राकृतिक आहार केंद्र में आंवला, ऐलोवेरा, लौकी, करेला, नारियल आदि का ताजा रस उपलब्ध था। मैंने और गगन ने ऐलोवेरा और नारियल का रस पिया। छह बजे कर्णप्रिय नाद-योग को सुनने के लिए पंद्रह मिनट ध्यान मुद्रा में बैठा। देर शाम मित्र हेमवती नंदन, नौटियाल जी और गगन मिलने आ गए। देर शाम तक बातें करते रहे हम।

सुबह सामने आसमान में अबाबीलें गोते लगा रही थीं। राह में आम के पेड़ पर बैठी एक अकेली चिड़िया ‘की-कुकि-कीईक’ गा रही थी। वहीं कहीं पास में ही बुलबुल दम्पती किसी गहरे वार्तालाप में व्यस्त थे। तभी कहीं से रूद्राक्ष के पेड़ पर आकर एक नन्हीं चिड़िया चहकने लगी- वीक्….वीक्……स्वीट!……….मैं आज फिर गोशाला कर ओर निकला। गाएं खुले बाड़े में जा चुकी थीं। सुनंदा अभी भी खूंटे से बंधी थी और बाहर जाने के लिए बेचैन थी। उसके पास गया तो उसने मेरी ओर भी बड़ी आस से देखा कि क्या पता मैं ही उसकी रस्सी खोल दूं। हरिवंश से पूछा तो वह मुंह में ही कुनमुनाया- लड़ती है। फिर उसने सुनंदा को खोला तो वह तेजी से बाहर खुले बाड़े की ओर भागी। शायद समझ गई होगी कि सबके साथ प्यार से रहना है।

जुलूस में गायत्री विद्यापीठ के विद्यार्थी
जुलूस में गायत्री विद्यापीठ के विद्यार्थी

दस बजे बालकनी में आया। धूप छिटकी हुई थी। बालकनी के सामने गोल हरी गेंदों जैसे फलों से लदे बेल के पेड़ पर भी गुनगुनी धूप पड़ रही थी। तभी देखते-देखते एक गिलहरी तेजी से आई और फुनगी पर लगे बेल के फल पर हाथ जोड़ कर धूप तापने लगी। उस शांत वातावरण में गूंजती आवाजें सुन कर चौंका। बाहर आया तो देखा गायत्री विद्यापीठ के सैकड़ों विद्यार्थी हाथों में बैनर, पोस्टर लिए जुलूस में नारे लगा रहे थे- “पर्यावरण बचाएंगे, पटाखे नहीं चलाएंगे!” दो दिन बाद दीपावली थी। वे परिसर में पर्यावरण की जागरूकता फैला रहे थे। जुलूस के आगे-आगे एक-दूसरे के कंधों पर हाथ टिकाए नन्हें विद्यार्थी चल रहे थे। शिक्षक-शिक्षिकाएं साथ थीं।

आज कमजोर वर्ग की बस्ती मोतीचूर में बच्चों को सौरमंडल की सैर करानी थी लेकिन समय की जानकारी नहीं मिल पा रही थी। काफी देर बाद पता लगा कि बच्चे दीपावली की छुट्टियों में जा चुके हैं। उन बच्चों से मिलने का मौका चूक गया। तो अब? अब क्या किया जाए?

कुछ देर आर्यभट पुस्तकालय की सीढ़ियों पर बैठा सोचता रहा। फिर पेड़-पौधों और चिड़ियों से मिलने का निश्चय किया। आसपास की वीथियों और मार्गों पर अनेक पेड़ों से मिला। आम, अशोक, रूद्राक्ष, रबर, मौलश्री, चंपा, अमलताश, नीम, हरसिंगार, शीशम, सागौन, बड़ी चंपा, बरगद, पीपल, पाम और बांज से भेंट हुई। चैतन्य भवन से पहले मोड़ पर बांज के उस किशोर वृक्ष को देख कर चौंका कि ऊंचे पहाड़ों का यह बांज यहां इन पेड़ों की संगत में कैसे? फिर अपना ख्याल आया और उत्तर मिल गया। जैसे मैं पहाड़ों से आकर नीचे मैदानों में संगी-साथियों की संगत में हूं, वैसे ही यह भी यहां उग रहा है। उसे छू कर गांव में अपने खेतों, वनों में उगे बांज वृक्षों की आत्मीयता को याद किया।

थक कर श्रीराम प्रशासनिक भवन के बगल में गोल वाटिका की एक बैंच पर चुपचाप जाकर बैठ गया ताकि आसपास आती-जाती चिड़ियों को देख सकूं। थोड़ी देर बाद दो गिलहरियां पास में आकर खेलने लगीं। भोजन खोजने का खेल खेल रही थीं। खेलते-खेलते मेरे पैरों के पास तक चली आती थीं। उन्हें पता था, इस परिसर में कोई उन्हें तंग नहीं करेगा। कुछ देर बाद सामने घास पर एक घुघुती यानी फाख्ता आकर बोलने लगी- ‘कुकुरू….रू रू रू….कुरूरू….कूं’…। न जाने क्या कहती थी, किसे याद करती थी। खग ही जाने खग की भाषा! मैं चुपचाप देखता रहा और देखा कहीं से एक काली सफेद बुशचैट आकर घास में बैठी और तेजी से इधर-उधर चारा-दाना ढूंढने लगी। सोच ही रहा था कि वह अकेली क्यों है कि तभी भूरे-मटमैले रंग की उसकी पत्नी भी आ बैठी।

थोड़ी देर में सातभाई बैबलरों की टोली चली आई। टोली में वे पांच थीं। उनमें से एक चारों ओर नजर रख रही थी कि कहीं कोई खतरा तो नहीं। मुझसे उन्हें भी कोई खतरा नहीं लगा। दो-एक बैबलर मेरी बैंच के पास तक चली आईं। दो-चार मैनाएं भी वहां आकर चहकीं। एक टेलरबर्ड यानी दर्जिन, एक किंगफिशर और एक ट्री-पाई भी आई। हवा में से एक वागटेल नीचे उतरी और तेजी से चहलकदमी करने लगी। कुछ देर बाद उसकी साथिन भी आकर उसके साथ हो गई। फिर वे जिस तेजी से आई थीं, उसी तेजी से उड़ भी गईं। लाल पगड़ी पहने एक कठफोड़वा भी कहीं से आकर सामने पेड़ के तने को चोंच से ठकठकाता सीधा ऊपर चढ़ा और वहां कुछ न पाकर फुरती से उड़ गया।

सायं फिर नाद योग। कमरे में लौटा तो विश्वविद्यालय के भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग की डा. मोना का फोन मिला कि मिलना है। वे पति-पत्नी दोनों मिलने आए तो उनसे पता लगा कि विभाग में ‘भारतीय संस्कृति में विज्ञान एवं तकनीकी का विकास’ विषय भी पढ़ाया जाता है। उन्होंने उसकी संदर्भ सामग्री के बारे में पूछा और यह भी जानना चाहा कि विद्यार्थियों के लिए यह विषय कैसे अधिक रोचक बनाया जा सकता है। उनसे प्राचीन भारत में विज्ञान पर लंबी चर्चा की। वापसी की यात्रा पर सुबह जल्दी निकलना था, इसलिए रकसैक में सामान समेट कर सो गया।

प्रातः 4 बजे उठा, ग्रीन टी बना कर पी और फटाफट तैयार हुआ। गगन को गाड़ी लेकर आना था। पीठ पर रकसैक लाद कर मैं ठीक पांच बजे बाहर निकल आया। सुबह की शीतल हवा में टहलते हुए मुख्य द्वार तक चला आया और गगन का इंतजार करने लगा। गगन गाड़ी लेकर आए तो तेजी से हरिद्वार रेलवे स्टेशन की ओर भागे। 6.39 बजे ट्रेन चली तो गगन को धन्यवाद देकर विदा का हाथ हिलाया और दिल्ली की दुनिया के लिए रवाना हो गया। रास्ते भर वहां की उस शांत दुनिया में बिताए वे पांच दिन शिद्दत से याद आते रहे।

(देवेंद्र मेवाड़ी)

 

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