आंगन की बगिया में जीवन की हलचल

Harsingar Flowers

सुबह छह बजे बुलबुल की ई…क्विं…क्विं की मधुर आवाज से नींद खुली। मैं बालकनी में आ खड़ा हुआ। सामने हरियाली का छोटा-सा संसार दिखा। उसे देखता रहा। गौर से। बिल्कुल सामने हरे गलीचे की तरह फैला हुआ बड़ा चौकोर पार्क। चारों कोनों पर एल्स्टोनिया के घनी पत्तियों से घिरे चार पेड़। आंखों की सीध में तीन सिल्वर ओक के ऊंचे पेड़, जिनमें से सबसे ऊंचे पेड़ की चोटी पर एक कौवा दंपति ने अपना घर बसाया है। घूम-फिर कर घोंसले में आते रहते हैं। दांई ओर भी सिल्वर ओक के दो पेड़ हैं। उनके पीछे दूसरे पार्क के अमलतास खड़े हैं। नीचे, दस पेड़ कुसुम के हैं जिनकी शाखों की फुनगियां इन दिनों सुर्ख लाल पत्तियों से सजी हुई हैं। इस कतार की शुरूआत में बरगद का पेड़ है जिस पर इन दिनों लाल-लाल कोंपलें और नई पत्तियां निकल रही हैं। हवाई जड़ों का जटा-जूट धीरे-धीरे बढ़ रहा है। गेट के बांई ओर शहतूत का पेड़ है जिसके फल कुछ समय पूर्व पक चुके हैं। मैंने सबसे पहले इसी पेड़ पर बुलबुल को देखा था।

हरियाली की इस कतार में केले के भी तीन गाछ हैं। बीच के गाछ में एक पेड़ पर लंबा पुष्प वृंत्त निकल आया है। मांसल पंखुड़ियों से ढका फूल खिलने वाला है। कतार में बांई और दांई ओर एक-एक अमलतास का पेड़ है। मई-जून में इन पर फूलों के पीले झुमके लटके थे। इन दिनों नई, हरीभरी पत्तियों से भर गए हैं। दांई ओर के अमलतास  पर मालती को प्यार उमड़ आया है। उसकी बेल तने से लिपट कर यहां-वहां होती हुई चोटी तक बढ़ आई है। अमलतास की शाखों के बीच में कहीं-कहीं उसके लंबे पतले लाल-सफेद फूलों के गुच्छे सज गए हैं। इन दिनों शाम ढलने के बाद मालती के गुच्छों की अनखिली सफेद कलियां खिलने लगती हैं और सायंकालीन बयार के झौंकों को अपनी भीनी-भीनी सुगंध से भर देती हैं। सुबह सूर्य की किरणें उनमें लाल रंग भर देती हैं। हर खिली कली लाल हो जाती है। मालती की एक लंबी बेल दूसरी ओर जीने के साथ-साथ ऊपर छत तक फैल गई है। इसे बुजुर्ग भटनागर जी ने अपने हाथों से लगाया है। मैंने ऊपर की ओर हवा में अपनी पतली नाजुक बांहें फैलाती मालती को रस्सी का सहारा दिया। वह खुश होकर ऊपर बढ़ती चली आई। जीने के आसपास उसके फूलों के गुच्छे लटके हुए हैं जो शाम को खिल कर खुशबू बिखेरते हैं। वर्षों पहले खुशवंत के कालम विद मेल्इस का वन एंड आल  में मालती का किस्सा पढ़ कर इसका लैटिन नाम याद हो गया था। शायद यह सही होगा। किस्से के अनुसार वनस्पतिशास्त्री ने लैटिन भाषा में किसी से पूछा, ‘‘इस बेल का नाम क्या है?’’ यानी ‘‘क्विस क्वेलिस’  सुनने वाले ने कुछ न समझ कर दुहराया, ‘‘क्विस क्वेलिस?’’ वनस्पति विज्ञानी ने नाम लिख लिया, ‘क्विस क्वेलिस’ । आज भारत की इस खुशबूदार बेल का वानस्पतिक नाम है-क्विस क्वेलिस इंडिका!

‘‘भारत की संपदा’ विश्वकोश देखने पर पता लगा कि हमारी आज की यह मालती या माधवी लता ही क्विस क्वेलिस इंडिका है। इसे पहले रंगून की बेल भी कहते थे। गुजरात में यह बारमासी बेल कहलाती है और महाराष्ट्र में रंगूनाचा बेल अथवा बारमासी। तेलगू भाषा में भी यह रंगोनीमल्ले ही कहलाती है। कहते हैं, मालती का जन्म हिंद-मलेशिया क्षेत्र तथा अफ्रीका में हुआ। (अभी उठ कर गया और मालती की बेल तथा फूलों के गुच्छों को छू कर आ गया।)

जीने की मालती के सामने और इधर-उधर दोनों ओर हरसिंगार के पेड़ हैं। इनमें से मालती के पास का हरसिंगार खिलने वाला है। सुबह-सुबह इसके नीचे गिरे नलिकार सफेद फूल दिखाई देते हैं। बाकी तीनों पेड़ अभी प्रतीक्षा कर रहे हैं। ये सभी अक्सर अगस्त-दिसंबर के दौरान खिलते हैं। हरसिंगार को संस्कृत में पारिजात और शेफालिका कहा गया है। इसका जन्म भारत में हुआ।

अभी कुछ माह पहले अप्रैल-मई में इसकी पत्तियां झर गई थीं लेकिन इन दिनों चारों हरसिंगार हरीभरी पत्तियों से भर गए हैं। पत्तियां यह इस तरह गिरा देता है रात में, जैसे पुराने वस्त्र उतार कर फेंक देता हो। शाम को पेड़ तले कुछ नहीं और सुबह पत्तियां बिछी हुईं!

मालती की तरह हरसिंगार भी शाम घिरने पर खिलने लगता है। खूब खुशबू बिखेरता है और पौ फटने पर उसके फूल झड़ जाते हैं। जब खूब फूल गिरने लगेंगे तो हम उन्हें अंजुरी में बटोर कर कांच की प्लेट में अपने बैठक-खाने में सजा देंगे।

जीने की मालती के बांई ओर आजकल रातरानी भी खिली हुई है। लिट से जाने वालों को तो पता नहीं, जीने की सीढ़ियां चढ़ने वालों को यह अपनी सुगंध की सौगात सौंपती है।

मैं फिर बालकनी पर आ खड़ा हुआ हूं। केले और कुसुम की कतारों के बीच बांई ओर एक अनार का पौधा भी झूम रहा है।

लो, अब बादलों की ओट से सूरज मुस्कुरा उठा है। थोड़ी देर बादलों के साथ आंख मिचैनी खेलने के बाद वह साफ चमकने लगा है। बादल भी यहां वहां भटक रहे हैं। हवा के हलके झौंके आ रहे हैं। हो सकता है, देर दोपहर बारिश आ जाए। देखते-देखते न जाने कहां से तितलियां आ गई हैं। शायद वे समझ गई हैं कि सूरज चमका है तो फूल खिल उठेंगे और उन्हें पराग मिल जाएगा। यों, हलकी हवा भी सुखद लग रही होगी। वे नन्हीं पतंगों की तरह हवा में इधर से उधर, ऊपर-नीचे चपलता से चक्कर लगा रही हैं। हल्के पीले रंग की तितलियों की तादाद अधिक है। दो-एक नीले, पीले, भूरे रंग के डिजायन से सजी-संवरी हैं।

मैनाएं सुबह से ही चु र्र र्र…चुर…चुर्रर्र…चुर…रोडियो…रोडियो की आवाज में चहक रही हैं। आसमान फिर बादलों से घिर उठा है। सामने चौकोर पार्क में दो दिन पहले ही ‘मोवर’ से दूब काटी गई है। उसमें चुगने के लिए भूरे रंग की चिड़ियों का झुंड आ चुका है। एक चिड़िया सतर्क होकर आसपास नजर रखती है। शायद वह प्रहरी है। बाकी मन लगा कर चुग रही हैं। नजर रखना बहुत जरूरी है क्योंकि सोसायटी में बिल्लियां भी कई हैं। हमारी और सामने की सोसायटी की छत पर से कबूतर पंख फटफटा कर कभी गोता लगा रहे हैं तो कभी सीधी उड़ान भर रहे हैं। अभी-अभी सामने की नीची छत पर एक फाख्ता आकर बैठ गया है। उसके सामने कुछ कबूतर चुग रहे हैं।

कुसुम के पेड़ पर अचानक बुलबुल आ बैठी। उसकी शाखा पर बैठे-बैठे उसने चोंच इधर-उधर घिसी। वहां से उड़ कर अमलतास के भीतर जा बैठी। लेकिन, तभी कुसुम पर उसी जगह दूसरी बुलबुल आ गई। कुछ देर बैठ कर हिली-डुली और फिर वह भी अमलतास  की शाखा पर जा बैठी। मैं उन्हें देख ही रहा था कि कुसुम पर फिर एक छोटी-सी बुलबुल आ बैठी। वह भी अमलतास  पर जा बैठी तो फिर एक छोटी-सी बुलबुल आ गई। वह उड़ी तो फिर एक आ गई। माजरा समझ में आ गया। पहली दोनों बुलबुलें माता-पिता हैं और बाद के तीनों बच्चे हैं। यह रेड वेंटेड बुलबुलों का परिवार है। काला सिर जैसे ‘बायकट’ बालों में लग रहा है। काली चोंच, भूरे पंख और पूंछ के नीचे लाल धब्बा।

अमलतास  पर लिपटी मालती के फूलों पर दर्जिन भी फटक रही है। यह फुटकी ठीक ही कहलाती है। जैतूनी भूरे रंग की यह दर्जिन चैन से नहीं बैठती। पूंछ लंबी नुकीली है जिसे सीधे ऊपर उठा रही है। एक बार भीतर गया तो मैंने देखा यह गमलों के पास बालकनी की मुंडेर पर आकर बैठ गई। पूंछ उठा कर चहकी‘‘टोविट…टोविट…टोविट’ और फिर जोर से ‘प्री टी टी टी’ चहक कर तेजी से उड़ गई। फुलचुही दिन में कई बार हरसिंगार और अमलताश-मालती पर‘‘चिक…चिक…चिक’ करके फुदकती दिखीं। पीछे की बालकनी में लटका लैंप शेड तो गौरयाओं का घर ही बन गया है। आज भी गौरेया दंपति दिन भर घोंसले के तिनके सहेजता रहा।

आज का दिन इन्हीं सब पेड़-पौधों और पक्षियों के नाम रहा। कुसुम की शाखा से दो काले, सिंदूरी पंखों वाले गुबरैले हेलीकाप्टर की तरह उड़ान भर रहे हैं।

दिन ढल रहा है। कौवा दंपति घूम-फिर कर सिल्वर ओक की चोटी पर लौट आया है। कबूतर छतों और खिड़कियों के आसपास अपनी रात्रि विश्राम की जगहों पर जा रहे हैं। सुबह सूरज निकलेगा और फिर जीवन की हलचल शुरू हो जाएगी।

शाम के धुधलके में चमेली के सफेद फूल चमकने लगे हैं। हरेभरे पेड़ों की कतार में एक पेड़ चमेली यानी ‘पगोडा ट्री’ का भी है। इसके बाकी पांच पेड़ सामने सोसायटी की इमारत के साथ लगे हुए हैं। पिछले पांच-छह महीनों से ये नंगे खड़े थे। वर्षा षुरू हुई तो इन पर भी तेजी से बड़ी-बड़ी लंबी पत्तियां निकल आईं। चमेली ‘गुल-ए-चिन’ न जाने क्यों कहलाती है। जन्मभूमि तो इसकी मैक्सिको और ग्वाटेमाला है। फूलों से मीठी सुगंध फूटने लगी होगी।

मालती और रातरानी के फूल खिल चुके हैं। रात में गुलशन की सैर पर आने वाले कीट-पतंगे इन फूलों पर मंडराने लगेंगे।

चलूं। इन्हें गुलशन की सैर करने दूं।

 

 

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