बच्चों के संग सौरमंडल की सैर

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आज सुबह दक्षिण दिल्ली के संगम विहार की घनी बस्ती के बीच, दूसरी गली में होप वर्ड  वाइड के प्राइमरी स्कूल में करीब 70 बच्चे सौरमंडल की रोमांचक सैर के लिए हमारा इंतजार कर रहे थे। हम इस सैर पर पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने वाली गैर सरकारी संस्था ‘बुकरु’ की ओर से जा रहे थे। स्कूल की उस पक्की इमारत के हालनुमा अंतरिक्ष अड्डे में बच्चों को सौरमंडल की सैर पर भेजने के लिए प्रधानाचार्या श्रीमती शीला सिंह और कुछ शिक्षक-शिक्षिकाएं भी मौजूद थीं।

प्रधानाचार्या शीला जी ने बातचीत में बताया कि पहले इस स्कूल की कोई पक्की इमारत नहीं थी। इसे यमुना पुश्ते की झुग्गी-झोपड़ी बस्ती में शुरू किया गया था। सन् 2004 में यहां टिगड़ी में किराए के एक कमरे में इसे चलाया और फिर विद्यार्थी बढ़ने पर एक गोशाला में जगह मिल पाई। वहां आधी गोशाला में गाय-भैंसे रहती थीं और आधी जगह में हमारा स्कूल चलता था। सन् 2010 में यह पक्की इमारत बन गई तो स्कूल इसमें चलने लगा।

“कितने बच्चे हैं स्कूल में? ”

“94, लेकिन नियमित रूप से पढ़ने 70-75 बच्चे आते हैं। सभी बच्चे कमजोर वर्ग के हैं और माता-पिता के काम में हाथ बंटाते हैं। इस कारण कुछ बच्चे नियमित रूप से नहीं आ पाते।”

DSCN187811“तो क्या अब मैं इन बच्चों को सौरमंडल की सैर पर ले जा सकता हूं? ”

“बिल्कुल ले जा सकते हैं, ” उन्होंने हंस कर कहा, “हम तैयार हैं।”

मैं, अंतरिक्षयान ‘कल्पना’ का कमांडर और मेरी सह-कमांडर रश्मि आजाद वहां पहुंचे तो बच्चों के चेहरे खिल उठे। मैंने कमान संभाली और सभी बच्चों को आंखें मूंद कर अंतरिक्षयान ‘कल्पना’ के भीतर आने के लिए आमंत्रित किया। वे आए और शांतिपूर्वक बैठ गए। अंतरिक्ष में उड़ान भरने से पहले मैंने उन्हें तारों भरा आसमान दिखाया। पूछा कि कितने तारे दिखाई दे रहे हैं?

बच्चे बोले, “असंख्य।”

मैंने पूछा, “आकाश में आर-पार फैली हुई विशाल दूधिया नदी कौन-सी है? ”

वे चहक कर बोले, “आकाशगंगा! ”

मैंने कहा, “अच्छा इस पहेली का उत्तर बताओ।”

‘एक थाल मोती भरा, सबके सिर पर औंधा धरा,

चारों ओर वह थाल फिरे, मोती उससे एक ना गिरे।”

बच्चे बोले, “आकाश! ”

“अरे वाह, शाबास दोस्तो! ”मैंने कहा और पूछा, “जानते हो किसने लिखी थी यह पहेली? ”

बच्चे चुप। उनकी किताब में लिखा ही नहीं है यह। मैंने उन्हें चुप देख कर कहा, ”उसी लेखक ने यह पहेली भी लिखी है- ‘हरी थी, मन भरी थी, नौ लाख मोती जड़ी थी….’। ”

बच्चे बोले, “मक्का! ”

मैंने उन्हें बताया, “ये दोनों पहेलियां आज से लगभग 700 वर्ष पहले अमीर खुसरो ने लिखी थीं। किसने? ”

वे बोले, “अमीर खुसरो ने।”

मैंने कहा, “जानते हो, हम अपनी कोरी आंख से आसमान में कितने तारे देख सकते हैं? ”

वे उत्सुकता से मेरी ओर देखते रहे। मैंने कहा, “वैज्ञानिकों ने हिसाब लगाया है कि हम अपनी आंख से आसमान में लगभग 8,500 तारे देख सकते हैं! ” फिर उन्हें बताया, “और दोस्तो, जो आकाशगंगा तुम्हें दिखाई देती है, उसमें करीब 6 खरब तारे हैं! ”

बच्चे चकित रह गए। तारे इत्ते सारे!

अंतरिक्ष अड्डे पर हमारा कल्पना अंतरिक्षयान प्रक्षेपण के लिए तैयार हो चुका था। मैंने चालक दल की ओर से घोषणा की, “सौरमंडल की सैर पर चल रहे आप सभी बाल अंतरिक्ष यात्रियों का मैं, कमांडर देवेंद्र मेवाड़ी हार्दिक स्वागत करता हूं। मुझे काउंट डाउन साफ सुनाई दे रहा था- दस, नौ, आठ….तीन, दो, एक, शून्य! और, लो दोस्तो, हमारे यान ने अंतरिक्ष की उड़ान भर ली है।”

हम कल्पना यान की उड़ान में विशाल तपते सूरज के पास पहुंचे। मैंने बाल यात्रियों से मन की आंखें खोल कर सूरज को नजदीक से देखने को कहा। उन्होंने परमाणु भट्टी की तरह धधकते सूरज, उसके काले धब्बों और लाखों किलोमीटर लंबी लपटों को देखा।

फिर हम भीषण गर्मी से तपते बुध ग्रह के पास गए। उसका कोई चांद नहीं था। बच्चों ने जहरीले बादलों से ढके चमकीले शुक्र ग्रह को देखा। अपनी धुरी पर वह उल्टी दिशा में घूम रहा था। उसका भी कोई चांद न देख कर बच्चे उदास हो गए। तब मैं उन्हें पृथ्वी के चंद्रमा के पास ले गया। उन्होंने रूखा-सूखा चांद देखा। वहां विश्राम करते हुए मैंने उन्हें चंद्रमा पर लिखी सूरदास, रामधारी सिंह दिनकर, बालस्वरूप राही, डा. श्याम सिंह शशि और अवनींद्र विनोद की कविताएं सुनाईं और क्षुद्रग्रहों की खतरनाक पट्टी पार कर उन्हें मंगल ग्रह के पास ले गया।

वहां हमने मंगल ग्रह की परिक्रमा करते मंगलयान को देखा। मंगल के दो बैडौल चांद देख कर बच्चे बहुत खुश हुए। फिर हम विशाल ग्रह बृहस्पति के पास गए। वह तो गैसों का गोला था। बच्चों को उसके 63 चांद देख कर बहुत आनंद आया। इतना ही आनंद उन्हें शनि ग्रह के वलयों ओर उसके 61 चंद्रमाओं को देख कर आया। हमने नीले-हरे यूरेनस को भी देखा जो पेट के बल घूम रहा था। नीले नेपच्यून ग्रह के ट्राइटन चांद पर आठ-आठ किलोमीटर की ऊंचाई तक बर्फ की फुहार छोड़ते ‘बर्फमुखियों को देख कर बच्चे चकित रह गए। बर्फमुखी बर्फ उगल रहे थे। ट्राइटन तो जैसे परीलोक ही था। बच्चों ने नेपच्यून के सभी 13 चांद देखे।

आठों ग्रह देखने के बाद हमने प्लूटो, होमीया, इरिस, सेरेस, मेकमेक और सेडेना नामक बौने ग्रह भी देखे। सौरमंडल के सीमांत से लौटते समय हमने लाखों किलोमीटर लंबी पूंछ लहराता एक धूमकेतु भी देखा। हम अपने कल्पना यान को गोली की तरह छूटते उल्का पिंडों से बचाते हुए पृथ्वी के पास लौटे।

बच्चों ने अंतरिख से सुंदर, नीले पृथ्वी ग्रह को देखा। फिर पास आकर भारत देश को भी देखा। सुंदर भारत देश को देखते हुए भारत के प्रथम अंतरिक्षयात्री राकेश शर्मा के शब्द याद आए, “सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा! ”

बच्चों ने सूरज ने लगभग 15 अरब किलोमीटर दूर तक की यात्रा की लेकिन इस यात्रा में उन्हें कहीं भी न कोई तितली दिखाई दी, न पेड़-पौधे, न जीव-जंतु। अपनी धरती पर लौटकर उन्हें लगा कि कितनी अनोखी है हमारी पृथ्वी जहां करोड़ों-करोड़ जीव-जंतु जी रहे हैं। तब हम सबने मिल कर सुर में सुर मिला कर जीवन का गीत गाया- ‘जीवन तेरे रूप अनेक।’

अंतरिक्ष अड्डे पर लौटकर मैंने और रश्मि ने उन सभी प्यारे बच्चों से विदा ली कि दोस्तो फिर मिलेंगे कभी। टाटा!

 

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