उस दुनिया में पांच दिन

डी ए वी सेंटेनरी पब्लिक स्कूल जगजीत नगर हरिद्वार
डी ए वी सेंटेनरी पब्लिक स्कूल जगजीत नगर हरिद्वार

इसी दुनिया में है वह साफ-सुथरी, शांत और सुकून भरी छोटी-सी दुनिया, यह पहले पता नहीं था। पता तब चला जब फेसबुक की डिजिटल दुनिया के मेरे एक अनजाने दोस्त हेमवतीनंदन का फोन मिला, “याद है, एक-डेढ़ साल पहले मैंने एक बार आपको फोन किया था कि विद्यार्थियों से विज्ञान की बातें करने के लिए आपको बुलाऊंगा। आपने ‘हां’ कहा था।”

मैंने कहा, “जी, मुझे याद है।”

“तो बस आप आरक्षण करा लीजिए। आपको हरिद्वार आना है, ” वे बोले।

“लेकिन, यह तो बताइए कि किन विद्यार्थियों से कहां मिलना है? ”

“यहां हरिद्वार के आसपास ही मिलना है। मैंने डी ए वी सेंटेनरी स्कूल, देव संस्कृति विश्वविद्यालय और गायत्री विद्यापीठ में बात कर ली है।”

“लौटना कब है?”

“वह फिर तय कर लेंगे। लौटने का आरक्षण मैं उसी हिसाब से करा दूंगा।”

मेरे लिए बिल्कुल नई जगह, मित्र भी अपरिचित और स्कूल, विद्यार्थी, शिक्षक सभी अपरिचित! ऊपर से धर्म और आस्था की नगरी में निखालिस विज्ञान की बातें। सोच कर रोमांच हो आया। निश्चय किया कि जावूंगा तो जरूर, अपरिचितों की उस अनजान दुनिया में। एक ही लालच था, जिज्ञासाओं से दिपदिपाते विद्यार्थियों से बातें करने का मौका मिलेगा। हेमवती से बात की। कहा, “बच्चों को सौरमंडल की सैर कराऊंगा, मंगल ग्रह तक मंगलयान की रोमांचक यात्रा के बारे में बताऊंगा और विज्ञान कथा सुनाऊंगा।

मन में यह सब और पीठ पर अपना रकसैक लाद कर यात्रा पर रवाना हुआ। अल-सुबह रेडियो टैक्सी से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और वहां से शताब्दी का आरामदेह सफर करके हरिद्वार। मेरे अपरिचित मित्र का कहना था कि फिक्र मत कीजिएगा, वहां स्टेशन पर कोई न कोई आपको लेने आ जाएगा। मैंने सोचा, जाहिर है वह भी कोई अज्ञात अपरिचित ही होगा! हरिद्वार पहुंचते-पहुंचते फोन मिला, “मेवाड़ी जी बोल रहे हैं? ”

“जी, बोल रहा हूं।”

“नमस्कार, मैं पी सी पुरोहित बोल रहा हूं, प्रिंसिपल डी ए वी सेंटेनरी पब्लिक स्कूल, जगजीत नगर। हेमवती जी ने बताया था आपके बारे में। हरिद्वार स्टेशन से कितनी दूर हैं? ”

“बस पहुंचने ही वाला हूं।”

“वहां ड्राइवर गाड़ी लेकर खड़ा है। आपको यहां हमारे पास आना है।”

सौरमंडल की सैर से पहले प्रिंसिपल श्री पुराहित और मैं
सौरमंडल की सैर से पहले प्रिंसिपल श्री पुराहित और मैं

जब तक ड्राइवर का नाम पूछूं, फोन कट गया। सोच ही रहा था कि ड्राइवर को कैसे पहचानूंगा कि फोन पर एस एम एस आ गया, ‘ड्राइवर भोपाल, गाड़ी नं. यू के 3091 । उसे आपका नंबर दे दिया है।’ स्टेशन आया। भूपाल को फोन मिलाया और बात करते-करते गाड़ी तक पहुंच गया। वह मेरा सामान उठाने लगा तो उसे अपना नियम बताया कि अपना बोझ मैं स्वयं उठाता हूं। खैर, भोपाल के साथ स्टेशन से सात-आठ किलोमीटर दूर जगजीतनगर, कनखल में डी ए वी सेंटेनरी पब्लिक स्कूल के हरे-भरे परिसर में पहुंचे।  प्रिंसिपल पुरोहित जी से पहली बार मिला, लेकिन दस-पंद्रह मिनट की बातचीत के बाद ही लगने लगा जैसे एक अरसे से जानता हूं उन्हें।

बातों-बातों में पता लगा कि उनका यह विद्यालय डी ए वी के शताब्दी वर्ष 1986 की देन है जब इसे हरिद्वार के वैदिक मोहन आश्रम में शुरू किया गया था। 1995 से यह जगजीतनगर के इस परिसर में चल रहा है। कभी जहां इस विद्यालय में केवल 63 विद्यार्थी पढ़ रहे थे, आज 3,430 विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। विद्यालय लगभग 8 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। उत्तराखंड के पहाड़ों में जहां कहा जाता है कई विद्यालयों में शिक्षक ही नहीं हैं या दो-एक शिक्षक ही पूरा स्कूल संभाल रहे हैं, वहीं यहां डी ए वी सेंटेनरी पब्लिक स्कूल में शिक्षक वर्ग के 108 स्टाफ सदस्य हैं, जान कर बहुत खुशी हुई। खुशी इस बात से भी हुई कि विद्यालय के पुस्तकालय में 10,275 पुस्तकें हैं और बच्चों के पढ़ने के लिए 40 पत्रिकाएं तथा 7 अखबार आते हैं।

चारों ओर की हरियाली और चींटियों की तरह सहज रूप से चलते विद्यार्थियों की अनुशासित कतारें देख कर मन बार-बार बचपन में लौटता और उन बच्चों की कतारों में शामिल होने के लिए मचलता रहा। तभी प्रिंसिपल पुरोहित जी ने कहा, “दीवाली के अवसर पर बच्चों ने ‘दीवाली हाट’ लगाई है। आप हाट देखेंगे तो बच्चे खुश हो जाएंगे।”

मैंने कहा, “खुशी तो मुझे होगी बच्चों से मिल कर। चलिए, कहां चलना है।” वे मुझे स्कूल के बड़े हाल में ले गए। बच्चों की लगाई उस हाट को मैं देखता ही रह गया- कहीं दीपावली के मिट्टी के दीए सजे थे तो कहीं रंग-बिरंगी मोमबत्तियां। कहीं बालिकाएं हाथों पर मेंहदी रचा रही थीं तो कहीं कंदीलें सजी थीं। मंच पर रामलीला के सभी मुख्य पात्र सजे-धजे विराजमान थे तो एक ओर राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बने विद्यार्थी पटाखों के बहिष्कार का संदेश दे रहे थे। बच्चों ने मुझ अतिथि के माथे पर तिलक-अक्षत लगाए तो मन भावुक हो उठा। उन्हें शुभकामनाएं देकर अतिथि गृह के कमरे में चला आया।

सांझ के समय प्रिंसिपल पुरोहित जी के साथ लंबे-चौड़े खेल के मैदान में चहलकदमी की और परिसर में उगे हरे-भरे पेड़ों के बारे में पूछता रहा। वे हर पेड़ के बारे में कुछ इस तरह बताते रहे जैसे वे भी उनके विद्यार्थी हों, जिन्हें विद्यालय में एडमिशन देकर लगातार उनकी प्रगति पर नजर रख रहे हों। मैंने उन्हें एक छात्रा को माता-पिता की उपस्थिति में धीरे-धीरे समझाते हुए चुपचाप सुन लिया था कि माता-पिता ने तो तुम्हें जन्म दिया है, स्कूल में तुम्हारे पिता हम हैं। तुम्हारी प्रगति को देखना और तुम्हें सही रास्ता दिखाना हमारी जिम्मेदारी है। पेड़ों के बारे में भी वे कुछ इसी भाव से बातें कर रहे थे।

“ये देखिए, रूद्राक्ष के पेड़। वनस्पति विज्ञान की भाषा में ‘इलियोकार्पस’। इन्हें हम पतंजलि योगपीठ से लाए।” मैं बड़ी ललक के साथ उन दोनों पेड़ों को देख रहा था क्योंकि रूद्राक्ष के पेड़ मैंने पहली बार वहीं देखे। पुरोहित जी ने उनमें से एक पेड़ पर लगे हरे गोल फल भी दिखाए। पास में ही अमलतास और छतीन भी खड़े थे। सामने उस पार अशोक के पेड़ों की हरी-भरी कतार के साथ खड़े दो चीड़ के पेड़ दिखाई दिए। मैदान के दूर दाहिने किनारे पर बांस की गाछ झूम रही थी। देर शाम मालती के फूल खुशबू बिखेर कर रात्रिचर कीटों को परागण के लिए आमंत्रित करने लगे थे। मैदान के बाएं किनारे पर धीर-गंभीर युवा बरगद खड़ा था जिसे संवेदनशील प्रिंसिपल साहब ने धावकों के ट्रैक से हटाया नहीं था, यह सोच कर कि प्यारे बच्चो, बरगद को काटने के बजाए उसकी बगल से निकल लो। बरगद भी तुम्हारी दौड़ देखता रहेगा!

विद्यालय के परिसर में पीपल, बकाइन, सागौन, छतीन, हिना, सिल्वर ओक, करीपत्ता, सिरिस, जामुन, बेल, अमलतास, गुलमोहर, प्राइड आफ इंडिया, बाटल ब्रश के पेड़ों के साथ ही खुशबू बिखेरती रातरानी भी लगी हुई थी। श्यामा और गौरी तुलसी के घने पौधे गमलों की शोभा बढ़ा रहे थे।

शाम ढली और छात्रावास के 40 विद्यार्थी विज्ञान कथा सुनने के लिए हाल में आकर बैठ गए। तभी मेरे अनजाने मित्र हेमवतीनंदन भी मिलने आ गए। उन्हें साथ लेकर हम कहानी सुनाने चल पड़े। उन बच्चों को मैं प्रकृति के विनाश और धरती से विदा हो रहे जीवों की दर्दभरी कहानी सुनाना चाहता था। इसलिए अपनी विज्ञान कथा ‘लौटे हुए मुसाफिर’ सुनाई। कहानी सुनाते-सुनाते उनसे कहा कि पहले हमारे देश में चारों ओर भरपूर और घनघोर जंगल थे। उनमें लाखों जीव रहते थे। जंगल कटे, शहर बने और आज हम चिड़ियाघरों में उन चंद बचे हुए जीवों को देख रहे हैं। मैंने उनसे पूछा, “दोस्तो, जरा सोचो, कल क्या होगा?” वे सोचते रहे और मैं अपनी कल्पना में उन्हें पच्चीस-तीस वर्ष बाद के एक चिड़ियाघर में ले गया, जहां आज के तमाम पशु-पक्षी थे, लेकिन वे सभी मशीनी पशु-पक्षी थे। उदास बच्चे वर्तमान में वापस लौटे तो भविष्य की कल्पना करके सिहर उठे। उन्होंने संकल्प किया कि वे जंगलों को बचाएंगे, जीव-जंतुओं को बचाएंगे।

पुरोहित जी ने पूछा, “क्या शाम को आसपास कुछ देखना चाहेंगे? कहीं दर्शन करना चाहेंगे?” मैंने कहा, “मैं केवल गंगा, प्रवासी पक्षियों, जीव-जंतुओं या पेड़-पौधों के दर्शन करना चाहूंगा। इनमें से जो भी मिले। शाम के धुंधलके में पुराहित जी के साथ गंगा किनारे हरि की पौड़ी की ओर निकले। लेकिन, कौन-सी गंगा? वहां सफाई के कारण बैराज से ही गंगा का पानी रोक दिया गया था। इसलिए जगमगाते बल्बों की पीली रोशनी में हरि की पौड़ी के घाटों पर आर-पार पड़ा वह बजबजाता कचरा ही दिखा जो गंगा मां के श्रद्वालुओं ने उसकी गोद में भर दिया था। वह सब देख कर मन उदास होना ही था, हुआ। वहां से निकल कर हम डी ए वी मोहन आश्रम में गए जहां हरिद्वार आने वाले लोगों को आश्रय मिलता है। आश्रम में एक पब्लिक स्कूल भी चलता है। देर शाम वापस लौटे।

रास्ते में पुराहित जी ने पूछा, “आप प्रवासी पक्षियों की बात कर रहे थे? ”

मैंने कहा, “हां, मैंने पढ़ा है कि यहां नीलधारा पक्षी विहार में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं। उनसे मिलने का बड़ा मन है।”

उन्होंने कहा, “आप सुबह-सुबह नीलधारा जा सकते हैं। वहां जाने का प्रबंध हो जाएगा।”

ठंडी हवा में सुबह 5 बजे सारथी विनोद और राजू के साथ नीलधारा में गंगा की निर्मल धारा देखने निकला। सोचा, वहीं पक्षी विहार का पता पूछ लेंगे। विनोद सन्यास मार्ग से होकर गंगा बैराज तक ले गया। रास्ते में उसने बताया कि तमाम सन्यासी यही गंगा के तट पर अपने अखाड़ों में रहते हैं। हम कुछ देर गंगा बैराज पर घूमे, फिर पुल पार करके पक्षी विहार के बारे में पूछताछ की। पर इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं था। राजू ने ही अनुमान लगाया कि जाड़ों में बहुत चिड़ियां गंगा किनारे आ जाती हैं, शायद वे ही होंगी जिनके बारे में आप पूछ रहे हैं। बाद में पता लगा, दीपावली के बाद ठंड बढ़ जाने पर नीलधारा के आसपास बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आ जाते हैं। मन मायूस हुआ कि वे विदेशी मेहमान नहीं मिले। बस, चार-पांच बगुले रेत में दम साधे खड़े थे।

नीलधारा में सूर्योदय
नीलधारा में सूर्योदय

विनोद और राजू धोबीघाट की ओर चले। वह बहुत खुली और साफ-सुथरी जगह थी। कुछ लोग सुबह की सैर पर आ रहे थे। किनारे पथरीले ढलान पर कई कव्वे और कुछ कुत्ते खुशनुमा सुबह का आनंद ले रहे थे। तभी, पूर्व में चंडीमंदिर की पहाड़ी के पीछे सुनहरी उजास बढ़ती गई और लो, स्वर्णिम किरणें बिखेरता सूरज निकल आया! सूरज ने गंगा के पानी में झांका। मैंने उन क्षणों को अपने कैमरे में कैद कर लिया। आसपास की हरियाली की दी हुई प्राणवायु में कई बार गहरी सांसें लीं। दूसरी ओर मैदान में गाएं, भैंसे चर रही थीं। राजू ने कहा, “जब केदारनाथ में बाढ़ आई थी तो गंगा में बह कर आए कई शव इस मैदान में भी बिखर गए थे। उन्हें देखा नहीं जा सकता था। मां कस कर बांहों में बच्चे को पकड़े हुए….दर्दनाक दृश्य था।” हम सोचते हुए चुपचाप डी ए वी परिसर में लौट आए।

सुबह कतारों में खड़े विद्यालय के हजारों बच्चों की प्रातःकालीन प्रार्थना सभा को देखना एक अद्भुत अनुभव था जिसमें बच्चे दैनिक समाचार सुनाने के साथ-साथ सामायिक विषयों पर अपने विचार भी व्यक्त कर रहे थे।

सौरमंडल की सैर पर विद्यार्थी
सौरमंडल की सैर पर विद्यार्थी

मैंने देखा, 11.30 बजे हाल में आठवीं कक्षा के 250 बच्चे मेरे साथ सौरमंडल की सैर पर जाने के लिए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं प्रिंसिपल सर के साथ हाल में पहुंचा और सौरमंडल में उड़ान भरने से पहले बच्चों को सहज बनाने के लिए उनके साथ तारों भरे आसमान और आकाशगंगा के बारे में बातचीत की। उनसे अमीर खुसरो की पहेली पूछीः              “एक थाल मोती भरा, सबके सिर पर औंधा धरा।

चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।।”

कुछ बच्चे समझ गए। बोले, आसमान। मैंने पूछा, क्या अनुमान लगा सकते हो कि हम कोरी आंख से आसमान में लगभग कितने तारे देख सकते हैं? वे जिज्ञासा से देखते रहे। मैंने बताया, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि कोरी आंख से हम लगभग 8500 तारे देख पाते हैं! और पूछा, “अच्छा दोस्तो, यह बताओ हमारी आकाशगंगा में कितने तारे हैं? ”

ओशो और कुछ अन्य विद्यार्थियों ने कहा, “करीब 600 बिलियन”

उन्हें शाबासी देकर मैंने बताया कि हमारी आकाशगंगा में लगभग 6 अरब तारे हैं। उनमें से एक हमारा प्यारा तारा है। “कौन-सा है वह तारा?” मैंने पूछा तो सभी बच्चे बोले, “सूर्य”।

अब वे सौरमंडल की सैर के लिए तैयार थे। मैं उन्हें कल्पना-यान पर सूर्य के पास ले गया। उसे नजदीक से देखा, उसके बारे में जाना और फिर सौरमंडल के ग्रह-उपग्रहों की ओर आगे बढ़े। पहले बुध, फिर शुक्र, पृथ्वी, मंगल, क्षुद्रग्रहों की पट्टी, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून। हमने अपनी इस यात्रा में पांच बौने ग्रह यानी प्लूटो, ईरिस, सेरेस, हौमीया, मेकमेक और सेडना को भी देखा। बर्फीली गेंदों की कुइपर पट्टी और ऊर्ट बादल भी देखा। हमें प्लूटो की ओर जाता हुआ ‘न्यू होराइजंस’ अंतरिक्ष यान और मंगल ग्रह की परिक्रमा कर रहा अपना मंगलयान भी देखा। वापसी में हमें बहुत दूर तक धूमकेतु भी दिखाई दिया। गोली की तरह तेजी से गिरती उल्काएं भी दिखाई दीं।

पृथ्वी पर लौटते समय जब हमें अंतरिक्ष से अपना भारत देश दिखाई दिया तो मैंने उन बच्चों से पूछा, “दोस्तो, जरा बताओ, कैसा दिखाई दे रहा है हमारा प्यारा देश? ”

कुछ बच्चों ने तपाक से भारत के अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा के शब्द दुहरा दिए, “सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा! ”

मैंने पूछा, “दोस्तो, हम सौरमंडल के सीमांत तक की सैर कर आए। क्या पूरे सौरमंडल में तुम्हें कहीं कोई तितली, कोई चिड़िया, कोई फूल, पेड़-पौधे दिखाई दिए? ”

“नहीं” बच्चे एक साथ बोले।

“तो दोस्तो, देखो, हमारी यह पृथ्वी कितनी अनोखी है। इसमें जीवन की धड़कन है, यहां लाखों-करोड़ों जीव-जंतु हैं, हम हैं। आओ, इस खुशी में जीवन का गीत गाएं।”

कल्पना अंतरिक्षयान से उतर कर सभी बच्चों ने मेरे सुर में सुर मिला कर जीवन का गीत ‘जीवन तेरे रूप अनेक’ गाया और फिर कतार बांध कर वे अपनी कक्षाओं में चले गए।

मंगल और मंगल यान की यात्रा का आनंद लेते विद्यार्थी
मंगल और मंगल यान की यात्रा का आनंद लेते विद्यार्थी

विद्यालय में मेरा अगला सत्र था- मंगलग्रह और मंगलयान। श्रोता थे विज्ञान विषय के नवीं और दसवीं कक्षा के 90 विद्यार्थी और विज्ञान शिक्षक-शिक्षिकाएं। सभी श्रोताओं को मैं मंगलग्रह के पास ले गया, उन्हें मंगल की कुशल मंगल बताई। रूखे-सूखे मंगल ग्रह की लाल-गेरुई रेत-बालू और धूल भरी आंधी के साथ-साथ हमने उसके धु्रवों पर जमी बर्फ की टोपियां देखीं। सौरमंडल का सबसे ऊंचा पहाड़ ओलिंपस मोंस और गहरी घाटियां तथा मैदान भी देखे। जब बच्चे मंगल ग्रह को देख रहे थे तो मैंने उन्हें युवा कवि राकेश रोहित की कविता ‘मुझे लगता है मंगल पर एक कविता धरती के बारे में है’ सुनाई। और, जब वे मंगल के दो चांद देख रहे थे तो कविता में सौरमंडल के पर्यटन पर निकले कवि कुमार अंबुज की वे पंक्तियां भी दुहराईं कि ‘सोचते हुए खरामा-खरामा पहुंचा मंगल ग्रह पर/वहां मुझे दो चंद्रमा मिले जिन्होंने किया स्वागत!’

और, फिर बच्चों के साथ पृथ्वी पर इसरो के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के पास लौटा। हमने मंगलयान का निर्माण, उसका प्रमोचन और मंगलग्रह तक की 300 दिन की लंबी यात्रा देखी। मंगलयान को मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित होते हुए देखा। मैंने बच्चों से विदा ली, आत्मीयता के साथ मिला शाल और विद्यालय के माली के स्नेह की डोरी से बंधा गुलदस्ता उठाया, प्रिंसिपल पुरोहित जी के साथ चाय पी और फोन सुना।

मित्र हेमवतीनंदन का फोन था। उन्होंने बताया, “आपको अब देव संस्कृति विश्वविद्यालय में जाना है। वहां से फोन आएगा। फोन आया, “मैं सांभवी बोल रही हूं। आप विश्वविद्यालय के गेट पर आएंगे तो आपको वहां से हमारे लोग अतिथि गृह में पहुंचा देंगे। आपको वहीं रूकना है।”

“आप? ” मैंने पूछा।

“मैं कोआर्डिनेटर हूं।”

“धन्यवाद सांभवी जी।”

पुरोहित जी ने मुझे विनोद और राजू के साथ देव संस्कृति विश्वविद्यालय पहुंचा दिया। वहां गगन देशमुख मौजूद थे। वे मुझे अतिथि गृह में ले गए।

 

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