मंगल पर एक नजर-देवेंद्र मेवाड़ी

11

साथियो, कल हमारा मंगलयान मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंच जाएगा। आइए, उसकी अगवानी में आज मंगल ग्रह पर एक नजर डालते हैं। मंगल ग्रह सूर्य से औसतन 22 करोड़ 79 लाख किलोमीटर दूर है। यह कभी पृथ्वी के 5 करोड़ 60 लाख किलोमीटर पास होता है तो कभी 40 करोड़ किलोमीटर दूर। हमारे पुरखों ने सदियों पहले इस लाल ग्रह को अपनी कोरी आंखों से देख लिया था। प्राचीन रोम और यूनान के निवासियों ने इसे युद्ध का देवता माना। गैलीलियो ने इसे पहली बार सन् 1610 में दूरबीन से देखा। उसने कहा, मंगल भी एक गोला है। इस तरह पता लग गया कि वह कोई देवता नहीं बल्कि हमारी पृथ्वी की तरह ही एक ग्रह है। मंगल ग्रह पृथ्वी से छोटा है। पृथ्वी के गोले का व्यास लगभग 12,656 किमी. और मंगल का व्यास करीब 6792 कि.मी. है। पृथ्वी की तरह वह भी अपनी धुरी पर झुका हुआ है जिसके कारण वहां भी ऋतुएं होती हैं- वसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतु। मंगल ग्रह पृथ्वी के 687 दिनों में सूर्य की एक परिक्रमा करता है इसलिए मंगल का वर्ष हमारे 687 दिनों के बराबर होता है। और, उसका एक दिन हमारे 24 घंटे 39 मिनट 36 सेकेंड के बराबर होता है। मंगल की धरती पर लाल-गेरूई मिट्टी और धूल की भरमार है। इसलिए वह लाल दिखाई देता है। वहां रेत और बालू के विशाल मैदान हैं, टीले हैं। धूल की जबरदस्त आंधियां चलती रहती हैं। विशाल गड्ढे, खाइयां, दरारें और ज्वालामुखी से बने पहाड़ हैं। मंगल ग्रह का 27 किमी. ऊंचा ‘ओलिंपस मोंस’ पहाड़ सौरमंडल का सबसे ऊंचा पहाड़ है। वह एवरेस्ट से तीन गुना ऊंचा है। मंगल ग्रह के ध्रुवों पर बर्फ की टोपियां दिखाई देती हैं। वे पानी और कार्बन डाइआक्साइड की बर्फ से बनी हैं। ध्रुवों के ऊपर बादल भी बनते हैं। मंगल ग्रह का वायुमंडल हल्का है। उसमें 95.3 प्रतिशत कार्बन डाइआक्साइड, 2.7 प्रतिशत नाइट्रोजन, 1.6 प्रतिशत आर्गन और मात्र 0.1 प्रतिशत आक्सीजन है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि करोड़ों वर्ष पहले मंगल पर घना वायुमंडल था, वहां बादल गरजते और बरसते थे, नदियां बहती थीं, झील-तालाब और शायद सागर भी थे। धीरे-धीरे सब कुछ सूख गया और रह गया केवल रूखा-सूखा मंगल। मंगल ग्रह के दो बैड़ौल चांद हैं: फोबोस और डेमोस। फोबोस बड़ा है। वह एक दिन में दो बार पश्चिम में उग कर पूर्व में अस्त होता है। डेमोस छोटा है और धूल मिट्टी से पटा पड़ा है।
पहले मंगल ग्रह पर नहरों और जीवों की कल्पना की गई थी जो केवल कपोल-कल्पना ही साबित हुई। जाने-माने विज्ञान कथाकार मंगल और मंगलवासियों के बारे में रोमांचक कहानियां लिखते रहे हैं। एच.जी. वेल्स के ऐसे ही एक उपन्यास ‘वार आफ द वल्र्ड्स’ पर आर्सन वैलीज के निर्देशन में जब 30 अक्टूबर 1038 को एक रेडियो नाटक प्रसारित हुआ तो अमेरिका और कनाडा में हजारों लोग सड़कों पर निकल आए। उन्हें लगा, मंगलवासियों का हमला हो गया है! हमारा मंगलयान मंगल ग्रह के अन्य रहस्यों के साथ-साथ वहां जीवन की भी खोज करेगा। कल उसके मंगल की कक्षा में प्रवेश करने की रोमांचक घड़ी के चश्मदीद गवाह बनिएगा, टेलीविजन के पर्दे पर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *