जैसे किसी नदी से मिला मैं ….

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उनसे मिलना जैसे किसी नदी से मिलना था।
नदी भी कौन? मां नर्मदा। वही नर्मदा का धीर, गंभीर स्वभाव और उसी के जल की तरह बहती वाणी। भोपाल में इस 86 वर्षीय तपस्वी पदयात्री से मिलना सचमुच नर्मदा से मिलने जैसा था।
ढलती शाम के समय जब मैं तन्मय होकर सरन सदन की छत के तार पर बैठी ओरिएंटल मैगपाइ रोबिन का गीत सुन रहा था तब सामने परिसर के पथ पर मैंने खादी के कुर्ता-पाजामे में अकेले, चुपचाप, धीरे-धीरे चलते बल्कि बहते, उस धीर-गंभीर व्यक्ति को देखा जरूर था, लेकिन जानता नहीं था कि वे कौन हैं।
जाना तो पलाश होटल में पहुंच कर। पता लगा कि वे नर्मदा के समर्पित यात्री अमृत लाल बेगड़ हैं। उनके पास गया, मिला और देर तक बातें कीं, नदियों की बातें। बातों-बातों में वे बोले, “ जब मनुष्य सभ्य नहीं था तो नदियां स्वच्छ थीं। वह सभ्य हुआ तो नदियां मैली हो गईं।”
फिर पीड़ा के साथ बोले, “हम हत्यारे हैं, अपनी नदियों के हत्यारे। क्या हाल बना दिया है हमने नदियों का? ”
उस सच का क्या उत्तर देता! मैंने कहा, मैं उत्तराखंड के पहाड़ों से हूं। आपकी बात सुन कर अपने जनकवि मित्र गिरदा की एक कुमाऊंनी कविता याद आ रही है। कविता है, “मेरि कोसि हरै गे कोसि।” मतलब, “मेरी कोसी खो गई है कोसी।” कोसी वहां एक नदी है, जंगलों के उजड़ने से जिसका पानी सूखता जा रहा है। वेगड़ जी, गिरदा कहते हैं, “दादा-दादी कहते थे, किस तरह इठलाती हुई आती थी कोसी।…..अंजुरी में भरे उसके पानी में दूर ब्याही हुई बेटियां अपने माता-पिता, भाई-बहनों की छवि देखती थीं….कहां खो गई वह कोसी? मैली-कुचैली और सूख कर तर्जनी-सी रह गई है वह कोसी”….और भी बहुत कुछ। वे ध्यान से सुनते रहे और बोले, ”बहुत अच्छी है। सही कहा है उन्होंने।”
मैंने कहा, “आपने अपनी नर्मदा-यात्रा का चित्रांकन भी स्वयं ही किया है? ”
बोले, “हां, मूलतः तो मैं चित्रकार ही हूं, मां नर्मदा ने लेखक भी बना दिया। मैंने विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन में चित्रकला की पढ़ाई की है। आचार्य नंदलाल बसु का विद्यार्थी रहा हूं। प्रकृति से प्रेम करना उन्हीं की छांव में सीखा।”
वेगड़ जी ने अपने जीवन के लगभग 30 वर्ष नर्मदा की पैदल यात्रा में बिताए हैं। उन्होंने नर्मदा के उद्गम स्थल अमर कंटक से लेकर भड़ूच में नर्मदा के सागर में समाहित होने तक की पैदल यात्रा की है। इन यात्राओं में उनकी पत्नी सदा साथ रही हैं। उन यात्राओं के अद्भुत अनुभवों को उन्होंने अपने यात्रा वृत्तांतों की पुस्तकों में संजोया है। उनकी कुछ प्रसिद्ध पुस्तकें हैं: नर्मदा की परिक्रमा, तीरे-तीरे नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा। इन पुस्तकों का अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। एक पुस्तक का इन दिनों इतालवी भाषा में अनुवाद हो रहा है।
वेगड़ जी को जैसे कुछ याद आ गया। बोले, “नर्मदा की पैदल यात्रा में मैंने नर्मदा का सौंदर्य तो देखा ही, लोगों के हृदय का सौंदर्य भी देखा।” फिर उदाहरण देते हुए कहने लगे, “एक बार नर्मदा की सहायक नदी बंजर के किनारे चल रहे थे। यह नदी कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से होकर गुजरती है। हम नौ लोग थे। 32 किलोमीटर चले थे कि रात हो गई। दूर एक गांव दिखा जिसमें दीयों की तरह रोशनी टिमटिमा रही थी। मैंने कहा, कहां जाएं। मेरी पत्नी बोली, कहीं भी। तभी साइकिल पर जाता हुआ एक आदमी देखा। वह दूसरे टोले के आखिरी मकान में रहता था जो वहां से डेढ़ किलोमीटर और आगे था। उसके साथ गए। घर में उसकी पत्नी और दो बच्चे थे।”
“हमने उसकी पत्नी से कहा, ‘हम बिन बुलाए मेहमान हैं, तो जानते हैं उसने क्या कहा? एक क्षण भी कुछ नहीं सोचा और हंस कर कहा, ‘बिन बुलाए मेहमान तो भगवान का रूप होते हैं!’ हमें खाना खिलाया और बोली, ‘घर में जहां ठीक लगे, वहां सो जाइए।’ यह थी उनके निर्मल हृदय की सुंदरता।”
“एक बार यात्रा में एक किसान मिला। वह बोला, “इस संसार में कोई अपना नहीं होता।” फिर बोला, “कोई पराया भी नहीं होता। आप आइए, घर में रहिए।” उसकी इस बात पर मैं आज भी सोचता रहता हूं।”
“एक किस्सा और सुनिए। एक बार मैं और मेरा एक विद्यार्थी एक गांव में गए। वहां दो गोस्वामी भाई मिले। हमने उनके घर में शरण ली। पच्चीस साल बाद फिर उस गांव में गए। इस बार हम आठ लोग थे। गांव में धर्मशाला बन चुकी थी। मैंने कहा, हम गोस्वामी भाइयों के घर जाएंगे। वहां गए। घर में केवल बहू थी। गोस्वामी भाइयों के बारे में पूछा तो उसने कहा, वे तो अब नहीं रहे। लेकिन, आप लोग यहीं रहिए। अपना सामान ले आइए।
“देखिए, पच्चीस साल बाद! उस बहू के आग्रह पर हम वहीं रहे। उसने हम आठों लोगों को खाना खिलाया। यह है, हृदय का सौंदर्य। असल में गांव के उन सीधे-सादे लोगों के पास संस्कृति है, हमारे पास सभ्यता है। उनमें और हम में यहीं अंतर है। तभी कहता हूं, हम सभ्य लोगों ने अपनी नदियां मैली कर दी हैं।” होटल के एक प्यारे से किशोर बेयरे ने हमारा फोटो खींच लिया। उसका आभार।
अगले दिन वे मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् के बरामदे में माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल के संस्थापक श्री विजयदत्त श्रीधर के साथ मिले। मैंने ‘नवनीत’ के मनीषी संपादक नारायणदत्त जी को याद करते हुए उनकी सुंदर लिखावट की बात तो श्रीधर जी बोले, “लिखते समय ये अमृतलाल वेगड़ जी भी वैसी ही मोती पिरोते हैं। जानते हैं इन्हें? ”
मैंने कहा, “जी हां, इनसे मिल चुका हूं मैं।” वेगड़ जी ने भी कहा, “हम मिल चुके हैं।”
श्रीधर जी ने कहा, “इन्हें कागज और कलम दीजिए। देखिए कितना सुंदर लिखते हैं ये।”
मैंने वेगड़ जी को पैड और पेन दिया। उन्होंने खड़ी दीवाल पर पैड टिका कर बेहद खूबसूरत अक्षरों में लिखाः “नर्मदा मेरे जीवन का ध्रुवतारा है। वहीं मेरे जीवन का पथ निर्धारित करती है।- अमृतलाल, भोपाल, 2.8.14”
वे शब्द मेरे पास सुरक्षित हैं।

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