आओ गौरेया, आओ-1

 

 आज कई गौरेयाओं के चहचहाने के साथ सुबह हुई। मेरी बालकनी की मुंडेर उन्हें काफी पसंद है। चंद गमलों में लगे नीम के एक पतले पौधे,  बोगनवेलिया, लिली, तुलसी, गुलदाउदी और गुलाब के गिने-चुने पौधों के गुलशन में उन्हें मिट्टी के कटोरों में दाना-पानी भी मिल जाता है। वे दिन में कई बार पत्थर की मुंडेर पर आकर चहचहाती रहती हैं। एक-दूसरे का पीछा करती हैं और पौधों,  गमलों व बालकनी में लगी लोहे की छड़ों के आगे-पीछे निकल कर आंखमिचौनी भी खेलती हैं।

काश मैं भी इनकी बातें समझ सकता! न जाने क्या-क्या बोलती रहती हैं – चििड्क्….चििड्क्….चीं! और भी न जाने क्या-क्या। दिन में जब मैं यह लिख रहा हूं, तब भी वे मुंडेर पर आ-आ कर बातें कर रही हैं। अगर मैं उनकी भाषा जानता तो उन्हें बताता कि 20 मार्च को उन्हें प्यार और दुलार देने के लिए विश्व गौरेया दिवस, मनाया जाएगा। साथ रहते-रहते सदियां बीत गईं, मगर अब वे जरूर सोचती होंगी कि आखिर हो क्या गया है आदमी को? अच्छा भला हरियाली में रहता था, शुद्ध हवा में सांस लेता था। ईंट-पत्थर या घास-फूस के घरों में रहता था। इसके घरों में हम भी अपने घोंसले बना लेती थीं। इसके घर-आंगन में अनाज के दाने चुग लेती थीं। आसपास बहता पानी पी लेती थीं।

लेकिन, धीरे-धीरे इसकी दुनिया ही बदल गई। कंक्रीट की ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने लगा यह। न उनमें कोई छेद, न दरार। घोंसला बनाएं भी तो कहां? यह खुद घोंसलों में रहने लगा है!

अगर गौरेयां ऐसा सोच रही होंगीं तो कुछ गलत नहीं सोच रही होंगीं। जिस बालकनी में वे चहचहा रही हैं वह मेरे घोंसले की बालकनी है। सोसाइटी के इस अपार्टमेंट में साठ घोंसले हैं। उनमें से एक घोंसला मेरा भी है। यह तो इन पंछियों का प्यार है कि ये यहां भी हमें जगाने और अपने गीत सुनाने आ जाती हैं अन्यथा तो केवल घूमते पंखे की चूं-चूं या मिक्सी की घुर्र र्र र्र सुनाई देती रहे।

घोंसले की बात पर अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई। सुनाऊं?

महानगर के महाकाय वृक्ष की

चैतरफा फैली हुई शाखों पर

सीमेंट और कंक्रीट और ईंट

और गारे और लोहे की सलाखों से

बया की तरह राज-मजदूरों की

अंगुलियों से बुने हुए

घोंसलों में,

यायावर परिंदों से रहते हैं हम।

कितना फर्क है उनकी और

हमारी दुनिया में।

उनके लिए घर होता है

एक समूचा जीता-जागता पेड़

चिचियाते चूजे और कूजते कुनबे के साथ

कलरव भरा भरपूर संसार!

मगर महानगर के महावृक्ष में

कंक्रीटी घोंसलों में घिरी

कर्कश  कोलाहल भरी

अकेली दुनिया है हमारी,

निपट अकेली।

यायावर पंछी उड़ जाते हैं

पहाड़ों और पहाड़ों और पहाड़ों

के पार।

मगर हम नहीं कर पाते हैं पार

अपने कंक्रीटी घोंसलों की

चारदीवार।

केवल सपनों के पंखों पर उड़ता है-

हमारा मन-पाखी,

इन दीवारों के पार

उन दीवारों के पार।

लो, इतनी देर में देखते ही देखते दो गौरेयां सूखी मिट्टी भरे मेरे गमले में धूल-स्नान भी कर गईं। चुपके से मुझे लिखते हुए देखा। देखा, मुझसे कोई खतरा नहीं है। गौरेया आई, गमले में उतरी और बीच-बीच में सिर उठा कर देखते हुए जम कर धूल-स्नान कर गई। वह हलके भूरे रंग की मादा थी। शायद उसी ने बताया हो, उसके बाद नर गौरेया आ गई। सिर, चौंच से लेकर छाती तक काली। भूरी पीठ पर काली लकीरें। उसने भी पहले भांपा, फिर गमले में उतर कर धूल-स्नान कर लिया।

हलकी पड़ती धूप उस पार इमारतों की ऊपरी मंजिलों पर चमक रही है। कुछ देर में सूरज ढल जाएगा। गौरेयां भी बालकनी से उड़ कर पहले अमलताश  के गाछ में छिप कर चहचहाईं और फिर एक-दूसरे का पीछा करते हुए दूसरी ओर उड़ गईं। सुबह आकर वे फिर चहचहाएंगी।

कल का दिन आप कैसे बिताएंगे गौरेयाओं के साथ, बताइएगा।

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