मंदसौर में विज्ञान- देवेंद्र मेवाड़ी

(शांत बहती शिवना नदी के निर्मल जल, उसके तट पर खड़े प्राचीन पशुपतिनाथ मंदिर में गूंजते घंटे-घड़ियालों और शंखों की ध्वनि, हरे-भरे पेड़ों और चहचहाते पक्षियों की यादें लेकर तीन दिन बाद मंदसौर, मध्य प्रदेश से लौटा हूं।

अचानक ही जाना हुआ वहां। 7 सितंबर को रात में माधवराव सप्रे समाचारपत्र संग्रहालय तथा शोध संस्थान, भोपाल के संस्थापक-संचालक विजयदत्त श्रीधर जी का फोन आया, “श्रीधर बोल रहा हूं भोपाल से। 28 अक्टूबर को मंदसौर में लोकप्रिय विज्ञान संचार कार्यशाला आयोजित कर रहे हैं। आप आएंगे तो आनंद आ जाएगा।”

मैंने पूछा, “कहां, मंदसौर में? ”

वे बोले, “हां। मंदसौर राजस्थान से लगा मध्य प्रदेश का एक जिला है।”

“वही, जो अफीम की खेती के लिए प्रसिद्ध है? ”

22“हां वही, लेकिन वह अफीम की खेती के लिए ही नहीं बल्कि अपने प्राचीन पशुपतिनाथ के मंदिर, शिवना नदी और पुरातात्विक खोजों के लिए भी प्रसिद्ध है। वहां के राजा यशोधर्म ने हूणों को हराया था। और हां, मंदसौर को मंदोदरी का मायका भी माना जाता है। और भी बहुत कुछ है। यह सब आपको लालायित करने के लिए बता रहा हूं ताकि आप आने का मन बना लें।”

मन ने कहा, “यही तो चुनौती है। उन्होंने सोचा होगा किसे बुलाएं जो धार्मिक आस्था के व्यूह में से विज्ञान की बातें करता हुआ साफ बाहर निकल आए। हो सकता है, तब उन्हें मेरा खयाल आया हो। खैर, मैंने हामी भरी है तो जाऊंगा जरूर।”

अगले ही दिन दून एक्सप्रेस के साथ मेरठ से मंदसौर जाने वाली एक लिंक ट्रेन में आरक्षण करा लिया। तय तिथि 26 सितंबर को उस ट्रेन में रात 9.55 बजे हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से मंदसौर के लिए रवाना हो गया।

रात के अंधेरे में मथुरा, भरतपुर, गंगानगर सिटी और सुबह के धुंधलके में सवाई माधोपुर जंक्शन पहुंचा। फिर कोटा जंक्शन, बूंदी, चित्तौड़गढ़, नीमच से होता हुआ दिन में 1.40 बजे मंदसौर पहुंचा। वहां पहुंचा ही था कि वरिष्ठ पत्रकार और कार्यशाला के समन्वयक डा. घनश्याम बटवाल का फोन आया कि कहां हैं आप? मैंने बताया, मंदसौर स्टेशन पर पहुंच चुका हूं। वे बोले, “हम भी स्टेशन में पहुंच चुके हैं। बस आ रहे हैं।”

मैंने कहा, “आप पहचानेंगे कैसे मुझे? ”

“हां, ये बात तो है।”

“लेखक की पुरानी छवि में मुझे मत खोजिएगा। मैं आज का लेखक हूं। पी-कैप पहने, पीठ पर हैवरसैक लिए बैंच पर बैठा हूं।”

डा. बटवाल आए। पूछा, “आप”। मैंने कहा, “हां मैं ही हूं। आपसे मिल कर बहुत खुशी हुई।” उन्हें बातों में लगा कर आगे बढ़ा। बातें सुनते सुनते बीस-पच्चीस कदमों के बाद उन्हें अचानक कुछ याद आया। वे रुके और मुस्कुरा कर बोले, “रुकिए जरा।” उन्होंने हाथ में पकड़े थैले से एक पुष्प हार निकाला और तेजी से मेरे गले में डालते हुए बोले, “मंदसौर में आपका हार्दिक स्वागत है! ” मैं ना-नुकुर करता रह गया। वे बोले, “यह तो यहां आदर व्यक्त करने की हमारी परंपरा है।” तभी उनके साथी प्रदीप शर्मा जी मिले और उन्होंने भी पुष्पहार पहना दिया।   

33वे मुझे प्रसिद्ध पशुपतिनाथ महादेव मंदिर के ठीक सामने हरे-भरे पेड़ों के बीच होटल में ले चले। वहीं हाल में अगले दिन विज्ञान कार्यशाला का भी आयोजन होना था।

सामान उतार कर बाहर आया और चारों ओर की हरियाली का जायजा लिया। देखा, होटल के उस पार खेतों में खड़ा विशाल बरगद बुला रहा है। वह जैसे कह रहा था, दिल्ली से आए हो, आओ मिल तो लो। मैं उससे मिलने चल पड़ा। सोचा, वहां चिड़ियों से भी भेंट हो जाएगी। लोहे की जालीदार बाड़ के किनारे से सरक कर खेतों में उगी घनी घास, बाजरा और तिल की फसल के बीच से दूर खड़े बरगद की ओर बढ़ा। रास्ते में सैकड़ों बालदार इल्लियां तितली बनने से सपने बुनती हुईं, प्यूपा बनने के लिए ठौर खोजतीं तेजी से यहां-वहां आ-जा रही थीं। 

            बरगद की छांव में बैठे सलीम और अजहर से दुआ-सलाम हुई। वे खेतों से चारा लेने आए थे। मैंने बरगद की हवाई जड़ों को छूकर पूछा, “बहुत पुराना बरगद लगता है? ”

            सलीम, “चार-पांच सौ साल तो हो ही गए होंगे।”

            मैं, “यह तो चिड़ियों का घर है। खूब चिड़ियां आती होंगी? ”

            सलीम, “खूब। आजकल इसकी गूलरियां पकी हुई हैं। इसलिए उन्हें खाने हर वक्त आती रहती हैं।  

ऊंचे बरगद की शाखों पर तोते, मैनाएं, कौवे, कबूतर और कई अन्य चिड़ियां भोजन करने में व्यस्त थीं। तभी अजहर ने कहा, “शाम होते-होते इस बरगद और उधर उस पीपल पर मैनाओं के झुंड जमा हो जाते हैं और खूब चहचहाते हैं। बरगद के साथ ही यह बावड़ी भी बहुत पुरानी है।”

            “बावड़ी? बावड़ी कहां है? ”

तभी कालू काका आ गए। वे इन्हीं खेतों में झोपड़ी बना कर रहते हैं। बावड़ी की बात पर बोले, “यह, जो आरपार ढकी हुई है। पहले खुली बावड़ी थी, भीतर एक गहरा कुआं भी है। दो-एक बच्चे गिर गए थे तो इन्हें ढक दिया गया।”

अजहर ने सामने तार की जाली से भीतर बावड़ी दिखाई। सीढ़ीदार, प्राचीन और पानी से भरी। बावड़ी के सामने ऊंचे पेड़ पर ग्रे हार्नबिल यानी सलेटी धनेशों की टोली खेल रही थी। इतने धनेश एक साथ मैंने पहली बार देखे। पंद्रह-बीस तो थे ही।

जिस पेड़ पर धनेश खेल रहे थे, वह मीठी नीम से मिलता-जुलता पेड़ था, लेकिन उसकी पत्तियां बड़ी थीं। नाम पूछा तो कालू काका बोले, “हम तो इसे हड़क-नीम कहते हैं।”)

अब तक अशोक सिंह भी साथ आ बैठे थे। मैंने उन सभी से कहा, ”ये जो लंबी चोंच और लंबी पूंछ वाले धनेश हैं, आप लोगों को इनकी बात बताता हूं। इनसे हम सभी को कुछ सीखना भी चाहिए।

काका ने पूछा, ”क्या”

मैंने कहा, ”अपनी घरवाली से बहुत प्यार करना। अपनी घरवाली के सुख-दुख का बड़ा खयाल रखता है यह। अंडे देने के लिए दोनों मिल कर पेड़ का कोटर खोजते हैं। उसे बाहर से घास और बीट से लीप कर बंद करते हैं। घरवाली अंडे देने के लिए भीतर बैठ जाती है। घरवाला कोटर को बंद कर छोटा-सा छेद छोड़ देता है। घरवाली के लिए रोज भोजन लाकर उस छेद से भीतर डालता है। वह अंडे देती है। एक-एक कर अंडों से चूजे निकलते हैं। चूजे उड़ने लायक होने पर घरवाली एक-एक करके उन्हें कोटर से बाहर भेजती है। फिर बंद दीवाल तोड़़ कर वह बाहर आती है और दोनों साथ निभाते हैं।”

कालू काका ने चकित होकर कहा, ”बताओ, एक छोटी-सी चिड़िया इतना-कुछ कर रही है। ये पता नहीं था हमें।“ फिर उन्होंने सामने इशारा करके  बताया, ”वह अशोक की जमीन है। उसमें देखो, कटहल का कितना बड़ा पेड़ है। मंदसौर में शायद ही इससे बड़ा कटहल का पेड़ हो। बहुत बड़े कटहल लगते हैं उस पर।”

55खाना खाकर पशुपतिनाथ मंदिर और आसपास देखने निकला। मंदिर में पशुपतिनाथ की पत्थर की अष्टमुखी मूर्ति है जिसकी ऊंचाई साढ़े सात फुट, गोलाई 11 फुट और भार 4.6 क्विंटल बताया जाता है। कहते हैं, यह मूर्ति शिवना नदी में 10 जून 1940 को मिली थी। अब तक शिवना नदी से पुरातात्विक महत्व की लगभग 50 प्रस्तर मूर्तियां मिल चुकी हैं।

माना जाता है कि आज के मालवा और मेवाड़ की सीमा पर स्थित मंदसौर नगर प्राचीनकाल में दशपुर कहलाता था। दशपुर नगर की स्थापना शायद 2,000 वर्ष ई. पू. में हो चुकी थी। कहा यह भी जाता है कि महाभारत काल में यहां दशामा लोगों का राज था। शायद उनका दशामा जनपद ही आगे चल कर दशपुर बन गया हो। कुछ लोग मंदसौर को मंदोदरी का मायका भी बताते हैं।

पुरातात्विक खोजों से जो इतिहास सामने आया है, उसके अनुसार छठी शताब्दी में यशोधर्म मालवा का राजा था। उसने 528 ईं में हूण शासक मिहिरकुल को पराजित किया था। तब राजा यशोधर्म ने सौंधनी में प्रस्तर के दो विशाल विजय स्तंभ स्थापित किए थे जो भारत के प्राचीनतम विजय स्तंभ हैं। मैंने साथियों से विजय स्तंभ देखने की इच्छा जताई तो उन्होंने अगले दिन सौंधनी ले चलने का आश्वासन दिया।

कुछ लोग दशपुर को महाकवि कालीदास की जन्मभूमि भी बताते हैं। वे कहते हैं, कालीदास जब दशपुर को जानते होंगे तभी तो उन्होंने ‘मेघदूत’ में मित्र मेघ को अलकापुरी जाने के लिए रामगिरि से विदिशा और उज्जयिनी होते हुए विशेष रूप से दशपुर जाने को यह कहा होगाः

”मित्र मेध, चंबल को पार कर अपने हृदय को दशपुर की रमणियों के नेत्रों का आकर्षण बनाते हुए आगे बढ़ना। वे भ्रूविलास में निपुण हैं। वे पलकों को ऊपर उठाती हैं तो उनके नयनों की श्वेत-श्याम आभा ऐसी लगेगी मानो उन्होंने कुंद-कुसुम पर मंडराते भौंरों की छटा चुरा ली हो।”

अगले दिन यानी 28 सितंबर को कार्यशाला का आयोजन होना था। तैयारियां चल रही थीं। मैं सुबह छह बजे के बाद फिर बरगद के पास पहुंचा। कालू काका जमीन में कुछ खोजते हुए से दिखे। पूछा, ”क्या खोज रहे हैं? ”

”खोज नहीं रहा हूं, यहां-वहां चलती इन इल्लियों को देख रहा हूं।”

”काका, ये तो तितलियां बनेंगीं।”

सुन कर वे बहुत खुश हो गए। चहक कर बोले, ”वही तो। लोग जानते ही नहीं। अरे ये सब तितलियां बनेंगीं। आपको पता है, जानकर अच्छा लगा।”

मैंने पास में चल रहे सफेद बगुलों की ओर देखा तो वे बोले, “फोटो खींच लो। बहुत सीधे पंछी हैं ये।” फिर बोले, “आपको सांप दिखाता, लेकिन अभी कोई दिख नहीं रहा है।”

“सांप? ”  मैं चौंका। पूछा, “यहां सांप हैं? ”

वे बोले, “बहुत हैं। अशोक की एक गाय को पिछले दिनों काट लिया था। देखते-देखते मर गई।” मैं सिहर उठा। कल शाम मैं खेतों में बिना रास्ते के ही, घास में चलते-चलते बरगद तक चला आया था।

कार्यशाला में भाग लेने के लिए लोग आने शुरू हो गए थे। नाश्ते में गर्मा-गर्म पकौड़े परोसे जा रहे थे। मैं भी तैयार होकर कार्यशाला के हाल की ओर बढ़ा।

44कार्यशाला शुरू हुई। समन्वयक डा. धनश्याम बटवाल ने जीवंत संचालन शुरू किया। लोग आए और बोले। माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल के संस्थापक-संचालक पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर जी ने कहा कि हमने अपनी नदियों को मैला करके नालों में बदल दिया है। उपजाऊ खेतों में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक झौंक कर उन्हें बंजर बना दिया है। हमें लोक विज्ञान और विज्ञान की समझ के साथ यह प्रदूषण रोकना होगा।

सांसद श्री सुधीर गुप्ता ने कहा कि हमारा देश प्रारंभ से ही प्रकृति प्रेमी देश रहा है। हमें लोक जीवन से मिले ज्ञान का भी विज्ञान के रूप में उपयोग करना चाहिए। उन्होंने प्रकृति के शोषण पर गहरी चिंता जताई। अपने व्याख्यान में मैंने समाज में वैज्ञानिक चेतना बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि हमें समाज को कुरीतियों तथा अंधविश्वासों से मुक्त कराने के लिए वैज्ञानिक जागरूकता फैलानी होगी। आया हूं तो धर्म और विज्ञान की बात भी करूंगा। धर्म और विज्ञान में थोड़ा अंतर है।  धर्म में जो लिखा है वह अकाटय है, उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। जबकि, विज्ञान में किसी भी सिद्धांत को कभी भी चुनौती दी जा सकती है। प्रयोग, प्रेक्षण, व्याख्या और निष्कर्ष के आधार पर यानी ‘विज्ञान विधि’ से कोई भी विज्ञान के सिद्धांत का संशोधन करके उसे आगे बढ़ा सकता है। जल विज्ञानी श्री कृष्णगोपाल व्यास ने लोक विज्ञान पर प्रकाश डाला और इस प्रकार के ज्ञान के संग्रह पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अपनी नदियों को प्रदूषण से बचाना हमारा कर्तव्य है। वरिष्ठ पत्रकार वसंत निरगुणे ने लोक विज्ञान को शाश्वत परंपरा और जीवन का अटूट हिस्सा बताया।

कार्यशाला में कृषि वैज्ञानिक श्री नरेंद्र सिंह सिपानी, वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश जोशी, इलैक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार श्री प्रदीप शर्मा, श्री हरनाम सिंह आदि ने भी वैज्ञानिक चेतना के बारे में अपने विचार व्यक्त किए।

66 कार्यशाला के बाद हमें श्री सिपानी का हरा-भरा कृषि अनुसंधान फार्म देखने का मौका मिला। फार्म में अरहर और सोयाबीन की नई किस्मों के प्रजनन का काम चल रहा था। उनके फार्म में फलों से लदे आंवले के वृक्षों को देखकर मन बहुत खुश हुआ। उनके कार्यालय में आगंतुक रजिस्टर में मैंने फार्म में किए जा रहे प्रयोगों और उसकी हरियाली से मिली खुशी के बारे में लिखा। यह भी लिखा कि फार्म में खड़े नीम के पेड़ ने धीरे से मुझसे पूछा- दिल्ली से यहां हमसे मिलने आए, बहुत अच्छा लगा। विजयदत्त श्रीधर जी ने लिखा- इस आवाज में एक आवाज मेरी भी। बाद में हम पुरातत्व संग्रहालय देखने गए जहां मंदसौर जिले में खुदाई में मिली तमाम प्राचीन मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं। उन्हें देखकर लगता रहा कि मंदसौर की गोद में अभी न जाने कितना इतिहास छिपा हुआ है।

मेरा मन मालवा के राजा यशोधर्म के पत्थर से बने विजय स्तंभों को देखने के लिए बेचैन था और आसपास के किसी स्कूल में जाकर बच्चों से बातें भी करना चाहता था। मुराद पूरी हुई, सुबह मित्र प्रदीप शर्मा आ गए और अपनी मोटरसाइकिल में बैठा कर चार-पांच किलोमीटर दूर सौधनी गांव में ले गए, जहां वे विजय स्तंभ हैं। शांत, एकांत सौंधनी में प्राचीन स्मारक दो रखवाले मिले-गबरू और रमेश। रमेश ने बताया वह आदिवासी क्षेत्र झाबुआ से है और मजदूरी कर रहा है। कुछ देर आंगन में खड़े छतनार बरगद के नीचे बैठे और मटके का ठंडा पानी पिया। सामने धोने के लिए गबरू और रमेश के बर्तन और पानी से भरी बाल्टी रखी हुई थी। अचानक वहां एक लंगूर आया और बाल्टी में मुंह डाल कर आराम से पानी पीने लगा। हमने गबरू से पूछा, ”क्या यह डरता नहीं? ”

“नहीं, रोज आता है। अब पहचान हो गई है।”

मैंने पूछा, “इसका नाम क्या है? ”

गबरू ने कहा, “नाम तो कुछ नहीं है।”

मैंने कहा, “पहचान बढ़ाने के लिए इसका कोई नाम रख दो। राजू भी कह सकते हो। रोज राजू कहोगे तो खुश हो जाएगा। समझ जाएगा कि उससे बात हो रही है और उसे बुला रहे हो।”

उस शांत-एकांत जगह पर गबरू और रमेश के पास केवल हम तीन ही दर्शक थे- मैं, मित्र प्रदीप और हनुमान लंगूर।

प्रदीप ने पूछा, “क्या यहां दर्शक आते रहते हैं? ”

“कभी-कभी आ जाते हैं। ज्यादातर समय तो हम दोनों ही यहां रहते हैं, ” गबरू ने कहा।

77हम पुरातात्विक दृष्टि से संरक्षित स्मारक के उस प्रांगण की ओर मुड़े जहां खुदाई में मिली प्राचीन मूर्तियां और विजय स्तंभ खड़ा था। सीढियों के पास ही प्रस्तर पर खुदा  था, “ये स्तंभद्वय महाराज यशोधर्म द्वारा स्थापित किए गए थे। इन पर यशोधर्म का अभिलेख है जिसमें उसकी हूणों पर विजय तथा अन्य महान कार्यों का वर्णन है। उत्खनन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह स्तंभ अपने मूल स्थल पर ही हैं। इसी स्थल पर दो चौकोर फलकों पर विपरीत दिशाओं में देखते हुए दो सिंह उकेरे हुए हैं। ये संभवतः स्तंभ के बोधिक थे।”

हम आज से 1,486 वर्ष पहले 528 ईस्वी. में मालवा के राजा यशोधर्म द्वारा स्थापित विजय स्तंभों के सामने खड़े थे जिनमें से एक स्तंभ तो आज भी खड़ा है लेकिन दूसरा स्तंभ किसी प्राकृतिक आपदा से गिर कर टूट गया है। उसके तीन खंड पास में ही सजा कर रख दिए गए हैं। एक ही पत्थर से बने स्तंभ की ऊंचाई 40 फुट, गोलाई 3.5 फुट और वजन 200 टन बताया गया है। कहा जाता है, इन स्तंभों को नागप्पा और दासप्पा नामक दो दक्षिण भारतीय कारीगरों ने बनाया था। इन्हें सबसे पहले सन् 1875 में अंग्रेज अधिकारी सलविन ने देखा था।

सीढ़ियां चढ़ कर हम ऊपर आए और पेड़ों के बीच खड़े होकर काफी देर तक सदियों से खड़े स्तंभ और भग्न स्तंभ को देखते रहे। तेज धूप थी और चारों ओर सन्नाटा था। मुझे प्रकृति के कवि सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियां याद आ रही थी, ‘एक सौ वर्ष नगर उपवन, एक सौ वर्ष विजन वन/यही तो है असार-संसार, सृजन सिंचन संहार।’ कभी एक प्रतापी राजा ने अपने विजय का जश्न मनाते हुए ये पाषाण स्तंभ स्थापित किए होंगे जिन्हें समय के साथ लोग भूल गए। समय बदलता गया, आसपास नए गांव और नगर पनपे और उनके बीच इतिहास का वह कालखंड काल के गर्त में समा गया। आज उन्हें खोज कर उनके बहाने हम फिर छठी शताब्दी तक की वैचारिक काल यात्रा कर रहे हैं।

हम स्मारक के गेट से बाहर निकले। गेट के आसपास कई बकरियां आकर चरने लगीं। हम चुपचाप अतीत को याद करते हुए आगे बढ़े। गांव की उस सड़क के दोनों ओर खूब हरियाली थी। सड़क के किनारे पेड़ों पर जैसे किसी ने सोने की कूंची फिरा दी थी। पेड़ कुंद की तरह चमक रहे थे। मैंने पूछा तो मित्र प्रदीप ने एक पेड़ के पास मोटरसाइकिल रोकी और बताया कि ये खेजड़ा के पेड़ हैं जिन पर आजकल बहार आई हुई है। मधुमक्खियों का उत्सव चल रहा है। हमने देखा, बड़ी संख्या में मधुमक्खियां और अन्य कीट फूलों पर मंडरा रहे थे। खेजड़ा के उस पेड़ के साथ मालवा के प्रसिद्ध बेर के पेड़ ने गलबहियां डाली हुई थीं।

88आगे बढ़े और एकाध किलोमीटर आगे आने पर एक स्कूल दिखाई दिया। मित्र प्रदीप ने कहा, “आप स्कूल में बच्चों से मिलना चाहते थे। लीजिए, आ गया स्कूल।” पास में गए तो देखा ‘शासकीय माध्यमिक विद्यालय, सेतखेड़ी, जिला-मंदसौर’ लिखा है। वहां बच्चों से मिले। स्कूल के प्राध्यापक भगवान सिंह अंजना जी हैं। शिक्षक ईश्वर लाल पाटीदार जी ने बच्चों से प्रार्थना करवाई जिसमें हमने भी भाग लिया। उनसे पूछा तो पता लगा उनका यह विद्यालय 15 वर्ष पहले सन् 1999 में खुला था। वहां आसपास के ग्रामीण इलाके के 51 बच्चे पढ़ रहे हैं जिनमें से 28 लड़कियां हैं। लड़कियों की संख्या अधिक देख कर हमें बहुत खुशी हुई।

99मैंने बच्चों के साथ विज्ञान की बहुत सारी बातें की और उनके बीच बैठ कर उन्हें बताया कि विज्ञान कठिन नहीं होता। हम अपने आसपास की दुनिया को गौर से देखें तो हमें उसमें विज्ञान दिखाई देगा। हर चीज को जानने की जिज्ञासा हमें विज्ञान का ज्ञान देती है। इसलिए हमें हर चीज के बारे में असलियत का पता लगा कर ही उस पर विश्वास करना चाहिए। कुरीतियों और अंधविश्वासों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। बच्चों को मैंने अपना गीत ‘जीवन तेरे रूप अनेक’ सुनाया। सभी बच्चों ने मेरे स्वर में स्वर मिला कर वह गीत गाया।

होटल की ओर लौटते समय चंद्रपुरा गांव में मित्र प्रदीप ने कबीट का एक पुराना पेड़ दिखाया जिसपर गोल-गोल फल लगे हुए थे। प्रदीप ने बताया कि उन की नानी बताती थी कि इसके फलों का गूदा दूध में खाने से जोड़ों और मांसपेशियों का  दर्द दूर होता है। इससे अनिद्रा का भी इलाज होता है। उन्होंने बताया कि बचपन में उन्होंने ये फल खूब खाए थे।

होटल लौट कर आसपास नीम, इमली, पीपल और बबूल के पेड़ों को एक बार फिर भर नजर देखा और फिर सामान उठा कर मित्र प्रदीप को अलविदा कहा। डा. बटवाल और उनके बेटे के साथ, उनकी गाड़ी में मंदसौर स्टेशन की ओर चला। रात के खाने के लिए होटल के विनीत मैनेजर जोशी जी ने पराठे रख दिए। डा. बटवाल ने भी फलों की थैली पकड़ा कर कहा, रास्ते में खाइएगा। इस आत्मीय विदाई से मन भीतर-भीतर बहुत भीगता रहा। डा. बटवाल तो ट्रेन में टी टी से भी बोल गए कि हमारे अपने हैं, इन्हें प्रेम से ले जाना।

ट्रेन छूटी तो अपनी कैबिन के एकांत में बैठा खिड़की से बाहर देखता रहा। दोपहर ढल चुकी थी। गांव, मकान, खेत, पेड़-पौधे और पहाड़ियां पीछे छूटने लगीं। अकेलापन घेरने लगा। सहसा आसमान की ओर नजर गई तो नीले आसमान में रूई के विशाल फाहों की तरह यहां-वहां विचरते बादल दिखाई दिए। अचानक मन में संज्ञा उपाध्याय की कविता ‘बादल का वह नटखट बच्चा’ कौंध गई। मंदसौर से कोटा तक आसमान में बादल के नटखट बच्चो को देखते समय बीता। उस दिन लगा कि एक अकेली कविता भी हमें कितना कुछ दे जाती है! देखते-देखते बादल जीवंत हो उठे और मैं मन ही मन वह कविता दुहराता रहा, ‘बादल का वह नटखट बच्चा, हाथ छुड़ाकर अपनी मां से/आगे-आगे दौड़ गया है, बादल का वह नटखट बच्चा! घूम रहा है जाने कब से, तरह-तरह के रूप बदलके….’

रात भर ट्रेन चली- खट्-खटाक-खट्….खट्-खटाक-खट् और मन में मंदसौर की यादें लेकर अलसुबह दिल्ली पहुंच गया।

 

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